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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय २९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय २९

ऋषियों ने कहा— महामुने ! आपने जिस किन्नरी नामक कन्या का नाम लिया था, वह किस स्थान में किस प्रकार उत्पन्न हुई है। कृपया विस्तार पूर्वक इसका वर्णन कीजिये ।
सूत जी बोले-पहले समय की बात है चैत्ररथ नामक प्रदेश में जहाँ अनेक भाँति के लोग निवास करते हैं, वसंत ऋतु के आने पर देवगण क्रीड़ा करते हैं। एक बार उसी समय में स्वर्ग निवासिनी मंजुघोषा नामक वेश्या ने मुनिश्रेष्ठ शुक के स्थान में जाकर अत्यन्त सुन्दर बालक के रूप में उन्हें देखकर मोहित करने का प्रयत्न किया। om, ॐमदनपीडिता उस वेश्या ने नृत्य-गान एवं अनेक प्रकार के अनुराग पूर्ण भावों के प्रदर्शित करने के उपरांत हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक सप्रेम उनकी स्तुति की। उस समय मुनि शुकदेव ने पद्यमय उसकी स्तुति सुनकर प्रसन्नचित्त से उसे वर की याचना करने के लिए कहा। उसने उस स्नेहवाणी को सुनकर प्रार्थना की कि हे नाथ, शरणागत वत्सल ! आप मेरा पति होना स्वीकार करें। उसकी प्रार्थना स्वीकार करने के उपरांत मुनिश्रेष्ठ एवं विज्ञान विशारद शुक ने उसके साथ रमण किया । उन दोनों के समागम के फलस्वरूप मुनि नामक एक पुत्ररत्न की उत्पत्ति हुई। उस बलवान् पुत्र ने बारह वर्ष तक अनवरत तप का अनुष्ठान किया, जिससे संतुष्ट होकर रूद्र समेत कुबेर ने स्वर्णदेव की पुत्री को उसे स्त्री रूप में प्रदान किया। हिमालय के उत्तुङ्ग शिखर पर उन दोनों के समागम से किन्नरी नाम से ख्यातिप्राप्त एक कन्या रत्न की उत्पत्ति हुई । रूप-यौवन सम्पन्न होने पर वह बाला तप करने लगी। जिससे लोक के कल्याण करने वाले भगवान शिव ने उस सौन्दर्य पूर्ण एवं कल्याणमुखी कन्या को धीर-गम्भीर राजा मकरन्द को सौंप दिया। उसी बीच मुनि ने शंकर जी से प्रार्थना की-देवाधिदेव आपको नमस्कार है । आप मेरी कन्या के लिए वर और मुझे एक समृद्ध राष्ट्र प्रदान करने की कृपा कीजिये । इसे सुनकर शिव जी ने कहा-पृथ्वीदल में गुरुण्डों (गोरों) के (राज्य) समाप्ति के अनन्तर मध्यप्रदेश में तुम्हारा सुखप्रद राष्ट्र होगा । किन्तु तीन सौ वर्ष के उपरांत उसका ह्रास हो जायगा। इस सुनकर उस हिमालय के उत्तुङ्ग शिखर के निवासी ने मकरन्द के साथ वहाँ निवास करना आरम्भ किया ।

विप्र ! इतना कहकर मैं पुनः तुम्हें एक अन्य शुभ कथा सुना रहा हूँ- उदयसिंह की उन्तीस वर्ष की अवस्था आरम्भ होने पर राजा नेत्रपाल के उस अनेक धातुओं द्वारा रचित चित्र-विचित्र नगर को बौद्ध ने चारों ओर से घेर लिया। कारण कि वहाँ के राजा को वह कमजोर समझता था। राजा की सात लाख सेना के साथ महाबली बौद्धसिंह ने अपनी तीन लाख सेनाओं द्वारा घोर संग्राम आरम्भ कर दिया। सात दिन तक दोनों सैनिकों का