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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय ९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – ९
कृष्णांश ‘आह्लाद’ (आल्हा) का जन्म

सूत जी बोले — राज-सेवक दोनों भाइयों ने कालिय (करिया) को पराजित करके गोपालक राज्य के अधीश्वर राजा दलवाहन के यहाँ प्रस्थान किया । वहाँ सहस्र चण्डी के अनुष्ठान में हवन का आरम्भ होने जा रहा था, जिसमें अनेक राजागण उपस्थित थे । इन दोनों भाइयों ने (देवी के बलिदानार्थ) उपस्थित उन भैंसों को पकड़कर अपने अधीन कर रखा था जिन्हें अन्य कोई राजा नहीं पकड़ सकता था । om, ॐराजा की दोनों कन्याओं ने उन्हें पहले ही बाँध रखा था । प्रसन्न होकर राजा ने अपनी दोनों कन्याएँ इन दोनों भाइयों को प्रदान किया । देवकी देशराज को और ब्राह्मी वत्सराज को देकर दुर्गा जी की आज्ञा से उन रूप यौवनशालिनी कन्याओं का पाणिग्रहण संस्कार सविधान सुसम्पन्न कराया ।

उन कन्याओं के साथ लक्षावृत्ति नामक वेश्या, जो नृत्य एवं गान में अत्यन्त निपुण थी, और मेघ मल्हार राग गाने वाली उसकी सुन्दरी सखियाँ भेजी गई तथा सौ हाथी, पाँच सहस्र घोड़े और चालीस पालकी भी राजा दलवान ने सप्रेम प्रदान किया । अत्यन्त धनराशि और अनेक दास दासी गणों समेत उन कन्याओं को लेकर सविधान विवाह हो जाने के उपरान्त अपनी महावती पुरी में वे दोनों भाई चले आये । मलना ने उस वधू को देखकर वह अमूल्य (नौलखा) हार, ब्राह्मी को सोलह शृंगार तथा बारह आभूषण प्रदान किया। परमानन्द मग्न होकर राजा परिमल ने दश गाँव जिसमें भाँति-भाँति की जाति के मनुष्य अधिक संख्या में रह रहे थे, वीर देशराज को प्रदान किया । उसी स्थान में ये दोनों पराक्रमी भाई रहने लगे । शिव की आज्ञावश जिस समय देवसिंह ने जन्म ग्रहण किया उसी समय देवकी ने गर्भधारण किया था, समय पाकर गौरवर्ण, कमलव नेत्र एवं अपनी आभा से देदीप्यमान सन्तान के उत्पन्न होते ही देवताओं के सहित इन्द्र आनन्दित हुए । शंखों की ध्वनि और बार-बार जय शब्द होने लगे । दिशाएँ हरी-भरी दिखाई देने लगी, उसी भाँति आकाश में ग्रहगण प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे । वेद-शास्त्र के पारगामी अनेक ब्राह्मण विद्वानों ने वहाँ एकत्र होकर उस शिशु का जातकर्म एवं नामकरण सविधान सुसम्पन्न किया ।

शुभ एवं प्रसन्नमुख वाले उस पुत्र को, जो भाद्र कृष्ण की पष्ठी चन्द्रवार के दिन अरुणोदय बेला तथा कृत्तिका नक्षत्र में उत्पन्न एवं अपने पितृवंश को यशस्वी बनाने वाला था, राम का अंश जानकर उसका ‘आह्लाद’ (आल्हा) नामकरण किया । वह बालक इसी नाम से इस भूतल में ख्याति प्राप्त किया। इस बालक के जन्मग्रहण करने के एक मास पश्चात् ब्राह्मी ने भी पुत्ररत्न उत्पन्न किया, जो गौरवर्ण, लम्बी भुजाएँ, विशालवक्षस्थल, तथा धर्म-पुत्र (युधिष्ठर) का अंश था । उस समय ब्राह्मणों ने उस बच्चे को देखकर, जिसका शुभ-प्रसन्नमुख और चरण-तल, सुन्दर कमल चिह्न से विभूपित था, महाबली होने के नाते उसको ‘बलस्वामी’ (मलखान) नामकरण ब्राह्मणों ने तीसरे वर्ष की अवस्था प्राप्त होने पर उस सबल एवं कृष्णांश (से उत्पन्न उदय) के दर्शनाभिलाषी इन्द्र घोड़े पर बैठकर वहाँ आये, जहाँ वह चन्दन के वन में अपने भाइयों के साथ बाल-क्रीडा में निमग्न हो रहा था । उस समय आकाश में स्थित इन्द्र को देखकर उस बालक ने अट्टहास (ठठाकर हँसा) किया, इधर हरिणी नामक बड़वा (घोड़ी) भी इन्द्र के उस दिव्य उच्चैःश्रवा नामक घोड़े के पास पहुँचकर उसके द्वारा गर्भ धारणकर पुनः अपने घर लौट आई। पश्चात् वर्ष की समाप्ति में उसने कपोत (कबूतर) नामक एक पुत्र (अश्व) उत्पन्न किया । पाँचवें वर्ष के आरम्भ में इन बालकों ने विद्याध्ययन आरम्भ किया। शिवशर्मा नामक ब्राह्मण की, जो सम्पूर्ण विद्या में निपुण थे, भक्ति-श्रद्धा से सेवा कर रहे थे, जो इन्हें शिक्षा दे रहे थे । आठ वर्ष की अवस्था में वह उदयसिंह अध्ययन करने वाले सभी बालकों में कुशाग्र बुद्धि हुआ, पत्रादि-लेखन भली-भाँति कर लेता था ।
(अध्याय ९)

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