भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय १३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – १३

ऋषियों ने कहा — मुने ! इन दोनों माहिष्मती एवं महावती (महोबा) वालों का आपस में किस मास में कितने दिनों तक युद्ध होता रहा । पश्चात् अपनी राजधानी में पहुँचकर महावती (महोबा) वालों ने क्या किया ?

सूत जी बोले — उन दोनों का भीषण संग्राम पौष मास से आरम्भ होकर समान रूप से सौ दिन तक होता रहा । om, ॐइस प्रकार ज्येष्ठ में वे महावती के वीर अपने घर पहुँचकर अनेक प्रकार के वाद्यों की हर्ष ध्वनि करने लगे । बली एवं विनयी उन अपने पुत्रों की विजय ध्वनि को सुनकर राजा परिमल ने ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें अनेक भाँति के दान प्रदान किये और वहाँ के प्रत्येक प्राणी सुख का अनुभव करने लगे । इस विजय-समाचार को सुनकर पृथ्वीराज ने विनय-विनम्र पूर्वक नमस्कार के उपरान्त महाबलवान् बलखानि (मलखान) से कहा — वीर ! आधा कोटि द्रव्य मैं आपको दे रहा हूँ, इसे ग्रहणकर सुख का अनुभव करते हुए आप माहिष्मती का राज्य मुझे लौटा दें । आपको नमस्कार है, प्रभो ! मैं इतना ही द्रव्य प्रत्येक वर्ष समर्पित करता रहूँगा । इसे स्वीकार कर बलखानि (मलखान) ने उन्हें वह राज्य लौटा दिया पश्चात् अपने घर चले गये ।

भृगुश्रेष्ठ ! उदयसिंह के तेरह वर्ष की अवस्था में भगवान् ने जिस प्रकार की लीला की है, मैं बता रहा हूँ, सुनो । भाद्रपद (भादों) मास की शुक्ल त्रयोदशी के दिन आह्लाद (आल्हा) ने उदयसिंह को साथ लेकर अनेक हाथी, घोड़े, रथ एवं द्रव्य समेत गया में पिण्डदानार्थ प्रस्थान किया । उस यात्रा में उदयसिंह बिन्दुल (बेंदुल) पर, मलखान हरिणी पर, देवसिंह पपीहा पर और सुखखानि कराल नामक घोड़े पर आसीन थे । ये चारों दो दिन की यात्रा कर गया क्षेत्र पहुँच गये। वहाँ पूर्णिमा से आरम्भ कर अगले (क्वार के प्रथम) पन्द्रह दिन (पूर्णपितृयज्ञ) तक उन्होंने सोलह श्राद्धों को सुसम्पन्न किया । जिसमें उन्होंने सौ गजराज, सौ रथ और सुवर्ण की मालाओं से विभूषित एक सहस्र घोड़े का दान करते हुए गौ, हिरण्य रत्न एवं अनेक भाँति के वस्त्रों को अर्पित किया पश्चात् सुफल होने पर घर चलने के लिए निश्चित किया । उनके यहाँ की रहने वाली लक्षावर्ति (लखपातुर) नामक वेश्या ने भी बदरिकाश्रम में जाकर अपने प्राण परित्यागकर अप्सरत्व की प्राप्ति की (अर्थात् पुनः अप्सरा हो गई) ।

