ॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय- २४ से २६
पुरुषों के शुभाशुभ लक्षण

राजा शतानीक ने पूछा – विप्रेन्द ! स्त्री और पुरुष के जो लक्षण कार्तिकेय ने बनाये थे और जिस ग्रन्थ को क्रोध में आकर भगवान शिव ने समुद्र में फेंक दिया था, वह कार्तिकेय को पुनः प्राप्त हुआ या नहीं ? इसे आप मुझे बतायें ।

सुमन्तु मुनि ने कहा – राजेन्द्र ! कार्तिकेय ने स्त्री-पुरुष का जैसा लक्षण कहा हैं, वैसा ही मैं कह रहा हूँ । व्योमकेश भगवान् के सुपुत्र कार्तिकेय ने जब अपनी शक्ति के द्वारा क्रौंच-पर्वत को विदीर्ण किया, उस समय ब्रह्माजी उन पर प्रसन्न हो उठे । उन्होंने कार्तिकेय से कहा कि हम तुम पर प्रसन्न हैं, जो चाहो वह वर मुझसे माँग लो । उस तेजस्वी कुमार कार्तिकेय ने नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम किया और कहा कि विभो ! स्त्री-पुरुष के विषय में मुझे अत्यधिक कौतुहल है । जो लक्षण-ग्रन्थ पहले मैंने बनाया था उसे तो पिता देवदेवेश्वर ने क्रोध में आकर समुद्र में फेंक दिया । वह मुझे भूल भी गया है । अतः उसको सुनने की मेरी इच्छा है । आप कृपा करके उसीका वर्णन करें ।
om, ॐ
ब्रह्माजी बोले – तुमने अच्छी बात पूछी हैं । समुद्र ने जिस प्रकार से उन लक्षणों को कहा हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हें सुना रहा हूँ । समुद्र ने स्त्री-पुरुषों के उत्तम, मध्यम तथा अधम – तीन प्रकार के लक्षण बतलाये हैं ।

शुभाशुभ लक्षण देखने वाले को चाहिये कि वह शुभ मुहूर्त में मध्याह्न के पूर्व पुरुष के लक्षणों को देखे । प्रमाण-समूह, छाया-गति, सम्पूर्ण अङ्ग, दाँत, केश, नख, दाढ़ी-मूँछ का लक्षण देखना चाहिये । पहले आयु की परीक्षा करके ही लक्षण बताने चाहिये । आयु कम हो तो सभी लक्षण व्यर्थ हैं । अपनी अङ्गुलियों से जो पुरुष एक सौ आठ यानी चार हाथ बारह अङ्गुल का होता हैं, वह उत्तम होता है । सौ अङ्गुल का होने पर मध्यम और नब्बे अङ्गुल का होने पर अधम माना जाता है – लम्बाई के प्रमाण का यही लक्षण आचार्य समुद्र ने कहा है ।

हे कुमार ! अब मैं पुरुष के अङ्गों का लक्षण कहता हूँ । जिसका पैर कोमल, मांसल, रक्तवर्ण, स्निग्ध, ऊँचा, पसीने से रहित और नाड़ियों से व्याप्त न हो अर्थात् नाड़ियाँ दिखायी नहीं पड़ती हों तो वह पुरुष राजा होता है । जिसके पैर के तलवे में अंकुश का चिह्न हो, वह सदा सुखी रहता है । कछुवे के समान ऊँचे चरण वाला, कमल के सदृश कोमल और परस्पर मिली हुई अङ्गुलियों वाला, सुंदर  पार्ष्णि  पार्ष्णि संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] १. एँड़ी । २. पृष्ठ । ३. सैन्यपृष्ठ । चंदावल । ४. ठोकर । पादाघात (को॰) । ५. जोतने की अभिलाषा । विजयेच्छा । (को॰) । ६. जाँच पड़ताल । तहकीकात (को॰) । ७. कुलटा स्त्री (को॰) । ८. कुंती का एक नाम (को॰) ।– एड़ी से युक्त, निगूढ टखने वाला, सदा गर्म रहने वाला, प्रस्वेद(संज्ञा पुं॰ [सं॰] पसीना)-शून्य, रक्त-वर्ण के नखों से अलंकृत चरण वाला पुरुष राजा होता है ।

