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विजया-दशमी
‘आश्विन शुक्ल पक्ष’ की दशमी को ‘विजया-दशमी’ का पर्व होता है। ‘ज्योतिर्निबन्ध ‘ में लिखा है कि
‘आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये ।
स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥’ Indian_Roller
आश्विन शुक्ल दशमी के सायंकालमें तारा उदय होनेके समय ‘विजयकाल’ रहता है । वह सब कामोंको सिद्ध करता है । आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवणयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है । इस दिन सूर्य-पुत्र “रेवन्त” का प्रातः-काल स्मरण-पूजन करने से वर्ष भर सुख की प्राप्ति होती है। घोड़े पर सवार, दोनों हाथों में खड्ग और ढाल लिए भगवान् ‘रेवन्त’ का स्मरण-पूजन निम्न मन्त्र से करना चाहिए –
ॐ नमस्ते सूर्य-पुत्राय, तुरंगानां हिताय च, शान्तिं कुरु तुरंगानां, रेवन्ताय नमो नमः ।
ॐ गन्धर्व-कुल-जातः त्वं, भू-पालाय च केशव, ब्रह्मणस्तत्त्व-बाह्येन, सोमस्य वरुणस्य च ।
ॐ तेजसा चैव सूर्यस्य, स्व-लीला ते पदा तथा, रुद्रस्य ब्रह्मचर्यस्य, पवनस्य बलेन च ।

विजयदशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन कर उसके पत्तों का आदान-प्रदान करना तथा नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ माना जाता है।

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