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॥ मृत्युञ्जय मन्त्र के भेद ॥

मृत्युञ्जयस्त्रिधा प्रोक्त आद्यो मृत्युञ्जयः स्मृतः ।
मृतसञ्जीवनी चैव महामृत्युञ्जयस्तथा ॥
मृत्युञ्जयः केवलः स्यात् पुटितो व्याहृतित्रयैः ।
तारं त्रिबीजं व्याहृत्य पुटितो मृतसञ्जीवनी ॥
तारं त्रिबीजं व्याहृत्य पुटितैस्तैस्त्र्यम्बकः ।
महामृत्युञ्जयः प्रोक्तः सर्वमन्त्रविशारदैः ॥

उक्त उद्धार मन्त्रों के अनुसार ‘त्र्यम्बक यजामहे..’ ऋचा को आद्य व अन्त में व्याहृति ‘भूर्भुवः स्वः’ से संपुटित करने पर मन्त्र को ‘मृत्युञ्जय’ कहा गया है । त्रिबीज – हौं जूं सः एवं व्याहृति त्रय से संपुटित मन्त्र को ‘मृतसञ्जीवनी’ मंत्र कहा है । इस मृतसञ्जीवनी मन्त्र में त्रिबीज और व्याहृति त्रय के प्रत्येक अक्षर के पहले लगाया जाता है । यही महामृत्युञ्जय मन्त्र कहा है जिसे शुक्राचार्य द्वारा आराधित माना जाता है ।

॥ भेद ॥

१. मृत्युञ्जय मन्त्र :- (४८ अक्षरात्मक)
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः ॐ भुवः ॐ भूः ॥

२. मृतसञ्जीवनी मन्त्र :- (५२ अक्षरात्मक)
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ ॥

कहीं-कहीं हौं रेफ अर्थात् अग्नि तत्व “र” युक्त है अर्थात् ह्रौं जूं सः भी है ।

३. महामृत्युञ्जय मन्त्र :- (६२ अक्षरात्मक ) शुक्राराधित
ॐ हौं ॐ जूं ॐ सः ॐ भूः ॐ र्भुवः ॐ स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः ॐ भुवः ॐ भूः ॐ सः ॐ जूं ॐ हौं ॐ स्वाहा ॥

कहीं-कहीं स्वाहा का प्रयोग नहीं लिखा है अत: जिस मन्त्र के अन्त में स्वाहा नहीं हो वह ६० अक्षर का होगा ।

४. महामृत्युञ्जय मन्त्र :- (५० अक्षरात्मक)
मन्त्र महोदधि में ५० अक्षर का अन्य मन्त्र बताया गया है, उसे ही महामृत्युञ्जय कहा गया है । इस मन्त्र के ऋषि वामदेव कहोल वशिष्ठ ही है ।
ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् भूर्भुवः स्वरों जूं सः हौं ॐ ॥

५. भिन्नपादमृत्युञ्जय
आगम शास्त्रों में मन्त्रों के प्रत्येक पाद के बाद ॐ या ऐं, ह्रीं, श्री, क्लीं कोई भी बीजाक्षर कामनाभेद से लगाकर जपने से श्रेष्ठफल की प्राप्ति कहा है, अर्थात् प्रत्येक पाद के बाद बीजाक्षर लगाने से उसको स्तम्भ रूपी आधार की प्राप्ति होती है एवं मन्त्र स्फुरित होता है । जैसा कि –
भिन्नपादा तु गायत्री ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।
अच्छिन्नपादा तु गायत्री ब्रह्महत्यां प्रयच्छति ॥ .