सूर्प के समान रुखा, सफेद नखों से युक्त, टेढ़ी-रुखी नाड़ियों से व्याप्त, विरल अङ्गुलियों से युक्त चरण वाले पुरुष दरिद्र और दुःखी होते हैं । जिसका चरण आग में पकायी गयी मिट्टी के समान वर्ण का होता हैं, वह ब्रह्म-हत्या करने वाला, पीले चरण वाला अगम्या-गमन करने वाला, कृष्ण-वर्ण के चरण वाला मद्यपान करने वाला तथा श्वेत-वर्ण के चरण वाला अभक्ष्य पदार्थ भक्षण करने वाला होता हैं । जिस पुरुष के पैरों के अँगूठे मोटे होते हैं वे भाग्यहीन होते हैं । विकृत अँगूठे वाले सदा पैदल चलने वाले और दुःखी होते हैं । चिपटे, विकृत तथा टूटे हुए अँगूठे वाले अतिशय निन्दित होते हैं तथा टेढ़े, छोटे और फटे हुए अँगूठे वाले कष्ट भोगते है ।
जिस पुरुष के पैर की तर्जनी अँगुली अँगूठे से बड़ी हो उसको स्त्री-सुख प्राप्त होता है । कनिष्ठा अँगुली के बड़ी होने पर स्वर्ण की प्राप्ति होती है । चपटी, विरल, सूखी अँगुली होने पर पुरुष धनहीन होता है और सदा दुःख भोगता है । रुक्ष और श्वेत नख होने पर दुःख की प्राप्ति होती है । ख़राब नख होनेपर पुरुष शील-रहित और काम-भोग-रहित होता है । रोम से युक्त जंघा होने पर भाग्यहीन होता है । जंघे छोटे होने पर ऐश्वर्य प्राप्त होता है, किंतु बन्धन में रहता है । मृग के समान जंघा होने पर राजा होता है । लम्बी, मोटी तथा मांसल जंघा वाला ऐश्वर्य प्राप्त करता हैं । सिंह तथा बाघ के समान जंघा वाला धनवान् होता है । जिसके घुटने मांस-रहित होते हैं, वह विदेश में मरता है, विकट जानू होने पर दरिद्र होता है । नीचे घुटने होने पर स्त्री-जित् होता है और मांसल जानू होने पर राजा होता है । हंस, भास पक्षी, शुक, वृष, सिंह, हाथी तथा अन्य श्रेष्ठ पशु-पक्षियों के समान गति होने पर व्यक्ति राजा अथवा भाग्यवान् होता है । ये आचार्य समुद्र के वचन है, इनमें संदेह नहीं है ।

जिस पुरुष का रक्त कमल के समान होता है वह धनवान् होता हैं । कुछ लाल और कुछ काला रुधिर वाला मनुष्य अधम और पापकर्म को करने वाला होता है । जिस पुरुष का रक्त मूँगे के समान रक्त और स्निग्ध होता है, वह सात द्वीपों का राजा होता है । मृग अथवा मोर के समान पेट होने पर उत्तम पुरुष होता हैं । बाघ, मेढक और सिंह के समान पेट होने पर राजा होता है । मांस से पुष्ट, सीधा और गोल पार्श्व वाला व्यक्ति राजा होता है । बाघ के समान पीठ वाला व्यक्ति सेनापति होता है । सिंह के समान लंबी पीठ वाला व्यक्ति बन्धन में पड़ता है । कछुवे के समान पीठ वाला पुरुष धनवान् तथा सौभाग्य-सम्पन्न होता है । चौड़ा, मांस से पुष्ट और रोम-युक्त वक्षःस्थल वाला पुरुष शतायु, धनवान् और उत्तम भोगों को प्राप्त करता है । सूखी, रुखी, विरल हाथ की अंगुलियों वाला पुरुष धनहीन और सदा दुःखी रहता है ।

