भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय १४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – १४

सूत जी बोले-उदयसिंह की चौदह वर्ष की अवस्था में जो कुछ हुआ है, मैं बता रहा हूँ, सुनो ! इन्द्र-पुत्र जयन्त ने जानकी जी के शाप द्वारा कलि में जन्म ग्रहण करने के निमित्त रानी स्वर्णवती (सोना) के गर्भ में निवास किया। चैत्र शुक्ल नवमी में बृहस्पति के मध्याह्न समय उसने राजकुमार के रूप में जन्म ग्रहण किया, जिसका मुख चन्द्रमा की भाँति सौन्दर्यपूर्ण एवं वह स्वयं राजलक्षणों से सम्पन्न था। उस उत्तम बालक के जन्मग्रहण करने पर ऋषियों समेत देवों ने कहा-‘यह वासवपुत्र जयन्त इन्दुल होकर भूतल में जन्म ग्रहण किया है। इसीलिए उस कुमार का ‘इन्दुल’ नामकरण हुआ। om, ॐउस समय प्रसन्नतापूर्ण आह्लाद (आल्हा) ने उस कुमार का जातकर्म संस्कार सुसम्पन्न कराने के उपरान्त व्राह्मणों को सुवर्ण, धेनु एवं अनेक हाथी-घोड़े दान रूप में समर्पित किया। इन्दुल के पृथ्वीतल पर जन्म ग्रहण करने के दो मास पश्चात् योगसिंह ने वहाँ जाकर स्वर्णवती (सोना) को अत्यधिक धन प्रदान किया। उस समय रानी मलना ने नेत्रसिंह के पुत्र योगसिंह को देखकर स्नेह-विभोर होने के नाते अत्यन्त गद्गद कंठ से उनसे कुशल प्रश्न पूछा, पश्चात् सविधान भोजन कराने के अनन्तर उनके महल में जहाँ वे ठहराये गये थे, सैकड़ों नर्तकियां अपने भाँति-भाँति के राग एवं कला-कुशलता द्वारा उन्हें प्रसन्न करने लगीं । इस प्रकार आनन्द-सागर में सात रात्रि रुकने के उपरान्त वे अपने घर गये । उस कुमार की छह मास की अवस्था तक अपने दिनों को व्यतीत करने में इन्द्र अधीर हो गये, उनसे न रहा गया, अन्ततोगत्वा पुत्रस्नेहवश उन्होंने अपनी माया द्वारा उस अपने पुत्र का अपहरण कर लिया। उस श्रेष्ठ बालक का अपहरण करके उसे अपनी इन्द्राणी (स्त्री) को सौंप दिया। स्नेह-कातर होकर शचीदेवी ने उसे शीघ्र अपने स्तनों का पान कराया । देवी का दुग्धपान करने से वह कुमार सोलहवर्ष की अवस्था वालों के समान दिखाई देने लगा। उसने अमृत राशि चन्द्रमा की समानता अपने असाधारण शरीर द्वारा प्राप्त की। इसलिए जयन्त को इन्दुल कहा गया है। उसने अपने पिता की विद्या का अध्ययन करके श्रेष्ठता प्राप्त की थी । बालक के अपहृत होने पर उसे कहीं न देखकर स्वर्णवती (सोना) दीन-हीन होकर हा पुत्र’, तुम कहाँ चले गये, इस प्रकार कहती हुई उच्च स्वर से रुदन करने लगी। इस समाचार को सुनकर आह्लाद (आल्हा) एवं उस ‘दशग्राम’ के निवासी गण हाय-हाय करने लगे । मुने ! इस प्रकार वहाँ जनता के क्रन्दन से करुणाका सागर उमड़ आया । आह्लाद (आल्हा) ने अपने कुटुम्ब के साथ निराहार एवं संयमी रहकर भगवती शारदा की शरण में पहुँचकर तीन रात तक वहाँ निवास किया। उस समय प्रसन्न होकर देवी ने आकाशवाणी की-पुत्र! तुम उस कुमार के विषय में कुटुम्ब समेत शोक क्यों कर रहे हो, चिन्ता छोड़ दो ! वह इन्द्र का पुत्र जयन्त है, अतः अपने पिता के यहाँ स्वर्गलोक चला गया है। वहाँ दिव्य विद्या का अध्ययन करके तीन वर्ष पश्चात् आ जायगा और जब तक तुम इस भूतल पर निवास करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा। पश्चात् स्वर्ग पहुँचकर जयन्त के रूप में हो जायगा। देवी की इस बात को सुनकर वे शोक-परित्यागपूर्वक अपने नगर ‘दशग्राम’ चले गये, वहाँ ज्ञानियों की भाँति दिन व्यतीत करने लगे ।
(अध्याय १४)

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