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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ९३
सूर्यदेव की पूजामें विविध उपचार और फल आदि निवेदन करने का माहात्म्य

ब्रह्माजी बोले — दिण्डिन् ! जो प्राणी भगवान् सूर्यनारायण के निमित्त सभी धर्म-कार्य करते हैं, उनके कुल में रोगी और दरिद्री उत्पन्न नहीं होते। जो व्यक्ति भगवान् सूर्यके मन्दिर में भक्ति-पूर्वक गोबर से लेपन करता है, वह तत्क्षण सभी पापों से मुक्त से जाता है । श्वेत-रक्त अथवा पीली मिट्टी से जो मन्दिर में लेप करता है, वह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है । जो व्यक्ति उपवास-पूर्वक अनेक प्रकार के सुगन्धित फूलों से सूर्यनारायण का पूजन करता है, यह समस्त अभीष्ट फलों को प्राप्त करता है।om, ॐ घृत या तिल-तैल से मन्दिर में दीपक प्रज्वलित करनेवाला सूर्यलोक को तथा सूर्यनारायण के प्रीत्यर्थ चौराहे, तीर्थ, देवालयादि में दीपक प्रज्वलित करने वाला ओजस्वी रूप को प्राप्त करता है । भक्ति-भाव से समन्वित होकर जिस मनुष्य के द्वारा सूर्य के लिये दीपक जलवाया जाता है, वह अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर देवलोक को प्राप्त करता है । जो चन्दन, अगरु, कुंकुम, कपूर तथा कस्तूरी आदि मिलाकर तैयार किये गये उबटन से सूर्यनारायण के शरीर का लेपन करता है, यह करोड़ों वर्ष तक स्वर्ग में विहार कर पुनः पृथ्वी पर सभी इच्छाओंसे संतृप्त रहता है और समस्त लोकों का पूज्य बनकर चक्रवर्ती राजा होता है । चन्दन और जलसे मिश्रित पुष्पोंके द्वारा सूर्यको अर्घ्य प्रदान करनेपर पुत्र, पौत्र, पत्नी सहित स्वर्गलोक में पूज्य होता है। सुगन्धित पदार्थ तथा पुष्पोंसे युक्त जलके द्वारा सूर्यको अर्घ्य देकर मनुष्य देवलोकमें बहुत समयतक रहकर पुनः पृथ्वीपर राजा होता है । स्वर्णसे युक्त जल अथवा लाल वर्णके जलसे अर्घ्य देनेपर करोड़ों वर्षतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है । कमलपुष्पसे सूर्यकी पूजा करके मनुष्य स्वर्गको प्राप्त करता है । श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक सूर्यनारायणको गुग्गुल तथा घृतमिश्रित धूप देने से तत्काल ही सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है ।
जो मनुष्य पूर्वाह्ण में भक्ति और श्रद्धासे सूर्यदेवका पूजन करता है, उसे सैकड़ों कपिला गोदान करने का फल मिलता है । मध्याह्नकाल में जो जितेन्द्रिय होकर उनकी पूजा करता है। उसे भूमिदान और सौ गोदानका फल प्राप्त होता है । सायंकाल की संध्या में जो मनुष्य पवित्र होकर श्वेत वस्त्र तथा उष्णीष (पगड़ी) धारण करके भगवान् भास्कर की पूजा करता है, उसे हजार गौओं के दान का फल प्राप्त होता है ।

