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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १८५
मातृ-श्राद्ध की संक्षिप्त विधि

भगवान् आदित्य ने कहा — अरुण ! रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये । रात्रि में किया गया श्राद्ध राक्षसी श्राद्ध कहा जाता है । दोनों संध्याओं में और सूर्य अस्त होनेपर भी श्राद्ध करना निषिद्ध है ।

अरुण ने पूछा — भगवन् ! माता का श्राद्ध किस प्रकार करना चाहिये और माता किन्हें माना गया है ? नान्दीमुख-पितरों का पूजन किस प्रकार करना चाहिये, इन्हें मुझे बताने की कृपा करें ।om, ॐभगवान् आदित्य ने कहा— खगशार्दूल ! मैं मातृ-श्राद्ध की विधि बतला रहा हूँ, उसे सुनिये ।

मातृ-श्राद्ध में पूर्वाह्ण-काल में आठ विद्वान् ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये तथा एक और अन्य नवम सर्वदैवत्य ब्राह्मण को भी भोजन देना चाहिये । इस प्रकार नौ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये । यव, तिल, दधि, गन्ध-पुष्पादि से युक्त अर्घ्य द्वारा सबकी पूजा करनी चाहिये तथा सभी ग्राह्मणों की प्रदक्षिणा करनी चाहिये । ब्राह्मणों को मधुर मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये । भोजन में कटु पदार्थ नहीं होने चाहिये । इस प्रकार ब्राह्मणों को भोजन कराकर पिण्डदान देना चाहिये । दही-अक्षत का पिण्ड बनाये । एक चौरस मण्डप बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करे । सव्य होकर हाथ से पूर्वाग्र कुश तथा पुष्पों को चढ़ाना चाहिये । माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता, पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही तथा अन्य अपने कुल में जो भी माताएँ हों, उन्हें आदरपूर्वक निमन्त्रित करना चाहिये । इस प्रकार माताओं को उद्दिष्ट कर छः पिण्ड बनाकर पूजन करना चाहिये । नान्दीमुख को उदिष्ट (चाहा हुआ, बताया हुआ) कर पाँच उत्तम ब्राह्मणों को पाँच पितरों के रूप में भोजन कराना चाहिये । नान्दीमुख-श्राद्ध एक आभ्युदयिक श्राद्ध जो पुत्रजन्म, विवाह आदि मंगल अवसरों पर किया जाता है । वृद्धिश्राद्ध । विशेष—निर्णयसिंधु में लिखा है कि पुत्र कन्या जन्म, विवाह, उपनयन, गर्भाधान, यज्ञ, पुंसवन, तड़ागादि प्रतिष्ठा, राज्याभिषेक, अन्नप्राशन इत्यादि में नांदीमुख श्राद्ध करना ही चाहिए । वृद्धि हुई हो तब तो यह श्राद्ध करना ही चाहिए, जिस कार्य से अभ्युदय या वृद्धि की संभावना हो उसमें भी इसे करना चाहिए । पहले माता का श्राद्ध करना चाहिए, फिर पिता का, उसके पीछे पितामह, मातामह आदि का । और श्राद्ध तो मध्याह्न में किए जाते हैं पर यह पूर्वाह्न में होता है । पुत्रजन्म के समय का नियम नहीं है । में ब्राह्मणों को विधिवत् भोजन कराकर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। ख़गपते ! श्राद्ध में दौहित्र अर्थात् नाती, कुतुप वेला कुतप वेला- श्राद्ध कर्म के लिए सर्वश्रेष्ठ समय होता है। ये लगभग दोपहर का समय होता है जो दिन का आठवां मुहूर्त माना जाता है। और तिल — ये तीन पवित्र माने गये हैं तथा तीन प्रशंसा-योग्य कहे गये हैं — शुद्धि, अक्रोध और शीघ्रता न करना । एक वस्त्र धारण कर देव-पूजन और पितरों के कर्म नहीं करने चाहिये । बिना उत्तरीय वस्त्र धारण किये पितर, देवता और मनुष्यों का पूजन, अर्चन तथा भोजन आदि सब कार्य निष्फल होता है ।
(अध्याय १८५)

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