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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ११६
सूर्य-भक्त सत्राजित् की कथा तथा त्रिविक्रम-व्रतकी विधि

ब्रह्माजी बोले — विष्णो ! प्राचीन काल में राजा ययाति के कुल में सत्राजित् नामक एक प्रतापी चक्रवर्ती राजा हुए थे । वे अत्यन्त प्रभावशाली, तेजस्वी, कान्तिमान्, क्षमावान्, गुणवान् तथा बलशाली राजा थे तथा धीरता, गम्भीरता एवं यश से सम्पन्न थे । उनके विषय में पुराणवेत्ता लोग एक गाथा गाते — महाबाहु सत्राजित् के इस पृथ्वी पर राज्य करते हुए जहाँ से सूर्य उदित होते और जहाँ अस्त होते हैं, जितने में भ्रमण करते हैं, वह सम्पूर्ण क्षेत्र सत्राजित्-क्षेत्र कहलाता है (सत्राजिते महाबाहो कृष्ण धात्रीं समाश्रिते ॥ यावत्सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति । सत्राजितं तु तत्सर्वं क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ (ब्राह्मपर्व ११६ । ९-१०)om, ॐराजा सत्राजित् सम्पूर्ण रत्नों से परिपूर्ण सप्तद्वीपवती पृथ्वीपर धर्मपूर्वक राज्य करते थे । वे सूर्यदेव के परम भक्त थे । उनके ऐश्वर्य को देखकर सभी लोगों को बड़ा आश्चर्य होता था । उनके राज्य में सभी व्यक्ति धर्मानुयायी थे । राजा सत्राजित् के चार मन्त्री थे, वे सब अप्रतिहत सामर्थ्यवाले और राजा के स्वाभाविक भक्त थे । भगवान् सूर्य के प्रति उनकी अत्यन्त श्रद्धा थी और उनकी सामर्थ्य को देखकर न केवल उनकी प्रजा को आश्चर्य होता था, बल्कि स्वयं राजा भी अपने ऐश्वर्य पर आश्चर्यचकित थे । एक बार उनके मन में आया कि अगले जन्मों में भी मेरा ऐसा ही ऐश्वर्य कैसे बना रहे । यह सोचकर उन्होंने शास्त्र और धर्म के तत्त्व को जानने वाले ब्राहाणों को बुलाकर उनकी यथोचित भक्ति-पूर्वक पूजा कर उन्हें आसन पर बिठलाया और उनसे कहा — ‘भगवन् ! यदि आप लोगों की मुझ पर कृपा है तो मेरी जिज्ञासा को शान्त करें ।’
ब्राह्मणों ने कहा — ‘महाराज ! आप अपना संदेह हमलोगों के सम्मुख प्रस्तुत करें । आपने हमारा पालन-पोषण किया है और सभी प्रकार से भोजन आदि द्वारा संतुष्ट रखा है । विद्वान् ब्राह्मण का तो कर्तव्य ही है कि वह धर्म के संदेह को दूर करे, अधर्म से निवृत्त करे और कल्याणकारी उपदेश को भली-भाँति समझाये (संतुष्टो ब्राह्मणोऽश्नीयाच्छिन्द्याद्वा धर्मसंशयम् । हितं चोपदिशेतद्वर्त्म अहिताद्वा निवर्तयेत् ॥ (ब्रह्मपर्व ११६ । २५)। आप अपनी इच्छा के अनुसार जो पूछना चाहें पूछें ।’ तभी उनकी महारानी विमलवती ने भी राजा से निवेदन किया कि ‘महाराज ! मेरा भी एक संदेह है, आप महात्माओं से पूछकर निवृत्त करा लें । मैं तो अन्तःपुर में ही रहती हूँ । अतः मेरी प्रार्थना है कि आप प्रथम मेरा ही संदेह निवृत्त करा दें, क्योंकि आपके संदेह की निवृत्ति के अनेक साधन हैं ।’

राजा सत्राजित् ने कहा — ‘प्रिये ! क्या पूछना चाहती हो, पहले मैं तुम्हारा ही संदेह पूछूँगा ।’
विमलवती ने कहा — ‘महाराज ! मैंने अनेक राजाओं के चरित्र और ऐश्वर्य को सुना है, किंतु आपके समान ऐश्वर्य अन्य लोगो को सुलभ नहीं है, यह किस कर्म का फल है ? मैंने कौन-सा उत्तम कर्म किया था, जिसके फलस्वरूप मुझे आपकी रानी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ? पूर्वजन्म में हम दोनों ने कौन-सा पुण्यकर्म किया है ? इस विषय में आप मुनियों से पूछें ।’

