भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय १५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय १५
वसु देवताओं के अंश से कुबेर आदि की उत्त्पति रामायण की संक्षिप्त कथा तथा त्रिलोचन वैश्योत्पत्ति का वर्णन

सूत जी बोले — भृगुवर्य एवं महाभाग ! बृहस्पति द्वारा कथित उस वसुमाहात्म्य का वर्णन कर रहा हूँ, जो पवित्र एवं सर्व वस्तुओं को सुख प्रदान करता है, सुनो !

बृहस्पति जी बोले — सतयुग के आदि काल में वैवस्वत मन्वन्तर के समय विश्रवा मुनि की उस तामसी प्रिया एवं इल्वला सती शक्ति ने पार्थिव पूजन द्वारा शिव की आराधना की । उसी समय दीक्षित कुल में उत्पन्न महाधूर्त यक्षशर्मा ने यक्षिणी की आराधना करके उसे प्रसन्न किया । पश्चात् उस पापी ने अपने मित्र की पुत्रवधू के साथ भी रमण किया, जिससे उसे कुष्ठ का रोग उत्पन्न हो गया । उस ब्राह्मण को कुष्ठ का रोगी देखकर उस यक्षिणी ने उसे त्यागकर गुह्यकाल कैलास की यात्रा की । om, ॐएक समय शिवरात्र व्रत के दिन भूख से पीड़ित होने पर यक्षशर्मा को भोजन नहीं मिला, किन्तु उपदेश एवं शिवार्चन का दर्शन करने के लिए विवश हुआ । प्रातः होने पर उस ब्राह्मण ने पारण किया । तदुपरांत उसी मंदिर में उसका निधन हो गया । उस पुण्य के प्रभाव से वह कर्णाटक देश का राजा हुआ, जो राजराज के नाम से प्रख्यात मण्डलीक राजा कहा जाता था । उस महाबली राजराज ने अपने राज्य में प्रत्येक प्रजाओं के यहाँ प्रतिदिन ब्राह्मणों द्वारा उस मांगलिक शिवार्चन की व्यवस्था सुसम्पन्न कराना आरम्भ किया । उस पुण्य प्रभाव से सौ वर्ष तक सुखी जीवन व्यतीत करने के उपरांत उस महात्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य भी सौंपकर स्वयं काशी की यात्रा की । वहाँ पहुँचकर शिवपूजन करना आरम्भ किया । तीन वर्षों के उपरांत महादेव जी ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो राज राजेश्वर के नाम से प्रख्यात हुए । भगवान् शिव के द्वारा पूतात्मा होकर उस राजा ने इल्वला के गर्भ में पहुँचकर शुभ लक्षणों से विभूषित पुत्र का जन्म ग्रहण किया । अंधेरी रात की कुत्सित (निंदित) वेला में उत्पन्न होने के नाते उस पुत्र का कुबेर नाम से इस भूमण्ड में प्रख्याति हुई ।

उसने अपने तपश्चर्या द्वारा पितामह ब्रह्मा को प्रसन्न किया तत्पश्चात् ब्रह्मा ने सुवर्ण रचित लंका नामक पुरी उसे प्रदान किया । लोककार्य सुसम्पन्न करने के लिए तीन कोटि यक्षों की उत्पत्ति की गई और उनके स्वामी कुबेर ‘यक्षराट्’ के नाम से विख्यात हुआ । बहुरूपी किन्नरगण जो उनके आदेश पालंक हैं, उन्हें बलि प्रदान द्वारा प्रसन्न रखते हैं । नरभाव से दिव्य एवं सुसज्जित केशपाश धारण करने वाले उन गुह्यकों के स्वामी भगवान् कुबेर स्वयंभू ही हैं । उन्होंने लोक कल्याणार्थ पर्वतों से रत्नों के संग्रहकर प्रत्येक घरों एवं मनुष्यों के लिए राक्षस द्वारा भेज दिया । जितने वेदमार्गानुयायी धार्मिक लोग होते हैं उनके कोषों की पूर्ति इन्हीं धर्ममूर्ति कुबेर द्वारा होती है । इसी भाँति लोभी धूर्त धनिकों के राजा जो उन्हें द्रव्य प्रदान करते है, भगवान् राक्षसेश्वर होते हैं, जिनके राक्षस गण अग्नि में जलाये गये शवों के मांस उसी अग्नि द्वारा भक्षण करते हैं ।

