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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय १८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय १८
अशऽविनीकुमारों के अंश से सधन (सदन कसाई) और संत रैदास की समुत्पत्ति का वर्णन

सूत जी बोले — भगवान बृहस्पति ने देवों से इस प्रकार की बातें कहकर पुनः अश्विनी कुमार की गाथा का वर्णन करना आरम्भ किया । वैवस्वत मन्वतर काल के पूर्व समय में विचित्र कारीगरी करने वाले विश्वकर्मा ने चित्रलेखा द्वारा निर्माण किये चित्रगुप्त को देखकर ईर्ष्या प्रकट करते हुए अनेक भाँति के पूजनों द्वारा महामाया का पूजन करना आरम्भ किया ।om, ॐ प्रसन्न होकर उस माहामाया ने, जो सम्पूर्ण ज्ञानों की प्रदात्री है, उनकी चित्रा नामक पत्नी में अपने अंश द्वारा संज्ञा नाम से जन्म ग्रहण किया । संज्ञा की सोलह वर्ष की अवस्था होने पर उसके सुखी पिता ने मेरुशिखर पर स्वयम्बर का आयोजन किया, जिसमें सभी देवों का आवाहन किया गया । उस स्वयम्बर में छब्बीस यक्षों समेत उनके अधीश्वर कुबेर, यादों गणों समेत उनके अध्यक्ष वरुण, पावकगण, उनचास वायुगण दोनों ध्रुव सोलह सोमगण, विश्वरक्षक तेरह प्रत्यूषगण, दिनरक्षक तीन सौ साठ प्रभास गण, चन्द्रमण्डलरक्षक भवादि रुद्रगण तथा सभी आदित्य उपस्थित थे । उसी प्रकार चौरासी विप्रचिति आदि दानव, प्रह्लाद आदि दैत्य, वासुकी आदि पन्नग, शेष आदि नाग और तार्क्ष्य आदि तथा गरुडगण भी उपस्थित थे । उस समय उस स्वयम्बर में महान् कोलाहल हो रहा था । उसी बीच देवकन्याओं के साथ वह संज्ञादेवी देवों के सामने आकाश में दिखाई पडी । उसे देखकर काममोहित होकर बलवान् बलि ने उसका हाथ पकड़कर उन सभी के देखते-देखते उनको लेकर चल दिया । उस समय देवों ने क्रुद्ध होकर उस दैत्यश्रेष्ठ को रोकने की चेष्टा की तथा अपने शस्त्रास्त्रों के घांत-प्रतिघात द्वारा उनमें महान् युद्ध आरम्भ हो गया । दानवों और दैत्यों ने अनेक भाँति के अपने-अपने वाहनों पर बैठकर उन देवों के साथ भीषण युद्ध किया । देव-दानवों का वह दिव्य युद्ध एक पक्ष (पन्द्रह दिन) तक हुआ, जिसमें उस इलावृत की भूमि शवमय दिखाई देने लगी । उस युद्ध में पाञ्चजन्य-धाता, हयग्रीव-मित्रक, अघासुर-अर्यमा, बल-इन्द्र, वकासुर-वरुण, शकट-प्रांशु, वत्सासुर-भग विवस्वान्-बलि, प्रलम्ब-पूजा, गर्दभ-सविता, विश्वकर्मा-मय, और कालनेमि-विष्णु आपस में एक दूसरे को पराजित करने की इच्छा से युद्ध कर रहे थे । उस युद्ध में पराजित होकर दैत्यों ने पलायन किया । उस समय विवस्वान् ने संज्ञा को रथ पर बैठाकर ले जाकर विश्वकर्मा को सौंप दिया । उस समय देवश्रेष्ठ विवस्वान् को प्रसन्न देखकर संज्ञा ने उनसे कहा — आप मेरे पति होकर मेरा कार्य सदैव किया करें । क्योंकि भगवन् ! आपने बलि को पराजित कर विजय रूप में मुझे प्राप्त किया है । भाई की पुत्री (भतीजी) का ग्रहण करने में कोई दोष भी न होगा, क्योंकि मुनियों ने यह स्वीकार किया है कि नारी सदैव वीर-भोग्या है और विशेषकर स्त्री-रत्न-गुण-युक्ता प्रकृति देवी अपने को गुण भेद द्वारा चार रूपों में विभक्त करती है — एक भाग से वह सनातनी प्रकृति माता, सतोगुण रूप से भगिनी, रजोगुण रूप से गृहिणी, और तमोगुण रूप से कन्या होती है, अतः उस देवी को नमस्कार है तथा एकरूपी उस निर्गुण को अनेक पुरुष रूपों में विभक्त किया है, जो चैतन्य, अज्ञानी एवं प्रकृति द्वारा उत्पन्न कहे जाते हैं । अ-लोक निवासी सभी लोग पापकर्म द्वारा ब्रह्मादि देवों से उत्पन्न हैं और उसे ही ज्ञानमयी नारी पुरुष रूप में वरण करती है । अतः उस स्त्री के पुत्र, पिता, भ्राता और पति कौन हो सकते हैं ? क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी पुत्री, विष्णु ने अपनी माता, एवं भगवान् शंभु ने अपनी भगिनी का (स्त्रीरूप) ग्रहणकर श्रेष्ठता प्राप्त की है । अदितिपुत्र विवस्वान् ने इस वेदमयी वाणी को सुनकर उस भ्रातृपुत्री संज्ञा का ग्रहणकर श्रेष्ठता प्राप्त की ।

