भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय २२
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय २२

सूत जी बोले — बलवान् उदयसिंह के महावती (महोबा) नगरी में पहुँचने पर राजा परिमल ने मांगलिक उत्सव कराया । उदयसिंह प्रतिदिन सखियों समेत पुष्पवती के साथ नृत्य-गान करते हुए उसके साथ मनोरञ्जन में ही सम्पूर्ण समय व्यतीत करने लगे । जिस प्रकार इन्द्र हेमन्त शिशिर के दिनों में अप्सराओं के साथ क्रीडा में अनुरक्त रहते हैं, उसी भाँति उदयसिंह भी उसके साथ क्रीडा करने लगे । उन्होंने अपनी निपुणता से उसका सर्वस्पर्श करने पर भी उसके साथ उपभोग नहीं किया । om, ॐएक बार नृत्य करते समय पुष्पवती देवी ने स्वयं उदयसिंह से पूँछा — आप पूर्व जन्म में कौन थे ।

इस बात को सुनकर उदयसिंह ने हँसकर कहा — प्रिये ! पूर्वजन्म में चन्द्रहास नामक राजा था । बाल्यकाल से ही मैं दैवयोग से दुःखी था । भगवान् शालग्राम की मूर्तिपूजा प्रतिदिन करता था जिसके पुण्यप्रभाव से मैं राजा हुआ । प्राणवियोग के समय मेरा मन शालिग्राम की मूर्ति में आसक्त हो गया था, इसलिए स्वयं ब्रह्मा की प्रसन्नतावश भगवान् में मेरी सायुज्य मुक्ति हो गई थी । अनन्तर कलि ने कालात्मा परमेश्वर विष्णु की प्रार्थना की । उन्होंने अपनी देह से मुझे पृथक् कर इस भूतल में जन्म ग्रहण कराया । प्रिये ! जिस-जिस समर्य धर्म का नाश सम्भव होता है, युगधर्म की मर्यादा के स्थापनार्थ मैं उन दिनों जन्म ग्रहण करता हूँ । सत्ययुग में देवताओं के प्रसन्नार्थ मानसी पूजा की जाती है, उसी भाँति त्रेता में यज्ञदान आदि क्रिया रूप अग्नि पूजा, द्वापर में देवों के प्रियार्थ मूर्तिपूजा और भीषण कलियुग के समय ब्रह्मपूजन उत्तम बताया गया है । प्रिये ! सत्ययुग में हंस, त्रेता में यज्ञपुरुष और द्वापर में हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ, तथा कलियुग में देवों की तृप्ति के लिए सुखदायक शालिग्राम मैं ही होता हूँ । प्रिये ! शालिग्राम के पूजन करने से महर्षि, देवता और पितृगण ये सभी प्रसन्न होते हैं । द्विजाति (उपनयनधारी) तीनों वर्गों को चन्दनादि द्वारा शालिग्राम की सप्रेम पूजा करनी चाहिए । शूद्रों को केवल स्नानमात्र करके भक्ति-भाव द्वारा ही उनका पूजन करना बताया गया है, और म्लेच्छों को भक्तिभाव से नम्र होकर उनके दर्शन करने से पुण्य प्राप्त होती है। क्योंकि शालिग्राम सत्-चित् और आनन्द रूपी शरीर धारण करने वाले स्वयं ब्रह्म है। उनके दर्शनमात्र से मल (पाप) नष्ट हो जाते हैं । देवि ! इस प्रकार मैंने तुम्हें युग-मर्यादा की उत्तम व्याख्या बता दी। अब तुम मुझसे सत्य कहो कि–पूर्वजन्म में तुम किसकी पुत्री थी ।