गया जी से लौटकर वे सब काशी में आकर निवास करने लगे, क्योंकि पूर्णचन्द्र (पूर्णिमा) के दिन राहू द्वारा चन्द्रमा में ग्रहण होने के नाते चारों ओर अंधकार हो गया था । उसमें स्नानार्थ अनेक देश के राजा काशी में आकर रह रहे थे । उनमें शार्दूल (बघेल) वंशीय नेत्रसिंह नामक राजा भी उपस्थित था, जो भाँति-भाँति की धातुओं से विभूषित एवं रमणीक उस हिमालय के प्रदेश का निवासी था । वीर रत्नभानु के निधन होने के उपरान्त भयभीत होकर नेत्रसिंह राजा ने नेत्रतुंग नामक स्थान पर पहुँचकर इन्द्र की आराधना की । बारह वर्ष के उपरान्त आराधना से प्रसन्न होकर देवराज (इन्द्र) ने उन्हें ढक्का (डमरू) रूपी अमृत प्रदान किया, जिसे पार्वती जी ने, अपने परम सेवक इन्द्र के लिए बनाया था । उसे राजा को देकर यह शुभ वाक्य भी कहा — नृप ! इसकी ध्वनि द्वारा तुम्हारी सेना जीवित हुआ करेगी और शत्रु के वीरभट्ट योद्धा शीघ्र नष्ट हो जायेंगे । इस डमरू की प्राप्ति के उपरान्त महाबली नेत्रसिंह ने एक सार्वजनिक नगर का निर्माण कराया, जो एक योजन (चारकोश) का विस्तृत एवं जिसके चारों दरवाजे शत्रुओं के लिए अत्यन्त अजेय थे । इस भारत प्रदेश के पृथ्वीतल में वह नेत्रसिंह गढ़ के नाम से ख्यात हुआ । काश्मीर के समीप वाला प्रदेश उसका राज्य था, जो उसकी पर्वतीय शिखरों के चारों ओर विस्तृत है । मुने ! उस नगर का पालन नेत्रसिंह ने अपने पुत्र की भाँति किया था, जिससे उस शत्रु द्वारा दुर्गम ग्राम का नाम ‘नेत्रपाल’ हुआ ।

(काणी की यात्रा में) उस बलवान् नेत्रसिंह नामक राजा के साथ स्वर्णवती (सोना) नामक उनकी पुत्री भी थी, जो रेवती के अंश से उत्पन्न होकर कामाक्षी देवी के वर प्रदान द्वारा सम्पूर्ण माया के कार्यों में निपुण हो गई थी । उस सौन्दर्यपूर्ण कन्या को जिसका मुख नवीन (द्वितीया के) चन्द्रमा के समान था, देखकर स्नान में आये हुए नृपतिगण उसके रूप-यौवन पर मुग्ध होकर अचेतन की भाँति अवाक् हो गये । उसी भाँति आह्लाद (आल्हा) भी समस्त रत्नों से अलंकृत उस सुन्दरी को देखकर जो सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त होने के नाते काम-मद-विह्वल एवं रति-मूर्ति के समान थी, मूर्छित होकर पृथिवी पर गिर गये और वह कन्या भी उन्हें देखकर मोहित हो गई । उसे उसकी दोनों सखियों ने डोला में बैठाकर राजा के समीप पहुँचाया। उस महामोह से किसी भाँति चेतना प्राप्त करने पर आह्लाद (आल्हा) को पुनः चेतनाहीन होते देखकर अत्यन्त दुःख का अनुभव करते हुए उदयसिंह ने कहा-आप तत्त्व के ज्ञाता हैं, अतः आप इतना मोह-मुग्ध क्यों हो रहे हैं ? जबकि आप यह जानते हैं कि-रजोगुण से अनुराग उत्पन्न होता है, उससे मोह तथा मोह से प्रमाद होता है । तुम सदैव अजेय हो, इसलिए ज्ञान रूपी तलवार से इसका समूल नाश कर दो। भाई की ऐसी बात सुनकर उन्होंने मोह का त्याग किया पश्चात् अपने घर के लिए प्रस्थान किया ।

