भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९४ से १९७
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १९४ से १९७
स्वप्न-फल-वर्णन तथा उदक-सप्तमी-व्रत

भगवान् सूर्य ने कहा — हे खगश्रेष्ठ ! व्रती को चाहिये कि जप, होम आदि सभी क्रियाओं को विधिपूर्वक सम्पन्न कर देवाधिदेव भगवान् सूर्य का ध्यान करता हुआ भूमि पर शयन करे । स्वप्न में यदि मनुष्य भगवान् सूर्य, इन्द्रध्वज तथा चन्द्रमा को देखे तो उसे सभी समृद्धियाँ सुलभ होती हैं । शृंङ्गार, चँवर, दर्पण, स्वर्णालंकार, रुधिरस्राव तथा केशपात को देखें तो ऐश्वर्यलाभ होता है । स्वप्न में वृक्षाधिरोपण शीघ्र ऐश्वर्यदायक है । om, ॐमहिषी, सिंही तथा गौ का अपने हाथ से दोहन और इनका बन्धन करने पर राज्य का लाभ लेता है । नाभि का स्पर्श करने पर दुर्बुद्धि होती है । भेड़ एवं सिंह को तथा जल में उत्पन्न जन्तु को मारकर स्वयं खाने से, अपने अङ्ग अस्थि, अग्नि-भक्षण, मदिरा-पान, सुवर्ण, चाँदी और पद्मपत्र के पात्र में खीर खाने पर उसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। द्युत या युद्ध में विजय देखना सुखप्रद होता है । अपने शरीर के प्रज्ज्वलन तथा शिरोबन्धन देखने से ऐश्वर्य प्राप्त होता है । माला, शुक्ल वस्त्र, अश्व, पशु, पक्षी का लाभ और विष्ठा का अनुलेपन प्रशंसनीय माना गया है । अश्च या रथ पर यात्रा का स्वप्न देखना शीघ्र ही संतति के आगमन का सूचक है । अनेक सिर और भुजाएँ देखने पर घर में लक्ष्मी आती है । वेदाध्ययन देखना श्रेष्ठ है । देव, द्विज, श्रेष्ठ वीर, गुरु, वृद्ध तपस्वी स्वप्न में मनुष्य को जो कुछ कहें उसे सत्य ही मानना चाहिये ।
देवद्विजश्रेष्ठवीरगुरुवृद्धतपस्विनः ॥
यद्वदन्ति नरं स्वप्ने सत्यमेवेति तद्विदुः । (ब्राह्मपर्व १९४ । ११-१२)

इनका दर्शन एवं आशीर्वाद श्रेष्ठ फलदायक है । पर्वत, अश्व, सिंह, बैल और हाथी पर विशिष्ट पराक्रम के साथ स्वप्न में जो आरोहण करता है, उसे महान् ऐश्वर्य एवं सुख की प्राप्ति होती है । ग्रह, तारा, सूर्य का जो स्वप्न मे परिवर्तन करता है और पर्वत का उन्मूलन करता है, उसे पृथ्वीपति होने का संकेत मिलता है । शरीर से आँत का निकालना, समुद्र एवं नदियों का पान करना ऐश्वर्य-प्राप्ति का सूचक है । जो स्वप्न में समुद्र को एवं नदी को साहस के साथ पार करता है, उसे चिरजीवी पुत्र होता है । यदि स्वप्न में कृमि का भक्षण करना देखता है, तो उसे अर्थ की प्राप्ति होती है । सुन्दर अङ्ग को देखने से लाभ होता है । मङ्गलकारी वस्तुओं से योग होने पर आरोग्य और धन की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं । भगवान् भास्कर अज्ञानान्धकार को दूरकर अपनी अचल भक्ति प्रदान करते हैं, उनके विधिपूर्वक पूजन करने के पश्चात् सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करनी चाहिये । जो व्यक्ति भगवान् भास्कर की पूजा करता है, वह उत्तम विमान में बैठ्कर सूर्यलोक को जाता है । विधिपूर्वक पूजन करने के पश्चात् उनके यथेष्ट मन्त्रों का जप तथा हवन करना चाहिये । सप्तमी के दिन भगवान् सूर्यनारायण का विधिपूर्वक पूजन कर केवल आधी अञ्जलि जल पीकर व्रत करने को “उदक-सप्तमी” कहते हैं, यह सदैव सुख देनेवाली है ।
(अध्याय १९४-१९७)

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1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

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4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

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118. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९० से १९२

119. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९३

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