जिसके हाथ में मत्स्य-रेखा होती है, उसका कार्य सिद्ध होता है और वह धनवान् तथा पुत्रवान् होता हैं । जिसके हाथ में तुला अथवा वेदी का चिह्न होता हैं, वह पुरुष व्यापार में लाभ करता है । जिसके हाथ में सोम-लत्ता चिह्न होता हैं, वह धनी होता है और यज्ञ करता हैं । जिसके हाथ में पर्वत और वृक्ष का चिह्न होता हैं, उसकी लक्ष्मी स्थिर होती है और वह अनेक सेवकों का स्वामी होता है । जिसके हाथ में बर्छी, बाण, तोमर, खड्ग और धनुष का चिह्न होता है, वह युद्ध में विजयी होता है । जिसके हाथ में ध्वजा और शङ्ख का चिह्न होता है, वह जहाज से व्यापार करता है और धनवान् होता है । जिसके हाथ में श्रीवत्स, कमल, वज्र रथ और कलश का चिह्न होता हैं, वह शत्रु-रहित राजा होता है । दाहिने हाथ के अँगूठे में यव का चिह्न रहने पर पुरुष सभी विद्याओं का ज्ञाता तथा प्रवक्ता होता है ।
जिस पुरुष के हाथ में कनिष्ठा के नीचे से तर्जनी के मध्य तक रेखा चली जाती है और बीच में अलग नहीं रहती है तो वह पुरुष सौ वर्षों तक जीवित रहता है । जिसका पेट साँप के समान लम्बा होता है वह दरिद्री और अधिक भोजन करने वाला होता है । विस्तीर्ण, फैली हुई, गम्भीर और गोल नाभि वाला व्यक्ति सुख भोगने वाला और धन-धान्य से सम्पन्न होता है । नीची और छोटी नाभि वाला व्यक्ति विविध क्लेशों को भोगने वाला होता है । बलि के नीचे नाभि हो और वह विषम हो तो धन की हानि होती है । दक्षिणावर्त नाभि बुद्धि प्रदान करती है और वामावर्त नाभि शान्ति प्रदान करती है । सौ दलों वाले कमल की कर्णिका के समान नाभि वाला पुरुष राजा होता है । पेट में एक बलि होने पर शस्त्र से मारा जाता है, दो बलि होने पर स्त्री-भोगी होता है, तीन बलि होने पर राजा अथवा आचार्य होता है । चार बलि होने पर अनेक पुत्र होते है, सीधी बलि होने पर धन का उपभोग करता है ।

जिसके स्कन्ध कठोर एवं मांसल तथा समान हों वे राजा होते है और सुखी रहते है । जिसका वक्षःस्थल बराबर, उन्नत, मांसल और विस्तृत होता है वह राजा के समान होता है । इसके विपरीत कड़े रोम वाले तथा नसें दिखायी पड़ने वाले वक्षःस्थल प्रायः निर्धनों के ही होते हैं । दोनों वक्षःस्थल समान होने पर पुरुष धनवान् होता हैं, पुष्ट होने पर शूरवीर होता है, छोटे होने पर धनहीन तथा छोटा-बड़ा होने पर अकिंचन होता है और शस्त्र से मारा जाता है । विषम हनु वाला धनहीन तथा उन्नत हनु(ठुड्डी) वाला भोगी होता है । चिपटी ग्रीवा वाला धनहीन होता है । महिष के समान ग्रीवा वाला शूरवीर होता है । मृग के समान ग्रीवा वाला डरपोक होता है । समान ग्रीवा वाला राजा होता है । तोता, ऊँट, हाथी और बगुले के समान लम्बी तथा शुष्क ग्रीवा वाला धनहीन और सुखी होता है । पुष्ट, दुर्गन्धरहित, सम एवं थोड़े रोमों से युक्त काँख वाले धनी होते है, जिसकी भुजाएँ ऊपर को खिंची रहती है, वह बंधन में पड़ता है । छोटी भुजा रहने पर दास होता हैं, छोटी-बड़ी भुजा होनेपर चोर होता है, लम्बी भुजा होने पर सभि गुणों से युक्त होता है और जानुओं तक लम्बी भुजा होने पर राजा होता है ।
जिसके हाथ का तल गहरा होता है उसे पिता का धन नहीं प्राप्त होता, वह डरपोक होता है । ऊँचे करतल वाला पुरुष दानी, विषम करतल वाला पुरुष मिश्रित फल वाला, लाख के समान रक्त-वर्ण वाला करतल होने पर राजा होता है । पीले करतल वाला पुरुष अगम्या-गमन करने वाला, काला और नीला करतल वाला मद्यादि द्रव्यों का पान करने वाला होता है । रूखे करतल वाला पुरुष निर्धन होता है । जिनके हाथ की रेखाएँ गहरी और स्निग्ध होती हैं वे धनवान् होते हैं । इसके विपरीत रेखा वाले दरिद्र होते हैं । जिनकी अँगुलियाँ विरल होती हैं, उनके पास धन नहीं ठहरता और गहरी तथा छिद्रहीन अँगुली रहने पर धन का संचयी रहता है ।

