भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय १९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय –
१९

सूत जी बोले — महाबली बलखानि (मलखान) ने अपनी सेना का ह्रास देखकर मानसिक पीड़ा का अनुभव करते हुए युद्ध बन्द करने का आदेश प्रदान किया, पश्चात् तीनों काल के ज्ञाता एवं बुद्धिमान् देवसिंह (डेबा) को बुलाकर कार्य की सफलता के हेतु उनसे मंत्रणा करना आरम्भ किया । उनकी बातों को सुनकर महाबली एवं महायोगी देवसिंह ने कहा — इन्द्र के किसी पुत्र ने, जो सभी शस्त्र एवं अस्त्रों के प्रयोग में अत्यन्त निपुण है, प्रातःकाल ही अपने दिव्यास्त्र द्वारा तुम्हारी सेना को अवरुद्ध (रोक) कर देता है ।om, ॐ पश्चात् रात्रि में स्वयं आकर उनके निधन करता है, इसलिए मेरी सहायता से तुम तालन और उदयसिंह को साथ लेकर उस सुन्दर इन्द्र-पुत्र पर शीघ्र विजय प्राप्त करो, अन्यथा शीघ्र नष्ट होकर यमपुरी पहुँच जावोगे । देवसिंह की ऐसी बात सुनकर बलवान् बलखानि (मलखान) ने अपने भाइयों तथा मित्रों के सहयोग से प्रयत्न करना आरम्भ किया ।

उस समय उदयसिंह की इक्कीसवें वर्ष की अवस्था आरम्भ थी । उस युद्ध के पण्डित उदयसिंह ने अपनी सेना को पोत (जहाजों) में छिपा दिया, आधी सेना को उसी स्थान (जहाज में) पर रखकर शेष आधी सेना समेत दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया, उनके सैनिक अत्यन्त युद्ध-कुशल एवं अश्वारोही थे । नगर के दरवाजे पर पहुँचकर अत्यन्त दृढ़बद्ध उस दरवाजे (किवाड़) को खोलकर वहाँ के रक्षकों का हनन करते हुए भीतर नगर को लूटना आरम्भ कर दिया । पश्चात् शत्रु के दुर्ग पर पहुँचकर वहाँ के शत्रु-सैनिकों के संहार करने के अनन्तर राजा के अन्तःपुर में उदयसिंह पहुँच गये । वहाँ कमल के समान विशाल नेत्रवाली उस सुन्दरी पद्मिनी नारी को देखकर, जो अपनी सातों सखियों समेत नृत्य-गायन में ही समय व्यतीत किया करती थी, सखियों समेत उसके डोले को साथ ले अपने शिविर में चले आये, जहाँ वह भीषण युद्ध हुआ था ।

इधर बलवान् बलखानि (मलखान) ने देव और तालन की सहायता से इन्दुल की अध्यक्षता में संग्राम करने वाली उस शत्रु-सेना का विध्वंस करके सेनाध्यक्ष शत्रु-पुत्र सत्यवर्मा को चारों ओर से घेरकर उसे धराशायी कर दिया । उन मदोन्मत्तों द्वारा सत्यवर्मा के हनन होने पर अत्यन्त क्रुद्ध होकर प्रतापी शक्र-पुत्र जयन्त (इन्दुल) ने सेना समेत अपने साले को जीवितकर अपने भवन को प्रस्थान किया । वहाँ सभी लोगों को रुदन करते देखकर सदैव की भाँति अपनी प्रेयसी के महल में गये, किन्तु मुने ! सखियों समेत अपनी प्रिया को वहाँ न देखने पर आर्यसिंह के महल में जाकर उन्होंने सभी कारणों का पता लगाया । विदित हुआ कि-शस्त्र निपुण शत्रुओं ने घर को लूटकर उसका अपहरण कर लिया है । वह वीर अत्यन्त रुदन करने लगा — हा, प्रिये, मदविह्वले ! शीघ्र अपने सुन्दर मुख को दिखाओ, तुम्हारा पति तुम्हें देखने के लिए अधीर हो रहा है । इस प्रकार विलाप समेत रुदन करके धनुष-बाण और शत्रुओं को मोहित करने वाले खड्ग को लेकर घोड़ी पर बैठकर क्रुद्ध होकर अकेला ही रणस्थल में पहुँच गया । उसी समय बलशाली बलखानि (मलखान) उस परम सुन्दरी कामिनी को देखकर अत्यन्त विलाप करने लगा । हा, इन्दुल, महावीर, हा मेरे बन्धुप्रियकारक ! यह रूप-यौवन सम्पन्न एवं परम सुन्दरी तुम्हारी ही प्रिया होने के योग्य है, कहाँ छिपे हो, शीघ्रदर्शन देकर इस कल्याणमुखी को अपनाओ । इस प्रकार विलाप करके शिव की मानसिक आराधना करते हुए बलखानि (मलखान) मूर्छित हो गये ।