अर्थात् पादभिन्न बिना गायत्री मन्त्र जपने से ब्रह्महत्या लगती है, वस्तुतः ऐसा अर्थ नहीं समझना चाहिये भावार्थ यह है कि उस साधक (ब्राह्मण) को बहुत न्यून फल मिलता है, परिश्रम व्यर्थ रहता है एवं पादभिन्न करके गायत्री मन्त्र जपने से अधिक फल मिलता है जिससे साधक की कान्ति व ओज बढ़ता है जो ब्रह्म हत्या के प्रभाव को दूर करता है ।

भिन्नपाद मृत्युञ्जय एवं मृत्युञ्जय मन्त्र –
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे ॐ सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
ॐ उर्वारुकमिव बंधनान् ॐ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ ॥

कामना भेद से ॐ की जगह विद्याप्राप्ति हेतु ऐं, लक्ष्मीप्राप्ति हेतु श्रीं, सर्वकामना व ऐश्वर्य हेतु ह्रीं आकर्षण व शत्रुनाश हेतु क्लीं बीजाक्षर लगाये जा सकते है ।

॥ श्रीविद्यार्णव तन्त्रोक्त त्रिपुरसुन्दरी मन्त्रेण भिन्नपाद रुद्रमन्त्राः ॥

१. शिव मन्त्र – (प्रासाद मन्त्र)- ॐ हौं हसकल ह्रीं ह्रीं हसकहल ह्रीं नमः सकल ह्रीं शिवाय ।
विनियोग एवं न्यास :-शिरसि वामदेवाय नमः, मुखे पंक्तिछन्दसे नमः, हृदये श्रीसदाशिवाय देवतायै नमः, गुह्ये हं बीजाय नमः, पादयोः श्रीशक्तये नमः सर्वाने सर्वाभीष्टसिद्धये विनियोगः ।
॥ ध्यानम् ॥
सिन्दूरपुञ्जशोणाङ्गं स्मेरवक्त्रं त्रिलोचनम् ।
मणिमौलि लसच्चन्द्रकलालंकृत मस्तकम् ।।
दक्षिणोर्ध्वकरे टङ्कं दधानं तदधोवरम् ।
वामोर्ध्वहस्ते हरिणं तदधोऽभयमादरात् ॥
पीनवृत्तघनोत्तुङ्गस्तनाग्रे विविवेश्य च ।
वामाङ्के सिनिविष्टायाः प्रियाया रक्तपङ्कजे ।
दधत्या दक्षिणे हस्ते वासिनं रक्तपङ्कजे ।
नानाभरणसंदीप्तं दिव्यगन्धस्त्रगम्बरम् ॥
हां, हीं, हूं, हैं, हौं, हः से करांगन्यास करें ।

२. भिन्नपाद पाशुपतास्त्रमन्त्रः –
ॐ श्लीं हसकलह्रीं पशु हसकहलह्रीं हुं सकल ह्रीं फट् ।
॥ ध्यानम् ॥
पञ्चवक्त्रं दशभुजं प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनम् ।
अग्निज्वालानिभश्मश्रुसंयुतं भीमदंष्टकम् ॥
खङ्गं-बाणनक्षसूत्रं शक्तिं परशुमेव च ।
दधानं दक्षिणैर्हस्तैरुर्ध्वादिक्रमतो गुरुम् ॥
खेटचापौ कुण्डिकां च त्रिशूलं ब्रह्मदण्डयुक् ।
वामहस्तैश्च बिभ्राणां मध्याह्नार्क समप्रभम् ॥ .
नानाभरण सन्दीप्तं पन्नगेन्द्रैरलंकृतम् ।
स्फटिकौघनिभं शान्तं सर्वरक्षाकरं स्मरेत् ॥

विनियोग – इस मन्त्र के वामदेव ऋषि, पंक्तिछन्द एवं पशुपति देवता है ।
न्यास – ॐ हुं फट, श्ली हुं फट, प हुं फट्, शु हुं फट्, हुं हुं फट्, फट् हुं, फट् इन विभागों से करन्यास करें ।
मन्त्र जप में यह भावना रखनी चाहिये कि शिव पशुता (अज्ञानता, जड़ता, भय अंधकार क्लेश एवं दुःख) का नाश करने वाले हैं एवं शिवता (कल्याण) के कारक होकर साधक को अभय प्रदान करते है । इस मन्त्र के प्रयोग से परमन्त्र परतन्त्र प्रयोग एवं महामारी का शमन भी होता है ।

