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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ११८
भद्र ब्राह्मण की कथा एवं कार्तिक मासमें सूर्य-मन्दिरमें दीपदानका फल

ब्रह्माजी बोले — विष्णो ! जो कार्तिक मास में सूर्यदेव के मन्दिर में दीप प्रज्वलित करता है, उसे सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त होता है एवं वह तेज में सूर्य के समान तेजस्वी होता है । अब मैं आपको भद्र ब्राह्मण की कथा सुनाता हूँ, जो समस्त पापों का नाश करनेवाली है, उसे आप सुनें —om, ॐप्राचीन काल में माहिष्मती नाम की एक सुन्दर नगरी में नागशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था । भगवान् सूर्य को प्रसन्नता से उसके सौ पुत्र हुए । सबसे छोटे पुत्र का नाम था भद्र । वह सभी भाइयों में अत्यन्त विचक्षण विद्वान् था । वह भगवान् सूर्य के मन्दिर में नित्य दीपक जलाया करता था । एक दिन उसके भाइयों ने उससे बड़े आदर से पूछा— ‘भद्र ! हमलोग देखते हैं कि तुम भगवान् सूर्य को न तो कभी पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि अर्पण करते हो और न कभी ब्राह्मण-भोजन कराते हो, केवल दिन-रात मन्दिर में जाकर दीप जलाते रहते हो, इसमें क्या कारण है ? तुम हमें बताओ ।’ अपने भाइयों की बात सुनकर भद्र बोला — भ्रातृगण ! इस विषय में आपलोग एक आख्यान सुनें —

प्राचीन काल में राजा इक्ष्वाकु के पुरोहित महर्षि वसिष्ठ थे । उन्होंने राजा इक्ष्वाकु से सरयू-तट पर सूर्यभगवान् का एक मन्दिर बनवाया । वे वहाँ नित्य गन्ध-पुष्पादि उपचारों से भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्य की पूजा करते और दीपक प्रज्वलित करते थे । विशेषकर कार्तिक मास में भक्तिपूर्वक दीपोत्सव किया करते थे । तब मैं भी अनेक कुष्ठ आदि रोगों से पीड़ित हो उसी मन्दिर के समीप पड़ा रहता और जो कुछ मिल जाता, उससे अपना पेट भरता । वहाँ के निवासी मुझे रोगी और दीन-हीन जानकर मुझे भोजन दे देते थे । एक दिन मुझमें यह कुत्सित विचार आया कि मैं रात्रि के अन्धकार में इस मन्दिर में स्थित सूर्यनारायण के बहुमूल्य आभूषणों को चुरा लूँ । ऐसा निश्चयकर मैं उन भोजकों की निद्रा की प्रतीक्षा करने लगा। जब वे भोजक सो गये, तब मैं धीरे-धीरे मन्दिर में गया और वहाँ देखा कि दीपक बुझ चुका है । तब मैंने अग्नि जलाकर दीपक प्रज्वलित किया और उसमें घृत डालकर प्रतिमा से आभूषण उतारने लगा, उसी समय ये देवपुत्र भोजक जग गये और मुझे हाथ में दीपक लिया देखकर पकड़ लिया । मैं भयभीत हो विलापकर उनके चरणों पर गिर पड़ा । दयावश उन्होंने मुझे छोड़ दिया, किंतु वहाँ घूमते हुए राजपुरुषों ने मुझे फिर बाँध लिया और ये मुझसे पूछने लगे— ‘अरे दुष्ट ! तुम दीपक हाथ में लेकर मन्दिर में क्या कर रहे थे ? जल्दी बताओ’, मैं अत्यन्त भयभीत हो गया । उन राजपुरुषों के भय से तथा रोग से आक्रान्त होने के कारण मन्दिर में ही मेरे प्राण निकल गये । उसी समय सूर्यभगवान् के गण मुझे विमान में बैठाकर सूर्यलोक ले गये और मैंने एक कल्प तक वहाँ सुख भोगा और फिर उत्तम कुल में जन्म लेकर आप सबका भाई बना । बन्धुओं ! यह कार्तिक मास में भगवान् सूर्य के मन्दिर में दीपक जलाने का फल है । यद्यपि मैंने दुष्टबुद्धि से आभूषण चुराने की दृष्टि से मन्दिर में दीपक जलाया था तथापि उसके फलस्वरूप इस उत्तम ब्राह्मणकुल में मेरा जन्म हुआ तथा वेद-शास्त्रों का मैंने अध्ययन किया और मुझे पूर्वजन्मों की स्मृति हुई । इस प्रकार उत्तम फल मुझे प्राप्त हुआ । दुष्टबुद्धि से भी घी द्वारा दीपक जलाने का ऐसा श्रेष्ठ फल देखकर मैं अब नित्य भगवान् सूर्य के मन्दिर में दीपक प्रज्वलित करता रहता हूँ । भाइयों ! मैंने कार्तिक मास में यह दीपदान का संक्षेप में माहात्म्य आपलोगो को सुनाया।

इतनी कथा सुनाकर ब्रह्माजी बोले— ‘विष्णो ! दीपक जलाने का फल भद्र ने अपने भाइयों को बताया । जो पुरुष सूर्य के नामों का जप करता हुआ मन्दिर में कार्तिक के महीने में दीपदान करता है, वह आरोग्य, धन-सम्पत्ति, बुद्धि, उत्तम संतान और जातिस्मरत्व को प्राप्त करता है । षष्ठी और सप्तमी तिथि को जो प्रयत्नपूर्वक सूर्यमन्दिर में दीपदान करता है, वह उत्तम विमान में बैठकर सूर्यलोक को जाता है । इसलिये भगवान् सूर्य के मन्दिर में भक्तिपूर्वक दीप प्रज्वलित करना चाहिये । प्रज्वलित दीप को न तो बुझाये और न उसका हरण करे । दीपक हरण करनेवाला पुरुष अन्धमूषक होता है । इस कारण कल्याण की इच्छा वाला पुरुष दीप प्रज्वलित करे, हरे नहीं ।
(अध्याय ११८)

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