भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १३१
सात प्रकार की प्रतिमा एवं काष्ठ-प्रतिमा के निर्माणोपयोगी वृक्षों के लक्षण

नारदजी बोले— साम्ब ! अब मैं विस्तार के साथ प्रतिमा-निर्माण का विधान बतलाता हूँ । भक्तों के कल्याण की अभिवृद्धि के लिये भगवान् सूर्य की प्रतिमा सात प्रकार की बनायी जा सकती है । सोना, चाँदी, ताम्र, पाषाण, मृत्तिका, काष्ठ तथा चित्रलिखित । इनमें काष्ठ की प्रतिमा के निर्माण का विधान इस प्रकार है —om, ॐनक्षत्र तथा ग्रहों की अनुकूलता एवं शुभ शकुन देखकर मङ्गल-स्मरण-पूर्वक काष्ठ-ग्रहण करने के लिये वन में जाकर प्रतिमोपयोगी वृक्ष का चयन करना चाहिये । दूधवाले वृक्ष, कमजोर वृक्ष, चौराहे, देवस्थान, वल्मीक, श्मशान, चैत्य, आश्रम आदि में लगे हुए वृक्ष तथा पुत्रक वृक्ष —जिसको किसी बिना पुत्रवाले व्यक्ति ने पुत्र रूप में लगाया हो अथवा बाल वृक्ष, जिसमें बहुत कोटर हों, अनेक पक्षी रहते हो, शस्त्र, वायु, अग्नि, बिजली तथा हाथी आदि से दूषित वृक्ष, एक-दो शाखा वाले वृक्ष, जिनका अग्रभाग सूख गया हो ऐसे वृक्ष प्रतिमा के योग्य नहीं होते । महुआ, देवदारु, वृक्षराज चन्दन, बिल्व, आम्र, खदिर, अंजन, निम्ब, श्रीपर्ण (अग्निमन्थ), पनस (कटहल), सरल, अर्जुन और रक्तचन्दन— ये वृक्ष प्रतिमा के लिये उत्तम हैं । चारों वर्णों के लिये भिन्न-भिन्न ग्राह्य काष्ठों का विधान है ।
अभिमत वृक्षके पास जाकर वृक्ष की पूजा करनी चाहिये । पवित्र स्थान, एकान्त, केश-अङ्गारशून्य, पूर्व और उत्तर को ओर स्थित, लोगों को कष्ट न देनेवाला, विस्तृत सुन्दर शाखाओं तथा पत्तों से समृद्ध, सीधा, व्रणशून्य तथा त्वचावाला वृक्ष शुभ होता है । स्वयं गिरे हुए या हाथी से गिराये गये, शुष्क होकर या अग्नि से जले हुए और पक्षियों से रहित वृक्षों का प्रतिमा-निर्माण में उपयोग नहीं करना चाहिये । मधुमक्खी के छातेवाला वृक्ष भी ग्राह्य नहीं है । स्निग्ध पत्र-समन्वित, पुष्पित तथा फलित वृक्षों का कार्तिक आदि आठ मासों में उत्तम मुहूर्त देखकर उपवास रहकर अधिवासन-कर्म ([सं-पु.] – 1. सुगंधित करना 2. मूर्ति की आरंभिक प्रतिष्ठा 3. देवमूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करने की एक रीति जिसमें मूर्ति को चंदन आदि लगाकर रातभर पानी में रखते हैं।) करना चाहिये । वृक्षके नीचे चारों ओर लीपकर गन्ध, पुष्पमाला, धूप आदि से यथाविधि वृक्ष की पूजा करें । अनन्तर गायत्री-मन्त्र से अभिमन्त्रित जल से प्रोक्षण करे । दो उज्ज्वल वस्त्र धारण कर वृक्ष की गन्ध-माल्य से पूजा करें तथा उसके सामने कुशासन पर बैठकर देवदारु की समिधा से अग्नि में आहुतियां दें, नमस्कार करे।

“ॐ प्रजापते सत्यसदाय नित्यं
श्रेष्ठान्तरात्मन् सचराचरात्मन् ।
सांनिध्यमस्मिन् कुरु देव वृक्षे
सूर्यावृतं मण्डलमाविशेश्च नमः ॥
(ब्राह्मपर्व १३१ । २६)

‘प्रजापतिसत्यस्वरूप इस वृक्ष को नित्य नमस्कार है। श्रेष्ठान्तरात्मन् ! सचराचरात्मन् ! देव ! इस वृक्ष में आप सांनिध्य करें । सूर्यावृत-मण्डल इसमें प्रविष्ट हो । आपको नमस्कार है।’

इस प्रकार वृक्ष की पूजा कर उसको सान्त्वना देते हुए कहे — ‘वृक्षराज ! संसार कल्याण के लिये आप देवालय में चलें । देव ! आप वहाँ छेदन और ताप से रहित होकर स्थित रहेंगे । समय पर धूप आदि प्रदान कर पुष्प के द्वारा संसार आपकी पूजा करेगा ।’
वृक्ष के मूल में धूप-माल्य आदि से कुठार कर पूजन कर उसका सिर पूर्व की ओर करके सावधानी से स्थापित करे ! अनन्तर मोदक, खीर आदि भक्ष्य द्रव्य तथा सुगन्धित पुष्प, धूप, गन्ध आदि से वृक्ष की तथा देवता, पितर, राक्षस, पिशाच, नाग, सुरगण, विनायक आदि की पूजा करके रात्रि में वृक्ष का स्पर्श कर यह कहे— ‘देवदेव ! आप पूजा में देवों के द्वारा परिकल्पित हैं । वृक्षराज ! आपको नमस्कार है । यह विधिवत् की गयी पूजा आप ग्रहण करें । जो-जो प्राणीं यहाँ निवास करते हैं, उनको भी मेरा नमस्कार है ।

“अर्चासु देवदेव त्वं देवैश्ध परिकल्पितः । नमस्ते वृक्ष पूजेयं विधिवत् परिगृह्यताम् ॥” (ब्राह्मपर्व १३१। ३३)

प्रभातकाल में पुनः उस वृक्ष का पूजन करे तथा ब्राह्मण और भोजक को दक्षिणा देकर विशेषज्ञों के द्वारा स्वस्ति-वाचन-पूर्वक वृक्ष का छेदन करे । पूर्व-ईशान और उत्तर की ओर वृक्ष कट करके गिरे तो अच्छा है । शाखाओं के इन दिशाओं में गिरने पर ही वृक्ष का छेदन करे अन्यथा नहीं । वृक्ष का नैर्ऋत्य, आग्नेय और दक्षिण दिशाओं में गिरना शुभ नहीं है एवं वायव्य और पश्चिम में गिरना मध्यम हैं । पहले वृक्ष के चारों ओर की शाखाओं को काटने के बाद वृक्ष को कटवाये । वृक्ष से शाखाएँ सर्वथा अलग हो जायँ तथा गिरकर टूटे नहीं एवं शब्द भी नहीं हो तो उत्तम है । जिसके कटने से दो भाग हो जाय, जिस वृक्ष से मधुर द्रव, घी, तेल आदि निकले उसका परित्याग कर दे । इन दोषों से रहित अच्छा काल देखकर काष्ठ का संग्रह करना चाहिये ।
(अध्याय १३१)

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