भगवान् विवस्वान् को संज्ञा से दिव्य तेजस्वी वैवस्वत मनु, यम और यमुना नामक तीन संतानें उत्पन्न हुईं । उस समय संज्ञा ने अपने पति को तेजपुञ्ज जानकर अपनी प्रतिनिधि छाया को वहाँ रखकर स्वयं तप करने के लिए प्रस्थान किया । अनन्तर विवस्वान् ने सावर्णि मनु, शनि और तपती को अपनी क्रूरदृष्टि द्वारा छाया के गर्भ से उत्पन्न किया । किन्तु पुत्रभेद करने से छाया को नारी समझते हुए भी क्रुद्ध होकर भगवान् विवस्वान् ने उस माया को भस्मकर दिया ।शनि और सावर्णि ने विवस्वान् को क्रुद्ध होते देखकर सूर्य के प्रति युद्ध करने लगे, किन्तु कुछ काल के उपरान्त विवस्वान् से भयभीत होकर उन दोनों ने हिमालय पर्वत पर जाकर तप करना आरम्भ किया । तीन वर्ष के उपरान्त भक्तवत्सला महाकाली देवी ने उन दोनों को वर प्रदान किया । वे दोनों पुनः आकर विवस्वान् से युद्ध करने लगे, किन्तु भयभीत होकर विवस्वान् ने उस युद्ध से पलायन कर उस रमणीक कुरु प्रदेश की यात्रा की, जहाँ उनकी संज्ञा नामक प्रिय बडवा (घोड़ी) का रूप धारणकर महाभीषण तप कर रही थी । भगवान् विवस्वान् ने वहाँ पहुँचकर उस अपनी संज्ञा पत्नी को देखकर कामपीड़ित होते हुए अश्वरूप धारण पूर्वक उसके साथ रमण किया । पाँच वर्ष तक रमण करने के उपरान्त संज्ञा ने गर्भ धारण किया, जिससे दिव्य रूप एवं पराक्रम पूर्ण दो पुत्रों (अश्विनीकुमार) ने जन्म ग्रहण किया । उन दोनों पुत्रों ने अपने पिता को दुःखी देखकर रविमण्डल में पहुँचकर उन दोनों दुराचारी बन्धुओं को विजयपूर्वक बाँधकर अपने पिता के सामने उपस्थित किया । उन दोनों बडवा-पुत्रों द्वारा उपस्थित अपने शत्रुओं को देखकर भगवान् विवस्वान् ने भयानक लोहदण्ड से उन्हें इस भाँति प्रताडित किया जिससे वे दोनों छायापुत्र पंगु हो गये । तत्पश्चात् दिवाकर ने बडवा पुत्रों की ओर देखकर हर्षित होकर कहा — जिस प्रकार जीव, ईश (परमात्मा) और नर-नारायण एक रूप रंग एवं अभिन्न मित्र हैं, उसी प्रकार ‘नासत्य’ इस एक नाम से प्रख्यात होकर तुम दोनों प्रसन्न रहोगे । सोम की शक्ति इड़ादेवी ज्येष्ठ की और सूर्य की शक्ति पिंगला कनिष्ठ पुत्र की पत्नी होगी । इसलिए प्रथम पुत्र की इडापति और दूसरे की पिंगलापति के नाम से ख्याति होगी । मनुष्यों की बारहवीं राशि के स्थान में प्राप्त क्रूरदृष्टि शनि की शांति इस भूतल में ज्येष्ठ पुत्र द्वारा होगी और उसी भाँति दूसरे स्थान में प्राप्त सावर्णि (शनि) राहु और केतु भ्रमण कारक होते हैं, उसकी शांति पिंगलापति करेंगे । उसी प्रकार जन्म राशि-स्थान में रहकर तपंती देवी ताप करने वाली होगी । उसकी शांति इडा और पिंगला द्वारा होगी । इसे सुनकर अश्विनी कुमार वैद्य और सावर्णि शनि, राहु और केतु हुए, जो स्वर्ग में ताप प्रदान करते रहते हैं । उन्ही के निवारणार्थ अश्विनी कुमारों का जन्म है ।

सूत जी बोले — गुरु की ऐसी बातें सुनकर प्रसन्न होकर उन दोनों देव श्रेष्ठों ने अपने अंश द्वारा इस भूतल में शूद्र कुल में जन्म ग्रहण किया । उनमें प्रथम पुत्र इडापति ने बकरे का वध करने वाले चाण्डाल के घर उत्पन्न होकर ‘सधन'(सदन कसाई)— नाम से प्रख्याति प्राप्त की, जो माता-पिता का परमभक्त था । उसने शालग्रामशिला के समान (शालग्राम से तौल कर) छाग (बकरे) का मांस विक्रय किया था । तत्पश्चात् कबीर के पास पहुँचकर उनकी शिष्य सेवा स्वीकार की । सधन पूर्व जन्म में सत्यनिधि नामक तपस्वी ब्राह्मण था । एक बार एक भयभीत गौ इसने चाण्डाल को सौंप दी, जिससे इसे राजघर से दण्ड की प्राप्ति हुई । इनके हाथ काट दिये गये । अनन्तर धन समेत स्वयं विनष्ट हो गया था । दूसरे पुत्र पिंगलापति ने मानदास चर्मकार के यहाँ पुत्र रूप में उत्पन्न होकर रैदास के नाम से प्रख्याति की । उसने काशीपुरी में राम परायण कबीरदास को अपने मत-विवाद द्वारा पराजित किया था । पश्चात् शंकराचार्य के सामने भी उन दोनों का एक रात-दिन विवाद हुआ, जिसमें रैदास ने पराजित होकर रामानन्द की शिष्य-सेवा स्वीकार की । विप्र ! इस प्रकार मैंने उन देवांशों की उत्पत्ति सुना दी, जिन मार्गप्रदर्शकों की लीला कलि को शुद्ध करती है ।
(अध्याय १८)

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