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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय २०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय २०

सूत जी बोले — मुने ! पाञ्चाल (पंजाब) देश में बलवर्द्धन नामक राजा राज्य करता था । उसकी विशालाक्षी पत्नी का नाम ‘जलदेवी’ था । वेदतत्त्वं निपुण एवं विसेन वंशावतंस उस राजा ने जलाधिनायक दम्पती (स्त्री-पुरुष) वरुण की आराधना की, जिससे उनके दो पुत्ररत्न उत्पन्न हुए, जो नितान्त क्षत्रिय धर्म के ही पारायण करने वाले थे । ज्येष्ठ का नाम लहर और कनिष्ठ (छोटे) का नाम मयूरध्वज रखा गया । बारह वर्ष की अवस्था में मयूरध्वज ने अपने ज्येष्ठ भाई की आज्ञा प्राप्तकर स्कन्द देव की आराधना आरम्भ की। om, ॐउसने संयम और मौन धारणकर पाँच वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम की भाँति रहकर जप ध्यान को सविधि सम्पन्न किया । पश्चात् अग्निपुत्र एवं सेनानायक भगवान् स्कन्द ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने आश्चर्यजनक स्वरूप के दर्शन देने की कृपा की । मयूरध्वज ने उस सर्वमय देव को देखकर जो उनके इष्टदेव थे, स्निग्ध वाणी द्वारा उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा की —
“जयति ते वपुर्दिव्यविग्रहं नयति शर्वदा देवतागणान् ।
पिबति मात्रियं दुग्धमुत्तमं वधति सर्वदा दैत्यदानवान् ॥
नमस्ते देवसेनेश महिषासुरमर्दन ।
षडानन महाबाहो तारकप्राणनाशक ॥
प्रसन्नो भव सर्दात्मन्गुहशक्तिधराय ।
किङ्करं पाहि मां नित्यं शरणागतवत्सल ॥”

मयूरध्वज ने कहा — तुम्हारी इस दिव्य शरीर की जय हो, जो देवगणों का (सेनानी) रूप में संचालन करती हुई केवल अपनी माता के दुग्ध का ही पान करके समस्त दैत्य-दानवों का वध करती है । देवसेना के अधीश्वर, महिषासुर के विध्वंसक, छः मुख वाले, महाबाहो एवं तारकासुर के हन्ता आपको नमस्कार है ! सर्वात्म भू ! गुहशक्तिधारी मुझपर आप सदैव प्रसन्न हों, तथा शरणागत वत्सल ! मुझ सेवक की रक्षा कीजिये ।’
इसे सुनकर स्कन्द ने कहा — नृपश्रेष्ठ ! तुम क्या चाहते हो, कहो ! मुझसे सभी कुछ प्राप्तकर सकोगे । देव स्कन्द के इस प्रकार कहने पर नम्रता पूर्वक राजा ने कहा — ‘भगवन् ! मुझे बल प्रदान करके सर्वदा मेरी सहायता करने की कृपा करें ।’ इसे स्वीकार कर भगवान् स्कन्द उसी स्थान पर अन्तर्हित हो गये, और उस राजा ने प्रसन्न होकर एक नगर का निर्माण कराया जिसका नामकरण ‘मयूरनगर’ हुआ, उसमें अनेक जाति के मनुष्य निवास करते थे, तथा वह दो योजन में विस्तृत और स्कन्ददेव से सुरक्षित था । उनके भाई लहर ने भी बीस वर्ष तक अत्यन्त प्रयत्न पूर्वक नदी-तट समेत वरुण की उपासना की । उस समय प्रसन्न होकर वरुण भगवान् ने प्रेमवाणी द्वारा राजा से कहा — नृप ! वर की याचना करो ! इस अमृतमयीवाणी को सुनकर राजा लहर ने अपनी स्निग्धवाणी द्वारा जलाधिपति एवं पाश (कांस) वस्त्रधारी उन वरुण को प्रसन्न किया ।
लहर ने कहा — तपोबल युक्त होने के नाते आपका चित्त महत्तापूर्ण है, इसीलिए ‘प्रचेता’ आपका नामकरण हुआ है, मैं उस प्रचेता को नमस्कार कर रहा हूँ। जल के उस वेग को, जो किसी के द्वारा रोका न जा सके, आप अनायास रोक लेते हैं, अतः आपका ‘वरुण’ नाम हुआ, मैं उस वरुण को नमस्कार करता हूँ। दैत्यों को आबद्ध करने एवं देवों के विजयार्थ आपने दिव्यपाश अस्त्र को अपनाया, इसलिए पाश अस्त्रधारी को बार-बार नमस्कार करता हूँ ।

