भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१० से २११
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – २१० से २११
अर्कसम्पुटिका-सप्तमीव्रत-विधि, सप्तमी-व्रत-माहात्म्य में कौथुमि का आख्यान

सुमन्तुजी बोले — राजन् ! फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अर्क-सप्तमी कहते हैं । इसमें षष्ठी को उपवास रहकर स्नान करके गन्ध, पुष्प, गुगुल, अर्क-पुष्प, श्वेत करवीर एवं चन्दनादि से भगवान् दिवाकर की पूजा करनौ चाहिये । रवि की प्रसन्नता के लिये नैवेद्य में गुड़ोदक समर्पित करे । इस प्रकार दिन में भानु की पूजा करके रात में निद्रारहित होकर उनके मन्त्र का जप करे । om, ॐशतानीक ने पूछा — मुने ! भगवान् सूर्य का प्रिय मन्त्र कौन-सा है ? उसे बतायें और धूप-दीप का भी निर्देश करें जिससे उस मन्त्र को जप करता हुआ मैं दिवाकर की पूजा कर सकूँ ।सुमन्तुजी ने कहा — हे भरतश्रेष्ठ ! मैं इस विधि को संक्षेप से कह रहा हूँ । व्रती को चाहिये कि एकाग्रचित होकर षडक्षर-मन्त्र का जप, होम तथा पूजा आदि सभी कर्म सम्पादित करे । सर्वप्रथम यथा-शक्ति गायत्री-मन्त्र का जप करना चाहिये । सौरी गायत्री-मन्त्र इस प्रकार हैं — “ॐ भास्कराय विद्महे सहस्ररश्मिं धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ।” इसे भगवान् सूर्य ने स्वयं कहा है । यह सौरी गायत्री-मन्त्र परम श्रेष्ठ है । इसका श्रद्धापूर्वक एक बार जप करने से ही मानव पवित्र हो जाता है, इसमें संदेह नहीं । सप्तमी के दिन प्रातःकाल एकाग्रचित हो इस मन्त्र का जप करे और भक्तिपूर्वक भास्कर की पूजा करे । राजन् ! यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराये । धन की कंजूसी न करे । जो सूर्य के प्रति श्रद्धा-सम्पन्न नहीं है, उन्हे भोजन नहीं कराना चाहिये । शाल्योदन, मूँग, अपूप, गुड़ से बने पुए, दूध तथा दही का भोजन कराना चाहिये । इससे भास्कर तृप्त होते हैं । भोजन के वर्ज्य पदार्थ इस प्रकार हैं —कुलथी, मसूर, सेम तथा बड़ी । उड़द आदि, कड़वा तथा दुर्गन्धयुक्त पदार्थ भी निवेदित नहीं करने चाहिये ।अर्क-वृक्ष को ‘ॐ खखोल्काय नमः’ से पूजा कर अर्कपल्लव को ग्रहण करे । फिर स्नानकर अर्क-पुष्प से रवि की पूजा करके ब्राह्मण को भोजन कराये और ‘अर्को में प्रीयताम्’ सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों, ऐसा कहे । तदनन्तर देवता के सम्मुख दाँत और ओठ से स्पर्श किये बिना निम्नलिखित मन्त्र से अर्कसम्पुट की प्रार्थना करते हुए जल के साथ पूर्वाभिमुख होकर अर्कपुट निगल जाय ।

“ॐ अर्कसम्पुट भद्रं ते सुभद्रं मेऽस्तु वै सदा ।
ममापि कुरु भद्रं वै प्राशनाद् वित्तदो भव ॥”
(बाह्यपर्व २१० । ७३)

इस मन्त्र का जाप करते हुए जो अर्क का ध्यान करता है तथा अर्क-सम्पुट का प्राशन करता है, वह श्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है ।दाँत से स्पर्श न किये जाने के कारण अर्कपुट अर्क-सम्पुट कहलाता है । जो इस विधि से वर्षभर सूर्यनारायण की प्रसन्नता के लिये श्रद्धापूर्वक सप्तमी-व्रत करता है, उस मनुष्य का धन सात पीढ़ी तक अक्षय तथा अचल हो जाता है । हे राजन् ! इस व्रत के अनुष्ठान से सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमि कुष्ठरोग से मुक्त हो गये तथा सिद्धि प्राप्त की । साथ ही बृहद्वल्क, राजा जनक, महर्षि याज्ञवल्क्य तथा कृष्णपुत्र साम्ब— इन सबने भी भगवान् सूर्य की पूजा करके और इस व्रत के अनुष्ठान से उनकी साम्यता प्राप्त कर ली । यह अर्क-सप्तमी पवित्र, पापनाशिनी, पुण्यप्रद तथा धन्य हैं । अपने कल्याण के लिये इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ।

