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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय १६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – १६

सूत जी बोले — मुनि शार्दूल ! उदयसिंह की सत्रहवें वर्ष की अवस्था आरम्भ होने पर योगबल से मैंने जो कुछ देखा है, तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ! विप्र ! राजा रत्नभानु के स्वर्गीय होने पर मरुधन्व देश के राजा गजसेन ने पृथ्वीराज से भयभीत होकर यज्ञ, ध्यानव्रत एवं अर्चना द्वारा अग्निदेव की आराधना की । प्रसन्न होकर भगवान् अग्निदेव ने एक सुन्दर अश्व, दो पुत्र और गजमुक्तिका (गज-मोतिना) नाम की एक कन्या प्रदान की । om, ॐपावकांश से उत्पन्न ये चारों अग्नि के समान वर्ण, स्वयं महाबली एवं सर्वलक्षणों से अलंकृत थे, इस धरातल पर जन्म ग्रहण किया । मुनिश्रेष्ठ ! अठ्ठारह वर्ष की अवस्था में ये सभी देवों की भाँति सौन्दर्यपूर्ण तथा समस्त विद्याओं में निपुण हो गये । अट्ठारह वर्ष की ही अवस्था में उस उत्तमाङ्गी कन्या को प्रसन्न होकर दुर्गाजी ने वर प्रदान किया था — वत्स पुत्र (मखलान) तुम्हारा पति होगा।

बघेलवंशी राजा गजसेन ने अपनी कन्या के विवाहार्थ स्वयंवर किया, जिसमें उनकी कन्या के रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध होकर अनेक देश के राजवृन्दों का आगमन हुआ था। मार्गशीर्ष (अगहन ) की शुक्लाष्टमी में चन्द्रवासर के दिन स्वयम्बर में आये हुए राजाओं के ‘वरणार्थ वह कन्या आई, जो स्वयं चपल एवं उसका मुख विद्युत की भाँति कान्तिपूर्ण था। राजा बलखानि (मलखान) तो उसे देखते ही मूर्छित हो गया और वह कुमारी गजमुक्तिका (गजमोतिका) भी उन्हें देखकर कामपीड़ित होने लगी और उसी अवस्था में उस शुभ-वदना ने उनके गले में वैजयन्ती माला पहना कर दी । तारक आदि नृपगण, जो उस कन्या के वरणार्थ वहाँ उपस्थित थे, बलप्रयोग करते हुए चारों ओर से बलखानि (मलखान) को घेर लिये। उन पाँच सौ राजाओं को अपने ऊपर आक्रमण करते देखकर बलखानि (मलखान) ने शीघ्रता से हाथ में खड्ग लेकर सौ राजाओं के शिर काटकर छिन्न-भिन्न कर दिया। तारक ने उस समय बलखानि (मलखान) को चारों ओर से घिरा देखकर अपने खड्ग से उनके हाथों पर
आघात किया, परन्तु उनकी देह में वह खड्ग आघात करते ही दो टुकड़ा हो गया ।

पृथ्वीराज के ज्येष्ठ पुत्र (तारक) इसे देखकर तथा अश्व के अपहरण हो जाने पर उनके समेत सभी राजगण भाग निकले। राजाओं के पराजित हो जाने पर बलखानि (मलखान) ने उस कन्या को शिविका (पालकी) में बैठाकर अपने घर को प्रस्थान किया । उस समय अपनी पुत्री को जाते हुए देखकर राजा गजसेन ने उर्वी पति माहिल तथा पराजित राजाओं की सम्मति से बलखानि (मलखान) को, जो क्षत्रियाधम, जम्बूक का हन्ता एवं महावीर था, अपनी माया से मोहित किया । पश्चात् दुर्गा शाप के कारण मोहित एवं निद्रित उस वीर को हथकड़ी-बेड़ी से दृढ़ आबद्ध करके लोहदुर्ग वाले ग्रामरूप में पहुँचकर वहाँ के निवासी चाण्डालों को बुलाकर कहा-‘अनेक भाँति के दण्ड देते हुए इसका वध करो।’ इस प्रकार की आज्ञा पाकर भीषण चाण्डालगण उन्हें बेतों आदि के प्रहार से पीड़ित करने लगे। कुछ समय पश्चात् उनकी मूर्च्र्छा नष्ट हो गई । चाण्डालों को प्रहार करते हुए देखकर बलखात (मलखान) ने हथेलियों (थप्पड़ों) और मुट्टियों के प्रहार से उन्हें धराशायी कर दिया । पाँच सौ चाण्डालों के निधन होने से शेष बचे हुए वहाँ से भाग निकले।