पुष्पवती बोली — पूर्वजन्म में मैं चन्द्रकान्ति नामक वेश्या थी । मैंने देवता के सामने नृत्य-गायन वाद्य किये थे, जिस पुण्य के प्रभाव से मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी । वहाँ मेरे रूप-यौवन पर मुग्ध होकर देवों ने मेरी प्रार्थना की, किन्तु उस स्वर्गलोक में रहकर भी मैंने अपने ब्रह्मचर्य को भली-भाँति सुरक्षित रखा था । उसी पुण्य के प्रभाव से मैंने बाणासुर के यहाँ उसकी ऊषा नाम की पुत्री होकर जन्म ग्रहण किया, उसमें ब्रह्मरूप अनिरुद्ध ने तब मेरा पाणिग्रहण किया था । पश्चात् कलि ने अपने स्वार्थ के लिए मेरे स्वामी की प्रार्थना की, इसीलिए वे अर्चावतार द्वारा उत्पन्न होकर मार्कण्डेय के यहाँ चले गये वहाँ उन्होंने अपने प्रसाद की महिमा उन्हें दिखाई । काष्ठरूप मेरे पति की वह मर्यादा आज यहाँ भी स्थित है । स्वामिन् ! मैं उन्हीं की आज्ञा शिरोधार्य कर पुनः राजा जम्बूक के यहाँ उनकी पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थी । उस समय मुझे दिव्य रूप की प्राप्ति थी, और मेरा नाम विजयैषिणी (विजया) था । वहाँ तुम्हारे भाई बलखानि (मलखान) द्वारा मेरा निधन हुआ था। (इस समय आप जानते ही है कि) मकरन्द की भगिनी होकर मैंने आपको पति रूप में प्राप्त किया है और उसी दोष से आपके भाई ने राजा गजपति के यहाँ स्वयं जाकर अत्यन्त तीव्र यातना का अनुभव किया था।

इतना कहकर पति के साथ स्थित मैना की भाँति वह मौन हो गई। होली के अवसर आने पर एक दिन रानी मला ने अत्यन्त स्नेह के नाते दुःखी होकर अपनी सुन्दरी पुत्री चन्द्रावली को स्वप्न में देखा । उस रात वे अपनी पुत्री के स्नेह से अत्यन्त अधीर होकर सम्पूर्ण रात रुदन करती हुई दुःखों का ही अनुभव करती रह गई थीं । उस समय उनके रुदन के कारण को जानकर उदयसिंह के दश सहस्र शूर सामन्तों समेत अनेक भॉति के द्रव्यों को लेकर अकेले ही चन्द्रावली के घर को प्रस्थान किया । उनके प्रबल शत्रु महीपति (पृथ्वीराज) ने भी कारण जानकर उनके पश्चात् ही वहाँ के लिए प्रस्थान किया था । क्योंकि दुर्योधन के अंश से उत्पन्न होने के नाते उसमें स्वार्थ की तत्परता अधिक मात्रा में थी ।

यदुवंशियों से सुरक्षित एक ठाठ नामक गाँव था, जिसमें वीरसेन नामक राजा अपने तीन लाख सैनिकों समेत रहता था । उसके रूप यौवन सम्पन्न आठ पुत्र थे—कामसेन, प्रसेन, महासेन, सुखसेन, रूपसेन, विष्वक्सेन, मधुव्रत और मधुप यही क्रमशः उनके नाम थे, जो यादव के अंश से उत्पन्न यादवों की मर्यादा-वृद्धि कर रहे थे। वहाँ की सभा में पहुँचकर नर केसरी उदयसिंह ने राजा वीरसेन को दण्डवत्प्रणाम करने के उपरान्त उन्हें दश भार सुवर्ण समेत मलना का लिखा पत्र प्रदान किया । पश्चात् उन यादवों के साथ उत्तम विचित्र भाँति के व्यंजनों का आस्वादन करके चन्द्रावली के महल में जाकर उनसे सब कुशल क्षेम सुनाया । प्रेम से अधीर होकर उसने अपना दुःख प्रकट किया–वीर ! जिस समय मेरा विवाह हुआ था, आप दो वर्ष के थे । आज बीस वर्ष का दिन पूरा हो रहा है, पिता-माता ने कभी मेरा स्मरण ही नहीं किया । मुझे एकदम भूल गये। वीर ! तुम्हीं इस योग्य हुए कि मेरा स्मरण तो किया । आज मेरा जन्म एवं जीवन सफल हो गया, कहाँ तक कहूँ भाई के दर्शन से मेरा सभी कुछ सफल हो गया ।