इन विभूतियों से सुसम्पन्न इन्हें देखकर बलवान् रावण ने लंका से हटकर स्वयं राजसिंहासन अपना लिया । उस समय दुःखी होकर कुबेर ने दुःखनाशक एवं शरण्य भगवान शंकर की शरण प्राप्त की । भगवान् शिव ने कुबेर के साथ मैत्री करके विश्वकर्मा द्वारा अलकावती पुरी की रचनाकर उन्हें उसका अधीश्वर बनाया । वह पुरी सज्जनों को सदैव मंगल प्रदान करती रहती है । भगवान् कुबेर ने उसमें रहकर अत्यन्त हर्षित जीवन व्यतीत करना आरम्भ किया । इसे सुनकर उनके अनुज लोकविदारक रावण ने कैलास जाकर नलकूबर की प्रेयसी को देखा । पुलस्त्य वंशज रावण ने अधीर होकर उस सुन्दरी का उपभोग बलात् किया, जिससे क्रुद्ध होकर उस पतिव्रता सुप्रभा देवी ने उनसे कहा । लोक दुःखदायी रावण ! पापिन् ! मैं तुम्हारी पुत्र-वधू की भाँति हूँ। इस पाप से तुम्हें भीषण कुष्ठ का रोग हो जायेगा और अपने ज्येष्ठ भाई कुबेर के विमान का जो तुमने अपहरण कर लिया है, चोरों के यहाँ से चुराये गये धन की भाँति तुम्हारे घर से निवृत्त होकर वहीं चला जायेगा । इस प्रकार शाप से अभिमूत होने के कारण दुःखी होकर रावण ने उसी कैलास पर रहकर पार्थिव पूजन द्वारा शिव की आराधना की । बारह वर्ष तक पूजन करने पर भी भगवान् रुद्र के न प्रसन्न होने पर रावण ने अत्यन्त दुःख प्रकट करते हुए प्रज्वलित अग्नि में अपने सिर का हवन करना आरम्भ किया उसने अपनी स्थूल देह का समस्त भाग रुद्र के लिए अर्पित कर दिया । केवल भस्मावशेष रह गया, किन्तु ब्रह्मा के वरदान द्वारा उसकी मृत्यु न हुई । उस समय अग्निकुंड से निकली हुई अन्य मनोहर शरीर की प्राप्तिकर उस बली ने अपने अंग को पुनः उन वायु रूप शिव के लिए अर्पित किया । उस समय वायुरूपधारी पिशाचों ने रावण के उस शरीर का भक्षण कर लिया था, किन्तु वरदान के प्रभाव द्वारा वह जीवित ही रहा । उस वायु द्वारा आधी देह को आकाश रूप रुद्र के पुनः अर्पित किया । उस समय भी घोर मातृगणों द्वारा उसके भक्षित होने पर भी वरदान प्राप्ति के नाते उसकी मृत्यु न हो सकी । पश्चात् आकाश जन्य उस शून्यभूत देह की प्राप्तिकर रावण ने पुनः उसे अहं भूतरूप शिव को समर्पित कर दिया । उस समय अहंकार देव भगवान् रुद्र प्रसन्न होकर कुबेर की भाँति रावण से भी मैत्री स्थापित की । तदुपरांत उसे एक सिर के बदले में कोटि-कोटि सिरों का वरदान देते हुए देवाधिदेव ने उसकी देह वज्र की भाँति कठोर होने का वरदान भी दिया । इस प्रकार उस रावण ने भीषण वरदान द्वारा गर्वित होकर देव, दैत्य, मनुष्य एवं पन्नगों की नवोढा रमणियों के साथ इरा ब्रह्माण्ड में घूमते हुए रमण करना आरम्भ किया । उस राक्षस ने सम्पूर्ण लोंकों के वैदिक एवं सनातनी पतिव्रता धर्म को निर्मूल कर दिया । शिव द्वारा तृप्त होने के नाते उसे भूख प्यास नहीं लगती थी । उस समय यज्ञानुष्ठान स्थगित हो जाने के नाते देवगण क्षुधा पीड़ित होकर अत्यन्त दुःखी रहने लगे। तदुपरांत दुःखी देवों ने ब्रह्मा को आगे कर क्षीरसागर में जाकर एक साथ परमेश्वर की आराधना आरम्भ की । उस समय प्रसन्न होकर सगुण निर्गुण भगवान् ने संयमी एवं भक्ति नम्र समस्त देवों से कहा — इस श्वेतवाराह नामक कल्प में इस लोक दुःखदायी रावण की भाँति अन्य कोई दानव उत्पन्न नहीं हुआ । पहले मार्कण्डेय कल्प में उत्पन्न शुम्भ निशुम्भ की भाँति ऐसे कुम्भ कर्ण और रावण भीषण हैं । रावण भी अनेक हो चुके हैं किन्तु इस रावण के समान वे नहीं थे । जिस प्रकृति द्वारा मैं ब्रह्मा, तथा सनातन रुद्र उत्पन्न हुए हैं, वह माया प्रकृति कोटि विश्व की रचना एवं धारण करने की शक्ति है और देवों के घोर संकट उपस्थित होने पर उसके निवारण के लिए स्वयं देवराट् समर्थ हैं, शक्र विघ्न के उपस्थित होने पर भगवान् शिव, और रुद्र के भीषण संकट उपस्थित होने पर मैं उसे निवारण के लिए सदैव समर्थ रहता हूँ । उसी प्रकार मेरे संकट के निवारणार्थ भगवान् हरि समर्थ हैं और ब्रह्मा के अत्यन्त संकट ग्रस्त होने पर परा प्रकृत्ति निवारण करती है । पहले समय में लोक विख्यात मधु और कैटभ दानव के उत्पन्न होने पर उनसे दुःखी होकर ब्रह्मा ने जगदम्बिका की आराधना की । उस समय अम्बिका द्वारा बल प्राप्तकर मैंने मधु कैटभ का संहार किया था । इसलिए मेरी आज्ञा से सबलोग उस विष्णु माया की जो शरण प्रदान करती है, शरण में पहुँचकर उसकी आराधना करो । उसे सुनकर देवों ने पराप्रकृति की आराधना आरम्भ की । उस समय प्रसन्न होकर उस ब्रह्म ज्योतिर्मयी शिवा ने द्विधा (दो भोगों में विभक्त) होकर सीताराम के रूप में जो पर अपर कहलाते हैं, अवतार धारण किया। त्रिलिंग उनकी सीता ने अपने अपर रूप को दो भागों में विभक्तकर उसके द्वारा शब्द और अर्थात्मक राम लक्ष्मण की उत्पत्ति की जिसमें शब्द मात्र संमूह के स्वामी राम और अर्थ मात्र समूह के ईश क्लीब लक्ष्मण हुए । जिसका वीर्य वज्रमय और ब्रह्मचर्य दृढ था । उसी प्रकार अन्य वानर गण भी क्लीब ही थे । उन दोनों की मंगलदायिनी सीता, जो परा प्रकृति रूप है, भूमि के मध्य से अयोनिज रूप में उत्पन्न हुई । जिस बुद्धिमान् ने राम राम का सहस्र जप किया है, उसका फल सीता नाम के समान ही उसे प्राप्त होता है । इस दृश्य के अभाव काल में तामसी प्रकृति, जो अक्षर (अविनाशिनी) एवं अशेष (सम्पूर्ण) रूप है, स्वयं तीन भागों में विभक्त होकर पूर्व भाग द्वारा राम मध्य से लक्षण और पूर्व भाग से क्लब (अलिंग और नपुंसक) रूप दो और की उत्पत्ति हुई है । देववृन्द ! अन्य तीसरे भाग से सनातनी योगनिद्रा देवी प्रकट होकर अवस्थित हैं । अन्य कल्पों में क्षीरशायी स्वयं भगवान राम और रुद्र लक्ष्मण एवं लक्ष्मी जनक- नन्दिन भगवती सीता के रूप में प्रकट होती हैं । उसी प्रकार उनके अस्त्र सुदर्शन भरत एवं शंख शत्रुघ्न रूप धारण करते हैं । श्वेत वाराह कल्प में परात्पर ब्रह्म राम, प्रद्युम्न लक्ष्मण और अनिरूद्ध भरत के रूप में प्रकट होकर रावणादि राक्षसों के विनाश करते हैं । वह स्वयं प्रभु राम रूप में जो अवतरित रहते हैं, ब्रह्माण्ड में अपनी पावन कीर्ति की स्थापना पूर्वक पुष्पक विमान कुबेर को लौटा देते हैं । पश्चात् एकादश सहस्र वर्ष राज्योपभोग करने के उपरांत परमपद की प्राप्ति करते हैं ।

