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॥ मालावतीकृतं महापुरुष स्तोत्रम् ॥

॥ मालावत्युवाच ॥
वन्दे तं परमात्मानं सर्वकारणकारणम् ।
विना येन शवाः सर्वे प्राणिनो जगतीतले ॥
निर्लिप्तं साक्षिरूपं च सर्वेषां सर्वकर्मसु ।
विद्यमानं न दृष्टं च सर्वैः सर्वत्र सर्वदा ॥


येन स्रष्टा च प्रकृतिः सर्वाधारा परात्परा ।
ब्रह्मविष्णुशिवादीनां प्रसूर्या त्रिगुणात्मिका ॥
जगत्स्रष्टा स्वयं ब्रह्मा नियतो यस्य सेवया ।
पाता विष्णुश्च जगतां संहर्त्ता शंकरः स्वयम् ॥
ध्यायन्ते यं सुराः सर्वे मुनयो मनवस्तथा ।
सिद्धाश्च योगिनः सन्तः सन्ततं प्रकृतेः परम् ॥
साकारं च निराकारं परं स्वेच्छामयं विभुम् ।
वरं वरेण्यं वरदं वरार्हं वरकारणम् ॥
तपःफलं तपोबीजं तपसां च फलप्रदम् ।
स्वयं तपःस्वरूपं च सर्वरूपं च सर्वतः ॥
सर्वाधारं सर्वबीजं कर्म तत्कर्मणां फलम् ।
तेषां च फलदातारं तद्बीजं क्षयकारणम् ॥
स्वयं तेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ।
सेवाध्यानं न घटते भक्तानां विग्रहं विना ॥
तत्तेजो मण्डलाकारं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
अतीव कमनीयं च रूपं तत्र मनोहरम् ॥
नवीननीरदश्यामं शरत्पङकजलोचनम् ।
शरत्पार्वणचन्द्रास्यमीषद्धास्यसमन्वितम् ॥
कोटिकन्दर्पलावण्यं लीलाधाम मनोहरम् ।
चन्दनोक्षितसर्वाङगं रत्नभूषणभूषितम् ॥
द्विभुजं मुरलीहस्तं पीतकौशेयवाससम् ।
किशोरवयसं शान्तं राधाकान्तमनन्तकम् ॥
गोपाङगनापरिवृतं कुत्रचिन्निर्जने वने ।
कुत्रचिद्रासमध्यस्थं राधया परिसेवितम् ॥
कुत्रचिद् गोपवेशं च वेष्टितं गोपबालकैः ।
शतश्रृङगाचलोत्कृष्टे रम्ये वृन्दावने वने ॥
निकरं कामधेनूनां रक्षन्तं शिशुरूपिणम् ।
गोलोके विरजातीरे पारिजातवने वने ॥
वेणुं क्वणन्तं मधुरं गोपीसम्मोहकारणम् ।
निरामये च वैकुण्ठ कुत्रचिच्च चतुर्भुजम् ॥
लक्ष्मीकान्तं पार्षदैश्च सेवितं च चतुर्भुजैः ।
कुत्रचित् स्वांशरूपेण जगतां पालनाय च ॥
श्वेतद्वीपे विष्णुरूपं पद्मया परिसेवितम् ।
कुत्रचित् स्वांशकलया ब्रह्माण्डे ब्रह्मरूपिणम् ॥
शिवस्वरूपं शिवदं स्वांशेन शिवरूपिणम् ।
स्वात्मनः षोडशांशेन सर्वाधारं परात्परम् ॥
स्वयं महद्विराडरूपं विश्वौघं यस्य लोमसु ।
लीलया स्वांशकलया जगतां पालनाय च ॥
नानावतारं विभ्रन्तं बीजं तेषां सनातनम् ।
वसन्तं कुत्रचित् सन्तं योगिनां हृदये सताम् ॥
प्राणरूपं प्राणिनां च परमात्मानमीश्वरम् ।
तं च स्तोतुमशक्ताहमबला निर्गुणं विभुम् ॥
निर्लक्ष्यं च निरीहं च सारं वाङ्मानसोः परम् ।
यं स्तोतुमक्षमोऽनन्तः सहस्रवदनने च ॥
पञ्चवक्त्रश्चतुर्वक्त्रो गजवक्त्रः षडाननः ।
यं स्तोतुं न क्षमा माया मोहिता यस्य मायया ॥
यं स्तोतुं न क्षमा श्रीश्च जडीभूता सरस्वती ।
वेदा न शक्ता यं स्तोतुं को वा विद्वांश्च वेदवित् ॥
किं स्तौमि तमनीहं च शोकार्ता स्त्री परात्परम् ।

