भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय १४ से १७
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – १४ से १७
पुष्पवाटिका तथा तुलसी की प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणो ! पुष्पवाटिका की प्रतिष्ठा में तीन हाथ की एक वेदी का निर्माण कर उस पर घट की स्थापना करे । पुष्पाधिवास से एक दिन पूर्व ब्राह्मण-भोजन कराये । कलश पर गणेश, सूर्य, सोम, अग्निदेव तथा नारायण का आवाहन कर पूजन करे । वेदी पर मधु तथा पायस से हवन करे । ईशानकोण में विधिवत् यूप का समारोपण कर उसके मूल में गुरुवार के दिन गेहुँऑ का रोपण कर उन्हें सींचे । om, ॐवाटिका को रक्त सूत्र से आवेष्टित करे । वाटिका के पुष्प-वृक्षों का कर्णवेध कराकर उन्हें कुशोदक से स्नान कराये और ब्राह्मणों को धान्य, यव और गेहूँ दक्षिणा-रूप में प्रदान करे और वाटिका को जलधारा से सींचे ।
तुलसी की प्रतिष्ठा ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में विधिपूर्वक करनी चाहिये । प्रतिष्ठा के लिये शुद्ध दिन अथवा एकादशी तिथि होनी चाहिये । रात्रि में घट की स्थापना कर विष्णु, शिव, सोम, ब्रह्मा तथा इन्द्र का पूजन करे । गायत्री-मन्त्र तथा पूर्वोक्त देवताओं के मन्त्रों द्वारा उन्हें स्नान कराये । ‘कया नश्चित्र० ‘ (यजु० २७ । ३९) इस मन्त्र से गन्ध, ‘अ शुना० ‘ (यजु० २० । २७) इस मन्त्र से इत्र, ‘त्वां गन्धर्वा० ‘ (यजु० १२ । ९८) तथा ‘मा नस्तोके० ‘ (यजु० १६ । १६) आदि मन्त्रों से पुष्प, ‘श्रीश्च ते० ‘ (यजु० ३१ । २२) तथा ‘वैश्वदेवी० ‘ (यजु० १९ । ४४) इन मन्त्रों से दूर्वा, ‘रूपेण वो० ‘ (यजु० ७ । ४५) इस मन्त्र से दर्पण और ‘याः फलिनीर्या० ‘ (यजु० १२ । ८९) इस मन्त्र से फल अर्पण करे तथा ‘समिद्धो० ‘ (यजु० २९ । १) इस मन्त्र से अञ्जन लगाये । तुलसी को पोले सूत्र से आवेष्टित कर उसके चारों ओर दूध और जल की धारा दे । कलश तथा तुलसी को वस्त्र से भली-भाँति आच्छादित कर घर आ जाय । दूसरे दिन ‘तद्विष्णोः० ‘ (यजु० ६ । ५) इस मन्त्र से सुहागिनी स्त्रियों द्वारा मङ्गल-गान-पूर्वक उसे स्नान कराये । मातृ-पूजापूर्वक वृद्धि-श्राद्ध करे । गन्ध आदि पदार्थों द्वारा आचार्य, होता और ब्रह्मा आदि का वरण करे । दस हाथ के मण्डप में गोलाकार वेदी का निर्माण करे और वहां भगवान् नारायण का पूजन करे । वेदी के मध्य ग्रह, लोकपाल, सूर्य और मरुद्गणों की पूजा करे । कलश के चारों ओर रुद्र और वसुओं का पूजन करे । कुश-कण्डिका करके, तिल-यव से हवन करे । विष्णु को उद्दिष्ट कर १०८ आहुतियाँ दे । अन्य देवताओं को यथाशक्ति आहुति प्रदान करे । यूप स्थापित कर चरु की बलि दे । चतुर्दिक कदली-स्तम्भ स्थापित कर ध्वजाएँ फहराये । दक्षिणा में स्वर्ण, तिल-धान्य एवं पयस्विनी गाय प्रदान करे । तुलसी को क्षीरधारा दे ।कुछ ऐसे भी वृक्ष हैं, जिनकी प्रतिष्ठा नहीं होती । जैसे — जयन्ती, सोमवृक्ष, सोमवट, पनस (क्टहल), कदम्ब, निम्ब, कनकपाटला, शाल्मलि, निम्बक, बिम्ब, अशोक आदि । इनके अतिरिक्त भद्रक, शमीकोण, चंडातक, बक तथा खदिर आदि वृक्ष की प्रतिष्ठा तो करनी चाहिये, किंतु इनका कर्णवेध-संस्कार नहीं करना चाहिये ।
(अध्याय १४-१७)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय १
5. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय २ से ३
6. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय ४ से ८
7. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय ९ से ११
8. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय १२ से १३

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