ॐ श्रीपरमात्मने नम:
॥ श्रीगणेशाय नम ॥
॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
भविष्यपुराण
ब्राह्म पर्व

गर्भाधान से यज्ञोपवीत पर्यन्त संस्कारों की संक्षिप्त विधि, अन्न-प्रशंसा तथा भोजन-विधि के प्रसंग में धनवर्धन की कथा, हाथों के तीर्थ एवं आचमन-विधि
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राजा शतानीक ने कहा – हे मुने ! आपने मुझे जातकर्मादि संस्कारों के विषय में बताया, अब आप इन संस्कारों के लक्षण तथा चारों वर्ण एवं आश्रम के धर्म बतलाने की कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारों के करने से द्विजातियों के बीज-सम्बन्धी तथा गर्भ-सम्बन्धी सभी दोष निवृत्त हो जाते है। वेदाध्ययन, व्रत, होम, त्रैविद्य व्रत, देवर्षि-पितृ-तर्पण, पुत्रोत्पादन, पञ्च-महायज्ञ और ज्योतिष्टोमादि यज्ञों के द्वारा यह शरीर ब्रह्म-प्राप्ति के योग्य हो जाता है। अब इन संस्कारों की विधि को आप संक्षेप में सुने –
पुरुष का जातकर्म-संस्कार नालच्छेदन से पहिले किया जाता है। इसमें वेद-मंत्रों के उच्चारण-पूर्वक बालक को सुवर्ण, मधु और घृत का प्राशन कराया जाता है। दसवें दिन, बारहवें दिन, अठारहवें दिन अथवा एक मास पूरा होने पर शुभ तिथि मुहूर्त और शुभ नक्षत्र में नामकरण-संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण का नाम मंगल-वाचक रखना चाहिये, जैसे शिवशर्मा। क्षत्रिय का बल-वाचक जैसे इंद्रवर्मा। वैश्य का धन-युक्त जैसे धनवर्धन और शुद्र का भी यथाविधि देवदासादि नाम रखना चाहिये। स्त्रियों का नाम ऐसा रखना चाहिये, जिसके बोलने में कष्ट न हो, क्रूर न हो, अर्थ स्पष्ट और अच्छा हो, जिसके सुनने से मन प्रसन्न हो तथा मंगल-सूचक एवं आशीर्वाद-युक्त हो और जिसके अन्त में आकार, ईकार आदि दीर्घ स्वर हो। जैसे यशोदा देवी आदि।
जन्म से बारहवें दिन अथवा चतुर्थ मास में बालक को घर से बाहर निकालना चाहिये, इसे ‘निष्क्रमण’ कहते हैं। छठे मास में बालक का अन्न-प्राशन-संस्कार करना चाहिये। पहले या तीसरे वर्ष में मुण्डन-संस्कार करना चाहिये। गर्भ से आठवे वर्ष में ब्राह्मण का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत-संस्कार करना चाहिये। परंतु ब्रह्मतेज की इच्छा वाला ब्राह्मण पांचवें वर्ष में, बल की इच्छा वाला क्षत्रिय छठे वर्ष में और धन की कामना वाला वैश्य आठवें वर्ष में अपने-अपने बालकों का उपनयन-संस्कार सम्पन्न करे। सोलह वर्ष तक ब्राह्मण, बाईस वर्ष तक क्षत्रिय और चौबीस वर्ष तक वैश्य गायत्री (सावित्री) के अधिकारी रहते हैं, इसके अनन्तर यथा-समय संस्कार न होने से गायत्री के अधिकारी नहीं रहते और ये ‘व्रात्य’ कहलाते हैं। फिर जब तक ‘व्रात्य-स्तोम’ नामक यज्ञ से उनकी शुद्धि नहीं की जाती, तब तक उनका शरीर गायत्री-दीक्षा के योग्य नहीं बनता। इन व्रात्यों के साथ आपत्ति में भी वेदादि शास्त्रों का पठन-पाठन अथवा विवाह आदि का सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।
त्रैवर्णिक ब्रह्मचारियों को उत्तरीय के रूप में क्रमशः कृष्ण (कस्तुरी)-मृगचर्म, रुरु नामक मृग का चर्म और बकरे का चर्म धारण करना चाहिये। इसी प्रकार क्रमशः सन (टाट), अलसी और भेड़ के ऊन का वस्त्र धारण करना चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिए तीन लड़ीवाली सुन्दर चिकनी मूँज की, क्षत्रिय के लिए मूर्वा (मुरा)- की और वैश्य के लिए सन की मेखला कही गयी है। मूँज आदि के प्राप्त न होने पर क्रमशः कुशा, अश्मन्तक और बल्वज नामक तृण की मेखला को तीन लड़ीवाली करके एक, तीन अथवा पाँच ग्रन्थियाँ उसमे लगानी चाहिये। ब्राह्मण कपास के सूत का, क्षत्रिय सन के सूत का और वैश्य भेड़ के ऊन का यज्ञोपवीत धारण करे। ब्राह्मण बिल्व, पलाश या प्लक्ष का दण्ड, जो सिरपर्यन्त हो उसे धारण करे। क्षत्रिय बड़, खदिर या बेंत के काष्ट का मस्तकपर्यन्त ऊँचा और वैश्य पैलव (पीलू वृक्ष की लकड़ी), गूलर अथवा पीपल के काष्ठ का दण्ड नासिकापर्यन्त ऊँचा धारण करे। ये दण्ड सीधे, छिद्र-रहित और सुंदर होने चाहिये। यज्ञोपवीत-संस्कार में अपना-अपना दण्ड धारणकर भगवान सूर्यनारायण का उपस्थान करे और गुरु की पूजा करे तथा नियम के अनुसार सर्वप्रथम माता, बहिन या मौसी से भिक्षा माँगे। भिक्षा माँगते समय उपनीत ब्राह्मण वटु भिक्षा देनेवाली से ‘भवति ! भिक्षां में देहि’, क्षत्रिय ‘भिक्षां भवति ! में देहि’ तथा वैश्य ‘भिक्षां देहि में भवति !’ – इस प्रकार से ‘भवति’ शब्द का प्रयोग करे। भिक्षा में वे सुवर्ण, चाँदी अथवा अन्न ब्रह्मचारी को दे।
इस प्रकार भिक्षा ग्रहणकर ब्रह्मचारी उसे गुरु को निवेदित कर दे और गुरु की आज्ञा पाकर पूर्वाभिमुख हो आचमन कर भोजन करे। पूर्व की और मुख करके भोजन करने से आयु, दक्षिण-मुख करने से यश, पश्चिम-मुख करने से लक्ष्मी और उत्तर-मुख करके भोजन करने से सत्य की अभिवृद्धि होती है। एकाग्रचित्त हो उत्तम अन्न का भोजन करने के अनन्तर आचमन कर अङ्गों (आँख, कान, नाक) का जल से स्पर्श करे। अन्न की नित्य स्तुति करनी चाहिये और अन्न की निन्दा किये बिना भोजन करना चाहिये। उसका दर्शनकर संतुष्ट एवं प्रसन्न होना चाहिये। हर्ष से भोजन करना चाहिये। पूजित अन्न के भोजन से बल और तेज की वृद्धि होती है और निन्दित अन्न के भोजन से बल और तेज दोनों की हानि होती है।
(तथान्नं पूजयेन्नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् । दर्शनात् तस्य हृष्येद् वै प्रसीदेच्चापि भारत ॥
पूजितं त्वशनं नित्यं बलमोजश्च यच्छति ॥
अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम्। (ब्राह्मपर्व ३।३७-३९))

