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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय २३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय २३

सूत जी बोले — मुने ! बाईस सौ चौंसठ वर्ष विक्रम काल के व्यतीत होने पर भूत नन्दि नामक राजा ने उस समय उन धन-धान्य पूर्ण मौन वंशजों को, जिन्हें कुबेर के यक्ष कहा जाता है, और डेढ़ लाख की संख्या में उपस्थित थे, उन्हें पराजित कर शासन-सूत्र को अपने अधीन किया। उस समय किल्किला में नाग वंश वाले राज्यपद पर प्रतिष्ठित थे जो आग्नेय दिशा में पुण्डरीक द्वारा निर्मित होकर प्रख्यात पुरी थी । पुण्डरीक आदि नाग वहाँ पर राजा हुए ।om, ॐ उनके राज्य करते हुए घर-घर में सभी पूजनीय होने लगे थे। स्वाहा, स्वधा, वषट्कार एवं देव की पूजा प्रारम्भ हो गयी थी । देवताओं को छोड़कर लोग मेरुपर्वत के शिखर पर स्थापित होने लगे थे । शक्र की आशा से कुबेर तो चारों तरफ से शूक धान्य यक्षों द्वारा ग्रहणकर षडंश को देवताओं को दे दिये । मौनराज्य में जो मणि एवं स्वर्णादि की वस्तुएँ थीं सबको कोशों में दे दिया। मण्डलीक के पद की सृष्टि कर मूतनन्दि द्वारा उसका सत्कार किया गया । उन्होंने पचासवर्ष तक राज्य किया। इसके बाद शिशुनन्दि नाम के राजा हुए। उन्होंने नागों की पूजा करके देवताओं का तिरस्कार करके बीस वर्ष तक राज्य किया। इसके बाद उनके छोटे भाई नाग की पूजा करने वाले यशोनन्दि ने राज्य किया। उन्होंने पचीसवर्ष तक राज्य किया। इसके बाद प्रवीरक नाम का उनका पुत्र राजा हुआ । वह ग्यारहवर्ष तक इस कर्मभूमि में राज्य किया। एक बार बाह्नीक प्रदेश में सेना समेत आकर उस राजा ने उन पिशाचम्लेच्छों के साथ घोर युद्ध किया, जिससे एक लाख म्लेच्छों का निधन हुआ। और साठ सहस्र नाग भक्तों की भी मृत्यु हुई । उन्हीं दिनों रोम देश के राजा बादल ने जो अत्यन्त पराक्रमी था । यशोनन्दिन् को बुलाकर उन्हें अपनी जालमती नामक पुत्री सौंप दी । अनन्तर म्लेच्छराज की उस पुत्री को लेकर वे अपने घर लौट आये। कुछ समय के उपरान्त दोनों के संयोग द्वारा एक बलवान् पुत्र की उत्पत्ति हुई, जो बाह्नीक नाम से प्रख्यात एवं नाग देवों का उपासक था। उसके वंश में उत्पन्न होकर तेरह बाह्रीक राजाओं ने क्रमशः चार सौ वर्ष तक राज्य करने के अनन्तर अपनी देह का परित्याग किया। अधोमुख नामदः वाह्नीक के शासनाधिकार के समय पितरगणों ने कृष्णचैतन्य के पाम पहुँचकर नमस्कार पूर्वक उनसे कहा- भगवन् ! आप हम लोगों की कुछ प्रार्थना सुनने की कृपा करें- नाग वंशीय राजाओं ने हम लोगों को निकाल दिया है । श्राद्ध और तर्पणरूप कर्मों द्वारा हम लोगों की सदैव वृद्धि होती रही है। क्योंकि पितरों की वृद्धि द्वारा सोमवृद्धि सोमवृद्धि से देवों की वृद्धि, देववृद्धि द्वारा लोक की वृद्धि, और