ब्रह्माजी पुन: बोले – कार्तिकेय ! चन्द्रमण्डल के समान मुख वाला व्यक्ति धर्मात्मा होता है और जिसका मुख सूँड की आकृति का होता है वह भाग्यहीन होता है । टेढ़ा, टुटा हुआ, विकृत और सिंह के समान मुखवाला चोर होता है । सुंदर और कान्ति-युक्त श्रेष्ठ हाथी के समान भरा हुआ सम्पूर्ण मुखवाला व्यक्ति राजा होता है । बकरे अथवा बंदर के समान मुखवाला व्यक्ति धनी होता है । जिसका मुख बड़ा होता है उसका दुर्भाग्य रहता है । छोटा मुखवाला कृपण, लम्बा मुखवाला धनहीन और पापी होता है । चौखूँटा मुखवाला धूर्त, स्त्री के मुख के समान मुखवाला और निम्न मुखवाला पुरुष पुत्रहीन होता है या उसका पुत्र उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है । जिसके कपोल कमल के दलके समान कोमल और कान्तिमान् होते हैं, वह धनवान् एवं कृषक होता है । सिंह, बाघ और हाथी के समान कपोल वाला व्यक्ति विविध भोग-सम्पत्तियों वाला और सेना का स्वामी होता है । जिसका नीचे का ओठ रक्तवर्ण का होता है, वह राजा होता है और कमल के समान अधरवाला धनवान् होता है । मोटा और रुखा होठ होनेपर दुःखी होता है ।

जिसके कान मांस-रहित हो वह संग्राम में मारा जाता है । चिपटा कान होनेपर रोगी, छोटा होने पर कृपण, शङ्कु के समान कान होनेपर राजा, नाड़ियों से व्याप्त होने पर क्रूर, केशों से युक्त होनेपर दीर्घजीवी, बड़ा, पुष्ट तथा लम्बा कान होने पर भोगी तथा देवता और ब्राह्मण की पूजा करने वाला एवं राजा होता है । जिसकी नाक शुक की चोंच के समान हो वह सुख भोगनेवाला और शुष्क नाक वाला दीर्घजीवी होता है । पतली नाक वाला राजा, लम्बी नाकवाला भोगी, छोटी नाकवाला धर्मशील, हाथी, घोडा, सिंह या सुई की भाँती तीखी नाकवाला व्यापार में सफल होता है । कुन्द-पुष्प की कली के समान उज्ज्वल दाँतवाला राजा तथा हाथी के समान दाँतवाला एवं चिकने दाँतवाला गुणवान् होता है । भालू और बंदर के समान दाँतवाले नित्य भूख से व्याकुल रहते हैं । कराल, रूखे, अलग-अलग और फूटे हुए दाँतवाले दुःख से जीवन व्यतीत करनेवाले होते है । बत्तीस दाँतवाले राजा, एकतीस दाँतवाले भोगी, तीस दाँतवाले सुख-दुःख भोगनेवाले तथा उनतीस दाँतवाले पुरुष दुःख ही भोगते हैं ।
काली या चित्रवर्ण की जीभ होनेपर व्यक्ति दासवृत्ति से जीवन व्यतीत करता हैं । रुखी और मोटी जीभवाला क्रोधी, श्वेतवर्ण की जीभवाला पवित्र आचरण से सम्पन्न होता है । निम्न, स्निग्ध, अग्रभाग रक्तवर्ण और छोटी जिह्वावाला विद्वान् होता है । कमल के पत्ते के समान पतली लम्बी न बहुत मोटी और न बहुत चौड़ी जिह्वा रहनेपर राजा होता है । काले रंग का तालुवाला अपने कुल का नाशक, पीले तालुवाला सुख-दुःख भोग करनेवाला, सिंह और हाथी के तालुके समान तथा कमल के समान तालुवाला राजा होता है, श्वेत तालुवाला धनवान् होता है । रुखा, फटा हुआ तह विकृत तालुवाला मनुष्य अच्छा नहीं माना जाता ।

