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युगलशरणागति-मन्त्र

सारस्वत कल्प से पच्चीसवें कल्प पूर्व की बात है, उस समय नारदजी कश्यपजी के पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे । उस समय भी उनका नाम नारद ही था । एक दिन वे भगवान् श्रीकृष्ण का परम तत्त्व पूछने के लिये कैलास पर्वत पर भगवान् शिव के समीप गये । वहाँ उनके प्रश्न करने पर महादेवजी ने स्वयं जिसका साक्षात्कार किया था, श्रीहरि की नित्य-लीला से सम्बन्ध रखनेवाले उस परम रहस्य का उनसे यथार्थरूप में वर्णन किया । तब नारदजी ने श्रीहरि की नित्य-लीला का दर्शन कराने के लिये भगवान् शङ्कर से पुनः प्रार्थना की ।

तब भगवान् सदाशिव इस प्रकार बोले — ‘गोपीजनवल्लभ-चरणाञ्छरणं प्रपद्ये’ (गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के चरणों की शरण लेता हूँ।) यह मन्त्र है । इस मन्त्र के सुरभि ऋषि, गायत्री छन्द और गोपीवल्लभ भगवान् श्रीकृष्ण देवता कहे गये हैं, ‘प्रपन्नोऽस्मि’ ऐसा कहकर भगवान् की शरणागतिरूप भक्ति प्राप्त करने के लिये इसका विनियोग बताया गया है । विप्रवर ! इसका सिद्धादि-शोधन नहीं होता है । इसके लिये न्यास की कल्पना भी नहीं की गयी है । केवल इस मन्त्र का चिन्तन ही भगवान् की नित्य लीला को तत्काल प्रकाशित कर देता है । गुरु से मन्त्र ग्रहण करके उनमें भक्तिभाव रखते हुए अपने धर्मपालन में संलग्न हो गुरुदेव की अपने ऊपर पूर्ण कृपा समझे और सेवाओं से गुरु को सन्तुष्ट करे । साधुपुरुषों के धर्मों की, जो शरणागतों के भय को दूर करनेवाले हैं, शिक्षा ले । इहलोक और परलोक की चिन्ता छोड़कर उन सिद्धिदायक धर्मों को अपनाये । ‘इहलोक का सुख, भोग और आयु पूर्वकर्मों के अधीन हैं, कर्मानुसार उनकी व्यवस्था भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही करेंगे ।’ ऐसा दृढ़ विचारकर अपने मन और बुद्धि के द्वारा निरन्तर नित्यलीलापरायण श्रीकृष्ण का चिन्तन करे ।

दिव्य अर्चाविग्रहों के रूप में भी भगवान् का अवतार होता है । अतः उन विग्रहों की सेवा-पूजा-द्वारा सदा श्रीकृष्ण की आराधना करे । भगवान् की शरण चाहनेवाले प्रपन्न भक्तों को अनन्यभाव से उनका चिन्तन करना चाहिये और विद्वानों को भगवान् का आश्रय रखकर देह-गेह आदि की ओर से उदासीन रहना चाहिये । गुरु की अवहेलना, साधु-महात्माओं की निन्दा, भगवान् शिव और विष्णु में भेद करना, वेदनिन्दा, भगवन्नाम के बल पर पापाचार करना, भगवन्नाम की महिमा को अर्थवाद समझना, नाम लेने में पाखण्ड फैलाना, आलसी और नास्तिक को भगवन्नाम का उपदेश देना, भगवन्नाम को भूलना अथवा नाम में आदरबुद्धि न होना — ये (दस) बड़े भयानक दोष हैं । वत्स ! इन दोषों को दूर से ही त्याग देना चाहिये । मैं भगवान् की शरण में हूँ, इस भाव से सदा हृदयस्थित श्रीहरि का चिन्तन करे और यह विश्वास रखे कि वे भगवान् ही सदा मेरा पालन करते हैं और करेंगे ।

भगवान् राधा-माधव से यह प्रार्थना करे — ‘राधानाथ ! मैं मन, वाणी और क्रिया द्वारा आपका हूँ । श्रीकृष्णवल्लभे ! मैं तुम्हारा ही हूँ । आप ही दोनों मेरे आश्रय हैं ।’ मुनिश्रेष्ठ ! श्रीहरि के दास, सखा, पिता-माता और प्रेयसियाँ सब-के-सब नित्य हैं; ऐसा महात्मा पुरुषों को चिन्तन करना चाहिये । भगवान् श्यामसुन्दर प्रतिदिन वृन्दावन तथा व्रज में आते-जाते और सखाओं के साथ गौएँ चराते हैं । केवल असुर-विध्वंस की लीला सदा नहीं होती । श्रीहरि के श्रीदामा आदि बारह सखा कहे गये हैं तथा श्रीराधा-रानी की सुशीला आदि बत्तीस सखियाँ बतायी गयी हैं । वत्स ! साधक को चाहिये वह अपने को श्यामसुन्दर की सेवा के सर्वथा अनुरूप समझे और श्रीकृष्ण सेवा-जनित सुख एवं आनन्द से अपने को अत्यन्त संतुष्ट अनुभव करे । प्रात:काल ब्राह्ममुहूर्त से लेकर आधी रात तक समयानुरूप सेवाके द्वारा दोनों प्रिया-प्रियतम की परिचर्या करे । प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर उन युगल सरकार के सहस्र नामों का पाठ भी करे ।

मुनीश्वर ! यह प्रपन्न भक्तों के लिये साधन बताया गया है । यह मैंने तुम्हारे समक्ष गूढ तत्त्व प्रकाशित किया है ।
[नारदपुराण ]

 

 

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