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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय १८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – १८

सूत जी बोले — उदयसिंह की बीस वर्ष की अवस्था में उनके जो कुछ चरित्र हुए हैं, मैं बता रहा हूँ, सुनो ! एक बार सागर नामक किसी सर (तालाब) के तट पर पहुँचकर उदयसिंह ने सप्तशती स्तोत्र के जप (पाठ) पूर्वक भगवती का ध्यान करना आरम्भ किया । उसी समय आकाश से हंसगण वहाँ उतरे । उनके शब्दों के सुनने से इनका ध्यान भंग हो गया । पश्चात् उठकर वे उन हंसों की ध्वनि सुनने लगे, वे कह रहे थे — दिव्य शरीर धारण करने वाला यह धन्य है, जिस प्रकार पर्वतों में हिमालय, वनों में वृन्दावन, नगरियों में महावती (महोबा), सरों में सागर श्रेष्ठ है, उसी प्रकार स्त्रियों में पद्मिनी, और पुरुषों में इन्दुल सर्वश्रेष्ठ हैं । पश्चात् हंसों ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा — महाप्राज्ञ, इन्दुल ! हम लोग मानसरोवर के निवासी हंस हैं, लक्ष्मी की बात को स्वीकार कर नलिनीसागर गये थे । om, ॐवहाँ समस्त आभूषणों से सुसज्जित एक परम सुन्दरी स्त्री को देखा था, जो अपनी सात सुन्दरी सखियों समेत वहाँ उपस्थित थी, गायन एवं नाट्य-निपुणा उस स्त्री को देखकर मोहित होकर हम लोग देश-देशान्तरों में भ्रमण किये, इस धरातल के सभी मनुष्यों को देखा, किन्तु तुम्हारे समान पुरुष पद्मिनी के समान कोई स्त्री नहीं है, अतः हमारे ऊपर बैठकर आप वहाँ चलने की कृपा करें तो बड़ी प्रसन्नता होगी । इन्दुल भी स्वीकार कर हंसराज की पीठ पर बैठा ।

रमणीक सिंहलद्वीप में आर्यसिंह नामक राजा राज करता था । पद्मिनी नामक उसकी पुत्री थी, जो रूप-यौवन सम्पन्न अनुपम ललना थी । सातो रागिणियाँ सुन्दरी स्त्रियों के वेष में उसकी सहेलियाँ हुई थीं । नलिनी सागर के तट पर स्थित पार्वती जी के उस रम्य भवन में स्थित होकर वह मनोविनोद कर रही थी । उसी अवसर में इन्दुल वहाँ पहुँचकर उसे देखा। उस सुन्दरी ने हंस की पीठ पर स्थित परम सुन्दर उस पुरुष को देखकर मुग्ध होकर उस पुरुष श्रेष्ठ को अपने पास बुलाया और उसके साथ रमण किया । उसकी अनेक भाँति की लीलाओं से मोहित होकर इन्दुल एक वर्ष तक वहाँ रह गये । उसी बीच आह्लाद (आल्हा) को देवी की भक्ति का गर्व हो गया था, भगवती जगदम्बिका उस गर्व का सर्वनाश करने के लिए अन्तर्हित हो गईं । पश्चात् आह्लाद (आल्हा) को अत्यन्त दुःख का अनुभव करना पड़ा, क्योंकि उस समय कुछ लोगों ने उनसे उसी मन्दिर में कहा — इन्दुल के रूप सौन्दर्य पर मुग्ध होकर लंका निवासी राक्षसों ने उसका अपहरण कर अपने घर को प्रस्थान कर दिया है । इसे सुनते ही सकुटुम्बे आह्लाद (आल्हा) विलाप करने लगे । मुने ! रुदन करते हुए उन लोगों के मुख से हा-हा शब्द हो रहे थे । उस समय उदयसिंह ने अपने भाई से, जो अधीर होकर रुदन कर रहे थे, कहा — तालन आदि के साथ मैं उन राक्षसों को पराजित कर इन्दुल को लाकर सौंप देगा, किन्तु आप धीरज को अपनाते रहें ।

अनन्तर बलखानि (मलखान), उदयसिंह, देवसिंह (डेबा) और तालन ने अपनी सात लाख सेना समेत लंका के लिए प्रस्थान किया । मार्ग में जो राजा मिल जाते थे, वे उचित भेंट प्रदानपूर्वक इन लोगों की प्रार्थना करते थे और जो अपने मद में मुग्ध रहते थे, बली तालन उन्हें पराजित करके हथकड़ी-बेड़ी से आबद्ध उन्हें साथ लिए चल रहे थे । इस प्रकार वे सेतुबंध के शिवालय के समीप पहुँच गये । वहाँ भगवान् राम द्वारा स्थापित रामेश्वर जी की पूजा करने के पश्चात् सिंहलद्वीप की यात्रा की । छः मास की यात्रा में वहाँ पहुँचकर नलिनी सागर पर उन लोगों ने अपना निवास-स्थान बनाया । बलखानि (मलखान) ने पत्र लिखकर राजा के पास भेजा ‘पुण्यात्मन् ! आर्य सिंह ! अपनी नौकाएँ भेज दीजिए, हम लोग आप के नगर में आना चाहते हैं अथवा अपनी सेना समेत आप इस समय इसी लंका में आ जाँय ।’ अन्यथा सेना समेत विजय प्राप्तकर आपका राष्ट्र भंगकर दूँगा । पत्र को पढ़कर बली राजा ने इन्द्र पुत्र (इन्दुल) द्वारा सुरक्षित होने के नाते युद्ध के लिए शीघ्र प्रस्थान कर दिया । इन्दुल ने स्तम्भन मंत्र द्वारा अभिमंत्रित बाण से तालन आदि की सेनाओं को स्तम्भित कर दिया । दिन में सुख शर्मा ने अपने तीन लाख सैनिकों द्वारा युद्ध किया, और रात्रि हो जाने पर इन्दुल सौ राज कुमारों को साथ लेकर युद्धार्थ उस रण-स्थल में गया । उनके घोड़े हरित् (हरे) वर्ण (रंग) के थे, और कुमार गण योगी के वेष बनाये थे । शत्रु की सहस्रों संख्या की उस बड़ी सेना को नष्ट कर घर में सुखपूर्वक रहते थे । इस प्रकार दोनों सेनाओं का अविराम गति से छः मास तक युद्ध हुआ, जिसमें क्रमशः बलखानि (मलखान) की वह विशाल सेना नष्ट होने लगी ।
(अध्याय १८)

 

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