घर पहुँचकर भगवती दुर्गाजी की मध्यम चरित्र द्वारा आराधना करके सहस्रों वैदिक एवं विद्वान् ब्राह्मणों को प्रिय भोजन से प्रसन्न किया। उसी मास के अन्त में देवी ने उन्हें अभीष्ट सिद्धि प्रदानकर विवाहार्थ उस कन्या को मोहित किया। उस कुमारी ने स्वप्न में देवकी पुत्र आल्हाद (आल्हा) का दर्शन प्राप्त किया । प्रातःकाल उठने पर वह उसी विषय में चिन्ता करती हुई अत्यन्त मोहित हुई । उस समय उसने समस्त मनोरथ प्रदान करने वाली कामाक्षी देवी को ध्यानपूर्वक पौषमास के आरम्भ में एक पत्र लिखदार शुक (तोते) के कंठ में बाँध दिया, पश्चात् प्रियपत्रवाहक उस शुक (तोते) को भेज दिया । वह शुक महावती नगर के पुष्पवाटिका में पहुँचकर वहाँ उदयसिंह से मनुष्य की वाणी में कहा-वीर ! तुम्हारे भाई महाबलवान् आल्हाद (आल्हा) के लिए स्वर्णवती (सोना) राजकुमारी ने यह पत्र भेजा है । इसे जानकर मुझे उत्तर दे अथवा पत्र लिखकर मेरे कंठ में बाँधने की कृपा करें । इसे सुनकर वीर उदयसिंह ने उस पत्र को लेकर पढ़ा, समस्त वृत्तान्त जानकर पश्चात् आल्हाद (आल्हा) को दे दिया ।

उसमें लिखा था-वीर! शिव द्वारा वरदान प्राप्त करने वाले राजा जम्बूक ऐसे अनेक अजेय भूपों को तुमने जिस प्रकार रणाङ्गण में स्वर्गीय बनाया है, उसी प्रकार इन्द्र द्वारा वरदान प्राप्त मेरे पिता रूप शत्रु को संग्राम में पराजित करके मेरा पाणिग्रहण करो ।’ इसे पढ़कर आल्हाद (आल्हा) ने उसे आश्वासन प्रदानकर उत्तर में एक पत्र लिखकर उसके गले में बाँध दिया । वह शुक (तोता) जन्मान्तर में पन्नग था, पुण्डरीक द्वारा शाप प्राप्त होने के नाते शुक का रूप धारण किये था । रेवती के अंश से उत्पन्न उस स्वर्णवती (सोना) नामक राजकुमारी के कार्य को सुसम्पन्न करने के उपरान्त यह शुक परलोक पहुँच गया । उसके देहावसान होने पर कुमारी स्वर्णवती (सोना) ने उसका दाहसंस्कार करके ब्राह्मणों को उसके तृप्त्यर्थ दान प्रदान किया ।

माघ मास की कृष्णपञ्चमी के दिन आल्हाद (आल्हा) ने प्रसन्न होकर अपनी सात लाख सेनाओं के साथ वहाँ के लिए प्रस्थान किया। तालन आदि सबल शूरों ने अपने-अपने वाहनों पर बैठकर चारों ओर से आल्हाद (आल्हा) की रक्षा में सन्नद्ध रहकर पन्द्रहवें दिन उस राजधानी में पदार्पण किया । बंग देश को पारकर ये लोग शीघ्र हिमालय के प्रदेश में पहुँचकर संदेशवाहक रूपण से बलखानि (मलखान) ने कहा-वीर ! कवच धारणपूर्वक कराल (करील) नामक घोड़े पर बैठकर पाँचों अस्त्र लिए हुए तू राजा के पास पहुँचकर उन्हें हमारे आगमन की सूचना देने के पश्चात् अपनी देह में कोई युद्धचिह्न अंकित कर शीघ्र लौट आवो । इसे स्वीकार करके वह शिखण्डी का अंश रूपण राजधानी में शीघ्र प्रविष्ट हुआ। उसने वहाँ जाकर राजा की राजसभा को देखा, जिसमें पर्वतीय अनेक शूरवीर नृपतिगण अपने शूर-सामन्तों समेत उपस्थित होकर वहाँ की श्रीवृद्धि कर रहे थे ।