उसी बीच महाबली इन्द्रपुत्र (इन्दुल) ने उदयसिंह की अध्यक्षता में युद्ध करने वाली सेना का विध्वंस कर दिया । उपरान्त नायक तालन ने उस सेना को नष्ट होते देखकर सिंहिनी घोड़ी पर बैठकर सिंहनाद किया — वीर ! केवल सेनाओं के विध्वंस करने से तुम्हारी विजय नहीं होगी । बालस्वरूप योगिन् ! पहले मुझे धराशायी करो । पश्चात् मेरी सेनाओं का हनन करो । उस भीषण इन्दुल ने इतना सुनकर तालन के हृदय पर बाण का प्रहार किया । उसे उन्होंने खड्ग से काट दिया । पश्चात् अपने भाले से वक्षस्थल में आघात कर उन्हें मूर्छित भी कर दिया । इन्दुल के मूर्छित होने पर दिव्य रूप धारण करने वाली घोड़ी आकाश में पहुँच गई, वहाँ उन्हें चेतना प्राप्त हुई ।, उस समय उस बालक ने कालास्त्र को अपने धनुष पर रखा । जिससे महान् शब्द और तालन की मृत्यु हो गई ।

सेनापति के निधन हो जाने पर आकाशमार्ग से पहुँचकर उदयसिंह बार-बार गर्जना करने लगे । उस सयम इन्दुल ने क्रुद्ध होकर अग्नि-बाण का प्रहार किया, जिससे पूर्ण आकाश अग्निमय दिखाई देने लगा । पश्चात् उसने वायव्य अस्त्र का प्रयोग किया । उदयसिंह अपने योगबल द्वारा उसका पान करके एकदम उनके पार्श्व में पहुँच गये । महाबली इन्द्र-पुत्र ने शत्रु की धृष्टता को देखकर उनके मोहनार्थ गन्धर्वास्त्र का प्रयोग किया, किन्तु, योगबल द्वारा पुनः वह अस्त्र नष्ट हो गया । उसके ऊपर उन्होंने वारुणास्त्र का प्रयोग किया, उदयसिंह ने अपने योगबल द्वारा उसका पान कर लिया । इस प्रकार बाहुशाली एवं संयमी उस उदयसिंह ने प्रसन्नचित्त होकर उनके सभी-अस्त्रों का बार-बार पान करके उनके प्रयत्न को निष्फल कर दिया । उस समय क्रुद्ध होकर इन्दुल ने घोड़ी से उतर पृथ्वी पर स्थित होकर खड्ग युद्ध करना आरम्भ किया ।

उसी बीच देवसिंह आदि राजाओं ने उस भीषण युद्ध की ओर दृष्टिपात किया, जिसे देखकर उन लोगों को महान् आश्चर्य हुआ । प्रातःकाल होने पर महाबली बलखानि (मलखान) ने उस सुन्दर बालक (इन्दुल) को देखा, जो जटा एवं मृगचर्म धारणकर सुशोभित हो रहे थे । प्रतापी इन्द्रपुत्र वह उस समय अत्यन्त श्रमित दिखाई देता था। उसने अपने पिता की, जो बलखानि (मलखान) के भाई होते थे, शपथ की-कृष्णांश (उदयसिंह) ! इसी अपने खड्ग द्वारा तुम्हारा शिरश्छेदन करूंगा ।’ यदि ऐसा न किया तो मेरी माता स्वर्णवती (सोना) को दूषित (असती) समझना । इस प्रकार दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञा करके वह दोषपूर्ण होकर हाथ में खड्ग लेकर शीघ्र वहाँ पहुँच गया । बलखानि (मलखान) ने उसे देखकर प्रेम गद्गद होने के नाते अपने अस्त्र के त्यागपूर्वक पुत्र के समीप पहुँचकर कहा— इन्दुल ! महाभाग एवं माता-पिता को यश प्रदान करने वाले तुम आह्लाद (आल्हा) के प्राण समान तथा स्वर्णवती (सोना) के मानस अंग हो, इसलिए वीर ! पहले मेरा वध करो, पश्चात् अपने अन्य पितृ (चाचा) उदयसिंह, देवसिंह और समस्त कुल-कुटुम्ब का निधन करके सुखवर्मा के घर रहकर सुख का अनुभव करो ।