उस समय प्रसन्न होकर उदयसिंह ने नम्रतापूर्वक अपनी भगिनी से कहा-सबल जम्बूक ने आकर वर को लुटवा लिया था, उसी दुःख से दुःखी एवं भयभीत होकर राजा अपना दिन व्यतीत कर रहे थे, पश्चात् हमलोगों ने अत्यन्त कष्ट से जम्बूक पर विजय प्राप्त की । इधर पृथ्वीराज ने भी हमारी राजधानी को चारों ओर से घेर लिया था, फिर उन्हें पराजित कर मैंने अपने भाई ब्रह्मा का विवाह उनकी पुत्री बेला से सुसम्पन्न कराया । अनन्तर इन्दुल के लिए हमें सिंहलद्वीप जाकर अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । इस प्रकार के अनेक दुःखों के अनुभव पिता जी को करने पड़े । इसलिए इधर आने-जाने का अवसर नहीं मिल सका, किन्तु, भगिनी ! अब हम लोग अत्यन्त प्रसन्न हैं, इसीलिए (वहाँ ले चलकर) हम लोग तुम्हारी सेवा करना चाहते हैं क्योंकि हम सब तुम्हारे सेवक ही तो हैं । इस प्रकार की कोमल वाणी को सुनकर प्रेम व्याकुल होती हुई चन्द्रावली ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें अपने निजी महल में ठहराया ।