महाबलवान् राजा नेत्रसिंह से उसने कहा–बलखानि (मलखान) नामक महाबली योद्धा अपनी सात लाख सेना लेकर अपनी कन्या के पाणिग्रहणार्थ इस राजधानी में उपस्थित हुए हैं-अतः आप अपनी पुत्री का पाणिग्रहण संस्कार आल्हाद (आल्हा) के साथ शीघ्र सुसम्पन्न करने के लिए प्रस्तुत हो जाँय और राजन् ! इसका पुरस्कार मुझे भीषण-युद्ध के रूप में मिलना चाहिए । उसकी ऐसी बात सुनकर राजा ने क्रोधान्ध होकर पूर्णबल नामक अपने सदनाध्यक्ष को आदेश दिया। उसने रूपण को बाँधने हेतु (रंगभूमि के) विशाल दरवाजे को बंद करा दिया। नगराध्यक्ष की अध्यक्षता में आये हुए उनके रक्षकवीरों को देखकर जो सौ की संख्या में उपस्थित होकर पाश (फांस) अस्त्र से सुसज्जित थे, रूपण हाथ में खड्ग लेकर युद्ध करने के लिए उनके सम्मुख खड़ा हो गया। पश्चात् युद्ध में उन्हें धराशायी कर और राजा के मुकुट को लेकर आकाशमार्ग से वह बलखानि (मलखान) के समीप पहुँचकर उन्हें वह राज-मुकुट सौंप दिया। यह साहस देखकर बलखानि (मलखान) ने प्रसन्न होकर सात लाख सैनिकों समेत उस नेत्रसिंह की सुरक्षित राजधानी को चारों ओर से घेर लिया।

बलवान् नेत्रसिंह ने भी अपने पर्वतीय राजाओं को साथ लेकर हिमालय की ऊँची तलहटी में उन्हें युद्धार्थ निमन्त्रित किया। उनकी सेना में एक सहस्र गज, एक लाख घोड़े, एक सहस्र की संख्या में वीर नृपगण और चार लाख पदाति (पैदल) की सेना थी । गज सेनानायक योगसिंह ने अपनी सेना समेत बलखानि (मलखान) को, अश्व सेनाध्यक्ष भोगसिंह ने उदय सिंह को तथा राजपुत्र विनयकुमार ने राजाओं समेत उस रणस्थल में देवसिंह, तालन एवं रूपण को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के वीरभट सैनिकों ने एक दूसरे पर भीषण आघात-प्रतिघात करते हुए उस युद्ध को अत्यन्त भयानक बना दिया । पर्वतीय शूरों ने चारों ओर से घेरकर शत्रु की दो लाख सेनाओं का हनन कर दिया। उस समय अपनी सेना का विनाश होते उन चारों मत्तोन्मत्त वीरों ने अपने दिव्य अश्व वाहनों पर बैठकर शत्रुदल का महान् वध करना आरम्भ किया। किन्तु शत्रु के सैनिक वीर डमरू के ध्वनि रूप अमृतपान करने से शीघ्र जीवित हो जाते थे और बार-बार युद्धार्थ सम्मुख पहुँच जाते थे। भृगुश्रेष्ठ! इस प्रकार बार-बार उनके जीवित होने के नाते वह युद्ध दिन-रात में समान रूप से चलते हुए सात दिन में भीषणाकार हो गया। उसमें वीरों ने अपनी अनेक भाँति की रण कुशलता प्रकट की, किन्तु शत्रुसैनिक पुनः जीवित होकर इनकी सेनाओं का बध करने लगे । इसे देखकर तालन आदि शूर वीरों ने अत्यन्त दुःख का अनुभव करते हुए विजय के लिए सर्वथा निराश होकर उदयसिंह के पास पहुँचकर प्रार्थना की । उन्होंने उन्हें धैर्य प्रदानकर अपने दिव्य वाहन पर बैठकर आकाश मार्ग से राजकुमारी स्वर्णवती (सोना) के महल में पहुँचकर उसे देखा, जो समस्त सौन्दर्य से अलंकृत होकर अपने प्रासाद पर देवी की भाँति स्थित थी । नमस्कारपूर्वक स्निग्ध वाणी द्वारा उससे कहा-मैं आपका सेवक उदय सिंह हूँ, भामिनि ! कामाक्षी देवी की भाँति आपकी शरण में मैं उपस्थित हुआ हूँ । पश्चात् उस युद्ध के समस्त वृत्तान्त को उससे निवेदन किया। और यह भी कहा कि हमारे सैनिक वीर अत्यन्त क्लान्त होने के नाते विजय से निराश हो गये हैं । उसने कहा- उदयसिंह ! इस समय तुम कामाक्षी देवी के मन्दिर में चलो। मैं अपनी सखियों समेत नवमी के दिन देवी के पूजनार्थ वहाँ आऊँगी । किसी स्त्री (दासी) के हाथ में वह डमरू वाद्य भी रहेगा। उससे उसका अपहरण कर लेना।’

