शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [चतुर्थ-कुमारखण्ड] – अध्याय 02
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
दूसरा अध्याय
भगवान् शिव के तेज से स्कन्द का प्रादुर्भाव और सर्वत्र महान् आनन्दोत्सव का होना

ब्रह्माजी बोले — देवताओं एवं विष्णु की स्तुति सुनकर योगज्ञानविशारद भगवान् शंकर यद्यपि निष्काम हैं तथापि उन्होंने भोग का परित्याग नहीं किया । फिर वे भक्तवत्सल शंकर दैत्य से पीड़ित हुए देवताओं के समीप घर के दरवाजे पर आये ॥ १-२ ॥ उस समय मुझ ब्रह्मा तथा विष्णु के साथ देवगण भक्तवत्सल प्रभु शिव का दर्शन कर अत्यन्त सुखी हुए ॥ ३ ॥

शिवमहापुराण

उन देवताओं का पूर्वोक्त वचन सुनकर दुखी आत्मावाले भगवान् शंकर ने उद्विग्नमन होकर उत्तर दिया ॥ ४ ॥ देवताओं ने सिर झुकाकर परम स्नेहपूर्वक शंकर को प्रणाम किया और हे मुने ! मुझ ब्रह्मा तथा विष्णु के साथ सभी देवताओं ने शंकर की स्तुति की ॥ ५ ॥

देवता बोले — हे देवदेव ! हे महादेव ! हे करुणासागर प्रभो ! आप सबके अन्तर्यामी हैं, हे शंकर ! आप सब कुछ जानते हैं । हे विभो ! हम देवताओं का कार्य कीजिये । हे महेश्वर ! देवताओं की रक्षा कीजिये तथा हे महाप्रभो ! कृपा करके तारकादि असुरों का विनाश कीजिये ॥ ६-७ ॥

शिव बोले — हे विष्णो ! हे विधाता ! हे देवो ! मैं आप सबके मन का अभिप्राय जान रहा हूँ, किंतु जो होना है, वह होता ही है, भावी का निवारण करनेवाला कोई नहीं है ॥ ८ ॥ हे देवो ! जो होना था, वह तो हो गया, अब जो उपस्थित है, उसके विषय में सुनिये । मुझ शिव के स्खलित इस तेज को इस समय कौन धारण करेगा ? ॥ ९ ॥

‘जिसे धारण करना हो, वह धारण करे’ — इस प्रकार कहकर शंकरजी मौन हो गये । तब देवताओं से प्रेरणा प्राप्त अग्नि ने कपोत होकर अपनी चोंच से शंकर के पृथ्वी पर गिरे समस्त तेज को ग्रहण कर लिया । हे नारद ! इसी समय शिव के आगमन में विलम्ब देखकर वहाँ पर भगवती गिरिजा आकर उपस्थित हो गयीं । उन्होंने देवताओं को देखा । वहाँ का वह सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर पार्वती महाक्रोधित हो गयीं । तब उन्होंने विष्णुप्रभृति सभी देवताओं से क्रोध में भरकर कहा — ॥ १०-१३ ॥

देवी बोलीं — हे देवगणो ! तुमलोग बड़े दुष्ट हो, तुम हमेशा अपने स्वार्थ-साधन में लगे रहते हो और अपने स्वार्थ साधन के निमित्त दूसरों को कष्ट देते हो ॥ १४ ॥ तुम लोगों ने अपने स्वार्थ के लिये परमप्रभु शिव की स्तुति कर मेरा विहार भंग किया, हे देवो ! इसी कारण मैं वन्ध्या हो गयी । हे देवताओ ! मेरा विरोध करने से तुम देवताओं को कभी सुख प्राप्त नहीं होगा और तुम दुष्ट देवताओं को इसी प्रकार महादुःख प्राप्त होगा ॥ १५-१६ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार क्रोध से जलती हुई शैलपुत्री पार्वती ने विष्णुप्रभृति सभी देवगणों को शाप दिया ॥ १७ ॥

पार्वती बोलीं — आज से सब देवताओं की स्त्रियाँ वन्ध्या हो जायँ और मेरा विरोध करनेवाले सभी देवगण सर्वदा दुःख प्राप्त करें ॥ १८ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार सर्वेश्वरी भगवती पार्वती ने विष्णुप्रभृति देवगणों को शाप देकर क्रोधपूर्ण हो शिव के तेज का भक्षण करनेवाले अग्नि से कहा — ॥ १९ ॥