३. भिन्नपाद दक्षिणामूर्तिशिव मन्त्र –
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये तुभ्यं हसकल ही वटमूल निवासने हसकहलह्रीं ध्यानैकनिरताङ्गाय सकलह्रीं नमो रुद्राय शंभवे ह्रीं ॐ ।
विनियोगन्यास –
शिरसि शुकाय ऋषये नमः, मुखे गायत्री छन्दसे नमः, हृदये दक्षिणामूर्तये दैवतायै नमः, गुह्ये ॐ बीजाय नमः, पादयोः ह्रीं शक्तये नमः, सर्वाङ्गे ममाभीष्टसिद्धये विनियोगः ।
॥ ध्यानम् ॥
वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं,
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिरूपं,
जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥

जिस मन्त्र की साधक को दीक्षा प्राप्त नहीं हुई हो वह दक्षिणामूर्तिशिव को सद्गुरु मानकर अपनी तन्त्रसाधना को आगे बढ़ा सकता है ।

४. रुद्रमन्त्र –
“ॐ हसकलह्रीं नमो हसकहलह्रीं भगवते सकलह्रीं रुद्राय” ।
विनियोगन्यास –
शिरसि ब्रह्मणे ऋषये नमः, मुखे विराटछन्दसे नमः, हृदये सदाशिव देवतायै नमः, सर्वाङ्गे ममाभीष्टसिद्धये विनियोगः ।
॥ ध्यानम् ॥
आकीर्ण दिव्यभोगैरमरदितिसुतैरर्चितं शैलकन्या
देहार्धं धारयन्तं स्फटिकमणिनिभं व्याघ्रचर्मोत्तरीयम् ।
द्वैपीं कृत्तिं वसानं हिमकिरणकलाशेखरं नीलकण्ठं
हृष्टं व्याप्तं कलाभिर्धृतकपिलजटं भावयेऽहं महेशम् ॥

५.त्र्यक्षरीमृत्युञ्जयमन्त्र –
ॐ हसकलह्रीं जूं हसकहलह्रीं सः सकलह्रीं ।

विनियोगन्यास – शिरसि कहोलायऋषये नमः, मुखे निवृद्गायत्रीछन्दसे नमः, हृदये श्रीमृत्युञ्जयाय देवतायै नमः, गुह्ये ॐ बीजाय नमः, पादयो सः शक्तये नमः, नाभौ जूं कीलकाय नमः, सर्वाङ्गे ममाभीष्टसिद्धये विनियोगः ।
॥ ध्यानम ॥
शुद्धस्फटिकसंकाशं शुभ्रपद्मासनस्थितम् ।
कपर्दमौलिविलसच्चन्द्व – खण्डाच्युतामृतैः ॥
अभिषिक्त – समस्ताङ्गमर्केद्गनललोचनम् ।
दक्षिणोर्ध्वकरे मुद्रां ज्ञानाख्यं तदधः करे ।
अक्षमालां च वामोर्ध्व पाशं वेदमघः करे ।
दधानं चिन्तये द्देवं मृत्युरोगभयापहम् ॥

६.त्र्यम्बकमृत्युञ्जयमन्त्र –
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे हसकलह्रीं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
हसकहलह्रीं उर्वारुकमिव बंधनान् सकलह्रीं मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

विनियोगन्यास – वशिष्ठर्षये नमः शिरसि । अनष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । त्र्यम्बकपार्वतीपतिर्देवतायै नमः हृदि । त्र्यं बीजाय नमः गुह्ये । बं ॐ शक्तये नमः पादयो । कं कीलकाय नमः नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
कराङ्गन्यास, ध्यान पूर्व में दिये गये है । ३२-३३ अक्षरीय मन्त्र के साथ दिये गये है, वे कर सकते है ।

भिन्नपादमन्त्र में कामराजपूजिता त्रिपुरसुन्दरी से संपुटित करे तो मन्त्र इस प्रकार होगा
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे कएईलह्रीं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
हसकहलह्रीं उर्वारुकमिव बंधनान् सकलह्रीं मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

गायत्री मन्त्र से भिन्नपाद मन्त्र शुक्रोपासिता मृतसञ्जीवनी विद्या में बताया गया है, उसे अवलोकन करें ।

 

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