इतना सुनकर वह बलवान् अपनी सेना में चला आया। पश्चात् अपनी बंची हुई आधी सेना समेत रण का त्यागकर पटना नगर में आकर रहने लगा । शत्रु के पराजित होने पर नेत्र सिंह ने अपने पुत्रों समेत घर आकर ब्राह्मणों को गो धनादि का दान दिया। पश्चात् नवमी के दिन राजकुमारी स्वर्णवती (सोना) ने अपने पिता से कहा-कामाक्षी देवी की आराधना के लिए मैं वहाँ जाना चाहती हूँ, अतः आप उस मेरे यज्ञोत्सव की तैयारी शीघ्र करा दें, क्योकि उसी के प्रसाद से आपने अजेय शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है। इसे सुनकर पिता ने कहा- मैंने भी इसी भाँति का स्वप्न ‘आज देखा है-उनके पूजन से ही राजाओं का कल्याण होता है, अन्यथा शोभने ! विघ्न का महान् भय होता है । पिता की ऐसी बात सुनकर उसने पिता की आज्ञा प्राप्तकर डमरू बजवाती हुई कामाक्षी देवी के मन्दिर में प्रवेश किया। उस समय उदयसिंह वहाँ के माली की पुत्र-बहू (पतोहू) बनकर उपस्थित थे, वे स्त्री के हाथ से उस डमरू को छीनकर वहाँ से भाग निकले। उसी बीच साठ सैनिक वीरों ने वाहन पर बैठे हुए अस्त्रों से सुसज्जित होकर उस डमरू के निमित्त उदयसिंह के पीछे अनुगमन किया। उन सबल सैनिकों को देखकर उन दोनों वीरों ने उन साठ सैनिकों को यमपुरी भेज दिया। पश्चात् उदयसिंह रूपन को साथ लेकर अपने शिविर में पहुँच गये।

उस अमृत रूपी डमरू के अपहरण हो जाने पर भयभीत होकर नेत्रसिंह ने पुनः ‘ऐन्द्र’ यज्ञ के समारम्भ की तैयारी के लिए आदेश प्रदान किया। प्रातःकाल होने पर अपनेअपने हाथी, घोड़े एवं ऊँटों आदि वाहनों पर बैठकर वेग से चलते हुए सायंकाल तक उस स्थान पर वे वीरगण पहुँच गये जहाँ वह घोर युद्ध नेत्र सिंह के साथ आरम्भ हुआ था। उदयसिंह ने पूजनपूर्वक उसे डमरू की ध्वनि की जिससे उसकी अमृत ध्वनि सुनकर उनके मृतक सैनिकों ने पुनः जीवन प्राप्त किया। पुनः वे अपने साथ मदोन्मत्त सैनिकों द्वारा चारों ओर से उस नगरी को घेरकर अनेक भाँति के वाद्यों की ध्वनि कराने लगे। उस ध्वनि के साथ अपने नगरी को अवरुद्ध होना सुनकर भयभीत होते हुए नेत्रसिंह उस यज्ञ के अग्निकुण्ड में इन्द्र के प्रसन्नार्थ अपने को अर्पित कर दिया। उससे प्रसन्न होकर भगवान् इन्द्र ने राजा से कहा-आह्लाद (आल्हा) और उदय सिंह के रूप में राम और कृष्ण अपनी एक कला द्वारा इस भूतल में अवतरित हुए हैं, इसलिए उस यशस्वी रामांश आह्लाद (आल्हा) के योग्य आपकी कन्या है। क्योंकि वह कन्या भी योगिनी और रेवती के अंश से उत्पन्न है। इतना कहकर स्वयं देवराज ने पार्वतीप्रिय डमरू का अपहरण करके उसे उसी अग्निकुण्ड में प्रक्षिप्त कर श्री दुर्गाजी से निवेदन करते हुए अपने लोक को प्रस्थान किया।