शतानीक ने पूछा — मुने ! जनक आदि ने भगवान् सूर्य की पूजा करके जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की. उसे तो मैंने बहुधा सुना है, किंतु महर्षि कौथुमि ने किस प्रकार अर्क की आराधना कर सिद्धि प्राप्त की और वे कैसे कुष्ठ रोग से मुक्त हुए, इसका मुझे ज्ञान नहीं हैं । ये कौथुमि कौन थे, उन्हें कैसे कुष्ठ हुआ ? हे द्विजश्रेष्ठ ! किस प्रकार उन्होंने देवाधिदेव दिवाकर की आराधना की ? इन सभी बातों को मुझे संक्षेप में सुनायें । सुमन्तुजी ने कहा — राजन् ! आपने बहुत अच्छी जिज्ञासा की है । इस विषय को आप श्रवण करें । प्राचीन काल में हिरण्यनाभ नाम के एक विद्वान् ब्राह्मण थे । वे अपने पुत्र के साथ महाराजा जनक के आश्रम पर गये । वहाँ अनेक ब्राह्मणों के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ । क्रोधवश कौथुमि से एक ब्राह्मण का वध हो गया । पुत्र के द्वारा विप्र को मारा गया देखकर पिता ने कौथुमि का परित्याग कर दिया । सज्जनों तथा कुटुम्बियों ने भी उनका बहिष्कार कर दिया । शोक और दुःख से दुःखी होकर वे दिव्य देवालयों में गये और उन्होंने अनेक तीर्थों की यात्राएँ की, किंतु ब्रह्महत्या से मुक्ति न मिल सकी । ब्रह्महत्या के कारण उन्हें भयंकर कुष्ठ नामक व्याधि ने ग्रस्त कर लिया । नाक, कान आदि अङ्ग गलकर गिर गये । शरीर से पीब और रक्त बहने लगा । समस्त पृथ्वी पर घूमते हुए वे पुनः अपने पिता के घर आये । दुःख से व्याकुल-चित्त हो उन्होने अपने पिता से कहा — ‘तात ! मैं पवित्र तीर्थों और अनेक देवालयों में गया, किंतु इस क्रूर ब्रह्म-हत्या से मुक्त नहीं हो सका । प्रायश्चित्त करने पर भी मुझे इससे छुटकारा नहीं मिला है । अब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? कैसे मैं रोग से मुक्ति पाऊँ ? हे अनघ ! अल्प परिश्रम-साध्य जिस कर्म के करने से इस ब्रह्म-हत्या-रूपी व्याधि से मुझे छुटकारा मिले, उस उपाय को आप शीघ्र बताये और मेरा कल्याण करें ।’

हिरण्यनाभ ने कहा — पुत्र ! पृथ्वी में घूमते हुए तुमने जो क्लेश प्राप्त किया है, उसे मैं भली-भाँति जानता हूँ । तुम अनेक तीर्थों में गये और प्रायश्चित्त भी किये, परंतु ब्रह्महत्या से मुक्ति न मिली, अब मैं एक उपाय बताता हूँ, उस उपाय से तुम अनायास ही ब्रह्माहत्या से मुक्त हो जाओगे ।

कौथुमि ने कहा — विभो ! मैं ब्रह्मादि देवों में किसकी आराधना करूं ? मैं तो शरीर से भी विकल हूँ, अतः सभी कर्मों का यथावत् सम्पादन मुझसे सम्भव नहीं है, फिर किस प्रकार मैं देवता को संतुष्ट कर सकूँगा ।

हिरण्यनाभ ने कहा — ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, वरुण आदि देवताओं ने भक्तिपूर्वक भगवान् भास्कर की पूजा की है और इस कारण वे स्वर्गलोक में आनन्दित हो रहे हैं । हे पुत्र ! मैं भगवान् सूर्य के समान किसी भी देवता को नहीं जानता हूँ । वे सभी कामनाओं को देनेवाले और माता-पिता तथा सभी के मान्य हैं, इसमें कोई संदेह नहीं हैं । इसलिये तुम उनके मन्त्र का जप करते हुए तथा सामवेद मन्त्रों का गान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करो और उनसे सम्बन्धित इतिहास-पुराण आदि का श्रवण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही रोग से मुक्ति मिलेगी और तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे ।सुमन्तुजी ने कहा — राजन् ! सामगान करने वाले महर्षि कौथुमि ने श्रद्धा-समन्वित हो अपने पिता द्वारा निर्दिष्ट सूर्योपासना की विधि से भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्य की आराधना की । भगवान् भास्कर की कृपा से महर्षि कौथुमि दिव्य मूर्तिमान् हो गये और उन्होंने भगवान् भास्कर के दिव्य मण्डल में प्रवेश किया ।
(महर्षि कौथूमि एक वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं । सामवेद-संहिता की कौथुमी शाखा अत्यन्त प्रसिद्ध है और इस समय वही प्राप्त है। उसके द्रष्टा ऋषि यही हैं । ये प्राच्य सामग भी कहलाते हैं । शौनकीय चरणव्यूह-ग्रन्थ में सामवेद की प्रायः एक हजार शाखाओं की विस्तृत चर्चा है।)
(अध्याय २१०-२११)

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