उसके द्वारा प्रजापति ब्रह्मा की वृद्धि होती है एवं ब्रह्मा की वृद्धि से अनेक घरों के प्रत्येक प्राणी सुखी-जीवन व्यतीत करते हैं। इसलिए भगवन् ! हम सनातनी प्रजाओं की रक्षा कीजिये। इसे सुनकर विष्णुरूप भगवान् यज्ञांशदेव ने आर्यवंश के वृद्ध्यर्थ धर्ममूर्ति पुष्यमित्र के यहाँ पुत्ररूप में जन्मग्रहण किया। उत्पन्न होते ही वह बालक आठ वर्ष के बालक की भाँति दिखाई देने लगा। उस अयानिज बालक ने योनिद्वारा उत्पन्न उन अयोमुख नामक आदि बाह्नीक राजाओं को पराजित करके देश से निकाल दिया और स्वयं उस राज्य का शासनाधिकार अपनाया । जिस प्रकार शिवांश से उत्पन्न होकर राजा विक्रमादित्य ने गन्धर्व पक्ष के समर्थक शकों को पराजितकर दिया था और स्वयं सर्वपूज्य हुए, उसी भाँति उस समय राजा पुष्यमित्र ने भीषण एवं गोल मुख वाले उन नागवंशीय राजाओं को पराजित किया और स्वयं सर्वपूज्य हुए। राजा पुष्पमित्र के राज्यपद प्राप्ति के समय विक्रम काल का सत्ताईस सौ बहत्तर वर्ष व्यतीत हो चुका था ।

उस धर्ममूर्ति ने सौ वर्ष तक राज्यपद को सुशोभित किया था। उसी राजा ने अपने राजकाल के समय अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका और द्वारकापुरी नामक तीर्थ स्थानों का पुनरुद्धार किया था। उन्होंने ही इस भूमण्डल पर चारों ओर कुरु, सूकर (वाराह) पद्म नामक विविध क्षेत्र नैमिषारण्य उत्पलारण्य एवं वृन्दावन और अनेक तीर्थों की स्थापना की थी। उस समय देवता तथा पितरों के निंदक क िने गन्धर्वसमेत ब्राह्मणवेष धारणकर राजा पुष्यमित्र के यहाँ प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचने पर नमस्कार पूर्वक उनसे कहा-दयालु राजन्! कुछ मेरी बात सुनने की कृपा कीजिये-आर्य प्रदेशों में श्राद्ध- तर्पण द्वारा पितरों की पूजा का जो एक महान क्रम चला आ रहा है, मैं उसे उचित नहीं समझता। क्योंकि इस पृथ्वी पर पितरों की पूजा करना अज्ञानता प्रकट करना है, इसलिए कि इस कर्मक्षेत्र में जिस मनुष्य की परलोक यात्रा होती है, वे वहाँ जाकर चौरासी लाख योनियों की शरीर क्रमशः प्राप्त करते रहते हैं। अतः देवों ने इस पितृ-पूजा का क्रमेण पूर्ण प्रचार किया। क्योंकि पितृ-पूजन के निमित्त किये गये मनुष्यों के श्रम एवं कर्म व्यर्थ हैं।’ इसे सुनकर राजा ने हंसकर कहा-आप मूर्ख ही नहीं महामूढ़ हैं, इसलिए उस उत्तम फल की प्राप्ति आप नहीं जान सकते हैं। भूवर्लोक में शून्य-भूत एवं भास्वर रूप जो दिखाई पड़ते हैं, वे पिंडरूप विमान पर सुशोभित पितृगण हैं । सत्पुत्रों द्वारा सविधान दिये गये पिंड दान आकाश में पहुँचकर सभी प्रकार के आनन्दप्रदायक विमानरूप हो जाते हैं । पश्चात् वे विमान जो पायस पिंड द्वारा निर्मित होते हैं पूरे वर्ष तक वहाँ स्थित रहते हैं। गीता के अठारह अध्याय और सप्तशती (दुर्गाजी) के चरित्र पाठ द्वारा पवित्र किये गये पिंडदान विमानरूप में वहाँ तीन सौ वर्ष स्थित रहते हैं। इस पृथ्वी तल पर जो मनुष्य श्राद्धतर्पण कर्म से वञ्चित होते हैं, उनके वंश के एक सौ एक पीढ़ी के लोग नारकीय होते हैं। अतः श्राद्ध कर्म महान् धर्म हैं, क्योंकि वही समस्त का कारण है। इसे सुनकर गन्धर्वसमेत राजा कलि ने प्रसन्न होकर नमस्कार पूर्वक ।