इत्युक्त्वा सा च गान्धर्वी विरराम रुरोद च ॥
कृपानिधिं प्रणनाम भयार्ता च पुनः पुनः ।
कृष्णश्च शक्तिभिः सार्द्धमधिष्ठानं चकार ह ॥
भर्तुरस्यान्तरे तस्याः परमात्मा निराकृतिः ।
उत्थाय शीघ्रं वीणां च धृत्वा स्नात्वा च वाससी ॥
प्रणनाम देवसंघं ब्राह्मणं पुरतः स्थितम् ।
नेदुर्दुन्दुभयो देवाः पुष्पवृष्टिं च चक्रिरे ॥
दृष्ट्वा चोपरि दम्पत्योः प्रददुः परमाशिषम् ।
गन्धर्वो देवपुरतो ननर्त्त च जगौ क्षणम् ॥
जीवितं पुरतः प्राप देवानां च वरेण च ।
जगाम पत्न्या सार्द्धं च पित्रा मात्रा च हर्षितः ॥
उपबर्हणगन्धर्वो गन्धर्वनगरं पुनः ।
मालावती रत्नकोटिं धनानि विविधानि च ॥
प्रददौ ब्राह्मणेभ्यश्च भोजयामास तान्सती ।
वेदांश्च पाठयामास कारयामास मङ्गलम् ॥
महोत्सवं च विविधं हरेर्नामैकमङ्गलम् ।
जग्मुर्देवाश्च स्वस्थानं विप्ररूपी हरिः स्वयम् ॥
एतत्ते कथितं सर्वं स्तवराजं च शौनक ।
इदं स्तोत्रं पुण्यरूपं पूजाकाले तु यः पठेत् ॥
हरिभक्तिं हरेर्दास्यं लभते वैष्णवोजनः।
वरार्थी यः पठेद्भक्त्या चास्तिकः परमास्थया ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां निश्चितं लभते फलम् ।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ॥
भार्य्यार्थी लभते भार्य्यां पुत्रार्थी लभते सुतम् ।
धर्मार्थी लभते धर्मं यशोऽर्थी लभते यशः ॥
भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं प्रजाभ्रष्टः प्रजां लभेत् ।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥
भयान्मुच्येत भीतस्तु धनं नष्टधनो लभेत् ।
दस्युग्रस्तो महारण्ये हिंस्रजन्तुसमन्वितः ॥
दावाग्निदग्धो मुच्येत निमग्नश्च जलार्णवे ॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते मालावतीकृतं महापुरुषस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
(ब्रह्मखण्ड १८ । ९-४९)
भावार्थः-
मालावती बोली – “मैं समस्त कारणों के भी कारण रूप उन परमात्मा की वन्दना करती हूँ, जिनके बिना भूतल के सभी प्राणी शव के समान हैं। वे निर्लिप्त हैं। सबके साक्षी हैं। समस्त कर्मों में सर्वत्र और सर्वदा विद्यमान हैं तो भी सबकी दृष्टि[1] में नहीं आते हैं। जिन्होंने सबकी आधारभूता उस परात्परा प्रकृति की सृष्टि की है; जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि की भी जननी तथा त्रिगुणमयी है; साक्षात जगत्स्रष्टा ब्रह्मा जिनकी सेवा में नियमित रूप से लगे रहते हैं; पालक विष्णु और साक्षात जगत्संहारक शिव भी जिनकी सेवा में निरन्तर तत्पर रहते हैं; सब देवता, मुनि, मनु, सिद्ध, योगी और संत-महात्मा सदा प्रकृति से परे विद्यमान जिन परमेश्वर का ध्यान करते हैं; जो साकार और निराकार भी हैं; स्वेच्छामय रूपधारी और सर्वव्यापी हैं।