इसलिए सर्वदा उत्तम अन्न का भोजन करना चाहिये। उच्छिष्ट ( जूठा ) नहीं खाना चाहिये तथा स्वयं भी किसी का उच्छिष्ट नहीं खाना वाहिये। भोजन करके जिस अन्न को छोड़ दे उसे फिर ग्रहण न करे अर्थात् बार-बार छोड़-छोडकर भोजन न करे, एक बार बैठकर तृप्ति-पूर्वक भोजन कर लेना चाहिये। जो पुरुष बीच-बीच में विच्छेद करके लोभ-वश भोजन करता है, उसके दोनों लोक नष्ट हो जाते हैं, जैसे धनवर्धन वैश्य के हुये थे।
राजा शतानीक ने पूछा – महाराज ! आप धनवर्धन वैश्य की कथा सुनाइये। उसने कैसा भोजन किया और उसका क्या परिणाम हुआ ?
सुमन्तु मुनिने कहा – राजन् ! सत्ययुग की बात है, पुष्कर क्षेत्र में धन-धान्य से सम्पन्न धनवर्धन नामक एक वैश्य रहता था। एक दिन वह ग्रीष्म ऋतू में मध्याह्न के समय वैश्वदेव-कर्म सम्पन्न कर अपने पुत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन कर रहा था। इतने में ही अकस्मात् उसे बाहर से एक करुण शब्द सुनायी पड़ा। उस शब्द को सुनते ही वह दयावश भोजन को छोडकर बाहर की ओर दौड़ा। किंतु जब तक वह बाहर पहुँचा वह आवाज बंद हो गयी। फिर लौटकर उस वैश्य ने पात्र में जो छोड़ा हुआ भोजन था उसे खा लिया। भोजन करते ही उस वैश्य की मृत्यु हो गयी और इसी अपराध-वश परलोक में भी उसकी दुर्गति हुई। इसलिए छोड़े हुए भोजन को फिर कभी नहीं खाना चाहिये। अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिये। इससे शरीर में अत्यधिक रस की उत्पत्ति होती है, जिससे प्रतिश्याय (जुकाम, मन्दाग्नि, ज्वर) आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते है। अजीर्ण हो जाने से स्नान, दान, तप, होम तर्पण, पूजा आदि कोई भी पुण्य कर्म ठीक से सम्पन्न नहीं हो पाते। अति भोजन करने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं – आयु घटती है, लोक में निन्दा होती है तथा अन्त में सद्गति भी नहीं होती। उच्छिष्ट मुख से कहीं नहीं जाना चाहिये। सदा पवित्रता से रहना चाहिये। पवित्र मनुष्य यहाँ सुख से रहता है और अन्त में स्वर्ग में जाता है।
राजा ने पूछा – मुनीश्वर ! ब्राह्मण किस कर्म के करने से पवित्र होता है ? इसका आप वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! जो ब्राह्मण विधि-पूर्वक आचमन करता है, वह पवित्र हो जाता है और सत्कर्मों का अधिकारी हो जाता है। आचमन की विधि यह है कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र स्थान में आसन के ऊपर पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके बैठे। दाहिने हाथ को जानू अर्थात घुटने के भीतर रखकर दोनों चरण बराबर रखे तथा शिखा में ग्रन्थि लगाये और फिर उष्णता एवं फेन से रहित शीतल एवं निर्मल जल से आचमन करे। खड़े-खड़े, बात करते, इधर-उधर देखते हुए, शीघ्रता से और क्रोधयुक्त होकर, आचमन न करे।
हे राजन् ! ब्राह्मण के दाहिने हाथ में पाँच तीर्थ कहे गये हैं – (१) देवतीर्थ, (२) पितृतीर्थ, (३) ब्राह्मतीर्थ, (४) प्राजापत्यतीर्थ और (५) सौम्यतीर्थ। अब आप इनके लक्षणों को सुने – अँगूठे के मूल में ब्राह्मतीर्थ, कनिष्ठा के मूल में प्राजापत्यतीर्थ, अङ्गुष्ठ के बीच में पितृतीर्थ और हाथ के मध्य-भाग में सौम्यतीर्थ कहा जाता हैं, जो देवकर्म से प्रशस्त माना गया है।
(“अङ्गुष्ठमूलोत्तरतो येयं रेखा महीपते ॥
ब्राह्म तीर्थं वदन्त्येतद्वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः । कायं कनिष्ठिकामूले अङ्गुल्यग्रे तु दैवतम् ॥
तर्जन्यअङ्गुष्ठयोरन्तः पित्र्यं तीर्थमुदाहृतम् । करमध्ये स्थितं सौम्यं प्रशस्तं देवकर्मणि ॥” (ब्राह्मपर्व ३।६३-६५))