पार्वती बोलीं — हे अग्ने ! आज से तुम सर्वभक्षी होकर सदैव दुःख प्राप्त करोगे । तुम्हें शिवतत्त्व का ज्ञान नहीं है । तुम देवगणों का कार्य करनेवाले मूर्ख हो ॥ २० ॥ हे शठ ! हे दुष्टों में महादुष्ट ! तुम बड़े दुर्बुद्धि हो, तुमने जो शिव के तेज का भक्षण किया है, यह अच्छा नहीं किया ॥ २१ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! इस प्रकार अग्नि को शाप देकर असन्तुष्ट होकर भगवती पार्वती भगवान् महेश्वर के साथ शीघ्रतापूर्वक अपने आवास में चली गयीं ॥ २२ ॥ हे मुनीश्वर ! वहाँ जाकर पार्वती ने प्रयत्नपूर्वक भली-भाँति शंकरजी को समझाया, फिर उनके सर्वश्रेष्ठ गणेश नामक पुत्र उत्पन्न हुए । हे मुने ! इन गणेशजी का सम्पूर्ण वृत्तान्त मैं आगे कहूँगा । इस समय आप प्रेमपूर्वक कार्तिकेय की उत्पत्ति का वृत्तान्त सुनिये, मैं कह रहा हूँ ॥ २३-२४ ॥

देवता लोग अग्नि के मुख से ही भोजन करते हैं — ऐसा वेद का वचन है, अतः अग्नि के गर्भधारण करने से सभी देवता गर्भयुक्त हो गये ॥ २५ ॥ शिव के तेज को सहन न करते हुए वे देवता पीड़ित हो गये । यही दशा विष्णु आदि देवताओं की भी हो गयी; क्योंकि देवी पार्वती की आज्ञा से उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी ॥ २६ ॥

इसके बाद विष्णुप्रभृति सभी देवता मोहित होकर [शिव के वीर्यरूप अग्नि से] जलते हुए शीघ्र ही पार्वतीपति भगवान् शंकर की शरण में गये । वे लोग शिवजी के गृहद्वार पर जाकर नम्रता से हाथ जोड़ अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पार्वतीसहित भगवान् की स्तुति करने लगे ॥ २७-२८ ॥

देवता बोले — हे देवदेव ! हे महादेव ! हे गिरिजेश ! हे महाप्रभो ! हे नाथ ! यह क्या हो गया ? निश्चय ही आपकी माया को समझना बड़ा कठिन है ॥ २९ ॥ हमलोग गर्भयुक्त होकर आपकी असह्य वीर्यज्वाला से जल रहे हैं, हे शम्भो ! कृपा कीजिये और हमलोगों की दुरवस्था का निवारण कीजिये ॥ ३० ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! देवताओं की इस प्रकार की स्तुति सुनकर उमापति परमेश्वर शिव गृहद्वार पर जहाँ देवता स्थित थे, वहाँ शीघ्र आये ॥ ३१ ॥ द्वार पर आये हुए सदाशिव को देखते ही विष्णुसमेत सभी देवगण विनम्र होकर प्रणामकर उन भक्तवत्सल की प्रेमपूर्वक स्तुति करने लगे ॥ ३२ ॥

देवता बोले — हे शम्भो ! हे शिव ! हे महादेव ! आपको विशेष रूप से प्रणाम करते हैं । आपके तेज से जलते हुए हम शरणागतों की रक्षा कीजिये ॥ ३३ ॥ हे हर ! इस दुःख का हरण कीजिये, अन्यथा हमलोग निश्चित ही मर जायँगे । इस समय देवताओं के दुःख का निवारण करने में आपके बिना कौन समर्थ है ? ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले — भक्तवत्सल, सुरेश्वर भगवान् शिव ने ऐसी दीनवाणी को सुनकर हँसते हुए देवताओं को उत्तर दिया ॥ ३५ ॥

शिव बोले — हे हरे ! हे ब्रह्मन् ! हे देवो ! आप सभी मेरी बात सुनें । आपलोग आज ही सुखी हो जायँगे, सावधान हो जायँ । सभी देवगण मेरे तेज का शीघ्र ही वमन कर दें । मुझ सुप्रभु की आज्ञा मानने से आपलोगों को विशेष सुख होगा ॥ ३६-३७ ॥

