ॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
विवाह-सम्बन्धी तत्त्वों का निरूपण, विवाहयोग्य कन्या के लक्षण, आठ प्रकार के विवाह, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त आदि उत्तम देशों का वर्णन

ब्रह्माजी बोले — मुनीश्वरो ! जो कन्या माता की सपिण्ड अर्थात् माता की सात पीढ़ी के अन्तर्गत की न हो तथा पिता के समान गोत्र की न हो, वह द्विजातियों के विवाह-सम्बन्ध तथा संतानोत्पादन के लिये प्रशस्त मानी गयी है।

असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ।। (ब्राह्मपर्व ७।१, मनु॰ ३।५)

जिस कन्या के भाई न हो और जिसके पिता के सम्बन्ध में कोई जानकारी न हो, ऐसी कन्या से पुत्रिका-धर्म की (पिता जिसके पुत्र से अपने पिण्ड-पानी की आशा करता है, उसे पुत्रिका कहते हैं) आशंका से बुद्धिमान् पुरुष को विवाह नही करना चाहिये। धर्मसाधन के लिये चारों वर्णों को अपने-अपने कन्या से विवाह करना श्रेष्ठ कहा गया है।

चारों वर्णों के इस लोक और परलोक में हिताहित के साधन करने वाले आठ प्रकार के विवाह कहे गये हैं, जो इस प्रकार है —

om, ॐ

ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा पैशाच। अच्छे शील-स्वभाव वाले उत्तम कुल के वर को स्वयं बुलाकर उसे अलंकृत और पूजित कर कन्या देना ‘ब्राह्म-विवाह’ है। यज्ञ में सम्यक् प्रकार से कर्म करते हुए ऋत्विज् को अलंकृत कर कन्या देने को ‘दैव-विवाह’ कहते हैं। वर से एक या दो जोड़े गाय-बैल धर्मार्थ लेकर विधि-पूर्वक कन्या देने को ‘आर्ष-विवाह’ कहते हैं। ‘तुम दोनों एक साथ गृहस्थ-धर्म का पालन करो’ यह कहकर पूजन करके जो कन्यादान किया जाता है, वह ‘प्राजापत्य-विवाह’ कहलाता है। कन्या के पिता आदि को और कन्या को भी यथाशक्ति धन आदि देकर स्वछन्दता-पूर्वक कन्या का ग्रहण करना ‘आसुर-विवाह’ है। कन्या और वर की परस्पर इच्छा से जो विवाह होता है, उसे ‘गान्धर्व-विवाह’ कहते हैं। मार-पीट करके रोती-चिल्लाती कन्या का अपहरण करके लाना ‘राक्षस-विवाह’ है। सोयी हुई, मद से मतवाली या जो कन्या पागल हो गयी हो उसे गुप्तरूप से उठा ले आना यह ‘पैशाच’ नामक अधम कोटि का विवाह है।

ब्राह्म -विवाह से उत्पन्न धर्माचारी पुत्र दस पीढ़ी आगे और दस पीढ़ी पीछे के कुलों का तथा इक्कीसवाँ अपना भी उद्धार करता है। दैव-विवाह से उत्पन्न पुत्र सात पीढ़ी आगे तथा सात पीढ़ी पीछे इस प्रकार चौदह पीढ़ियों का उद्धार करनेवाला होता है। आर्ष-विवाह से उत्पन्न पुत्र तीन अगले तथा तीन पिछले कुलों का उद्धार करता है तथा प्राजापत्य-विवाह से उत्पन्न पुत्र छः पीछे के तथा छः आगे के कुलों को तारता है। ब्राह्मादी आद्य चार विवाहों से उत्पन्न पुत्र ब्रह्मतेज से सम्पन्न, शीलवान्, रूप, सत्त्वादि गुणों से युक्त, धनवान्, पुत्रवान्, यशस्वी, धर्मिष्ठ और दीर्घजीवी होते है। शेष चार विवाहों से उत्पन्न पुत्र क्रूर-स्वभाव, धर्म-द्वेषी और मिथ्या-वादी होते हैं। अनिन्दित विवाहों से संतान भी अनिन्द्य ही होती है और निन्दित विवाहों की संतान भी निन्दित होती है। इसलिए आसुर आदि निन्दित विवाह नहीं करना चाहिये। कन्या का पिता वर से यत्किंचित् भी धन न ले। वर का धन लेने से वह ‘अपत्य-विक्रयी’ अर्थात् संतान का बेचने वाला हो जाता है। जो पति या पिता आदि सम्बन्धी वर्ग मोहवश कन्या के धन आदि से अपना जीवन चलाते है, वे अधोगति को प्राप्त होते है। आर्ष-विवाह में जो गो-मिथुन लेने की बात कही गयी है, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि चाहे थोड़ा ले या अधिक, वह कन्या का मूल्य ही गिना जाता है, इसलिये वर से कुछ भी लेना नहीं चाहिये। जिन कन्याओं के निमित्त वर-पक्ष से दिया हुआ वस्त्राभूषणादि पिता-भ्राता आदि नहीं लेते, प्रत्युत कन्या को ही देते है, वह विक्रय नहीं हैं। यह कुमारियों का पूजन हैं, इसमें कोई हिंसादि दोष नहीं है। इस प्रकार उत्तम विवाह करके उत्तम देश में निवास करना चाहिये, इससे बहुत यश की प्राप्ति होती है।

ऋषियों ने पूछा — ब्रह्मन् ! वह कौन-सा देश है, जहाँ निवास करने से धर्म और यश की वृद्धि होती है ?