पश्चात् (उस दुर्ग का) कपाट (किवाड़) भलीभाँति दृढ़ता से बन्द करके बलखानि (मलखान) भीतर राजा के पास पहुँचे । सभी कारणों को जानकर राजा ने अञ्जलि बाँधकर कहा-‘वीर ! खेद का विषय है कि चाण्डालों ने आपको बाँध लिया और चोरों ने धन का अपहरण कर लिया है, शायद, आप उस वन में पहुँचकर निद्रित हो गये थे। मेरी कन्या मेरे भवन में आ गई है, सौभाग्य से आपको जीवित देख रहा हूँ। अब उसके साथ विवाह करके आप शीघ्र अपने घर चले जाइये । इसे सुनकर बलखानि (मलखान) ने प्रसन्न होकर उनकी अत्यन्त प्रशंसा की। राजा ने भी विवाहार्थ मण्डप आदि की रचना के लिए आदेश प्रदान किया। विवाह की तैयारी हो जाने पर अग्नि सेवक गजसेन ने आह्लाद (आल्हा) के पास पत्र लिखकर एक संदेशवाहक को, जो सांडिया पर पत्र-वाहन का कार्य करता था, देकर कहा-इस पत्र को शीघ्र आह्लाद (आल्हा) के पास ले जाओ। पत्र में लिखा था कि-‘बलखानि (मलखान) का विवाह यहाँ होना निश्चित हुआ है, आप सेना समेत यहाँ आकर मेरे द्वारा किये गये आतिथ्य सत्कार को स्वीकार करने की कृपा करें ।’ पश्चात् उसी रात्रि में राजा ने बलखानि (मलखान) को भोजन में विष भक्षण करा दिया। किन्तु भोजन भक्षण करने पर भी वरदान प्राप्त होने के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई। मूर्छित होने पर राजा ने पुनः हथकड़ी-बेड़ी से दृढ़ बाँधकर उनके पैरों पर बेतों के प्रहार कराने लगा। उस समय सम्पूर्ण देह में व्याप्त विष के रक्त के द्वारा बाहर निकल जाने पर बलखानि (मलखान) को चेतना प्राप्त हुई !

उन्होंने विनम्र होकर राजा से कहा-राजन् ! क्या कारण है, आपकी सेना मुझ पर आघात कर रही है। राजा ने कहा-वीर ! मेरे कुल की रीति ही इस प्रकार है कि प्रथम यातनाओं के उपभोग प्रदानकर पश्चात् उसका विवाह किया जाता है। राजा के इस प्रकार कहने पर राजकुमारी गजमुक्ता (गजमोतिना) वहाँ आकर अपने पिता से कहने लगी । इस प्रहारों द्वारा किसे दण्डित किया जा रहा है । राजा ने कहा-पुत्री ! तू शीघ्र अपने महल चली जा, यह एक खेतिहर किसान है, राजकर के लिए दण्डित हो रहा है। इस घोर अपमानपूर्ण बात को सुनकर महाबली बलखानि (मलखान) ने अपने शृंखला-बन्धनों को तोड़कर हाथ में खड्ग ग्रहण कर उसके द्वारा उन घेरे हुए पाँच सौ सैनिकों को, जो शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित होकर वहाँ युद्धार्थ उपस्थित थे, छिन्न-भिन्न करके धराशायी कर दिया । अनन्तर राजा गजसेन के सूर्यद्युति (सूर्यमणि) नामक ज्येष्ठ पुत्र ने वहाँ आकर उस बली बलखानि (मलखान) को पुनः बंधन समेत गर्त (गड्ढे-खाई) में डाल दिया।