नृप श्रेष्ठ राजा पुष्पमित्र से कहा-नृप ! मैं आप का सेवक हूँ, मेरी इच्छा है कि आप मेरे मित्र हों। इससे आपका कलिमित्र पुष्य मित्र नाम इस भूमण्डल में सदैव स्थापित रहेगा। जिस प्रकार राजा विक्रमादित्य के मित्र वैताल उनके सभी कार्य सुसम्पन्न करते थे, उसी में मैं आपकी सेवा पूर्वक समस्त कार्यों को पूरा करूंगा, इतना कहकर उस पराक्रमी कलि ने उस धीर गम्भीर राजा को अपनी पीठ पर बैठाकर आकाश के मार्गों द्वारा उन्हें सातों द्वीपों नव खण्डों के दर्शन कराया। राजा पुष्पमित्र ने कलि के समय सभी प्रदेश में नष्ट प्राय उस आर्य- धर्म वा पुनः विस्तृत प्रचार किया। पश्चात् शरीर परित्याग करने पर उनका तेज यज्ञांश में विलीन हुआ। उस समय आंध्र देशीय एवं पराक्रम शाली राजा सुगद ने राज्य के न रहने पर उस राज्य को अपने अधीन कर उसका उपभोग किया। इस कर्मभूमि क्षेत्र में बीस वर्ष तक राज्य पद सुशोभित करने के उपरांत उनकी परलोक यात्रा हुई। अनन्तर उनके वंश के साठ राजाओं ने जो अनेक मार्गावलम्बी थे, क्रमशः उस सिंहासन को सुशोभित किये । पुष्यमित्र राज्य के च्युत होने के तीन सौ दश वर्ष व्यतीत होने पर उसी समय आंध्र देश निवासी राजा का भी विनाश हुआ था। पश्चात् पचास वर्ष तक यह पृथिवी विना राजा की ही रही। उस समय चोर डाकुओं ने छोटे-छोटे मनुष्यों को लूटकर अत्यन्त दुःखी बना दिया था, उससे घोर दरिद्र का आगमन हुआ—पृथ्वी सुवर्ण हीन हो गई। उसे देखकर देवों ने पुनः भगवान से प्रार्थना की । प्रसन्न होकर भगवान ने उन देवों से कहा — कौशल देश में सूर्यांश द्वारा ‘राक्षसारि’ नामक राजा है, जो अत्यन्त देवों का अनुयायी है मेरी आज्ञा से वही नदीतल का राजा होगा। इतना कहकर विष्णु ने अन्तर्हित होकर देवलोक की यात्रा की । अनन्तर उस राक्षसारि को अयोध्या के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित किया । उस राजा ने आंध्रप्रदेश में राक्षसों द्वारा अपहृत किये गये द्रव्यों को पराजित राक्षसों से प्राप्तकर प्रत्येक ग्रामों में मोतियों का आठ सुवर्ण मूल्य निर्धारित किया । उसी प्रकार पीतल का सौ मुद्रा चाँदी, ताँबे का पाँच पीतल, नागधातु का पाँच ताँबे का मूल्य निश्चित किया। पश्चात् उसी क्रम से नागवंश का भी । और लोहे का सौ वंश मूल्य स्थापित किया। इस भाँति उसने पचास वर्ष तक राज्य पद सुशोभित करनेके उपरांत सूर्यलोक की यात्रा की ।