उनकी ऐसी बातें सुनकर उस बालक ने उन्हें अपने ही कुल में उत्पन्न जानकर खड्ग दूर रखकर शीघ्र अपने पितृव्य (चाचा) के चरण पर शिर रखा, और अपने अपराध की क्षमा के लिए अत्यन्त रुदन करते हुए कहा-मेरे प्रिय तात ! वेदों में बताया गया है — स्त्रियाँ पुरुषों को मोहित करती हैं, वह देव, मनुष्य, पन्नग अथवा दानव कोई भी हो, अतः ये दूषित हैं, आर्य ! यह नारीमय जाल आबद्ध करने के लिए ही सदैव उद्यत रहता है । आज मुझे इसका पूर्ण अनुभव हो रहा है-यद्यपि मैं इन्द्र का पुत्र जयन्त हूँ, और पिता आह्लाद (आल्हा) के जो आजन्म विशुद्ध हैं, कुल में जन्म ग्रहण किया तथापि इस पद्मिनी के मोह में विभोर होकर मैंने इस पर ध्यान कभी नहीं दिया । अतः मुझ मन्दभागी एवं अज्ञानी का अपराध क्षमा करने की कृपा करें । इतना कहकर वह बालक स्नेह से अधीर होकर पुनः रुदन करने लगा । मैंने सेना समेत महाबली तालन को जीवित कर दिया है, उस बालक की इस बात को सुनकर उदयसिंह ने परमानन्द निमग्न होकर उसे अपने अङ्क (गोद) में बैठा लिया । पश्चात् उसी प्रदेश में प्रत्येक मनुष्यों में महान् उत्सव सुसम्पन्न कराया ।

आर्य सिंह ने भी इस समाचार को सुनकर अनेक भाँति के द्रव्य समेत उस पद्मिनी कन्या का पाणि-ग्रहण इन्दुल के द्वारा सविधान सुसम्पन्न कराया तथा मुक्ता (मोती) और मणियों से विभूषित अनेक गजराज एवं अत्यन्त आभूषण अपने जामाता (जामाई) को प्रदान किया । अनन्तर उन लोगों के प्रेम वाक्य से गद्गद होकर अपने घर लौट आये और उन सबने भी आनन्दानुभव करते हुए अपने देश के लिए प्रस्थान किया । एक मास की यात्रा में उस भीषण मार्ग की समाप्ति करके कीर्तिसागर पर पहुँचकर उन लोगों ने अनेक भाँति के उत्सव की आयोजना की । आह्लाद (आल्हा) ने अत्यन्त प्रसन्न होकर पत्नी (पुत्र-वधू) समेत पुत्र को देखकर ब्राह्मणों को निमंत्रित कर अनेक भाँति के दान प्रदानकर उन्हें तृप्त किया । पश्चात् दशहार नगर के प्रत्येक प्राणी अपने कुटुम्ब समेत वहाँ एकत्र होकर उदयसिंह की विशाल कीर्ति का यशोगान करने लगे, जो प्रत्येक प्राणियों में व्याप्त होने ने नाते अत्यन्त दूर तक विस्तृत हो गई । पृथ्वीराज ने भी इसे सुनकर महान् विस्मय प्रकट किया। दुर्वासा के शाप के कारण उस पद्मिनी स्त्री ने अप्सरा पद का त्यागकर इस भूतल में मनुष्य (नारी) रूप में जन्म ग्रहण किया था । बारह वर्ष की आयु तक वह इस जगत् में सुशोभित रही। तदुपरान्त यक्ष्मा रोग से पीड़ित होकर पुनः स्वर्ग चली गई । उसने आह्लाद (आल्हा) के महल में केवल नव मास ही निवास किया था ।
(अध्याय १९)

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