भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १४९
सूर्यचक्रका निर्माण और सूर्य-दीक्षाकी विधि

साम्बने पूछा — भगवन् ! भगवान् सूर्य के चक्र का और उसमें स्थित पद्म का कितने विस्तार में किस प्रकार निर्माण करना चाहिये तथा नेमि, अर और नाभि का विभाग किस प्रकार करना चाहिये ।om, ॐभगवान् श्रीकृष्ण बोले — साम्ब ! चक्र चौंसठ अङ्गुल अङ्गुल वैदिक काल की हिन्दू लम्बाई मापन की इकाई है। एक अङ्गुल की लम्बाई एक मानव हस्त की अङ्गुली की मोटाई के बराबर होती है। वायु पुराण के अनुसार एक अंगुल, अंगुली की एक गांठ के बराबर है और अन्य प्राधिकारियों के अनुसार सिरे पर अंगुष्ठ की मोटाई के बरबर है। 1 अंगुल = लगभग 16 mm से 21 mm का और नेमि आठ अङ्गुल की बनानी चाहिये । नाभि का विस्तार भी आठ अङ्गुल का होना चाहिये और पद्म नाभि का तीन गुना अर्थात् चौबीस अङ्गुल का होना चाहिये । कमल में नाभि, कर्णिका और केसर भी बनाने चाहिये । नाभि से कमल की ऊँचाई अधिक होनी चाहिये । वहींपर द्वार के कोण में कमल-पुष्प के मुख की कल्पना करनी चाहिये । ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र के लिये चार द्वारों की कल्पना करनी चाहिये । द्वारों को बनाने के पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओं का उनके नाम-मन्त्रों से भक्तिपूर्वक आवाहन कर पूजन करना चाहिये ।