अनन्तर उनके कुल के साठ राजाओं ने क्रमशः उस राजपद को सुशोभित करते रहे । पुष्पमित्र के राज्य काल के सात सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर कौशलवंशीय राजाओं ने स्वर्गारोहण किया, जिससे पचास वर्ष तक यह पृथ्वी मण्डलीक राजा से वञ्चित रही। भार्गव ! उस समय छोटे-छोटे राजा पृथ्वी पर राज कर रहे थे। उसी बीच वैदर देश के राजा ने आर्यदेश में पहुँचकर अपने लाख सैनिकों द्वारा उन छोटे-छोटे राजाओं को अपने अधीनकर मण्डलीक पद को अपनाया। उस राजा ने इस भूमण्डल पर अनेक भाँति के कलापूर्ण एवं विचित्र कार्यों के सुसम्पन्न होने के लिए प्रत्येक ग्रामों में ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया, जो वर्णसंकर के प्रचारक थे। उस राज काल में ब्राह्मण-क्षत्रियवर्ण नाममात्र का रह गया था। आर्य मनुष्य वैश्य और शूद्र राजगीर हो गये थे। उसके राज्य में मनुष्य नाममात्र के देवपूजक थे । इस प्रकार उसने इस कर्म भूमि प्रदेश में साठ वर्ष तक उस सिंहासन को अपनाया था। पश्चात् उसके वंश के क्रमशः छे राजाओं ने उस पद को अपनाकर राज्य किया। पुष्यमित्र राजा के सोलह सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर उस भीषण कलिकाल के समय दूर राजाओं का समूल विनाश हो गया। पुनः छोटे-छोटे राजाओं ने पृथक्-पृथक् अपना आधिपत्य स्थापित किया। चार सौ वर्ष के उपरांत नैषध राज्य के प्रदेश में कालमाली नामक राजा ने राजसिंहासन को सुशोभित किया। उसने अनेक छोटे राजाओं को अपने अधीन करने के उपरांत उस नगर में अपनी राजधानी स्थापित की, जो यमुना नदी के तट पर त्वष्ट्रा द्वारा एक योजन में विस्तृत एवं ‘काल-काला’ नाम से प्रख्यात थी । आर्य राजाओं पर अपना आधिपत्य स्थापित करके उसने देवों तथा पितरों के अपमान पूर्वक प्रत्येक जनों में प्रेत-पूजा का प्रचार किया। इस प्रकार उस कालमाली राजा ने प्रजाओं को पीड़ित करते हुए बत्तीस वर्ष तक राज्य किया। तदनन्तर उसके वंशज साठ राजाओं ने जो नैषध देश के निवासी थे, क्रमशः सौ वर्ष तक राज्य किया ! पश्चात् एक सहस्र वर्ष तक पुनः पूर्व की भाँति छोटे-छोटे राजाओं ने पृथक्-पृथक् शासन सूत्र ग्रहण किया। उस समय देवोंकी पूजा, वैदिकधर्म केवल नाममात्र सुनाई पड़ता था।

पुष्यमित्र के राज्यकाल के इकतीस सौ वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरांत बत्तीसवें के अन्त समय में देवों ने दुःख प्रकट करते हुए कृष्णचैतन्य के पास जाकर नमस्कार पूर्वक प्रियवाणी द्वारा उनसे कहा-भगवन् भूमण्डल में इस समय चारों वर्ण भ्रष्ट हो गये हैं, जो प्रेतमय जीवन व्यतीत करते हुए पचास वर्ष तक ही जीवित रहते हैं । वे लोग पृथ्वी में चारों ओर देवों एवं पितरों के अपमानपूर्वक पिशाचों की ही पूजा करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक ग्रामों