सत्राजित् बोले — ‘देवि ! तुमने तो मेरे मन की बात जान ली है । मुनियों की बातें सत्य हैं, पत्नी पुरुष की अर्धाङ्गिनी होती है । ऐसी कोई बात नहीं है जो इन महामुनियों से छिपी हो । इन महात्मा से मैं भी यही पूछना चाहता था । अनन्तर महाराज ने महात्माओं से पूछा—भगवन् ! मैं पूर्वजन्म में कौन था, मैंने कौन-से पुण्य कर्म किये थे ? इस सर्वाङ्गसुन्दरी मेरी पत्नी ने कौन-से उत्तम कर्म सम्पन्न किये थे, जिससे हमें ऐसी दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त हुई है । हमलोगों में परस्पर अतिशय प्रीति है । सभी राजा मेरे अधीन हैं, मेरे पास असीम द्रव्य है और मैं अत्यन्त बलशाली हूँ । मेरा शरीर भी नीरोग है । मेरी पत्नी के समान संसार में कोई स्त्री नहीं हैं । सभी मेरे असीम तेज को सहन करने में असमर्थ हैं । महामुने ! आपलोग त्रिकालज्ञ हैं । आप मेरी जिज्ञासा को शान्त करें ।’ राजा के इस प्रकार पूछने पर उन ब्राह्मणों ने सूर्यदेव के परम भक्त परावसु से प्रार्थना की कि आप ही इनके संदेह को निवृत्त करें । धर्मज्ञ ब्राह्मणों की सम्मति से महामति परावसु ने योग-समाधि के द्वारा राजा तथा रानी के पूर्वजन्म के सभी कर्मों की जानकारी प्राप्त कर राजा से कहना आरम्भ किया —
परावसु बोले— महाराज़ ! आप पूर्वजन्म में बड़े निर्दयी, हिंसक तथा कठोर हृदय के शूद्र थे, कुष्ठ रोग से पीड़ित थे । सुन्दर नेत्रों वाली ये महारानी उस समय भी आपकी ही भार्या थीं । ये ऐसी पतिव्रता थीं कि आपके द्वारा पीड़ित होनेपर भी आपकी सेवा में निरन्तर संलग्न रहती थीं, परंतु आपकी अतिशय क्रूरता के कारण आपके बन्धु-बान्धव आपसे अलग हो गये और आपने भी अपने पूर्वजों द्वारा संचित धन को नष्ट कर इाला । अनन्तर आपने कृषि-कार्य प्रारम्भ किया, किंतु दैवेच्छा से वह भी व्यर्थ हो गया । आप अत्यन्त दीन-हीन होकर दूसरों की सेवाद्वारा जीवन-यापन करने लगे । आपने अपनी स्त्री को छोड़ने का बहुत प्रयास किया, किंतु उसने आपका साथ नहीं छोड़ा । इसके बाद आप दोनों कान्यकुब्ज देश में चले गये और भगवान् सूर्य के मन्दिर में सेवा करने लगे। वहाँ प्रतिदिन मन्दिर का मार्जन, लेपन, प्रोक्षण (जल छिड़कना) आदि कार्य बड़े भक्तिभाव से करते रहे । मन्दिर में पुराण की कथा होती थी । आप दोनों ने उसका भक्तिपूर्वक श्रवण किया । कथा-श्रवण करने के बाद आपकी पत्नी ने पिता से प्राप्त अँगूठी को कथा में चढ़ा दिया । आपके मन में रात-दिन यही चिन्ता रहती थी कि यह मन्दिर कैसे स्वच्छ रहे । आप दोनों बहुत दिनोंतक वहाँ रहे । भगवान् के सेवारूपी योगकर्म में आपका मन अहर्निश लगा रहता था ।

इस प्रकार आप दोनों निष्काम-भाव से भगवान् सूर्य को सेवा करते और जो कुछ मिलता, उसीसे निर्वाह करते थे । गोपति भगवान् सूर्य का आप नित्य चिन्तन करते थे, अतः आपके सभी पाप समाप्त हो गये ।

किसी समय अपनी विशाल सेनाके साथ कुवलाश्च नामका एक राजा वहाँ आया। उसकी अपार सम्पत्ति और हजारों श्रेष्ठ रानियोंको देखकर आप दोनों को भी राजा-रानी बनने की इच्छा हुई । कुछ ही समय में आपका देहान्त हो गया । सूर्यदेव की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक की गयी सेवा तथा पुराण श्रवण के प्रभाव से आप राजा हुए और आपकी स्त्री रानी हुई तथा आप दोनों को असीम तेज प्राप्त हुआ है, उसका भी कारण सुनिये —
जब मन्दिर में दीपक तेल तथा बत्ती के अभाव में बुझने लगता था, तब आप अपने भोजन के लिये रखे तेल से उसे पूरित करते थे और आपकी रानी अपनी साड़ी फाड़कर उससे बत्ती बनाकर जलाती थी । राजन् ! यदि अन्य जन्म में भी आपको ऐश्वर्य की इच्छा है तो भगवान् सूर्य की श्रद्धापूर्वक आराधना करें । गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि जो आपको प्रिय हों, वही भगवान् सूर्य को अर्पण करें । उनके मन्दिर में मार्जन, उपलेपन आदि कार्य करें, जिससे मन्दिर स्वच्छ और निर्मल रहे । उत्तम दिनों में उपवास कर रात्रि-जागरण और नृत्य-गीत-वाद्यादि द्वारा महोत्सव करायें । पुराण-इतिहास आदि की कथा श्रद्धापूर्वक सुनें तथा भगवान् सूर्य को प्रसन्नता के लिये वेद-पाठ करायें । सदा निष्कामभाव से तन्मय होकर उनकी सेवामें लगे रहें । संतुष्ट होकर भगवान् सूर्य अभीष्ट फल देते हैं । वे पुष्प, नैवेद्य, रत्न, सुवर्ण आदि से उतना प्रसन्न नहीं होते, जितना वे भक्तिभाव से प्रसन्न होते हैं । यदि भक्तिभावपूर्वक सूर्यकी आराधना और विविध उपचारोंसे पूजन करेंगे तो इन्द्र से भी अधिक वैभव की प्राप्ति कर लेंगे ।

