Print Friendly, PDF & Email

मोहनी शाबर मन्त्र
(१) “फूलर से फूल बसे अदूल फूल में, नरसिंह बसे वाही फूल, फूल कचनार छोड़ह, तिरिया माय-बाप कै, चल हमरा संग। दोहाय महत मानी कै।”
विधिः- अदूल (गुड़हल) फूल की कली पर बारह बार उक्त मन्त्र पढ़ें। जिस पर फेकेंगे, वह वशीभूत होगा।
(२) “मोहन-मोहन क्या करे ? मोहन मेरा नाम। भीत पर तो देवी खड़ी। मोहों सारा गाँव, राजा मोहों, प्रजा मोहों, मोहों गणपत राय। तैंतीस कोटि देवता मोहों। नर लोग कहाँ जायँ ? दुहाई ईश्वर महादेव, गौरा पार्वती, नैना योगिनी, कामरु कमक्षा की।”
विधिः- दशहरे के दिन से नित्य एक माला का जप दस दिन तक करे। जप-काल में घी-गुग्गुल-कपूर से धूनी दे, तो मन्त्र सिद्ध होता है।
‘गोरोचन’ को उक्त मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित कर तिलक लगाएँ। तब जिस व्यक्ति के पास जाएँगे, वह मोहित होगा। ‘फूल’ को अभिमन्त्रित कर जिसे सुँघाया जाएगा, वह मोहित होगा। सभा को मोहित करना हो तो मन्त्र पढ़कर चारों ओर फूँक मारें-सभी मोहित होंगे।

नारी-मोहन
“आ चन्दा की चाँदनी, होकर उन्मादिनी। सतगुरु की है पुकार। मान-मान मानिनी।। तुझे कामाक्षा की आन, छोड़ हठः चीर घटा-पट। आ जा नदी के किनार, गा ले प्रीति रागिनी।। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”
विधिः- किसी पूर्णिमा की रात को नदी के किनारे, एकान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठे। १०८ बार उक्त मन्त्र पढ़कर एक फूल नदी में डाल दे। इस क्रिया से यह मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। फिर जब चाहे, इस मन्त्र से अभिमन्त्रित फूल या रुमाल आदि कोई भी सुहावनी वस्तु, किसी भी युक्ति से, साध्या के हाथ में दे। साध्या मोहित होकर उसकी आज्ञानुवर्तिनी बन जाएगी।

अधिकारी-मोहन
“ॐ नमो प्रजापत्यै नृपति-मन मोहय सर्वं सेद्धय नमः। कामाक्षात अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”
विधिः- शुक्ल पक्ष पँचमी की रात्रि में चनदन-काष्ठ के पीढ़े पर बैठकर उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। जप करते समय श्री कामाक्षा देवी का ध्यान करता रहे, तो यह मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। जिस अधिकारी के गले में उक्त मन्त्र से अभीमन्त्रित फूलों की माला पहनाएँगे, वह मोहित हो जाएगा।

ग्राम-मोहन
“जल-जल-जीवन-दाता जल। जल के राजा कूप, जहाँ बसे वरुण भूप।। दोहाई कामाख्या की, मोहनी चला दे। भूप को फँसा कूप में, माया फैला दे।। तेरी महिमा महान, रख ले सतगुरु की आन।। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”

विधिः- शुक्ल पक्ष एकादशी की अर्ध-रात्रि में किसी कुएँ के पास सवा सेर शक्कर (चीनी) लेकर जाए और पूर्व की ओर मुख कर, उल्लू के पँख पर पाँव रखकर बैठे। १०८ बार उक्त मन्त्र पढ़कर शक्कर को कुएँ में डाल दे। जितने नर-नारी उस कुएँ का जल पिएँगे, सभी जप-कर्त्ता पर मोहित होकर उसकी आज्ञा से प्राण तक देने के लिए सदा तैयार रहेंगे।

सभा मोहन
“गंगा किनार की पीली-पीली माटी। चन्दन के रुप में बिके हाटी-हाटी।। तुझे गंगा की कसम, तुझे कामाक्षा की दोहाई। मान ले सत-गुरु की बात, दिखा दे करामात। खींच जादू का कमान, चला दे मोहन बान। मोहे जन-जन के प्राण, तुझे गंगा की आन। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”

विधिः- जिस दिन सभा को मोहित करना हो, उस दिन उषा-काल में नित्य कर्मों से निवृत्त होकर ‘गंगोट’ (गंगा की मिट्टी) का चन्दन गंगाजल में घिस ले और उसे १०८ बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित करे। फिर श्री कामाक्षा देवी का ध्यान कर उस चन्दन को ललाट (मस्तक) में लगा कर सभा में जाए, तो सभा के सभी लोग जप-कर्त्ता की बातों पर मुग्ध हो जाएँगे।

शत्रु-मोहन
“चन्द्र-शत्रु राहू पर, विष्णु का चले चक्र। भागे भयभीत शत्रु, देखे जब चन्द्र वक्र। दोहाई कामाक्षा देवी की, फूँक-फूँक मोहन-मन्त्र। मोह-मोह-शत्रु मोह, सत्य तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र।। तुझे शंकर की आन, सत-गुरु का कहना मान। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”

विधिः- चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण के समय किसी बारहों मास बहने वाली नदी के किनारे, कमर तक जल में पूर्व की ओर मुख करके खड़ा हो जाए। जब तक ग्रहण लगा रहे, श्री कामाक्षा देवी का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का पाठ करता रहे। ग्रहण मोक्ष होने पर सात डुबकियाँ लगाकर स्नान करे। आठवीं डुबकी लगाकर नदी के जल के भीतर की मिट्टी बाहर निकाले। उस मिट्टी को अपने पास सुरक्षित रखे। जब किसी शत्रु को सम्मोहित करना हो, तब स्नानादि करके उक्त मन्त्र को १०८ बार पढ़कर उसी मिट्टी का चन्दन ललाट पर लगाए और शत्रु के पास जाए। शत्रु इस प्रकार सम्मोहित हो जायेगा कि शत्रुता छोड़कर उसी दिन से उसका सच्चा मित्र बन जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.