सुरपति इन्द्र के चले जाने पर उस (उदयसिंह) से संधि करने की इच्छा से नेत्रसिंह ने उर्वी (उरई) निवासी महीपति (माहिल) के यहाँ प्रस्थान किया । राजा को देखकर आथिथ्य सेवा के उपरान्त आह्लाद (आल्हा) के मामा ने उनसे कहा-‘राजन् ! यद्यपि यह आह्लाद (आल्हा) अपने भाइयों के नाते अत्यन्त बलवान् है, तथापि हीन कुल में उत्पन्न होने के कारण मेरी पंक्ति (समाज) में इनका प्रवेश नहीं हो पाया है । क्योंकि ऐसा सुना भी गया है कि इनकी ‘पूर्वजा’ जाति की अहीरिनि थी । क्या यह तुम्हें विदित नहीं है ! यदि इन्हें अपनी कन्या प्रदान करोगे तो तुम्हें भी समाज से बहिष्कृत होना पड़ेगा। अतः अपने कुल के योग्य मेरी इस बात को सुनो ! तालन समेत चौथे पुत्र (उदयसिंह) को कहीं किसी प्रवंचना द्वारा वंचित कर उस विवाह में उनके शिर काट लो और उसे मण्डप के अन्त में चामुण्डादेवी को अर्पित कर दो तथा तुम्हारी कन्या के आह्वान करने पर ही ये वीरगण आये हुए हैं । अतः इसके पश्चात् अपने हाथ से उस रेवती कन्या का भी शिरश्छेदन करना तुम्हें आवश्यक होगा, क्योंकि इसी में तुम्हारे कुल का कल्याण दिखाई दे रहा है । अन्यथा राजा जम्बूक की भाँति आप भी सकुटुम्ब नष्ट हो जाँयेंगे। सुयोधन के अंश से उत्पन्न उस महीपति (माहिल) की बातों को स्वीकार करके शल्यांश से उत्पन्न नेत्रसिंह ने उनसे कहा-मण्डप के अन्त में आपके समेत उन पाँचों व्यक्तियों को निरस्त्र वहाँ बुलाकर उस रात्रि में सबका पूजन करूंगा पश्चात् रामांश आह्लाद (आल्हा) को अपनी पुत्री प्रदान करुंगा।