अनवरत भीषण युद्ध हुआ जिसमें योगसिंह भोगसिंह, और महाबलवान् विजय ने शत्रु बौद्धसिंह की अध्यक्षता में युद्ध करते हुए उनकी सेना का विनाश कर दिया । उसी बीच श्याम और जापक आदि प्रदेशों के मायावी बौद्धगण भी आ गये, जो समस्त लोकों में मानपूर्वक पूज्य थे। उनके आगमन करने से वहाँ पुनः एक मास तक उन दोनों में भीषण युद्ध हुआ। राजा नेत्रपाल की प्रेरणा से उदयसिंह आदि वीरगण भी वहाँ पहुँच गये जिसमें उदयसिंह विन्दुल (बेंदुल) पर देवसिंह अपने घोड़े पर इन्दुल (इंदल) कराल नामक घोड़े पर मंडलीक (आल्हा) गजराजपर, गोतमहरिनागर पर और तालन अपनी सिंहिनी नामक घोड़ी पर सवार होकर वहाँ उपस्थित हुए । धान्यपाल तेली युयुतनु के अंश से उत्पन्न लल्लसिंह तथा लक्षण (लाखन) की आज्ञा से वह तमोली भी साथ आया था । उस समय राजा नेत्रसिंह ने अपने सात लाख सैनिकों द्वारा जो उनके आत्मीय आठ वीरों की अध्यक्षता में सुरक्षित थे, बौद्धों के विनाशार्थ प्रस्थान कर दिया किन्तु उनसे भयभीत होकर उन बौद्धों ने इस देश का त्यागकर चीन देश को प्रस्थान किया और वहाँ पहुँचकर रणभूमि की घोषणा की। इन लोगों ने भी बौद्धों के पीछे हूला नदी के तटपर पहुँचने का प्रयत्न किया। वहाँ माघ मास के आरम्भ में दोनों सैनिकों का पुनः युद्ध आरम्भ हुआ । बौद्धसिंह के पास श्याम एवं जावा के एक लाख और चीन के दशलाख चीनी बौद्ध सैनिक आये थे।

उसी प्रकार राजा नेत्रपाल के पास उदयसिंह देवसिंह, योगसिंह भोगसिंह समेत नेत्र पाल सिंह, इन्दुल (इंदल) समेत मंडलीक (आल्हा) धनपाल, लल्लसिंह, जगनायक और तालन के साथ पृथक्-पृथक एक लाख सैनिक आये थे। मुनिश्रेष्ठ ! उस स्थानपर बौद्धों और आर्यों का घोर संग्राम आरम्भ हुआ, जो निरन्तर एक पक्ष तक चलते हुए यमलोक की वृद्धि कर रहा था। उस रण भूमि में बौद्धों के सातलाख और आर्यों के दोलाख सैनिक काम आये। पश्चात् भयभीत होकर बौद्धगण अपने घर भाग गये किन्तु कलयंत्र के द्वारा उन्होंने काष्ठसेना का निर्माण कर पुनः युद्धारम्भ किया, जिसमें काष्ठ के शूरसमेत दशसहस्र गज, एक लाख अश्व, सहस्र भैंसे, सहस्र कोल, सहस्र सिंह, सहस्र हंस, कंक स्यार, गीध, और सातसहस्र ऊँट सवार समेत उस रणस्थल में युद्धोन्मुख हो रहे थे। उस प्रकार उस युद्ध में बौद्धों के सवा लाख काष्ठ सैनिकों द्वारा उदयसिंह आदि के दो लाख मनुष्य सैनिकों का संहार होते देखकर आर्यों की सेनाओं में हाहाकर मच गया। इस दृश्य को देखकर युद्ध निपुण इंदुल ने अपने आग्नेय वाणों द्वारा उन काष्ठ सैनिकों को उनके वाहन समेत भस्मकर उन्हें विलीन कर दिया । पश्चात् शेष तीन लाख क्षत्रिय सैनिकों ने रण पंडित इंदुल को अपने जय जयकार के सिंहनाद द्वारा संतुष्ट किया। उस समय चीन निवासी बौद्धों ने लोहनिर्मित बीस सहस्र वाहन समेत सैनिकों को पुनः उस युद्धस्थल में भेजा। उन्हें देखकर हाथीपर बैठे हुए योगसिंह ने अपने वाणों द्वारा उन वीरों