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॥ वृन्दावन-महिमा ॥

वृन्दाटवी सहजवीतसमस्तदोषा दोषाकरानपि गुणाकरतां नयन्ती ।
पोषाय मे सकलधर्मबहिष्कृतस्य शोषाय दुस्तरमहाघचयस्य भूयात् ॥

वृन्दाटवी बहुभवीयसुपुण्यपुञ्जान्नेत्रातिथीभवति यस्य महामहिम्नः ।
तस्येश्वरः सकलकर्म मृषा करोति ब्रह्मादयस्तमतिभक्तियुता नमन्ति ॥

वृन्दावने सकलपावनपावनेऽस्मिन् सर्वोत्तमोत्तमचरस्थिरसत्त्वजातौ ।
श्रीराधिकारमणभक्तिरसैककोशे तोषेन नित्यपरमेन कदा वसामि ॥

वृन्दावने स्थिरचराखिलसत्त्ववृन्दानन्दाम्बुधिस्नपनदिव्यमहाप्रभावे ।
भावेन केनचिदिहामृति ये वसन्ति ते सन्ति सर्वपरवैष्णवलोकमूर्ध्नि ॥

श्रीवृन्दावनधाम स्वाभाविक ही समस्त दोषों से मुक्त है; यही नहीं, वह दोष-कोषों को भी गुणागार बना देने की सामर्थ्य रखता है । यद्यपि सब प्रकार के धर्मों ने मेरा बहिष्कार कर दिया है — मुझसे नाता तोड़ लिया है, फिर भी मैं आशा करता हूँ कि मेरा वह सब प्रकार से पोषण करेगा और मेरे दुस्तर महापातक-समुद्र को शीघ्र ही सुखा डालेगा । अनेक जन्मों की महान् पुण्य-राशि जब फलीभूत होती है, तभी श्रीवृन्दावनधाम के दर्शन होते हैं । किंतु जिस महाभाग्यवान् पुरुष को श्रीवृन्दावनधाम के दर्शन हो जाते हैं, कर्मफल-दाता ईश्वर उसके सारे संचित कर्मो को विफल कर देते हैं और ब्रह्मादिक भी अत्यन्त भक्तियुक्त होकर उसे नमन करते हैं । संसार में जितनी भी पवित्र करनेवाली वस्तुएँ हैं, श्रीवृन्दावनधाम उन सबको भी पवित्र करनेवाला है । चराचर जितने भी जीव श्रीवृन्दावनधाम में रहते हैं, वे संसार के समस्त जीवों में श्रेष्ठतम हैं । श्रीराधिका-रमण श्रीव्रजेन्द्रनन्दन के भक्ति-रस का तो यह भण्डार ही है । अहा ! वह समय कब होगा, जब परम सन्तोषपूर्वक मैं नित्य इस वृन्दावन-भूमि में निवास करूँगा ? इस वृन्दावनधाम का ऐसा अलौकिक प्रभाव है कि इसमें निवास करनेवाले चराचर समस्त जीव-समूह आनन्द-समुद्र में गोता लगाने लगते हैं । जो कोई भी किसी भी भाव से मृत्युपर्यन्त यहाँ रह जाते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ वैष्णवधाम के मुकुटमणि बन जाते हैं ।
[ श्रीप्रबोधानन्दसरस्वतीप्रणीत ‘श्रीवृन्दावनमहिमामृत’ से]

 

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