भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — प्रथम भाग)
अध्याय – १६
अग्नि-पूजन-विधि

सूतज़ी बोले — ब्राह्मणो ! नित्य-नैमित्तिक यागादिक समाप्ति में हवन हो जाने पर भगवान् अग्निदेव की षोडश उपचारों से पूजा करनी चाहिये । अग्नि को वायु द्वारा प्रदीप्त कर पीठस्थ देवताओं की पूजा कर हाथ में लाल फूल ले निम्न मन्त्र पढ़कर ध्यान करे —om, ॐ

इष्टं शक्तिस्वस्तिकाभीतिमुच्यैर्दीर्धैर्दौर्भिर्धारयन्तं वरान्तम् ।
हेमाकल्पं पद्यसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्वह्निं बद्धमौलिं जटाभिः ॥
(मध्यमपर्व १ । १६ । ३)

‘भगवान् अग्निदेवता अपने हाथों में उत्तम इष्ट (यज्ञपात्र), शक्ति, स्वस्तिक और अभय-मुद्रा धारण किये हैं, देदीप्यमान सुवर्ण-सदृश उनका स्वरूप है, कमल के ऊपर विराजमान हैं, तीन नेत्र हैं तथा वे जटाओं और मुकुट से सुशोभित हैं ।’

मण्डप के पूर्व आदि द्वारदेशों में कामदेव, इन्द्र, वराह तथा कार्तिकेय को आवाहित कर स्थापित करे । तदनन्तर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा गन्धादि उपचारों से पूजन कर आठ मुद्राएँ प्रदर्शित करे । फिर सुवर्ण-वर्णवाले निर्मल, प्रज्वलित, सर्वतोमुख, महाजिह्व तथा महोदर भगवान् अग्निदेव की आकाश-रूप में पूजा करे । अग्नि की जिह्वाओं का भी ध्यान करे । इसके बाद भगवान् अग्निदेव का विविध उपचारों से पूजन करे *(अध्याय १६)

* सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र से तीन पुष्पगुच्छों द्वारा अग्निदेव को आसन प्रदान करे —
आसन-मन्त्र —
त्वमादिः सर्वभूतानां संसारार्णवतारकः । परमज्योतीरुपस्त्वमासनं सफलीकुरु ॥
संसार रुपी सागर से उद्धार करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियों में आदि, परम ज्योतिः-स्वरूप हे अग्निदेव ! आप इस आसन को ग्रहण कर मुझे सफल बनायें । अनन्तर करबद्ध प्रार्थना करे —
प्रार्थना-मन्त्र —
वैश्वानर नमस्तेऽस्तु नमस्ते हव्यवाहन । स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ शान्तिं कुरु नमोऽस्तु ते ॥
हे हव्यवाहन वैश्वानर देव ! आप देवताओं में श्रेष्ठ हैं, आपका स्वागत है, आपको नमस्कार है, आप शान्ति प्रदान करें ।
पाद्य-मन्त्र —
नमस्ते भगवन् देव आपोनारायणात्मक । सर्वलोकहितार्थाय पाद्यं च प्रतिगृह्यताम् ॥
नर-नारायणस्वरुप हे भगवान् वैश्वानर देव ! आपको नमस्कार है । आप समस्त संसार के हित के लिये इस पाद्य-जल को ग्रहण करें ।
अर्घ्य-मन्त्र —
नारायण परं धाम ज्योतीरूप सनातन । गृहाणार्घ्य मया दत्तं विश्वरूप नमोऽस्तु ते ॥
हे विश्वरुप ! आप ज्योतीरुप हैं, आप ही सनातन, परम धाम एवं नारायण हैं, आपको नमस्कार है, आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्य को ग्रहण करें ।
आचमनीय-मन्त्र —
जगदादित्यरूपेण प्रकाशयति यः सदा । तस्मै प्रकाशरूपाय नमस्ते जातवेदसे ॥
जो आदित्यरूप से सम्पूर्ण संसार को नित्य प्रकाशित करते रहते हैं, ऐसे उन जातवेदा तथा प्रकाशस्वरूप भगवान् वैश्वानर को नमस्कार है । हे अग्निदेव ! इस आचमनीय जल को आप ग्रहण करें ।
स्नानीय-मन्त्र —
धनञ्जय नमस्तेऽस्तु सर्वपापप्रणाशन । स्नानीयं ते मया दत्तं सर्वकामार्थसिद्धये ॥
सभी पापों का नाश करनेवाले हे धनञ्जयदेव ! आपको नमस्कार है । सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि के लिये मेरे द्वारा दिये गये इस स्नानीय जल को आप ग्रहण करें ।
अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्र-मन्त्र —
हुताशन महाबाहो देवदेव सनातन । शरणं ते प्रगच्छामि देहि में परमं पदम् ॥
हे देवदेव सनातन महाबाहु हुताशन ! मैं आपकी शरण हूँ, मुझे आप परम पद प्रदान करें (मेरे द्वारा प्रदत्त इस अङ्गप्रोणक्ष एवं वस्त्र को आप स्वीकार करें)।
अलंकार-मन्त्र —
ज्योतिषां ज्योतीरूपस्त्वमनादिनिधनाच्युत । मया दत्तमलंकारमलंकुरु नमोऽस्तु ते ॥
अपने स्थान से कभी च्युत न होनेवाले हे अग्निदेव ! आपका न आदि है न अन्त । आप ज्योतियों के परमज्योतीरुप हैं, आपको मेरा नमस्कार है । मेंरे दिये गये इस अलंकार को आप अलंकृत करें ।
गन्ध-मन्त्र —
देवीदेवा मुदं यान्ति यस्य सम्यक्समागमात् । सर्वदोषोपशान्त्यर्थं गन्धोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
हे देव ! आपके सम्यक् संनिधान से सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं । सम्पुर्ण दोषों की शान्ति के लिये मेरे द्वारा दिये गये इस गन्ध को आप ग्रहण करें ।
पुष्प-मन्त्र —
विष्णुत्वं हि ब्रह्मा च ज्योतिषां गतिरीश्वर । गृहाण पुष्पं देवेश सानुलेपं जगद् भवेत् ॥
हे देवश! आप ही ब्रह्माविष्णु तथा ज्योतियोंकी गति हैं और आप ही ईश्वर हैं । आप इस पुष्प को ग्रहण करें, जिससे सारा संसार पुष्प गन्ध से सुवासित हो जाय ।
धूप-मन्त्र —
देवतानां पितृणां च सुखमेकं सनातनम् । धूपोऽयं देवदेवेश मे गृह्यतां मे धनञ्जय: ॥
हे देवदेवेश धनञ्जय ! आप देवताओं और पितरों के सुख प्राप्त करने में एकमात्र सनातन आधार हैं । आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस धूप को ग्रहण करें ।
दीप-मन्त्र —
त्वमेकः सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च । परमात्मा पराकारः प्रदीपः प्रतिगृह्यताम् ॥
हे परमात्मन् ! आप सम्पूर्ण चराचर प्राणियों में व्याप्त हैं । आपकी आकृति परम उत्कृष्ट है । आप इस दीपक को ग्रहण करें ।
नैवेद्य-मन्त्र —
नमो5स्तु यज्ञपतये प्रभवे जातवेदसे । सर्वलोकहितार्थाय नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
हे यज्ञपति जातवेदा ! आप शक्तिशाली हैं तथा समस्त संसार का कल्याण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है । मेरे द्वारा प्रदत्त इस नैवेद्य को आप ग्रहण करें ।
परम अन्नस्वरूप मधु भी नैवेद्य के रूप में निवेदित करे तथा यज्ञसूत्र भी अर्पित करे । अन्त में समस्त कर्म भगवान् अग्निदेव को निवेदित कर दे —
हुताशन नमस्तुभ्यं नमस्ते रुक्मवाहन । लोकनाथ नमस्तेऽस्तु नमस्ते जातवेदसे ॥
हे हुताशनदेव ! आपको नमस्कार है, रुक्मवाहन लोकनाथ ! आपको नमस्कार है, हे जातवेदा ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ।

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय २ से ३
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