देवार्चा, ब्राह्मण को दक्षिणा आदि कर्म देवतीर्थ से; तर्पण, पिण्डदानादि कर्म पितृतीर्थ से; आचमन ब्राह्मतीर्थ से; विवाह के समय लाजा-होमादि और सोमपान प्राजापत्यतीर्थ से; कमण्डलु-ग्रहण, दधि-प्राशनादि कर्म सौम्यतीर्थ से करे। ब्राह्मतीर्थ से उप-स्पर्शन सदा श्रेष्ठ माना गया है।
अङ्गुलियों को मिलाकर एकाग्रचित्त हो, पवित्र जल से विना शब्द किये तीन बार आचमन करने से महान् फल होता है और देवता प्रसन्न होते हैं। प्रथम आचमन से ऋग्वेद, द्वितीय से यजुर्वेद और तृतीय से सामवेद की तृप्ति होती है तथा आचमन करके जल-युक्त दाहिने अँगूठे से मुख का स्पर्श करने से अथर्ववेद की तृप्ति होती है। ओष्ठ के मार्जन से इतिहास और पुराणों की तृप्ति होती है। मस्तक में अभिषेक करने से भगवान रुद प्रसन्न होते है। शिखा के स्पर्श से ऋषिगण, दोनों आँखों के स्पर्श से सूर्य, नासिका के स्पर्श से वायु, कानों के स्पर्श से दिशाएँ, भुजा के स्पर्श से यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा अग्निदेव तृप्त होते हैं। नाभि और प्राणों की ग्रंथियों के स्पर्श करने से सभी तृप्त हो जाते है। पैर धोने से विष्णुभगवान्, भूमि में जल छोड़ने से वासुकि आदि नाग तथा बीच में जो जलबिन्दु गिरते है, उनसे चार प्रकार के भूतग्राम की तृप्ति होती है।
अङ्गुष्ठ और तर्जनी से नेत्र, अङ्गुष्ठ तथा अनामिका से नासिका, अङ्गुष्ठ एवं मध्यमा से मुख, अङ्गुष्ठ और कनिष्ठका से कान, सब अङ्गुलियों से सिर का स्पर्श करना चाहिये। अङ्गुष्ठ अग्निरूप है, तर्जनी वायुरूप, मध्यमा प्रजापति रूप, अनामिका सूर्य रूप और कनिष्ठिका इन्द्र रुप है।
(“अङ्गुष्ठोऽग्निर्महाबाहो प्रोक्तो वायुः प्रदेशिनी ॥
अनामिका तथा सूर्यः कनिष्ठा मघवा विभो । प्रजापतिर्मध्यमा ज्ञेया तस्माद् भरतसत्तम ॥” (ब्राह्मपर्व ३।८४-८५))