जो मनुष्य अर्धरात्रि में भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्य की पूजा करता है, उसे जातिस्मरता प्राप्त होती है और उसके कुल में धार्मिक व्यक्ति उत्पन्न होते हैं । प्रदोष-वेला में जो मनुष्य भगवान् सूर्यदेव की पूजा करता है, वह स्वर्गलोक में अक्षयकाल तक आनन्दका उपभोग करता है । प्रभातकाल में भक्ति पूर्वक सूर्य की पूजा करनेपर देवलोक की प्राप्ति होती है । इस प्रकार सभी वेलाओं में अथवा जिस किसी भी समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मन्दार-पुष्पों से भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह तेज में भगवान् सूर्य के समान होकर सूर्यलोक में पूज्य बन जाता है । जो व्यक्ति दोनों अयन-संक्रान्तियों में भगवान् सूर्य की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह ब्रह्मा के लोक को प्राप्त करता है । और वहाँ देवताओं द्वारा पूजित होता है । ग्रहण आदि अवसरों पर पूजन करनेवाला चिन्तित नहीं होता । जो निद्रा से उठने पर सूर्यदेव को प्रणाम करता है, उसे प्रसन्न होकर भगवान् अभिलषित गति प्रदान करते हैं ।
उदयकाल में सूर्यदेव को मात्र एक दिन यदि घृत से स्नान करा दिया जाय तो एक लाख गोदान का फल प्राप्त होता है । गाय के दूध द्वारा स्नान कराने से पुण्डरीक-यज्ञका फल मिलता है । इक्षुरस से स्नान कराने पर अश्वमेध-यज्ञ के फल का लाभ होता है । भगवान् सूर्य के लिये पहली बार ब्यायी हुई सुपुष्ट गौ तथा शस्य प्रदान करने वाली पृथ्वी का जो दान करता है, वह अचल लक्ष्मी को प्राप्त कर पुनः सूर्यलोक को चला जाता है और गौ के शरीर में जितने रोयें होते हैं, उतने ही करोड़ वर्षतक वह सूर्यलोक में पूजित होता है । जो मनुष्य भगवान् सूर्यके निमित भेरी, शंख, वेणु आदि वाद्य दान करते हैं, वे सूर्यलोक को जाते हैं । जो मनुष्य भक्तिभावसे सूर्यनारायण की पूजा करके उन्हें छत्र, ध्वजा, पताका, वितान, चामर तथा सुवर्णदण्ड आदि समर्पित करता है, वह दिव्य छोटी-छोटी किंकिणियों से युक्त सुन्दर विमानके द्वारा सूर्यलोकमें जाकर आनन्दित होता है और चिरकालतक वहाँ रहकर पुनः मनुष्यजन्म ग्रहण कर सभी राजाओंके द्वारा अभिवन्दित राजा होता है ।

जो मनुष्य विविध सुगन्धित पुष्पों तथा पत्रों से सूर्य की अर्चना करता है और विविध स्तोत्रों से सूर्य का संस्तवन-गान आदि करता है, वह उन्हीं के लोकको प्राप्त होता है । जो पाठक और चारणगण सदा प्रातःकाल सूर्यसम्बन्धी ऋचाओं एवं विविध स्तोत्रोंका उपगान करते हैं, वे सभी स्वर्गगामी होते हैं । जो मनुष्य अश्वों से युक्त, सुवर्ण, रजत या मणिजटित सुन्दर रथ अथवा दारुमय रथ सूर्यनारायण को समर्पित करता है, यह सूर्यके वर्णके समान किंकिणी-जालमाला से समन्वित विमान में वैठकर सूर्यलोककी यात्रा करता है ।

