भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ६८
सूर्यनारायण के प्रिय पुष्प, सूर्यमंदिर में मार्जन-लेपन आदिका फल, दीपदान का फल तथा सिद्धार्थ-सप्तमी-व्रत का विधान और फल

ब्रह्माजी बोले – याज्ञवल्क्य ! एक बार मैंने भगवान् सूर्यनारायण से उनके प्रिय पुष्पों के विषय में जिज्ञासा की । तब उन्होंने कहा था कि मल्लिका (बेला फुल की एक जाति) पुष्प मुझे अत्यन्त प्रिय है । जो मुझे इसे अर्पण करता है, वह उत्तम भोगों को प्राप्त करता है । मुझे श्वेत कमल अर्पण करने से सौभाग्य, सुगन्धित कुटज-पुष्प से अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा मन्दार-पुष्प से सभी प्रकार के कुष्ठ-रोगों का नाश होता है और बिल्व-पत्र से पूजन करनेपर विपुल सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ।om, ॐ मन्दार-पुष्प की माला सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति, वकुल (मौलसिरी)-पुष्प की माला से रूपवती कन्या का लाभ, पलाश-पुष्प से अरिष्ट-शान्ति, अगस्त्य-पुष्प से पूजन करनेपर (मेरा) सूर्यनारायण का अनुग्रह तथा करवीर (कनैल) पुष्प समर्पित करने से मेरे अनुचर होने का सौभाग्य प्राप्त होता है । बेला के पुष्पों से सूर्य की (मेरी) पूजा करनेपर मेरे लोक की प्राप्ति होती है । एक हजार कमल-पुष्प चढ़ाने पर मेरे सूर्यलोक में निवास करने का फल प्राप्त होता है । वकुल-पुष्प अर्पित करने से भानुलोक प्राप्त होता है । कस्तुरी, चन्दन, कुंकुम तथा कपूर के योग से बनाये गए यक्षकर्दम गन्ध का लेपन करनेसे सद्गति प्राप्त होती है । सूर्य भगवान् के मन्दिर का मार्जन तथा उपलेपन करनेवाला सभी रोगों से मुक्त हो जाता है और उसे शीघ्र ही प्रचुर धन की प्राप्ति होती है । जो भक्तिपूर्वक गेरू से मन्दिर का लेपन करता है, उसे सम्पत्ति प्राप्त होती है और वह रोगों से मुक्ति प्राप्त करता हैं और यदि मृत्तिका से लेपन करता है तो उसे अठारह प्रकार के कुष्ठरोगों से मुक्ति मिल जाती है ।

सभी पुष्पों से करवीर का पुष्प और समस्त विलेपनो में रक्तचन्दन का विलेपन मुझे अधिक प्रिय है । करवीर के पुष्पों से जो सूर्यभगवान् की पूजा करता है, वह संसार के सभी सुखों को भोगकर अन्तमें स्वर्गलोक में निवास करता है ।

मन्दिर में लेपन करने के पश्चात् मण्डल बनानेपर सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । एक मण्डल बनानेसे अर्थ की प्राप्ति, दो मण्डल बनाने से आरोग्य, तीन मण्डल की रचना करने से अविच्छिन्न संतान, चार मण्डल बनाने से लक्ष्मी, पाँच मण्डल बनाने से विपुल धन-धान्य, छः मण्डलों की रचना करनेसे आयु, बल और यश तथा सात मण्डलों की रचना करने से मण्डल का अधिपति होता है तथा आयु, धन, पुत्र और राज्य की प्राप्ति होती है एवं अन्त मे उसे सूर्यलोक मिलता है ।

मन्दिर में घृत का दीपक प्रज्वलित करने से नेत्ररोग नहीं होता । महुए के तेल का दीपक जलाने से सौभाग्य प्राप्त होता है, तिल के तेल का दीपक जलाने से सूर्यलोक तथा कडुआ तेल से दीपक जलाने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है ।

सर्वप्रथम गन्ध-पुष्प-धुप-दीप आदि उपचारों से सूर्य का पूजन कर नाना प्रकार के नैवेद्य निवेदित करने चाहिये । पुष्पों में चमेली और कनेर के पुष्प, धूपों में विजय-धूप, गन्धों में कुंकुम, लेपों में रक्त-चन्दन, दीपों में घृतदीप तथा नैवेद्यों में मोदक भगवान् सूर्यनारायण को परम प्रिय हैं । अतः इन्ही वस्तुओं से उनकी पूजा करनी चाहिये । पूजन करने के पश्चात् प्रदक्षिणा और नमस्कार करके हाथ में श्वेत सरसों का एक दाना और जल लेकर सूर्यभगवान् के सम्मुख खड़े होकर हृदय में अभीष्ट कामना का चिन्तन करते हुए सरसों सहित जल को पी जाना चाहिये, परन्तु दाँतों से उसका स्पर्श नहीं हो । इसीप्रकार दूसरी सप्तमी को श्वेत सर्षप (पीली सरसों) के दो दाने जलके साथ पान करना चाहिये और इसी तरह सातवीं सप्तमीतक एक-एक दाना बढ़ाते हुए इस मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करके पान करना चाहिये –
“सिद्धार्थकस्त्वं हि लोके सर्वत्र श्रूयसे यथा ।
तथा मामपि सिद्धार्थमर्थतः कुरुतां रविः ॥” (ब्राह्मपर्व ६८ । ३६)

तदनन्तर शास्त्रोक्त रीतिसे जप और हवन करना चाहिये । यह भी विधि है कि प्रथम सप्तमी के दिन जलके साथ सिद्धार्थ (सरसों) का पान करे, दूसरी सप्तमी को घृत के साथ और आगे शहद, दही, दूध, गोमय और पञ्चगव्य के साथ क्रमशः एक-एक सिद्धार्थ बढ़ाते हुए सातवीं सप्तमी तक सिद्धार्थ का पान करे । इसप्रकार जो सर्षप-सप्तमी का व्रत करता है, वह बहुत-सा धन, पुत्र और ऐश्वर्य प्राप्त करता है । उसकी सभी मनःकामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं और वह सूर्यलोक में निवास करता है ।
(अध्याय ६८)

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