Print Friendly, PDF & Email

मूसलकिसलयम्

तेरहवीं शताब्दी में तमिलनाडु में नम्मालवार नाम के तमिल और संस्कृत के एक महान् साहित्यकार हो चुके हैं । वे बचपन में अनपढ़ रसोइया थे । वे आचार्य और उनके छात्रों के लिये भोजन बनाने का कार्य करते थे । आचार्य थे – पेरिया अचन पिल्लई । एक रोज आचार्य ने उस रसोइये से कहा, ‘नीचे जाकर पता करके बताओ कि इस समय विद्यार्थी क्या पढ़ रहे हैं ?’ विद्यार्थी जानते थे कि यह आदमी निपट निरक्षर है, न इसे अपनी भाषा तमिल आती है, न संस्कृत; अतः उन्होंने उसके साथ हँसी करने का मन बनाया । वे छात्र आचार्य से संस्कृत-ग्रन्थों का अध्ययन करते थे । उनमें से एक छात्र ने शरारतवश रसोइये से कहा ‘हम तो मूसलकिसलयम् पढ़ रहे हैं ।’ तमिल में इस शब्द का अर्थ होता है ‘मूसलों से चोट करना ।’
रसोइये ने छात्र की बात को सत्य मानते हुए जाकर आचार्य को बताया । सुनकर आचार्य भी हँस पड़े । फिर उसे फटकारा और कहा कि तुम बूढ़े हो चले हो, फिर भी मूर्ख ही हो, तुम्हें क्या पता, क्या ‘मूसलकिसलयम्’ भी पढ़ने का विषय है ! रसोइये को यह अपमान गहरे तक असर कर गया । बूढ़ा होने पर भी अगले दिन से उसने भी आचार्य से पढ़ना शुरु कर दिया । तीन वर्ष में वह तमिल और संस्कृत भाषा का प्रकाण्ड पण्डित हो गया । यद्यपि छात्र द्वारा की गयी शरारतपूर्ण घटना उसका उपहास करने के लिये की गयी थी, परन्तु उसी घटना ने उसकी जीवनधारा ही मोड़ दी और उसी प्रेरणादायी घटना की स्मृति में ही उसने जो पहला काव्य-ग्रन्थ रचा, उसका नाम रखा ‘मूसलकिसलयम्’ तमिल ही नहीं, संस्कृत में भी उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे । ‘भगवद् गीताई वेन्दवा’ उनके द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध काव्य-ग्रन्थ है । उन्होंने ‘मणिप्रवालभाव्य’ – जैसा बृहद् ग्रन्थ लिखा, जिसमें बारह हजार छन्द हैं । उन्होंने लगभग तीन सौ ग्रन्थों का प्रणयन कर तमिल साहित्य की श्रीवृद्धि की ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.