इस विधि से ब्राह्मण के आचमन करने पर सम्पूर्ण जगत्, देवता और लोक तृप्त हो जाते हैं। ब्राह्मण सदा पूजनीय है, क्योंकि वह सर्व-देव-मय है।
ब्राह्मतीर्थ, प्राजापत्यतीर्थ अथवा देवतीर्थ से आचमन करे, परंतु पितृतीर्थ से कभी भी आचमन नही करना चाहिये। आचमन का जल ह्रदय तक जाने से ब्राह्मण की; कंठ तक जाने से क्षत्रिय की और वैश्य की जल के प्राशन से तथा शुद्र की जल के स्पर्शमात्र से शुद्धि हो जाती है।
दाहिने हाथ के नीचे और बायें कंधे पर यज्ञोपवीत रहने से द्विज उपविती (सव्य) कहलाता है, इसके विलोम रहने से प्राचीनावीती (अपसव्य) तथा गले में माला की तरह यज्ञोपवीत रहने से निवीती कहा जाता है।
मेखला, मृगछाला, दण्ड, यज्ञोपवीत और कमण्डलु – इनमे कोई भी चीज भग्न हो जाय तो उसे जल में विसर्जित कर मंत्रोच्चारण-पूर्वक दूसरा धारण करना चाहिये। उपवीती (सव्य) होकर और दाहिने हाथ को जानू अर्थात घुटने के भीतर रखकर जो ब्राह्मण आचमन करता है वह पवित्र हो जाता है। ब्राह्मण के हाथ की रेखाओं को गङ्गा आदि नदियों के समान पवित्र समझना चाहिये और अङ्गुलियों के जो पर्व है, वे हिमालय आदि देवपर्वत माने जाते है। इसलिए ब्राह्मण का दाहिना हाथ सर्व-देव-मय है और इस विधि से आचमन करने वाला अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।
(यास्त्वेताः करमध्ये तु रेखा विप्रस्य भारत ॥
गङ्गाद्याः सरितः सर्वा ज्ञेया भरतसत्तम । यान्यङ्गुलिषु पर्वाणि गिरयस्तानि विद्धि वै ॥
सर्वदेवमयो राजन् करो विप्रस्य दक्षिणः ।” (ब्राह्मपर्व ३।९२-९४))

(अध्याय 3)

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

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