इतना कहकर वह आह्लाद के यहाँ गया जहाँ वे अपने बधुओं आदि के साथ रह रहे थे। उनके चरण का साष्टाङ्ग दण्डवत् करके राजा ने उनसे कहा-आप लोग देवश्रेष्ठ के अंश से उत्पन्न हुए हैं, यह मुझे भी विदित हुआ है (अतः मैं आपकी बात अङ्गीकार कर रहा हूँ ) इतना कहकर अपने घर चले आये और दुर्गाजी के महोत्सव में उन लोगों के वध करने की तैयारी करने लगे-अपनी सेना समेत एक सहस्र राजाओं को मण्डप के भीतर गुप्त रखकर पश्चात् तालन आदि उन छः शूरवीरों को विवाहार्थ उस मंडप में निमंत्रित किया । वहाँ पहुँचने पर विवाह कार्य आरम्भ हुआ, उसकी पहली भाँवर में योगसिंह ने अपनी उस उत्तम तलवार से आह्लाद (आल्हा) के शिर पर आघात करके रोषपूर्ण गर्जना की । उसे देखकर तालन ने उनसे कहा-आपने महान् अनुचित कार्य किया है। उसे सुनकर नेत्रसिंह ने कहा—बलिन् ! यह मेरे कुल की रीति है अस्त्रहीन शत्रुओं से सशस्त्र हम लोग घोर युद्ध करते हैं। इसे सुनकर उदयसिंह ने योगसिंह को रोक लिया और भोगसिंह को बलखानि (मलखान) ने पकड़ लिया। तीसरी भाँवर में प्रहार करने वाले विजय को सुखखानि ने रोक लिया, चौथी भाँवर में पूर्णबल नामक शठ राजा को रूपन ने पकड़कर उससे घोर युद्ध किया । पाँचवें भाँवर में बहु राजा को तालन ने रोका और छठे भाँवर में आह्लाद (आल्हा) ने स्वयं नेत्रसिंह को पकड़ लिया । उस घोर युद्ध में अनेक शूरवीर आहत हुए । ये छहों व्यक्ति निरायुध रहने पर भी अपने-अपने शत्रुको अस्त्रहीन कर देते हैं।

उस समय स्वर्णवती (सोना) ने अपने पति को बँधा हुआ और उनके बंधुवर्ग एवं सैनिकों को शम्भु की माया से मोहित (अचेतन) देखकर अधीर होकर रुदन किया। पश्चात् कामरूपिणी देवी को ध्यानपूर्वक प्रसन्न करने लगी, प्रसन्न होकर जगज्जननी ने उन मूर्छितों को चेतना प्रदान की। ज्ञान होने पर उन लोगों ने स्वर्णवती (सोना) से पूँछा-देवि ! भाई आह्लाद (आल्हा) कहाँ हैं, उसका कारण शीघ्र बताइये । जिस प्रकार उसके स्वामी आबद्ध होकर गये थे, उसने सब कुछ सविस्तृत कह सुनाया और उदयसिंह से यह भी कहा कि मैं तोते का रूप धारणकर तुम्हारे साथ चल रही हैं, तुम घोड़े पर बैठो। इतना कहकर वह तोते का रूप धारण कर उदयसिंह के साथ वहाँ गई, जहाँ उसके स्वामी बँधे हुए कारागार में पड़े थे। उदयसिंह भी आकाशमार्ग से वहाँ पहुँच गये । स्वर्णवती (सोना) ने अहोरिनि का रूप धारणकर अपने पति के पास पहुँचकर उन्हें आश्वासन प्रदान किया। पुनः उदयसिंह से वहाँ का सभी मार्मिक भेद वर्णन किया। बलवान् उदयसिंह ने समस्त दुर्ग रक्षकों का जो सहस्र की संख्या में वहाँ सदैव रह रहे थे, हनन करके अपने भाई को साथ ले उसी चैत्र की पूर्णिमा के दिन अयोध्या के लिए प्रस्थान किया । स्वर्णवती ने प्रसन्न होकर वहाँ अत्यन्त स्नान-दर्शन किया। पश्चात् होली के अवसर पर वे सब वेणी तट पर पहुँचे । वहाँ स्नान-ध्यान करके अपने घर पहुँच गये । कुछ दिन के उपरान्त सागर के तट पर जाकर एक विशाल महोत्सव का आयोजन किया, उसे सुसम्पन्न करने के उपरांत चैत्रकृष्ण पञ्चमी के दिन पुनः अपने घर आकर सानन्द रहने लगे। ऊँट (गाडियों) पर चलने वाले संदेश वाहक दूतगण फाल्गुन शुक्ल पञ्चमी के दिन ही अपने घर पहुँच गये थे। उस समय मलना तथा राजा परिमल के आनन्द की सीमा नहीं रही, घर-घर महोत्सव मनाकर उन्होंने ब्राह्मणों को अधिकाधिक दान प्रदान किया ।
( अध्याय १३)

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