ब्रह्माजी बोले — विष्णु आदि सभी देवताओं ने इस आज्ञा को शिरोधार्य करके अव्यय भगवान् शिव का स्मरण करते हुए शीघ्र ही तेज का वमन कर दिया ॥ ३८ ॥ शम्भु का स्वर्णिम आभावाला, अद्भुत तथा सुन्दर कान्तिवाला वह तेज भूमि पर गिरकर पर्वताकार हो गया और अन्तरिक्ष का स्पर्श करने लगा ॥ ३९ ॥ श्रीहरिसहित सभी देवगण सुखी हो गये और भक्तवत्सल परमेश्वर शिव की स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥

हे मुनीश्वर ! किंतु अग्निदेव वहाँ प्रसन्न नहीं हुए । तब परमेश्वर श्रेष्ठ शंकर ने उन्हें आज्ञा दी ॥ ४१ ॥ हे मुने ! तदनन्तर वे अग्निदेव मन में सुख न मानकर विकल हो हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक शिव की स्तुति करते हुए इस प्रकार बोले — ॥ ४२ ॥

अग्नि बोले — देवाधिदेव महेश्वर ! मैं मूर्ख हूँ तथापि आपका सेवक हूँ, मेरे अपराध को क्षमा करें और मेरे दाह का निवारण करें । हे स्वामिन् ! आप दीनवत्सल परमेश्वर सदाशिव हैं । इस प्रकार से प्रसन्नात्मा अग्निदेव ने दीनवत्सल शिव से कहा ॥ ४३-४४ ॥

ब्रह्माजी बोले — अग्नि की यह बात सुनकर दीनवत्सल उन परमेशान सदाशिव ने प्रसन्न होकर अग्नि से इस प्रकार कहा — ॥ ४५ ॥

शिव बोले — [हे अग्नि!] पाप की अधिकता के कारण ही तुमने यह अनुचित कार्य किया कि मेरे तेज का भक्षण कर लिया, अब मेरी आज्ञा से तुम्हारे दाह का निवारण हो गया । हे अग्ने ! अब तुम मेरी शरण में आ गये हो, इससे मैं प्रसन्न हुआ । अब तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जायगा और तुम सुखी हो जाओगे ॥ ४६-४७ ॥ अब तुम किसी सुलक्षणा स्त्री में मेरे रेत को प्रयत्नपूर्वक स्थापित करो । इससे तुम दाहमुक्त होकर विशेष रूप से सुखी हो जाओगे ॥ ४८ ॥

ब्रह्माजी बोले — भगवान् शंकर की बात को सुनकर अग्नि हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर प्रीतिपूर्वक भक्तों के कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर से धीरे-धीरे बोले — ॥ ४९ ॥

हे महेश्वर ! हे नाथ ! आपका यह तेज असह्य है । शक्तिस्वरूपा भगवती के अतिरिक्त तीनों लोकों में इसे धारण करने में कोई समर्थ नहीं है ॥ ५० ॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! अग्नि ने जब ऐसा कहा, तब हृदय से अग्नि का उपकार चाहनेवाले आपने भगवान शंकर की प्रेरणा से इस प्रकार कहा — ॥ ५१ ॥

नारदजी बोले — हे अग्ने ! तुम्हारे दाह का निवारण करनेवाला, कल्याणकारी, परम आनन्ददायक, रमणीय तथा सभी कष्टों का निवारण करनेवाला मेरा वचन सुनो ॥ ५२ ॥ हे वह्ने ! मेरे द्वारा बतलाये जानेवाले इस उपाय को करके दाहरहित होकर सुखी हो जाओ । हे तात ! भगवान् शिव की इच्छा से ही मैंने आदरपूर्वक भली-भाँति कहा है ॥ ५३ ॥ हे शुचे ! माघमास में प्रातःकाल जो स्त्रियाँ स्नान करती हों, इस महान् तेज को तुम उनके शरीर में स्थापित कर दो ॥ ५४ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! उसी अवसर पर माघमास में प्रातःकाल नियमपूर्वक स्नान करने की इच्छा से सप्तर्षियों की स्त्रियाँ वहाँ आयीं ॥ ५५ ॥ हे मुने ! स्नान करके वे स्त्रियाँ अत्यन्त ठण्ढ से पीड़ित हो गयीं और उनमें से छः स्त्रियाँ अग्निज्वाला के समीप जाने की इच्छा से वहाँ से चल पड़ीं ॥ ५६ ॥ उन्हें मोहित देखकर सुचरित्रा, ज्ञानवती देवी अरुन्धती ने शिव की आज्ञा से उन्हें जाने से विशेषरूप से रोका ॥ ५७ ॥ हे मुने ! भगवान् शिव की माया से मोहित वे छः ऋषिपत्नियाँ अपने शीत का निवारण करने के लिये हठपूर्वक वहाँ जा पहुँचीं ॥ ५८ ॥ हे मुने ! [अग्नि के द्वारा गृहीत] उस रेत के सभी कण रोमकूपों के द्वारा शीघ्र ही उन ऋषिपत्नियों के देहों में प्रविष्ट हो गये और वे अग्नि दाह से मुक्त हो गये ॥ ५९ ॥