वर, वरेण्य, वरदायक, वर देने के योग्य और वरदान के कारण हैं, तपस्या के फल, बीज और फलदाता हैं; स्वयं तपः स्वरूप तथा सर्वरूप हैं; सबके आधार, सबके कारण, सम्पूर्ण कर्म, उन कर्मों के फल और उन फलों के दाता हैं तथा जो कर्मबीज का नाश करने वाले हैं, उन परमेश्वर को मैं प्रणाम करती हूँ। वे स्वयं तेजःस्वरूप होते हुए भी भक्तों पर अनुग्रह के लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं; क्योंकि विग्रह के बिना भक्तजन किसकी सेवा और किसका ध्यान करेंगे। विग्रह के अभाव में भक्तों से सेवा और ध्यान बन ही नहीं सकते। तेज का महान मण्डल की उनकी आकृति है। वे करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान हैं।

उनका रूप अत्यन्त कमनीय और मनोहर है। नूतन मेघ की-सी श्याम कान्ति, शरद्-ऋतु के प्रफुल्ल कमलों के समान नेत्र, शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति मन्द मुस्कान की छटा से सुशोभित मुख और करोड़ों कन्दर्पों को भी तिरस्कृत करने वाला लावण्य उनकी सहज विशेषताएँ हैं। वे मनोहर लीलाधाम हैं। उनके सम्पूर्ण अंग चन्दन से चर्चित तथा रत्नमय आभूषणों से विभूषित हैं। दो बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, हाथ में मुरली है, श्रीअंगों पर रेशमी पीताम्बर शोभा पाता है, किशोर अवस्था है। वे शान्त स्वरूप राधाकान्त अनन्त आनन्द से परिपूर्ण हैं। कभी निर्जन वन में गोपांगनाओं से घिरे रहते हैं। कभी रासमण्डल में विराजमान हो राधारानी से समाराधित होते हैं। कभी गोप-बालकों से घिरे हुए गोप वेष से सुशोभित होते हैं। कभी सैकड़ों शिखर वाले गिरिराज गोवर्धन के कारण उत्कृष्ट शोभा से युक्त रमणीय वृन्दावन में कामधेनुओं के समुदाय को चराते हुए बालगोपाल के रूप में देखे जाते हैं।

कभी गोलोक में विरजा के तट पर पारिजात के वन में मधुर-मधुर वेणु बजाकर गोपांगनाओं को मोहित किया करते हैं। कभी निरामय वैकुण्ठधाम में चतुर्भुज लक्ष्मीकान्त के रूप में रहकर भार भुजाधारी पार्षदों से सेवित होते हैं। कभी तीनों लोकों के पालन के लिये अपने अंश रूप से श्वेतद्वीप में विष्णुरूप धारण करके रहते हैं और पद्मा उनकी सेवा करती हैं। कभी किसी ब्रह्माण्ड में अपनी अंशकला द्वारा ब्रह्मारूप से विराजमान होते हैं। कभी अपने ही अंश से कल्याणदायक मंगलरूप शिव-विग्रह धारण करके शिवधाम में निवास करते हैं। अपने सोलहवें अंश से स्वयं ही सर्वाधार, परात्पर एवं महान विराट-रूप धारण करते हैं, जिनके रोम-रोम में अनन्त ब्रह्माण्डों का समुदाय शोभा पाता है। कभी अपनी ही अंशकला द्वारा जगत की रक्षा के लिये लीलापूर्वक नाना प्रकार के अवतार धारण करते हैं।

उन अवतारों के वे स्वयं ही सनातन बीज हैं। कभी योगियों एवं संत-महात्माओं के हृदय में निवास करते हैं। वे ही प्राणियों के प्राणस्वरूप परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। मैं मूढ़ अबला उन निर्गुण एवं सर्वव्यापी भगवान की स्तुति करने में सर्वथा असमर्थ हूँ। वे अलक्ष्य, अनीह, सारभूत तथा मन और वाणी से परे हैं।