जो लोग वर्षभर या छः मास नित्य इनकी रथयात्रा करते हैं, वे उस परमगतिको प्राप्त करते हैं, जिसे ध्यानी, योगी तथा सूर्यभक्तिके अनुगामी श्रेष्ठ जन प्राप्त करते हैं । जो मनुष्य भक्तिभाव-समन्वित होकर भगवान् सूर्यके रथको खींचते हैं, वे बार-बार जन्म लेनेपर भी नीरोग तथा दरिद्रतासे रहित होते हैं। जो मनुष्य भास्करदेवकी रथयात्रा करते हैं, वे सूर्यलोक को प्राप्तकर यथाभिलषित सुखका आनन्द प्राप्त करते हैं, परंतु जो मोह अधवा क्रोधवश रथयात्रामें बाधा उत्पन्न करते हैं, उन्हें पाप-कर्म करनेवाले मंदेह नामक राक्षस ही समझना चाहिये ।
सूर्यभगवान् के लिये धन-धान्य-हिरण्य अथवा विविध प्रकारके वस्त्रोंका दान करनेवाले परमगति प्राप्त होते हैं । गौ, भैंस अथवा हाथी या सुन्दर घोड़ो का दान करनेवाले लोग अक्षय अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले अश्वमेध-यज्ञके फलको प्राप्त करते हैं और उन्हें उस दान से हज़ार गुना पुण्य-लाभ होता है । जो सूर्यनारायण के लिये खेती करने योग्य सुन्दर उपजाऊ भूमि-दान देता है, वह अपनी पीढ़ी से पहले दस कुल और पश्चात् दस कुल को तार देता है तथा दिव्य विमान से सूर्यलोकको चला जाता है । जो बुद्धिमान् मनुष्य भगवान् सूर्यके लिये भक्तिपूर्वक ग्राम-दान करता है, वह सूर्यके समान वर्णवाले विमानमें आरूढ़ होकर परमगतिको प्राप्त होता है। भक्तिपूर्वक जो लोग फल-पुष्प आदिसे परिपूर्ण उद्यानका दान सूर्यनारायणके लिये देते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं । मनसा-वाचा-कर्मणा जो भी दुष्कृत होता है, यह सब भगवान् सूर्यकी कृपासे नष्ट हो जाता है । चाहे आर्त हो या रोगी हो अथवा दरिद्र या दुःखी हो, यदि वह भगवान् आदित्य की शरणमें आ जाता है तो उसके सम्पूर्ण कष्ट दूर हो जाते हैं । एक दिन की सूर्य-पूजा करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह अनेक इष्टापूर्तोंको अपेक्षा श्रेष्ठ है ।

जो भगवान् सूर्यके मन्दिरके सामने भगवान् सूर्यकी कल्याणकारी लीला करता है, उसे सभी अभीष्ट कामनाओंको सिद्ध करनेवाले राजसूय-यज्ञ का फल प्राप्त होता है । गणाधिप ! जो मनुष्य सूर्यदेवके लिये महाभारत ग्रन्थ का दान करता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त होकर विष्णुलोकमे पूजित होता है । रामायणकी पुस्तक देकर मनुष्य वाजपेय-यज्ञ के फलको प्राप्त कर सूर्यलोकको प्राप्त करता है । सूर्यभगवान् के लिये भविष्यपुराण अथवा साम्यपुराण की पुस्तक का दान करनेपर मानव राजसूय तथा अश्वमेध-यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है तथा अपनी सभी मनोकामनाओं को प्राप्त कर सूर्यलोकको पा लेता है और वहाँ चिरकालतक रहकर ब्रह्मलोकमें जाता है । वहाँ सौ कल्पतक रहकर पुनः वह पृथ्वीपर राजा होता है । जो मनुष्य सूर्य-मन्दिर में कुआँ तथा तालाव बनवाता है, वह मनुष्य आनन्दमय दिव्य लोकको प्राप्त करता है । जो मनुष्य सूर्यमन्दिरमें शीतकाल में मनुष्यों के शीतनिवारणके योग्य कम्बल आदिका दान करता है, वह अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य सूर्यमन्दिर में नित्य पवित्र पुस्तक, इतिहास तथा पुराण का वाचन करता है, वह उस फल को प्राप्त करता है, जो नित्य हजारों अश्वमेधयज्ञको करनेसे भी प्राप्त नहीं होता । अतः सूर्यके मन्दिरमें प्रयत्नपूर्वक पवित्र पुस्तक, इतिहास तथा पुराणका वाचन करना चाहिये । भगवान् भास्कर पुण्य आख्यान-कथासे सदा संतुष्ट होते हैं ।
(अध्याय ९३)

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

15. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २२

16. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २३

17. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २४ से २६

18. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २७

19. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २८

20. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २९ से ३०

21. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३१

22. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३२

23. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३३

24. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३४

25. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३५

26. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३६ से ३८

27. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३९

28. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४० से ४५

29. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४६

30. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४७

31. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४८

32. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४९

33. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५० से ५१

34. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५२ से ५३

35. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५४

36. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५५

37. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५६-५७

38. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५८

39. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५९ से ६०

40. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय  ६१ से ६३

41. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६४

42. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६५

43. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६६ से ६७

44. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६८

45. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६९

46. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७०

47. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७१

48. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७२ से ७३

49. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७४

50. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७५ से ७८

51. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७९

52. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८० से ८१

53. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८२

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