उसी बीच उस धूर्त महीपति ने वीरसेन की सभा में पहुँचकर आतिथ्य सत्कार ग्रहण करने के उपरान्त बीच में बात काटकर उनसे कहा । राजा ने आह्लाद (आल्हा) आदि सभी दुष्टों को अपने यहाँ से निर्वासित कर (निकाल) दिया है। कारण कि इन नीचों ने उनके कोष (खजाने) में चोरी की थी । उसी समय से ये लोग शिरीष (सिरसा) नामक गाँव में रह रहे हैं । अवसरवादी उदयसिंह इस समय आपके घर आया हुआ है, वह चन्द्रावली का डोला लेकर चला जायगा। भूप ! मैं यह सब सत्य कह रहा हूँ, मेरी बात अन्यथा नहीं होती है । इसे सुनकर राजा वीरसेन ने इसे सत्य समझकर अपने पुत्र कामसेन को, जो चन्द्रावली का पति था, बुलवाया और कहा-पुत्र ! उदयसिंह को बाँध लो ! यह सुनकर कामसेन ने तीक्ष्ण विष भोजन में डालकर उदयसिंह को दिया । यह समाचार पाकर चन्द्रावली शीघ्र भाई के पास जाकर उस पात्र को लेकर वहाँ से चली गई ! क्रुद्ध होकर कामसेन ने अपनी पत्नी चन्द्रावली को बेंत की छड़ी से अत्यन्त पीड़ित किया । उस समय क्रुद्ध होकर उदयसिंह ने उसके दोनों हाथ-पाँव बाँध दिये । महाबली वीरसेन ने अपने पुत्र के बाँधे जाने पर उदयसिंह को बाँधने के लिए अन्य पुत्रों को आदेश दिया । उसी अवसर में उदयसिंह ने डोला लेकर अपने सैनिक शिविर में आकर शत्रुओं से घोर युद्ध किया । एक ओर दश सहस्र की सेना और दूसरी ओर तीन लाख सैनिक उस भीषण युद्ध में भाग ले रहे थे । वह रोमाञ्चकारी युद्ध अविराम गति से दिन-रात चल रहा था । शत्रु के एक लाख सैनिकों का निधन हुआ और एक सहस्र सैनिकों का उदयसिंह के भी निधन हुआ। जो अवशिष्ट रहे वे यादवों से भयभीत होकर भाग गये। अपने सैनिकों के पराजित हो जाने पर उन सातों पुत्रों ने अपने-अपने गजों पर बैठकर उदयसिंह को चारों ओर से घेर लिया । वीर उदयसिंह ने भी विन्दुल पर बैठे हुए हाथियों के सिंहासन समेत उन्हें पृथ्वी पर धूल-धूसरित करते हुए उनके अस्त्रों को काटकर उन सबको बाँध लिया। इसे सुनकर सूर्य के अनन्य भक्त वीरसेन ने सौर (सूर्य द्वारा प्राप्त) अस्त्र से इनकी सेना को भस्म कर दिया और उसी अस्त्र के प्रयोग से घोड़े समेत उदयसिंह भी मूर्छित हो गये। उस समय वीरसेन ने उन्हें बाँधकर अपने पुत्रों समेत वधू (बहू) को भी मुक्त कराकर अपने घर में अनेक भाँति के वाद्यों द्वारा महोत्सव मनाया । उदयसिंह के शेष वीर सामन्त इधर-उधर भाग गये। उनमें से कुछ लोगों ने परिमल के पास पहुँचकर आदि से अन्त तक सभी वृत्तान्त कहा-महीपति (पृथ्वीराज) को महाधूर्त जानकर राजा ने ब्रह्मानन्द से कहा-एक लाख सेना समेत तुम शीघ्र वहाँ जाओ । अपनी भगिनी के पति को बाँधकर अपने भाई को मुक्त कराओ । इसे सुनकर एक लाख सैनिकों को लेकर ब्रह्मानन्द ने वहाँ पहुँचकर अत्यन्त क्रोधादेश में उस नगरी को चारों ओर से घेर लिया । पश्चात् युद्धस्थल में आये हुए उनके सैनिकों को बाँध लिया । सेना के आबद्ध हो जाने पर राजा वीरसेन ने अपने सौर अस्त्र के प्रयोग से उन्हें भस्म करने का प्रयत्न किया, किन्तु उनके उस अस्त्र द्वारा प्रयोग करते समय ब्रह्मानन्द ने अपने ब्रह्मास्त्र से उसे शांत करते हुए अपना क्रुद्ध स्वरूप प्रकट किया । उसे देखकर राजा वीरसेन ने अत्यन्त भयभीत होकर उन्हीं की शरण प्राप्त की।

निर्भय होकर ब्रह्मानन्द ने उनसे कहा । नृप ! एक धूर्त के कहने से मेरे भाई को बाँध लिया, और स्त्रियाँ सदैव अबध्य होती हैं, किन्तु तुम्हारे पुत्र ने इसका उल्लघंन कर उसे (भगिनी को) अत्यन्त ताड़ना दी । इसलिए आप अपनी पुत्री समेत उस कामसेन पुत्र को मेरे अधीन कीजिये । इसे सुनकर राजा ने नम्रतापूर्वक कहा-मेरी कन्या इस समय घर में नहीं है, किन्तु कामसेन उपस्थित है। इतना कहकर वीरसेन ने कामसेन समेत चन्द्रावली को उन्हें सौंप दिया, पश्चात् प्रसन्नतापूर्ण होकर उनका प्रस्थान भी कराया । बलवान् ब्रह्मानन्द ने उदयसिंह और अस्सी सहस्र सेना साथ लेकर महावती (महोबा) को प्रस्थान किया । घर पहुँचने पर रानी मलना ने अपने पुत्र को देखकर प्रेम में अत्यन्त मग्न हो गई कि अपने आँसुओं से उन्हें स्नान कराकर ब्राह्मणों को धन वितरण किया।
(अध्याय २२)

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