हंस के समान स्वरवाले तथा मेघ के समान गम्भीर स्वरवाले पुरुष धन्य माने गये हैं । क्रौंच के समान स्वरवाले राजा, महान धनी तथा विविध सुखों का भोग करनेवाले होते हैं । चक्रवाक के समान जिनका स्वर होता है ऐसे व्यक्ति धन्य तथा धर्मवत्सल राजा होते हैं । घड़े एवं दुन्दुभि के समान स्वरवाले पुरुष राजा होते है । रूखे, ऊँचे, क्रूर, पशुओं के समान तह घर्घरयुक्त स्वरवाले पुरुष दुःखभागी होते हैं । नीलकण्ठ पक्षी के समान स्वरवाले भाग्यवान् होते हैं । फूटे काँसे के बर्तन के समान तथा टूटे-फूटे स्वरवाले अधम कहे गये हैं ।

दाड़िम के पुष्प के समान नेत्रवाला राजा, व्याघ्र के समान नेत्रवाला क्रोधी, केकड़े के समान आँखवाला झगड़ालू, बिल्ली और हंस के समान नेत्रवाला पुरुष अधम होता है । मयूर एवं नकुल के समान आँखवाले मध्यम माने जाते हैं । शहद के समान पिङ्गल वर्ण के नेत्रवाले को लक्ष्मी कभी भी त्याग नहीं करती । गोरोचन, गूंजा और हरताल के समान पिङ्गल नेत्रवाला बलवान् और धनेश्वर होता है । अर्धचन्द्र के समान ललाट होनेपर राजा होता है । बड़ा ललाट होनेपर धनवान् होता है । छोटा ललाट होनेपर धर्मात्मा होता है । ललाट के बीच जिस स्त्री तथा पुरुष के पाँच आड़ी रेखा होती है वह सौ वर्षोतक जीवित रहता हैं और ऐश्वर्य भी प्राप्त करता है । चार रेखा होनेपर अस्सी वर्ष, तीन रेखा होनेपर सत्तर वर्ष, दो रेखा होनेपर साठ वर्ष, एक रेखा होनेपर चालीस वर्ष और एक भी न होनेपर पचीस वर्ष की आयुवाला होता हैं । इन रेखाओं के द्वारा हीन, मध्यम और पूर्ण आयु की परीक्षा करनी चाहिये । छोटी रेखा होनेपर व्याधियुक्त तथा अल्पायु और लम्बी-लम्बी रेखाएँ होनेपर दीर्घायु होता है । जिसके ललाट में त्रिशूल अथवा पट्टिश(संज्ञा पुं॰ [सं॰] एक प्रकार का प्राचीन शस्त्र या खाँड़ा)  का चिह्न होता हैं, वह बड़ा प्रतापी, कीर्ति-सम्पन्न राजा होता है । छत्र के समान सिर होनेपर राजा, लम्बा सिर होनेपर दुःखी, दरिद्र, विषम होनेपर समान तथा गोल सिर होनेपर सुखी, हाथी के समान सिर होने राजा के समान होता हैं । जिनके केश अथवा रोम मोटे, रूखे, कपिल और आगे से फटे हुए होते हैं, वे अनेक प्रकार के दुःख भोगते हैं । बहुत गहरे और कठोर केश दुःखदायी होते हैं । विरल, स्निग्ध, कोमल, भ्रमर अथवा अंजन (काजल)  के समान अतिशय कृष्ण केशवाला पुरुष अनेक प्रकार के सुख का भोग करता है और राजा होता है ।
(अध्याय २४-२६)
See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

15. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २२

16. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २३

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