में मनुष्यों द्वारा वही निन्दित पूजन चल रहा है। उसी लिए वे अत्यन्त दुःखी भी है यह हम लोगों ने भली भाँति देखा है, और भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी एवं शाकिनीगण अपनी पूजा से मदान्ध होकर देवों और पितरों की निन्दा करते हैं । अतः स्वामिन् शरणागत वत्सल ! कृपाकर हमारी रक्षा कीजिये, क्योंकि वे सब सबल और हम लोग सभी निर्बल हैं। इसे सुनकर नदीहा के उपवन में स्थित यज्ञांशदेव ने विनयविनम्र देवों से कहा-मगध देश के राजा पुरंजय और उसकी पत्नी पुरञ्जनी व्रह्म की उपासना कर रहे हैं, मेरी आज्ञावश उनके संयोग से एक महाबली पुत्र की उत्पत्ति होगी, जो विश्व स्फूर्जि’ के नाम से प्रख्यात, ब्रह्ममार्गपरायण एवं गुणी होगा। इसके अनन्तर पुरञ्जनी ने गर्भ धारण किया, जिससे दशवें मास में महाबली विश्वस्फूर्जि नामक राजकुमार का जन्म हुआ। उस राजकुमार के जन्म ग्रहण करने के समय आकाश वाणी हुई–वर्णधर्म के प्रवर्तक राजा पुष्यमित्र की भाँति यह बली बालक भी वर्णधर्म के प्रचार पूर्वक ब्रह्ममार्ग का अनुगामी होगा। यदुवंशियों, तथा भद्रदेश निवासियों में वर्णव्यवस्था की स्थापना करते हुए कलि के दमन करने वाला यह राजपुत्र उन दुष्ट बुद्धिवाली प्राओं को वैदिक मार्ग के अनुयायी करने के उपरांत दुष्ट राजाओं के विनाश पूर्वक पद्मवतीपुरी की स्थापना करेगा। इस प्रकार की आकाशवाणी सुनकर राजा पुरञ्जय ने क्षुधा पीडितों अतिथियों को वस्त्रादि समेत दान प्रदान किया । मुने ! उस समय कलि के आगमन का आठ सहस्र आठ सौ वर्ष व्यतीत हो चुका था । उस अवसर पर महाबलवान् एवं महाप्रबुद्ध राजा विश्वस्फूज ने छोटे-छोटे राजाओं को अपने अधीनकर सभी वर्ण के मनुष्यों को ब्राह्मण वणों में सम्मिलित किया-क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, वर्णसंकर पिशाच, गुरुण्ड और म्लेच्छ सभी ब्राह्मण हो गये । उन दुल्य भोजियों ने वैदिक विधान द्वारा संध्या, तर्पण एवं देवों की विविध भाँति की पूजाओं को सुसम्पन्न करते हुए अत्यन्त सुखी जीवन व्यतीत किया। मुने ! इस प्रकार साठ वर्ष तक राज्य के सुखोपभोग करने के उपरांत उनके कुल सहस्र राजाओं ने क्रमशः जो इस महिमण्डल में अत्यन्त प्रख्यात थे, दशसहस्र वर्ष तक राज्य किया। उन व्रह्ममार्गावलम्बि राजाओं द्वारा यज्ञानुष्ठान में दिये गये भाग को दैत्य और देवगण समान रूप में ग्रहण करते थे। उसे देखकर देवों को महान् आश्चर्य हुआ। पश्चात् उन देवों ने यज्ञांशदेव की शरण जाकर उनसे समस्त वृत्तान्त निवेदन किया। उसका कारण जानकर शक्रपुत्र (यज्ञांशदेव) ने कहा-वेद साक्षात् नारायण भगवान् हैं । उन्होंने विवेकी हंस- रूप धारण करके मनुष्यों में गुणभेद के अनुसार वर्णभेद की व्यवस्था स्थापित की है-सतोगुण वाले ब्राह्मण, रजोगुण वाले क्षत्रिय, तमोगुण वाले