भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १३५
साम्बोपाख्यान के प्रसंग में सूर्यकी अभिषेक-विधि

नारदजी बोले— साम्ब ! अब मैं भगवान् सूर्य के स्नपन की विधि बताता हूँ । वेदपाठी, पवित्र आचारनिष्ठ, शास्त्रमर्मज्ञ, सूर्यभक्त भोजक अथवा अन्य ब्राह्मणों के साथ मण्डल के ईशानकोण में एक हाथ लम्बा-चौड़ा और ऊँचा भद्रपीठ स्थापित कर देव-प्रतिमा को प्रासाद में लाये और प्रतिमा को उस पीठपर स्थापित करे । मार्ग में ‘भद्रं कर्णेभिः०” आदि माङ्गलिक मन्त्रों की ध्वनि होती रहे तथा भाँति-भांति के वाद्य बजते रहें ।om, ॐ अनन्तर समुद्र, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, चन्द्रभागा, सिन्धु, पुष्कर आदि तीर्थों, नदी, सरोवर, पर्वतीय झरनों के जल से भगवान् सूर्य को स्नान कराये । आठ ब्राह्मण और आठ भोजक सोने के कलशों के जल से स्नान करायें । स्नान के जल में रत्न, सुवर्ण, गन्ध, सर्वबीज, सर्वौषधि, पुष्प, ब्राह्मी, सुवर्चला (सूर्यमुखी), मुस्ता, विष्णुक्रान्ता, शतावरी, दूर्वा, मदार, हल्दी, प्रियंगु, वच आदि सभी ओषधियाँ डाले । कलशों के मुख पर वट, पीपल और शिरीष के कोमल पल्लवों को कुश के साथ रखे । भगवान् सूर्य को अर्घ्य देकर गायत्री-मन्त्र अभिमन्त्रित सोलह कलशों से स्नान कराये । सुवर्ण कलश के अभाव में चाँदी, ताँबा, मृत्तिका के कलशों से ही स्नान कराना चाहिये । इसके अनन्तर पक्के ईटों से बनी हुई वेदी के ऊपर कुश बिछाकर मूर्ति को दो वस्त्र पहनाकर स्थापित करना चाहिये । उस दिन व्रत रखे । मूर्ति स्थापित करने के पश्चात् निम्न मन्त्रों से प्रतिमा का अभिषेक करे —

” देवास्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।
व्योमगङ्गाम्बुपूर्णेन कलशेन सुरोत्तम ॥
मरुतश्चाभिषिचन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते ।
मेघतोयाभिपूर्णेन द्वितीयकलशेन तु ॥
सारस्वतेन पूर्णेन कलशेन सुरोत्तम ।
विद्याधराभिषिञ्चन्तु तृतीयकलशेन तु ॥
शक्राद्या अभिषिञ्चन्तु लोकपालाः सुरोत्तमाः ।
सागरोदकपूर्णेन चतुर्थकलशेन तु ॥
वारिणा परिपूर्णेन पद्मरेणुसुगन्धिना ।
पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागास्त्वां कलशेन तु ॥
हिमवद्धेमकूटाद्या अभिषिञ्चन्तु चाचलाः ।
नैर्ऋतोदकपूर्णन षष्ठेन कलशेन तु ॥
सर्वतीर्थाम्बुपूर्णेन पद्मरेणुसुगन्धिना ।
सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः ॥
वसवश्चाभिषिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन वै ।
अष्टमङ्गलयुक्तेन देवदेव नमोऽस्तु ते ॥
(ब्राह्मपर्व १३५ । २१-२८)

‘देवश्रेष्ठ ! ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवगण आकाशगङ्गा से परिपूर्ण जल द्वारा आपका अभिषेक करें । दिवस्पते ! भक्तिमान् मरुद्गण मेघजल से परिपूर्ण द्वितीय कलश से आपका अभिषेक करें । सुरोत्तम ! विद्याधर सरस्वती के जल से परिपूर्ण तृतीय कलश के द्वारा आपका अभिषेक करें । देवश्रेष्ठ ! इन्द्र आदि लोकपालगण समुद्र के जल से परिपूर्ण चतुर्थ कलश से आपका अभिषेक करें । नागगण कमल के पराग से सुगन्धित जल से परिपूर्ण पञ्चम कलश से आपका अभियेक करें । हिमवान् एवं सुवर्णशिखरवाले सुमेरु आदि पर्वतगण दक्षिण-पश्चिम में स्थित छठे कलश के जल से आपका अभिषेक करें । आकाशचारी सप्तर्षिगण पद्मपराग से सुगन्धित सम्पूर्ण तीर्थ-जल से परिपूर्ण सप्तम घट के द्वारा आपका अभिषेक करें । आठ प्रकार के मङ्गल से समन्वित अष्टम कलश से वसुगण आपका अभिषेक करें । हे देवदेव ! आपको नमस्कार हैं ।’

इसी प्रकार एक ताम्र के पात्र में पञ्चगव्य बनाकर स्नान कराये । वैदिक मन्त्रों से गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, कुशोदक लेकर ताम्र के नवीन पात्र में पञ्चगव्य बनाकर सूर्यनारायण को स्नान कराये । मन्त्र से गन्धयुक्त जल से स्नान कराये, अनन्तर शुद्धोदक-स्नान कराये तथा रक्त वस्त्र एवं अलंकार से अलंकृत कर इस प्रकार आवाहन करे —

“एह्यहि भगवन् भानो लोकानुग्रहकारक ।
यज्ञभागं गृहाण त्वमग्निदेव नमोऽस्तु ते ॥”

‘भगवन् ! लोकानुग्रहकारक भानो ! आप आयें, इस यज्ञभाग को ग्रहण करें, भगवान् सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है।’

तदनन्तर सुवर्णपात्र के द्वारा सूर्यदेव को अर्घ्य प्रदान करें । पहले मिट्टी के कलश से, अनन्तर ताम्र-कलश से फिर रजतकलश से और अन्त में सुवर्ण के कलश से मन्त्रों द्वारा अभिषेक करे । सम्पूर्ण तीर्थोदक और सर्वौषधि से युक्त शङ्ख को सूर्यदेव के मस्तक पर भ्रमण कराये और उसके जल से स्नान कराये, अनन्तर पुष्प और धूप देकर जल, दूध, घृत, शहद और इक्षुरस से स्नान कराये ।

इस प्रकार से सूर्यदेवको स्नान कराने वाला पुरुष अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध— यज्ञके फल को प्राप्त करता है । जो स्नान के समय सूर्यदेव का भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह भी पूर्वोक्त फल प्राप्त करता है । ऐसे स्थान में स्नान कराना चाहिये जहाँ स्नान के जल का कोई लड्घन न कर सके और स्नान के जल, दही, दूध को कुत्ता, कौआ आदि निन्दित जीव भक्षण न कर सकें ।

इस प्रकार के स्नानविधि के सम्पादन के लिये जिस प्रकार के ब्राह्मण और भोजक की आवश्यकता होती है, उनका लक्षण सुनें —

वह व्यक्ति विकलाङ्ग अर्थात् न्यूनाधिक अङ्गवाला न हो । वेदादि-शास्त्र का ज्ञाता, सुन्दर, कुलीन और आर्यावर्त देश में उत्पन्न हो । गुरुभक्त, जितेन्द्रिय, तत्त्ववेता और सूर्यसम्बन्धी शास्त्रों का ज्ञाता हो। ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण से स्नान और प्रतिष्ठा करानी चाहिये।
(अध्याय १३५)

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