सूत जी बोले — इसे सुनकर प्रथम वसुदेवता कुबेर ने मुख द्वारा अपने अंश को निकालनर धरन (धरदत्त) वैश्य के घर भेजा जो वहाँ पुत्र रूप में उत्पन्न होकर इस भूमण्डल पर प्रख्यात हुआ । उसकी पुरी का नाभ ‘मथुरा’ और उसका नाम त्रिलोचन था । उसने अपने समस्त द्रव्य को व्यय करते हुए तीर्थों में भ्रमण करते काशी की यात्रा की । वहां पहुंचने पर रामानन्द वैष्णव’ के अधीन होकर उनका शिष्य होना स्वीकार किया । तत्पश्चात् अपने घर जाकर त्रिलोचन ने गुरु की आज्ञा से राम भक्ति में तत्पर रहकर साधु सेवा करना आरम्भ किया । उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर राम ने तेरहवें मास दास रूप में उसके घर रहकर उसकी इच्छापूर्ति समेत मणि रत्न, सुवर्ण भाँति-भाँति के वस्त्र तथा अनेक भाँति के व्यंजन ब्राह्मणों को स्वयं प्रदान कर उन्हें तृप्त करना आरम्भ किया । उस समय वैष्णवों एवं योगियों को उनके मनवाञ्छित पदार्थ दिये जाते थे । इस प्रकार अनेक वर्षों की सेवा करने के उपरांत रावण विनाशी भगवान् ने एक दिन त्रिलोचन वैश्य से कहा — मैं राम हूँ, तुम्हारा मनुष्य सेवक नहीं । तुम्हारी भक्ति से मोहित होकर तुम्हारे घर रहकर तुम्हारा प्रिय एवं हितसाधन किया करता था, किन्तु अब आज ही मैं इस सेवक रूप में रहकर तुम्हारे हृदय में निवास करूंगा । इतना कहकर भगवान् अन्तर्हित हो गये और उस वैश्य ने जाकर वैराग्य उत्पन्न होने के नाते हर्षमग्न होकर अपनी स्त्री एवं पुत्र के परित्याग पूर्वक सरयू के तट पर भगवान् का ध्यान करना आरम्भ किया ।
(अध्याय १५)

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