वैश्य, और तीनों गुणों के समान वाले शूद्र कहे गये हैं, जिनमें ब्राह्मणों क्षत्रियों द्वारा पितरवृन्द और देवगण, वैश्यों द्वारा यक्ष राक्षस और शूद्रों द्वारा दैत्य-दानवगण तृप्त होते हैं। एक वर्ष में चारों वर्षों के धर्म की समानता हो जाने से वह वर्ण कायस्थ कहलाया जो सदैव भूत-प्रेत और पिशाचों को तृप्त करते रहते हैं। इसलिए इस समय ब्रह्म, वर्ण में चार वर्ण हुए हैं। ये सभी ब्रह्य शंकर वर्ण के हैं। इन सब द्वारा दिये गये यज्ञ-भागों से सबभसे पहले दानवं अर्धतृप्त होते हैं, फिर स्वर्गीय देवलोग । अतः देववृन्द ! इस भीषण कलि के समय तुम लोगों के हित के लिए मैं भूमण्डल में सौराष्ट्र राजा के यहाँ अपने अंश से अवतरित होने जा रहा हूँ ।

इतना कहकर यज्ञांशदेव ने अपनी एक कला द्वारा सौराष्ट्र नगरी के अधीश्वर के यहाँ अवतरित होकर सोमनाथ नाम से प्रख्याति प्राप्त की। उन्होंने सभी राजाओं को पराजित कर समुद्र तट पर अपनी राजधानी स्थापित की । उस समय कलियुग में पृथ्वी पर क्षत्रिय वर्ण की अधिकता दिखाई देने लगी । सोमनाथ ने अनेक यज्ञानुष्ठानों की सुसम्पन्नता द्वारा सदैव देवों को तृप्त किया। इस प्रकार उन्होंने देवों के प्रसाद से सौ वर्ष तक उस राजसिंहासन को सुशोभित किया । और उनके राज्यकाल में ही उनके नाम पर संवत् आरम्भ हुआ। पश्चात् उनके कुल के डेढ़ सौ राजाओं ने देवप्रिय होकर दश सहस्र वर्ष तक क्रमशः राज्याधिकार पूर्वक सुखी जीवन व्यतीत किया। इस कर्मभूमि भारत प्रदेश में कलि के तीस सहस्र वर्ष व्यतीत होने पर दुःखी होकर दैत्यों ने कलि से कहा-पहले हम लोगों ने सौ वर्ष तक महेश्वर की आराधना की थी, जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसके फलस्वरूप हमें आपको दिया, और आप की शरीर में आधा भाग वज्र की भाँति कठोर और आधे भाग को कोमल बनाया। अतः कलि महाराज ! आप हमारी रक्षा करें। इस समय हमलोग अत्यन्त दुःखी हैं। इसे सुनकर दैत्यपक्ष के समर्थक उस कलि ने अपने अंश से उस दारुण गुर्जर (गुजरात) प्रदेश में सिंहिका नामक आभीरी (अहोरिन) के गर्भ से जो सिंहमांस भक्षण करती थी, जन्म ग्रहण किया। उसका नाम ‘राहु’ हुआ जिस प्रकार आकाशमार्ग में स्थित होकर राहु चन्द्रमा को पीड़ित करने के नाते विधुतद् कहलाता है । उसी प्रकार यह राहु भी कलि अश द्वारा भूतल पर जन्म ग्रहण करने के नाते सुरन्तुद् (देवों को दुःख देने वाला) कहा जाने लगा। उसके जन्म ग्रहण करने के समय महान् भूकम्प हुआ, सभी देवगण प्रतिकूल होकर भयंकर भय की सूचना देने लगे। उस समय समस्त देवों ने अपनी मूर्ति का निवास त्यागकर सुमेरु पर्वत के लिए शिखर पर महेन्द्रदेव की शरण प्राप्त की। इसे सुनकर इन्द्र ने भगवती जगदम्बा की आराधना की। तदनन्तर प्रसन्नतापूर्वक कन्यारूप में प्रकट होकर कल्याणकारिणी भगवती ने देवों से