भगवान अनन्त सहस्र मुखों द्वारा भी उनकी स्तुति नहीं कर सकते। पंचमुख महादेव, चतुर्मुख ब्रह्मा, गजानन गणेश और षडानन कार्तिकेय भी जिनकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं, माया भी जिनकी माया से मोहित रहती है, लक्ष्मी भी जिनकी स्तुति करने में सफल नहीं होती, सरस्वती भी जड़वत हो जाती है और वेद भी जिनका स्तवन करने में अपनी शक्ति खो बैठते हैं, उन परमात्मा का स्तवन दूसरा कौन विद्वान कर सकता है? मैं शोकातुर अबला उन निरीह परात्पर परमेश्वर की स्तुति क्या कर सकती हूँ।”

ऐसा कहकर गन्धर्व-कुमारी मालावती चुप हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी। भय से पीड़ित हुई उस सती ने कृपानिधान भगवान श्रीकृष्ण को बारंबार प्रणाम किया। तब निराकार परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण अपनी शक्तियों के साथ मालावती के पति -गन्धर्व उपबर्हण के शरीर में अधिष्ठित हुए। उनका आवेश होते ही गन्धर्व वीणा लिये उठ बैठा और शीघ्र ही स्नान के पश्चात दो नवीन वस्त्र धारण करके उसने देव-समूह को तथा सामने खड़े हुए उन ब्राह्मण देवता को प्रणाम किया। फिर तो देवता दुन्दुभि बजाने और फूलों की वर्षा करने लगे। उन गन्धर्व-दम्पति पर दृष्टिपात करके उन सबने उत्तम आशीर्वाद दिये।

गन्धर्व ने एक क्षण तक देवताओं के सामने नृत्य और गान किया। देवताओं के वर से नया जीवन पाकर गन्धर्व उपबर्हण अपनी पत्नी के साथ पुनः गन्धर्व-नगर में चला गया। सती मालावती ने ब्राह्मणों को करोड़ों रत्न और नाना प्रकार के धन दिये तथा उन सबको भोजन कराया। उनसे वेदपाठ और मंगलकृत्य करवाये। भाँति-भाँति के बड़े-बड़े उत्सव रचाये। उन सब में एकमात्र हरिनाम कीर्तन रूप मंगल कृत्य की प्रधानता रही। देवता अपने-अपने स्थान को चले गये और ब्राह्मण-रूपधारी साक्षात श्रीहरि भी अपने धाम को पधारे।

शौनक! यह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। साथ ही स्तवराज का भी वर्णन किया। जो वैष्णव पुरुष पूजाकाल में इस पुण्यमय स्तोत्र का पाठ करता है, वह श्रीहरि की भक्ति एवं उनके दास्य का सौभाग्य पा लेता है। जो आस्तिक पुरुष वर-प्राप्ति की कामना रखकर उत्तम आस्था और भक्तिभाव से इस स्तोत्र को पढ़ता है, वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी फल को निश्चय ही पाता है।

इस स्तोत्र के पाठ से विद्यार्थी को विद्या का, धनार्थी को धन का, भार्या की इच्छा वाले को भार्या का और पुत्र की कामना वाले को पुत्र का लाभ होता है। धर्म चाहने वाला धर्म और यश की इच्छा वाला यश पाता है। जिसका राज्य छिन गया है, वह राज्य और जिसकी संतान नष्ट हो गयी है, वह संतान पाता है। रोगी रोग से और कैदी बन्धन से मुक्त हो जाता है। भयभीत पुरुष भय से छुटकारा पा जाता है।

जिसका धन नष्ट हो गया है, उसे धन की प्राप्ति होती है। जो विशाल वन में डाकुओं अथवा हिंसक जन्तुओं से घिर गया है, दावानल से दग्ध होने की स्थिति में आ गया है अथवा जल के समुद्र में डूब रहा है, वह भी इस स्तोत्र का पाठ करके विपत्ति से छुटकारा पा जाता है।

 

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