को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया। जिसके फलस्वरूप योगसिंह के वाणों से पीड़ित होकर लोहे के उन पाँच सहस्र सैनिकों का निधन हुआ। बौद्धसिंह ने उनके इस पराक्रा को देखकर एक लोहे का सिंह बनाकर उनके पास भेजा। उस सिंह के आक्रमण करने से योगसिंह का निधन हो गया। उसे देखकर घोड़े पर बैठे हुए भोगसिंह ने अपने भल्लास्त्र द्वारा उस सिंह का वध करके भीषण गर्जना की। उसी समय बौद्ध सिंह द्वारा प्रेषित एक लोहे के वाद्य द्वारा घोड़े समेत भोगसिंह का निधन हो गया। उस समय अपने दोनो मामा को मृत्यु की गोद में शयन किये देखकर स्वर्णवती (सोना) पुत्र इन्दुल ने कराल नामक घोड़े पर बैठकर बौद्धसिंह के पास पहुँचते ही अपने संमोहन नामक वाण द्वारा सेना समेत बौद्धसिंह को एवं उनके अनुयायी दश सहस्र राजाओं को मोहित करने के उपरांत बाँधकर तथा उनके कलयंत्र को समूल नष्ट करते हुए उदयसिंह के पास पहुँचने का प्रयत्न किया। उनके पहुँचने पर हर्षित होकर उन लोगों ने प्रपेष्य नगर की यात्रा की । सम्पूर्ण सम्पत्तियों से भरे उस नगर के घरों को जिसमें वहाँ के निवासी अत्यन्त सुख का अनुभव कर रहे थे, विध्वंस एवं लूट मचाते हुए वे लोग राजा के दुर्ग पर पहुँच गये। वहाँ इन्दुल द्वारा मुक्त होने पर बौद्धसिंह ने पद्मना नामक अपनी पुत्री का पाणिग्रहण इंदुल के साथ सुसम्पन्न किया। तथा आह्लाद (आल्हा) को दशकोटि सुवर्ण धन प्रदान करने के उपरांत बौद्धों ने उनके समक्ष शपथ भी की- ‘कि राज्य की लिप्सा से हम लोग आर्य प्रदेश में कभी भी यात्रा नहीं करेंगे। इसके उपरांत उन्हें प्रणाराकर वहाँ से प्रस्थान किया। और नेत्रपाल भी अपने तीन लाख सैनिकों समेत घर आये।५०-५२
ऋषियों ने कहा-सूत ! इन्दुल ने अत्यन्त प्रिय अपने योगसिंह आदि वीरों को क्यों जीवित नहीं किया। इसे बताने की कृपा कीजिये ।५३
सूत जी बोले-यमराज के लोक से कुछ प्राणियों ने इस पृथ्वी पर आकर (यहाँ का दृश्य देखते हुए) पुनः देवराज इन्द्र के पास पहुँचकर उनसे प्रार्थना की कि समस्त देवों के प्रिय नेता देवराज तुम्हें नमस्कार है । भगवान् ! जयंत (इंदुल) पृथ्वीपर जाकर मृतकों को स्वयं जीवनदान प्रदान कर रहा है, इसलिए लोक की मर्यादा भूतल पर उसके विरुद्ध दिखाई दे रही है । इसे सुनकर देवसम्राट इन्द्र ने अपनी देवमाया द्वारा अपने पुत्र जयन्त की स्वर्गगामिनीगति समेत उस अमृत वडवा का अपहरण कर लिया। उस समय अत्यन्त दुःख का अनुभव करते हुए इंदुल अपने सर्वमंगला शारदा जी की सविधि पूजा करने के उपरांत ध्यान-योग करना आरम्भ किया। विप्र ! इतना कहकर मैं पुनः अन्य कथा सुना रहा हूँ। बलवान् नेत्रपाल ने पुत्र-शोक करते हुए शेष पुत्रों को दश कोटि का सुवर्ण समभाग कर विभाजित करने के उपरांत आठों बलशाली पुत्रों की शेष दो लाख सेनासमेत अपने घर को प्रस्थान किया ।
(अध्याय २९)

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