कहा — देववृन्द्र ! मेरे अंग दर्शन के फलस्वरूप तुम्हें क्षुधा एवं पिपासा का नष्ट नहीं होगा, इसी भाँति सदैव यहाँ स्थित रहकर तुम लोग मेरा दर्शन करते रहो। इसे सुनकर देवों ने सहर्ष उसे स्वीकार कर किया। मुनिसत्तम ! वह आभीरी (अहीरिन) का पुत्र राहु सौ वर्ष तक राज्य करके अपने प्राण के परित्याग पूर्वक कलि में विलीन हो गया । पश्चात् उसके वंश में डेढ़ सौ राजाओं ने दश सहस्र वर्ष तक महामद (मुहम्मद) के मृतकों जो घोर एवं चिरकाल में विनष्ट हो गये, अपनाकर राज्य का उपभोग किया। उन्होंने अपने उस मत का पुनः विस्तृत प्रचार आरम्भ किया, जिससे पृथ्वी के सभी लोग म्लेच्छ होने लगे। उसे भीषण कलि में उन राजाओं के राजकाल के समय वेद, देव, एवं वर्ण की व्यवस्था का प्रायः लोप हो चला था, और मर्यादा तो एकदम विलीन हो गई थी। उस समय शेष सहस्र ब्राह्मणों ने अर्बुद पर्वत के शिखर पर जाकर सप्रयत्न देवों की आराधना करना आरम्भ किया, जिससे उसी अर्बुद पर्वत से खड्ग एवं चर्म अस्त्रधारी एक राजाओं का समूह उत्पन्न हुआ, जो उन दुर्धर्ष म्लेच्छो पर विजयप्राप्ति पूर्वक बलवान् चार्व’ के नाम से ख्याति प्राप्त की। उन्होंने अपने वंश वृद्यर्थ पाँच योजन की समतल भूमि पर अपने शुद्ध नाम की एक पुरी का निर्माण कराया। उसी स्थान पर पुनः आर्यकुल की वृद्धि धीरे-धीरे होने लगी। उन्होंने वहाँ रहकर प्रयत्न पूर्वक पचास वर्ष तक राज्य किया। मुने ! उसके अनन्तर उनके कुल के डेढ़ सौ राजाओं ने इस भूमण्डल पर राजपद को दश सहस्र वर्ष तक समलड़कृत किया। गश्चात् दश सहस्र वर्ष के उपरांत उन वीरों ने म्लेच्छों से मैत्री स्थापितकर म्लेच्छ कन्याओं के साथ विवाह करना आरम्भ किया, जिससे नाममात्र आर्यों की उत्पत्ति हुई और उस समय आर्यमार्ग के अनुयायी नाममात्र के रह गये थे। उसी बीच मलयदेश के निवासी म्लेच्छों ने एक लाख की संख्या में एकत्र होकर आर्बुद आर्यों पर चढ़ाई की जिससे एक वर्ष तक रोमाञ्चकारी युद्ध होता रहा। उस भयानक युद्ध में मालवदेश के महाबली म्लेच्छों ने जो राजा के पैदल सैनिक थे, राजा को पराजित कर आर्यों को उनके देश से निकाल दिया। इस प्रकार उन म्लेच्छ भूपों ने क्रमशः इस भूमण्डल पर चालीस सहस्र वर्ष तक राज्य किया, उन स्वल्पजीवी म्लेच्छ राजाओं की संख्या पच्चीस सहस्र थी। उनमें जो पुण्यात्मा राजा थे, जिन्होंने पूर्व जन्म के तप द्वारा राज्यपद की प्राप्ति की थी, उन्हीं के चरित्रों का वर्णन मुनियों ने पुराणों में किया है। वे अनेक भाँति के संवत्प्रवर्तक पैशाच धर्म (अधर्म) के विनाशक थे । पश्चात् नब्बे सहस्र वर्ष व्यतीत होने के उपरांत कलि युग में समस्त भूमि म्लेच्छमयी हो गई जिसमें प्रत्येक प्राणी दरिद्रता से पीड़ित हो रहा था ।
(अध्याय २३)

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