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विपरीत-प्रत्यंगिरा महा-विद्या स्तोत्र
बहुत से व्यक्ति प्रेत, यक्ष, राक्षस, दानव, दैत्य, मरी-मसान, शंकिनी, डंकिनी बाधाओं तथा दूसरे के द्वारा या अपने द्वारा किए गए प्रयोगों के फल-स्वरुप पीड़ित रहते हैं। इन सबकी शान्ति हेतु यहाँ भैरव-तन्त्रोक्त ‘विपरीत-प्रत्यंगिरा’ की विधि प्रस्तुत है।
पीड़ित व्यक्ति या प्रयोग-कर्ता गेरुवा लंगोट पहन कर एक कच्चा बिल्व-फल अपने तथा एक पीड़ित व्यक्ति के पास रखे। रात्रि में सोने से पूर्व पीड़ित व्यक्ति की चारपाई पर चारों ओर इत्र का फाहा लगाए। रात्रि को १०८ या कम से कम १५ पाठ सात दिन तक करे। नित्य गो-घृत या घृत-खाण्ड (लाल शक्कर), घृत, पक्वान्न, बिल्व-पत्र, दूर्वा, जाउरि (गुड़ की खीर) से हवन करे। सात ब्राह्मणों या कुमारियों को भोजन प्रतिदिन करावे। यदि भोजन कराने में असमर्थ हो, तो कुमारियों को थोड़े बताशे तथा दक्षिणा प्रतिदिन दे। बिल्व-फल जब काला पड़ जाये, तो दूसरा हरा बिल्व-फल ले ले। फल को लाल कपड़े में लपेटकर रखे।
“वक्र-तुण्ड महा-काय, कोटि-सूर्य-सम-प्रभं! अविघ्नं कुरु मे देव! सर्व-कार्येषु सर्वदा।।”
उक्त श्लोक को पढ़कर भगवान् गणेश को नमन करे। फिर पाठ करे-
ब्राह्मी मां पूर्चतः पातु, वह्नौ नारायणी तथा। माहेश्वरी च दक्षिणे, नैऋत्यां चण्डिकाऽवतु।।
पश्चिमेऽवतु कौमारी, वायव्ये चापराजिता। वाराही चोत्तरे पातु, ईशाने नारसिंहिका।।
प्रभाते भैरवी पातु, मध्याह्ने योगिनी क्रमात्। सायं मां वटुकः पातु, अर्ध-रात्रौ शिवोऽवतु।।
निशान्ते सर्वगा पातु, सर्वदा चक्र-नायिका।
ॐ क्षौं ॐ ॐ ॐ हं हं हं यां रां लां खां रां रां क्षां ॐ ऐं ॐ ह्रीं रां रां मम रक्षां कुरु ॐ ह्रां ह्रं ॐ सः ह्रं ॐ क्ष्रीं रां रां रां यां सां ॐ वं यं रक्षां कुरु कुरु। ॐ नमो विपरित-प्रत्यंगिरायै विद्या-राज्ञो त्रैलोक्य-वशंकरी तुष्टि-पुष्टि-करी, सर्व-पीड़ापहारिणी, सर्व-रक्षा-करी, सर्व-भय-विनाशिनी। सर्व-मंगल-मंगला-शिवा सर्वार्थ-साधिनी। वेदना पर-शस्त्रास्त्र-भेदिनी, स्फोटिनी, पर-तन्त्र पर-मन्त्र विष-चूर्ण सर्व-प्रयोगादीनामभ्युपासितं, यत् कृतं कारितं वा, तन्मस्तक-पातिनी, सर्व-हिंसाऽऽकर्षिणी, अहितानां च नाशिनी दुष्ट-सत्वानां नाशिनी। यः करोति यत्-किञ्चित् करिष्यति निरुपकं कारयति। तन्नाशयति, यत् कर्मणा मनसा वाचा, देवासुर-राक्षसाः तिर्यक् प्रेत-हिंसका, विरुपकं कुर्वन्ति, मम मन्त्र, यन्त्र, विष-चूर्ण, सर्व-प्रयोगादीनात्म-हस्तेन, पर-हस्तेन। यः करोति करिष्यति कारियिष्यति वा, तानि सर्वाणि, अन्येषां निरुपकानां तस्मै च निवर्तय पतन्ति, तस्मस्तकोपरि।
।।भैरव-तन्त्रान्तर्गत विपरित-प्रत्यंगिरा महा-विद्या स्तोत्रम्।।

One comment on “विपरीत-प्रत्यंगिरा महा-विद्या स्तोत्र

  • aachary ji pranam
    is prayog me bilvfal ko sat din hi rakhna hai
    ya iske aage ke din bhi rakhna padega sat din baad bilvfal ka kya karna hai bilvfal ko nity pooja sthan par rakhna hai fir apne paas ya rogi ke pass rakhna hai

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