पति की उस अवस्था को देखकर गजमुक्ता (गजमोतिना) अत्यन्त दुःख का अनुभव करती हुई आधी रात के समय वहाँ पहुँचकररक्षकों (सिपाहियों) को द्रव्य देकर भीतर कारागार में अपने पति के पास गई और उन्हें सविधि व्यञ्जन भोजन कराकर लौट आई। प्रत्येक रात्रि में इसी प्रकार का क्रम चलता हुआ एक पक्ष (पखवारा) का समय व्यतीत हो गया। पश्चात् अपनी सात लाख सेना समेत आह्लाद (आल्हा) वहाँ शीघ्र पहुँच गये । उन्होंने पहले ही सुना था कि बलखानि (मलखान) किसी गर्त (खाईं) में पड़े हुए हैं, इसलिए उनकी नगरी को चारों ओर से घेरकर युद्धार्थ राजा को निमन्त्रित दिया। सोलह सहस्र की गजसेना समेत गजसेन, तीन लाख घोड़े की सेना समेत सुर्यद्युति (सूर्यमणि) और तीन लाख पदाति (पैदल) की सेना लेकर छोटे भाई कांतामल ने उस रणस्थल में पहुँचकर दिन-रात्रि का अविराम घोर युद्ध आरम्भ किया। तालनादि और गजसेनादि की अध्यक्षता में दोनों सेनाओं ने भीषण संग्राम करते हुए प्रथम दिन व्यतीत किया। किन्तु, महाबली गजसेन ने दूसरे दिन अपनी सेना को छिन्न-भिन्न होते देखकर अग्नि का प्रयोग किया, जिससे तालन आदि की सेनायें भस्मीभूत हो गई। इसे देखकर तालन ने अपने भाला के प्रहार से राजा गजसेन को मूर्छित कर दिया। तदुपरांत सूर्यद्युति ने उस अग्नि के घोड़े द्वारा तालन को भस्म कर दिया । उसी बीच आह्लाद (आल्हा), और उदयसिंह ने क्रुद्ध होकर सूर्यद्युति को बाँध लिया। अपने भाई को दृढ़बंधन में पड़ा देखकर कांतामल उस घोड़े पर बैठा । वह देवसिंह को मोहितकर उदयसिंह के पास गया, किन्तु उदयसिंह ने उसे पकड़कर उस (घोड़े) के तेज का अपहरण कर लिया, जिससे उनकी सात लाख की सेना तत्काल भस्मीभूत हो गई, केवल एक आह्लाद (आल्हा) ही अमर होने के नाते शेष रह गये ।

उन्होंने गजसेन की अवशिष्ट सेना को थोड़े ही समय में नष्ट कर दिया। किन्तु विजय राजा गजसेन की ही रही, वे अपने घर लौट आये। उदयसिंह के भस्म हो जाने पर आह्लाद (आल्हा) ने भगवती दुर्गाजी की मानसिक आराधना की। उस समय देवी ने कहा-‘वत्स ! तुम्हारा पुत्र स्वर्ग से आकर इन सभी मृतकों को पुनः जीवन प्रदान करेगा।’ देवी जी के इस प्रकार कहने पर उस समय इन्द्र के यहाँ से विद्याविशारद इन्दुल बारह वर्ष के समान अवस्था प्राप्तकर अमृत-अश्व पर बैठकर वहाँ आया। उसके घोड़े के अंग से मेघ की भाँति तीन घोड़े प्रकट होकर जो तीनों देवों की भाँति दिखाई दे रहे थे, उस रणस्थल की अग्नि का शमन किया । पश्चात् उस प्रमुख घोड़े ने अग्नि को शान्त देखकर अपने मुख से लार टपकाया, जिसमे वे सभी जीवित हो उठे। अग्नि के शांत होने एव शत्रु को सात लाख सेना को पुनः जीवित होकर सुसज्जित देखकर राजा गजसेन अपने दोनों पुत्रों समेत चारों ओर भागने लगे। उनके पास जो एक लाख सैनिक शेष रह गये थे, वे भयभीत होकर अनेक भाँति के अपने वेष बनाकर इधर-उधर भाग निकले। कुछ संन्यासी के रूप में और कुछ ब्रह्मचारी के रूप में थे–इन्हीं लोगों का जीवन सुरक्षित रहा, किन्तु, जो सैनिकों के वेष में थे, धराशायी कर दिये गये। तदुपरान्त तालन ने दोनों पुत्रों समेत गजसेन को बाँधकर उदयसिंह के साथ इन्द्र दुर्ग के लिए प्रस्थान किया। वहाँ जाकर बलखानि (मलखान) को उस बंधन एवं खाईं से मुक्तकर उनसे समस्त कारणों को पूँछने लगे । पश्चात् उन तीनों को स्तम्भ में बाँधकर बेंतों के प्रहार द्वारा दण्डित करने लगे।