राजा सत्राजित् ने कहा— भगवन् ! इन्द्रत्व की प्राप्ति या अमरत्व की प्राप्ति से जो आनन्द होता है, वह आनन्द आपकी इस वाणी को सुनकर मुझे प्राप्त हुआ । अज्ञानरूपी अन्धकार के लिये आपकी यह वाणी प्रदीप्त दीपक के समान है । सम्पत्ति के विनाश की सम्भावना से हम बहुत व्याकुल थे । आपने सम्पत्ति प्राप्ति के लिये मूल तत्त्व का आज उपदेश दिया है । इससे यह सिद्ध हो गया कि मुझे यह सारी सम्पनि पूर्वजन्म के सुकृतकर्म के ही फलस्वरूप प्राप्त हुई है । भक्तिमान् दरिद्र भी भगवान् सूर्य प्रसन्न कर सकता है, किंतु एक ऐश्वर्यशाली धनवान् भक्तिहीन होनेपर उनका अनुग्रह नहीं प्राप्त कर सकता । भगवन् ! आप मुझे सूर्यभगवान् की आराधना के उस मार्ग को सूचित करें, जिससे शीघ्र ही उनका अनुग्रह प्राप्त हो सके ।
परावसु बोले — राजन् ! कार्तिक मास में प्रतिदिन भगवान् सूर्य का पूजन कर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये और स्वयं भी एक ही बार भोजन करना चाहिये । इस आराधना से बाल्यावस्था में किये गये ज्ञात-अज्ञात सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है । मार्गशीर्ष में पूर्वोक्त रीति से व्रत करनेवाले स्त्री-पुरुषकी, ब्राह्मणों को मरकत मणि का दान करने से प्रौढावस्था में किये गये पापों से मुक्ति हो जाती है । पौष मास में पूर्वोक्त विधि के अनुसार एकभुक्त हो श्रद्धापूर्वक सूर्यको आराधना करने से वृद्धावस्था में किये गये सभी पाप नष्ट हो जाते हैं ।

इस त्रैमासिक व्रत को श्रद्धापूर्वक विधि-विधान से करनेवाले स्त्री या पुरुष सूर्यभगवान् के कृपापात्र हो जाते हैं और लघु पापों से मुक्त हो जाते हैं। दूसरे वर्ष इसी प्रकार त्रैमासिक व्रत करने पर सभी उपपातक निवृत्त हो जाते हैं । तीसरे वर्ष भी इस व्रत को करने पर महापातक नष्ट हो जाते हैं और मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति होती है । यह व्रत तीन मास में सम्पन्न होता है और इसे तीन वर्ष तक करना चाहिये । सभी अवस्थाओं में आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक — त्रिविध पातक इसके द्वारा नष्ट हो जाते हैं । इस सर्वपापहर्ता व्रत को त्रिविक्रम-व्रत कहा जाता है ।

राजा सत्राजित् ने कहा— भगवन् ! व्रत का विधान तो मैंने सुना, परंतु भोजन कैसे ब्राह्मण को कराना चाहिये, यह भी आप कृपाकर बतायें ।

परावसु बोले— पौराणिक ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये । इस प्रसंग में अरुण को सूर्यदेव ने जो निर्देश दिया था, वह मैं आपको बताता हूँ —
किसी समय उदयाचल पर अरुण ने भगवान् सूर्य से पूछा—’महाराज ! कौन-कौन पुष्प, नैवेद्य, वस्त्र आदि आपको प्रिय है और कैसे ब्राह्मण को भोजन कराने से आप संतुष्ट होते हैं ?’ इसे आप कृपाकर बतायें ।

भगवान् सूर्य ने कहा — अरुण ! करवीर के पुष्य, रक्तचन्दन, गुग्गुल का धूप, घी का दीपक और मोदक आदि नैवेद्य मुझे प्रिय हैं । मेरे भक्त और पौराणिक ब्राह्मण को दान देकर उसके प्रति श्रद्धा समर्पित करने से मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता गीत, वाद्य और पूजन आदि से नहीं होती । मैं पुराण आदि के वाचन-श्रवण से अतिशय प्रसन्न होता हूँ । इतिहास-पुराण के वाचक तथा मेरी पूजा करने वाला भोजक ये दोनों मुझे विशेष प्रिय हैं । इसलिये पौराणिक का पूजन करे और इतिहास आदि को सुनें ।
(अध्याय ११६)

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