इस प्रकार वरुणदेव की आराधना करके उस बुद्धिमान् राजा ने लहरी नामक नगरी का निर्माण करवाया जो तीन योजन में विस्तृत तथा चारों वर्णों के मनुष्यों से सुशोभित हो रही थी । उस नगरी के रक्षार्थ स्वयं वरुणदेव वहाँ निवास करते थे । तदुपरान्त राजा को वरुण देव की अनुकम्पावश कल्याणमुखी रानी की प्राप्ति हुई, जिसका नाम रावी था, तथा जो अत्यन्त श्रेष्ठ देवांगना के समान रूप-यौवन सम्पन्न थी । राजा द्वारा उस रानी के गर्भ से सोलह पुत्ररत्न की उत्पत्ति हुई, जो धृतराष्ट्र-पुत्र कौरवों के अंश से उत्पन्न एवं गजराज के समान बली थे । पश्चात् मदन मंजरी नामक एक परमसुन्दरी कन्या का जन्म हुआ । उसकी बारह वर्ष की अवस्था आरम्भ होने पर राजा ने चन्द्रवंशी देवसिंह के साथ उस कन्या का विवाह करने के विचार से अपने ज्येष्ठ पुत्र को उनके पास भेजा । पुत्र रणधीर ने भी एक लाख मुद्रा एवं सहस्र शुर सामन्तो समेत महावती को प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचकर राजा परिमल तथा उनके वंशजों को नमस्कार करके अपने आगमन का कारण बताया कि — ‘मैं अपनी भगिनी के विवाहार्थ ही आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ ।

इसे सुनकर राजा ने उस कुशाग्रबुद्धि वाले देवसिंह को बुलाकर कहा — मेरी बड़ी इच्छा है कि तुम इस विवाह को स्वीकार कर लो । इसे सुनकर बली देवसिंह ने नम्रतापूर्वक अपने पितृव्य (चाचा) से कहा — ‘मैंने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का नियम किया है, अतः विवाह करने में असमर्थ हूँ ।’ इसे सुनकर विप्रगणों ने भी वहाँ एकत्र होकर उन्हें अनेक भाँति से समझाया, किन्तु उस वीर व्रतधारी देवसिंह ने अपने व्रत का त्याग करना उचित नहीं समझा । अतः उसी पर दृढ़ रहे । अनन्तर राजा परिमल ने रणवीर से कहा — ‘मैं इस सम्बन्ध के लिए सुखखानि नामक बालक को आपको सौंपता हूँ, आप उसी का विवाह स्थिर कीजिये ।’ राजा रणधीर ने उसे सहर्ष स्वीकार कर अपने गृह को प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचकर अपने पिता से सुखखानि के व्रत एवं रूपगुण की प्रशंसा की । बीच में महीपति (माहिल) बोल उठे — राजन् ! इस पावचीय उत्तम कुल के योग्य वह विवाह नहीं है, क्योंकि वर शूद्र से उत्पन्न होने के नाते वर्णसंकर है, अतः उन पर विजय प्राप्त करने के लिए सेना समेत वहाँ अवश्य गमन करो । भूपते ! उन्हें हथकड़ी-बेड़ी से बाँधकर इस लोहे के जेल में अवश्य करो, जिससे आपकी इस अन्तिम अवस्था में आपकी कीर्ति संसार में विचरण करती हुई स्वर्ग तक पहुँच जाये क्योंकि उन लोगों में राजा जम्बूक, राजा नेत्रसिंह, राजा गजपति, महाबली पृथ्वीराज तथा आर्यसिंह और ये अन्य बलवान् नृप हैं, सभी को पराजित कर विजय प्राप्ति की है ।