अर्क-मण्डल की पूजा के लिये इस यज्ञ-क्रिया के अनुरूप दीक्षित होना चाहिये, भगवान सूर्य ने इसे मुझसे पूर्वकाल में कहा था ।
साम्ब ने पूछा — भगवन् ! सूर्यचक्र-यज्ञ के लिये देवताओं ने किन मन्त्रों को कहा है ? तथा यज्ञ के स्वरूप और क्रम को भी आप बताने की कृपा करें ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — सौम्य ! सूर्यनारायण के चक्र में कमल बनाकर पूर्व की भाँति हृदय में स्थित भगवान् सूर्य का ‘खखोल्क’ नाम से कमल की कर्णिका-दलों में नाम-मन्त्र-पूर्वक चतुर्थ्यन्त विभक्ति और क्रिया लगाते हुए ‘नमः’ लगाकर अङ्गन्यास एवं हृदयादि-न्यास तथा पूजन करना चाहिये । हवन करते समय नाम के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द का प्रयोग करना चाहिये । यथा- ‘ॐ खखोल्काय स्वाहा ।’ ‘ॐ खखोल्काय विद्महे दिवाकराय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ।’ इन चौबीस अक्षरों वाली सूर्यगायत्री का जप सभी कर्मों में करना चाहिये, अन्यथा कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता । यह सूर्यगायत्री ब्रह्मगोत्रवाली सर्वतत्वमयी तथा परम पवित्र है एवं भगवान् सूर्य को अत्यन्त प्रिय है, इसलिये प्रयत्नपूर्वक मन्त्र के ज्ञान और कर्म की विधि को जानना चाहिये । इससे अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होता है ।
साम्ब ने पूछा — भगवन् ! आदित्य-मण्डल में किसकी, किस कार्य के लिये और कैसी दीक्षा होनी चाहिये ? इसे बतायें ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुलीन शूद्र, पुरुष अथवा स्त्री भी सूर्य-मण्डल में दीक्षा के अधिकारी हैं । सूर्यशास्त्र के जाननेवाले सत्यवादी, शुचि, वेदवेत्ता ब्राह्मण को गुरु बनाना चाहिये और भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम करना चाहिये । षष्ठी तिथि में पूर्वोक्त विधि के अनुसार अग्नि-स्थापन कर विधिपूर्वक सूर्य तथा अग्नि की पूजा करके हवन करना चाहिये । तदनन्तर गुरु पवित्र शिष्य को कुशों और अक्षतों के द्वारा उसके प्रत्येक अङ्ग में सूर्य की भावना कर उसका स्पर्श करे । शिष्य वस्त्रादि से अलंकृत होकर पुष्प, अक्षत, गन्ध आदि से भगवान् सूर्य की पूजा करे तथा बलि भी दे । आदित्य, वरुण, अग्नि आदि का अपने हृदय में ध्यान करे । घी, गुड़, दधि, दूध, चावल आदि रखकर तीन बार जल से अग्नि को सिंचितकर अग्नि में पुनः हवन करे । उसके बाद गुरु शिष्टाचार स्वरूप शिष्य को दातून दे । वह दातून दूधवाले वृक्ष का हो और उसकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये । दातून करने के पश्चात् उसे पूर्व-दिशा में फेंक देना चाहिये, उस दिशा में देखे नहीं । पूर्व, पश्चिम और ईशान कोण की ओर मुख करके दातून करना शुभ होता है और अन्य दिशाओं में दातून करना अशुभ माना गया है। निन्दित दिशा में दन्तधावन से जो दोष लगता है, उसकी शान्ति के लिये पूजन-अर्चन करना चाहिये । पुनः गुरु शिष्य के अङ्गों का स्पर्श करे । सूर्यगायत्री का जपपूर्वक उसके आँखों का स्पर्श करे । इन्द्रिय-संयम के लिये शिष्य से संकल्प कराये । तदनन्तर आशीर्वाद देकर उसे शयन करने की आज्ञा दे । दूसरे दिन आचमन कर सूर्य को प्रातःकाल नमस्कार कर अग्नि-स्थापन करे और हवन करे । स्वप्न में कोई शुभ संवाद सुने अथवा दिन में यदि कोई अशुभ लक्षण दिखायी पड़े तो सूर्यनारायण को एक सौ आहुति दे । स्वप्न में यदि देवमन्दिर, अग्नि, नदी, सुन्दर उद्यान, उपवन, पत्र, पुष्प, फल, कमल, चाँदी आदि और वेदवेत्ता ब्राह्मण, शौर्यसम्पन्न राजा, धनाढ्य क्षत्रिय, सेवा संलग्न कुलीन शूद्र, तत्त्व को जाननेवाला, सुन्दर भाषण देनेवाला अथवा उत्तम वाहनपर सवार, वस्त्र, रत्न आदिकी प्राप्ति, वाहन, गाय, धान्य आदि उपकरण अथवा समृद्धि की प्राप्ति आदि स्वप्न में दिखायी दे तो उस स्वप्न को शुभ मानना चाहिये । शुभ कर्म दिखायी पड़े तो सब कार्य शुभ ही होते हैं । अनिष्टकारक स्वप्न दिखायी पड़ने पर सप्तमी को सूर्यचक्र लिखकर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिये । ब्राह्मणों तथा गुरु को संतुष्ट करना चाहिये। आदित्यमण्डल पवित्र और सभी को मुक्ति प्रदान करनेवाला है । इसलिये अपने मन में ही आदित्यमण्डल का ध्यान कर एक सौ आहुति देनी चाहिये । इस क्रम से दीक्षा-विधि और मन्त्र का अनुसरण करते हुए आदित्यमण्डल पर पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । इससे व्यक्ति के कुल का उद्धार हो जाता है । सूर्यप्रोक्त पुराणादि का श्रवण करना चाहिये । पूजन के बाद विसर्जन करे । सूर्य का दर्शन करने के पश्चात् ही भोजन करना चाहिये । प्रतिमा की छाया का और न ही ग्रह-नक्षत्र योग और तिथि का लङ्घन करना चाहिये । सूर्य अयन, ऋतु, पक्ष, दिन, काल, संवत्सर आदि सभी के अधिपति हैं और वे सभी के पूज्य तथा नमस्कार करने योग्य हैं । सूर्य की स्तुति, वन्दना और पूजा सदा करनी चाहिये । मन, वाणी और कर्म से देवताओं की निन्दा का परित्याग करना वाहिये । हाथ-पाँव धोकर, सभी प्रकार के शोक को त्यागकर शुद्ध अन्तःकरण से सूर्य को नमस्कार करना चाहिये । इस प्रकार संक्षेप में मैंने सूर्य-दीक्षा की विधि को कहा है, जो सुखभोग और मुक्ति को प्रदान करनेवाली है ।
(अध्याय १४९)

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