अग्नि अन्तर्धान होकर ज्वालारूप से शीघ्र ही उन भगवान् शंकर और आपका मन से स्मरण करते हुए सुखपूर्वक अपने लोक को चले गये ॥ ६० ॥ हे साधो ! वे स्त्रियाँ अग्नि के द्वारा दाह से पीड़ित और गर्भवती हो गयीं । हे तात ! अरुन्धती दुखी होकर अपने आश्रम को चली गयीं ॥ ६१ ॥ हे तात ! अपनी स्त्रियों की गर्भावस्था देखकर उनके पति तुरंत क्रोध से व्याकुल हो गये और परस्पर भली-भाँति विचार-विमर्श करके उन्होंने अपनी पत्नियों का त्याग कर दिया ॥ ६२ ॥ हे तात ! वे छहों ऋषिपत्नियाँ अपनी गर्भावस्था का विचार करके अत्यन्त दुःखित और व्याकुल चित्तवाली हो गयीं ॥ ६३ ॥

उन मुनिपत्नियों ने शिव के उस गर्भरूप तेज को हिमशिखर पर त्याग दिया और वे दाहरहित हो गयीं ॥ ६४ ॥ भगवान् शिव के उस असहनीय तेज को धारण करने में असमर्थ होने के कारण हिमालय प्रकम्पित हो उठे और दाह से पीड़ित होकर उन्होंने शीघ्र ही उस तेज को गंगा में विसर्जित कर दिया ॥ ६५ ॥ हे मुनीश्वर ! गंगा ने भी परमात्मा के उस दुःसह तेज को अपनी तरंगों के द्वारा सरकण्डों के समूह में स्थापित कर दिया ॥ ६६ ॥

वहाँ गिरा हुआ वह तेज शीघ्र ही एक सुन्दर, सौभाग्यशाली, शोभायुक्त, तेजस्वी और प्रीति को बढ़ानेवाले बालक के रूप में परिणत हो गया ॥ ६७ ॥ हे मुनीश्वर ! मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को उस शिवपुत्र का पृथ्वी पर प्रादुर्भाव हुआ ॥ ६८ ॥ हे ब्रह्मन् ! इस अवसर पर अपने कैलास पर्वत पर हिमालयपुत्री पार्वती तथा भगवान् शंकर भी अकस्मात् आनन्दित हो उठे ॥ ६९ ॥ हे मुने ! भगवती पार्वती के स्तनों से आनन्दातिरेक के कारण दुग्धस्राव होने लगा । वहाँ जाकर सबको अत्यन्त प्रसन्नता हुई ॥ ७० ॥

हे तात ! त्रिलोकी में सभी सज्जनों के यहाँ अत्यन्त सुख देनेवाला मांगलिक वातावरण हो गया । दुष्ट दैत्यों के यहाँ विशेष रूप से विघ्न होने लगे ॥ ७१ ॥ हे नारद ! अकस्मात् अन्तरिक्ष में महान् दुन्दुभिनाद होने लगा और उस बालक पर पुष्पों की वर्षा होने लगी ॥ ७२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! विष्णु आदि सभी देवताओं को अकस्मात् परम आनन्द हुआ और महान् उत्सव भी होने लगा ॥ ७३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के चतुर्थ कुमारखण्ड में शिवपुत्रजननवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

 

 

 

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