विप्र ! उसी समय गजमुक्ता (गजमोतिना) ने वहाँ आकर अपने पिता एवं भाइयों को मुक्त कराया। पश्चात् विवाह की तैयारी होने लगी। अश्वारूढ़ होकर बलखानि (मलखान) और गजमुक्ता (गजमोतिना) उस मण्डप स्थान में पहुँचकर सुशोभित होने लगे । वहाँ राजा गजसेन ने दिव्य भोजनों द्वारा उन लोगों का आतिथ्य सत्कार किया। किन्तु, यह सत्कार छलपूर्ण था, उसी व्याज से उन्हें उस लोहदुर्ग में रखकर उसके दरवाजे को सुदृढ़ बन्द करा दिया गया और एक लाख शूर सैनिकों को वहाँ गुप्त रक्षक के रूप में नियत कर राजा स्वयं अपने पुत्री, पुत्रों समेत चले गये । प्रातःकाल दरवाजे को बन्द देखकर सेना नायक से कहा गया कि–दरवाजे (के किंवाड़) को शीघ्र खोलवा दो, अन्यथा तुम्हें प्राण परित्याग करना पड़ेगा । सेनानायक ने इसे सुनकर अपने सैनिकों को आदेश दिया कि-‘इन भीषण शत्रुओं का सभी प्रकार से हनन करना आरम्भ हो। इतना सुनकर वे शूर वीरगण अपने शस्त्र तथा तोप आदि चलाने लगे। इन सबने भी सैनिक वृदों को छिन्न-भिन्न करके धराशायी करना आरम्भ किया। दशसहस्र सैनिक के निधन होने के उपरान्त उदयसिंह ने अपने विन्दुल (वेंदुल) नामक अश्व पर आसीन होकर अपने खड्ग द्वारा उन सैनिकों का वध करना आरम्भ किया। शेष अस्सी सहस्र सेना भयभीत होकर इन्द्र दुर्ग पहुँच गई, वहाँ उसने जिस प्रकार सैनिकों का हनन हुआ था, इसे राजा से कहा–इसे सुनकर राजा गजसेन ने अत्यन्त भयभीत होकर अपने दोनों पुत्रों समेत आह्लाद (आल्हा), के पास आकर कुमारी गजमुक्ता (गजमोतिना) को अनेक द्रव्यों समेत उन्हें समर्पित कर उर्वी (उरई) पति (माहिल) द्वारा किये गये अपने पाप का प्रक्षालन किया।

प्रसन्न होकर आह्लाद (आल्हा) ने सोलह ऊँट पर सुवर्ण लेकर अपने पुत्र एवं बंधुओं समेत अपने घर को प्रस्थान किया। आह्लाद (आल्हा) के घर पहुँचने पर देवी स्वर्णवती (सोना) ने इन्दुल (इन्दल) को अपने अंक (गोद) में बैठाकर बहुत करुण रुदन किया-पुत्र ! मेरे जैसे मृतक को आज तुमने पुनः जीवित कर दिया, जयन्त ! तुम्हारे दर्शन से मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गई।’ इसे सुनकर वीर इन्दुल ने भी प्रसन्नतापूर्ण होकर अपनी माता से नमस्कार पूर्वक कहा-माता ! मैं तुम्हारे ऋण से कभी भी मुक्त नहीं हो सकता हूँ। इस समाचार को सुनकर राजा परिमल ने वाद्यों की ध्वनिपूर्वक ब्राह्मणों को धन दान करना आरम्भ किया।
(अध्याय १६)

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