ब्रह्माजी बोले — मुनीश्वरों ! जिस देश में धर्म अपने चारों चरणों के साथ रहे, जहाँ विद्वान् लोग निवास करते हों और सारे व्यवहार शास्त्रोक्त-रीतिसे सम्पन्न होते हों, वही देश उत्तम और निवास करने योग्य है।

ऋषियों ने पूछा — महाराज ! विद्वान् जिस शास्त्रोक्त आचरण को ग्रहण करते हैं और धर्मशास्त्र में जैसी विधि निर्दिष्ट की गयी है उसे हमें बतलायें, हमे इस विषय में महान् कौतुहल हो रहा है।

ब्रह्माजी बोले राग-द्वेष से रहित सज्जन एवं विद्वान् जिस धर्म का नित्य अपने शुद्ध अंतःकरण से आचरण करते हैं, उसे आप सुने –

इस संसार में किसी वस्तु की कामना करना श्रेष्ठ नहीं है। वेदों का अध्ययन करना और वेद-विहित कर्म करना भी काम्य है। संकल्प से कामना उत्पन्न होती है। वेद पढना, यज्ञ करना, व्रत-नियम, धर्म आदि कर्म सब संकल्प-मूलक ही हैं। एसीलिये सभी यज्ञ, दान आदि कर्म संकल्प-पठन-पूर्वक किये जाते हैं। ऐसी कोई भी क्रिया नही है, जिससे काम न हो। जो कोई भी जो कुछ करता है वह इच्छा से ही करता है।

(काम की गणना चार पुरुषार्थों में है। भोग की कामना के विरुद्ध योग, यज्ञ, जप-तप, धर्मसंस्थापन और गति-मुक्ति की कामना ही शुभ कामना है। वैदिक कर्मयोग को भि भविष्यपुराण में सकाम कहने का यही भाव है)

श्रुति, स्मृति, सदाचार और अपने आत्मा की प्रसन्नता – इन चार बातों से धर्म का निर्णय होता है। श्रुति तथा स्मृति में कहे गये धर्म के आचरण से इस लोक में बहुत यश प्राप्त होता है और परलोक में इन्द्रलोक की प्राप्ति होती है। श्रुति वेद को कहते है और स्मृति धर्मशास्त्र का नाम है। इन दोनों से सभी बातों का विचार करें, क्योंकि धर्म की जड़ ये ही हैं, जो धर्म के मूल इन दोनों का तर्क आदि के द्वारा अपमान करता है, तो उसे सत्पुरुषों को तिरस्कृत कर देना चाहिये, क्योंकि वह वेद-निन्दक होने से नास्तिक ही है।

निगमो धर्ममूलं स्यात् स्मृतिशीले तथैव च ।
तथाचारश्च साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् सदा नरः ।
प्राप्य चेह परां कीर्ति याति शक्रसलोकताम् ॥
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्तेषु मीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥
योऽवमन्येत ते चोभे हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः ।
स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं विप्राः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ (ब्राह्मपर्व ७ । ५२, ५४-५७)

जिनके लिए मंत्रो द्वारा गर्भाधान से श्मशान तक संस्कार की विधि कही गयी है, उन्ही लोगों को वेद तथा जप में अधिकार है। सरस्वती तथा दृषद्वती – इन दो देवनदियों के बीच का जो देश है वह देवताओं द्वारा बनाया गया है, उसे ब्रह्मावर्त कहते है। उस देश में चारों वर्ण और उपवर्णों में जो आचार परम्परा से चला आया है, उसका नाम सदाचार है। कुरुक्षेत्र, मत्स्यदेश, पाञ्चाल और शूरसेनदेश (मधुरा) – ये ब्रह्मर्षियों के द्वारा सेवित है, परंतु ब्रह्मावर्त से कुछ न्यून हैं। इन देशों में उत्पन्न हुए ब्राह्मणों से सब देश के मनुष्य अपना-अपना आचार सीखते हैं।

एतद्देश सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ (ब्राह्मपर्व ७ ।५३)

हिमालय और विन्ध्यपर्वत के बीच, विनशन से पूर्व और प्रयाग से पश्चिम जो देश है उसे मध्यदेश कहते है। इन्हीं दोनों पर्वतों के बीच पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र तक जो देश है वह आर्यावर्त कहलाता है।

आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् ।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥ (ब्राह्मपर्व ७ ।६५)

जिस देशों में कृष्णसार मृग अपनी इच्छा से नित्य विचरण करें, वह देश यज्ञ करने योग्य होता है। इन शुभ देशों में ब्राह्मण को निवास करना चाहिये। इससे भिन्न म्लेच्छ देश हैं। हे मुनीश्वरो ! इस प्रकार मैंने यह देश-व्यवस्था आप सबको संक्षेप में सुनायी है।   ( अध्याय – ७ )

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See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

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