इस बात को सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा लहर ने अपनी चार लाख की चतुरंगिणी सेना को जिसकी अध्यक्षता उनके सोलह पुत्र कर रहे थे, नित्य प्रोत्साहित करने का प्रयत्न किया । माघ शुक्ल दशमी के दिन महाबली बलखानि (मलखान) चार लाख सैनिकों समेत अपने कुल कुटुम्ब के साथ पंजाब प्रान्त के लहरी नामक नगरी में पहुँच गये । उनके साथ बारह वर्ष की अवस्था वाले उदयसिंह भी वहाँ रह रहे थे । राजा की आज्ञा से उनके सैनिकगण ने युद्ध की घोषणा कर दी । धर्मात्मा बलखानि (मलखान) ने आये हुए उन शूरों को देखकर संग्राम में विजयी होने के लिए अपने सैनिक वीरों को आदेश प्रदान किया । दोनों सैनिकों का भीषण एवं रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया । पाँचवें दिन महाबली बलखानि (मलखान) ने उदयसिंह को साथ लेकर स्वयं शत्रुओं का वध किया । उस रणस्थल में शत्रु के अनेक सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की, और शेष भयभीत होकर भाग निकले । अपनी सेना को तितर-बितर एवं सामने उपस्थित शत्रुओं को देखकर उन सोलह राजकुमारों ने भी जो धनुर्विद्या में अत्यन्त निपुण थे, अपने-अपने रथ पर बैठकर रणस्थल में पहुँचकर युद्ध आरम्भ कर दिया । बाणों की वर्षा करने वाले उन कुमारों को रणस्थल में उपस्थित देखकर उदयसिंह ने खड्ग और (ढाल) लेकर स्वयं अकेले ही वहाँ पहुँचकर उनके धनुष को नष्ट कर उन मदान्धों को बाँध लिया । पश्चात् रणपण्डित उदयसिंह ने उन्हें लाकर आह्लाद (आल्हा) को सौंप दिया ।

अपने पुत्रों को आबद्ध सुनकर राजा लहर ने महात्मा बलखानि (मलखान) की सेना को जल के प्रवाह में प्रवाहित किया । बलवान् जयन्त ने सेना को जलरूप देखकर अपने वायव्य अस्त्र से शत्रु के सभी जल का शोषण कर दिया और उनकी रोना को अनेक योजन की दूरी पर पहुँचा दिया । उस समय जलाधिनायक भगवान् वरुण देव ने स्वयं राजा लहर की कन्या का विवाह संस्कार सुखखानि के साथ सुसम्पन्न कराया । इसे जानकर राजा लहर अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस भूतल में वे वरुणदेव के सदैव के लिए अनुपम एवं अटलभक्त हो गये । तदनंतर अनेक द्रव्य उन वीरों के मरण पर रखकर उनकी बार-बार परिक्रमा की और प्रसन्नतया उन्हें अपने महल में एक मास तक अतिथि बनाया । वे वीर भी उनकी उस महती पूजा का सादर ग्रहणपूर्वक उस वधू (बहू) को डोला में बैठाकर प्रसन्न होते हुए अपने घर लौट आये । विप्र ! इस प्रकार इस उदयसिंह के चरित को तुमसे वर्णन किया, जिसमें सुखखानि के विवाह को सुनकर तुम्हें आनन्द प्राप्त होगा ।
(अध्याय २०)

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