भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८० से ८१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ८० से ८१
सूर्य भगवान् को नमस्कार एवं प्रदक्षिणा करने का फल और विजया – सप्तमी – व्रत की विधि

देवर्षि नारद ने कहा – साम्ब ! अब मैं आपको भगवान् सूर्यनारायण के पूजन, उनके निमित्त दिये गए दान तथा उनको किये गये प्रणाम एवं प्रदक्षिणा के फल के विषय में दिण्डी और ब्रह्माजी का संवाद सुना रहा हूँ, आप ध्यान से सुनें –
om, ॐ

ब्रह्माजी बोले – दिण्डिन् ! सूर्य भगवान् का पूजन, उनकी स्तुति, जप, प्रदक्षिणा तथा उपवास आदि करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है । सूर्यनारायण को नम्र होकर प्रणाम करने के लिये भूमि पर जैसे ही सिर का स्पर्श होता है, वैसे ही तत्काल सभी पातक नष्ट हो जाते हैं ।
प्रणिधाय शिरो भूमौ नमस्कारपरो रवेः । तत्क्षणात् सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ (ब्राह्मपर्व ८० । १०)
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सूर्यनारायण की प्रदक्षिणा करता हैं, उसे सप्तद्वीपा वसुमती की प्रदक्षिणा का फल प्राप्त हो जाता है और वह समस्त रोगों से मुक्त होकर अन्त समय में सूर्यलोक को प्राप्त करता है, किन्तु प्रदक्षिणा में पवित्रता का ध्यान रखना आवश्यक है । अतएव जूता या खड़ाऊँ आदि पहनकर प्रदक्षिणा नहीं करनी चाहिये । जो मनुष्य जूता या खड़ाऊँ पहनकर सूर्य-मन्दिर में प्रवेश करता है, वह असिपत्र-वन नामक घोर नरक में जाता है । जो प्राणी षष्ठी या सप्तमी के दिन एकाहार अथवा उपवास रखकर भक्तिपूर्वक सूर्यनारायण का पूजन करता है, वह सूर्यलोक में निवास करता है । कृष्ण पक्ष की सप्तमी को रक्त पुष्पोंपचारों से और शुक्ल पक्ष की सप्तमी को श्वेत कमलपुष्प तथा मोदक आदि उपचारों में भगवान् सूर्यनारायण का पूजन करना चाहिये । ऐसा करने से व्रती सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोक को प्राप्त करता है ।दिण्डिन् ! जया,विजया, जयन्ती, अपराजिता, महाजया, नन्दा तथा भद्रा नाम की ये सात प्रकार की सप्तमियाँ कही गयी हैं । यदि शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रविवार हो तो उसे विजया सप्तमी कहते हैं । उस दिन किया गया स्नान, दान, होम, उपवास, पूजन आदि सत्कर्म महापातकों का विनाश करता है । इस विजया-सप्तमी-व्रत में पञ्चमी तिथि को दिन में एकभुक्त रहे, षष्ठी तिथि को नक्तव्रत करे और सप्तमी को पूर्ण उपवास करे, तदनन्तर अष्टमी के दिन व्रत की पारणा करे । इस तिथि के दिन किया गया दान, हवन, देवता तथा पितरों का पूजन अक्षय होता है ।

(अध्याय ८०-८१)

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