शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 02
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
दूसरा अध्याय
तारकपुत्रों से पीड़ित देवताओं का ब्रह्माजी के पास जाना और उनके परामर्श के अनुसार असुर-वध के लिये भगवान् शंकर की स्तुति करना

व्यासजी बोले — हे ब्रह्मपुत्र ! हे महाप्राज्ञ ! हे वक्ताओं में श्रेष्ठ ! अब मुझे बताइये कि उसके बाद क्या हुआ और देवगण किस प्रकार सुखी हुए ? ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — महाबुद्धिमान् व्यासजी का यह वचन सुनकर शिवजी के चरणकमलों का स्मरण करके सनत्कुमारजी ने कहा — ॥ २ ॥

शिवमहापुराण

सनत्कुमार बोले — तब उनके तेज से दग्ध हुए इन्द्रादि देवता दुखी हो परस्पर मन्त्रणाकर ब्रह्माजी की शरण में गये ॥ ३ ॥ वे सभी निस्तेज देवता प्रीतिपूर्वक पितामह को प्रणाम करके अवसर देखकर उनसे अपना दुःख कहने लगे ॥ ४ ॥

देवता बोले — हे विधाता ! तारकपुत्रोंसहित त्रिपुरनाथ मय के द्वारा सभी देवता अत्यधिक पीड़ित किये जा रहे हैं । इसलिये हे ब्रह्मन् ! हमलोग दुखी होकर आपकी शरण में आये हैं; आप उनके वध का कोई उपाय कीजिये, जिससे हमलोग सुखी हो जायें ॥ ५-६ ॥

सनत्कुमार बोले — देवगणों के इस प्रकार कहने पर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी मय से डरे हुए उन समस्त देवताओं से हँसकर कहने लगे — ॥ ७ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे देवताओ ! आपलोग उन दैत्यों से बिलकुल मत डरिये, मैं उनके वध का उपाय बता रहा हूँ; शिवजी कल्याण करेंगे । मैंने ही इस दैत्य को बढ़ाया है, अतः मेरे हाथों इसका वध होना उचित नहीं है और इस समय त्रिपुर के नगर में निरन्तर पुण्य बढ़ ही रहा है ॥ ८-९ ॥ अतः इन्द्रसहित सभी देवता शिवजी से प्रार्थना करें । यदि वे सर्वाधीश प्रसन्न हो जायँ, तो आपलोगों के कार्य को पूर्ण करेंगे ॥ १० ॥

सनत्कुमार बोले — तब ब्रह्माजी की बात सुनकर इन्द्रसहित सभी देवता दुखी होकर वहाँ गये, जहाँ शिवजी थे । हाथ जोड़कर बड़ी भक्ति से देवेश को प्रणाम करके सिर झुकाकर वे सब लोककल्याणकारी शंकर की स्तुति करने लगे — ॥ ११-१२ ॥

॥ देवा ऊचुः ॥
नमो हिरण्यगर्भाय सर्वसृष्टि विधायिने ।
नमः स्थितिकृते तुभ्यं विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ १३ ॥
नमो हरस्वरूपाय भूतसंहारकारिणे ।
निर्गुणाय नमस्तुभ्यं शिवायामित तेजसे ॥ १४ ॥
अवस्थारहितायाथ निर्विकाराय वर्चसे ।
महाभूतात्मभूताय निर्लिप्ताय महात्मने ॥ १५ ॥
नमस्ते भूतपतये महाभारसहिष्णवे ।
तृष्णाहराय निर्वैराकृतये भूरितेजसे ॥ १६ ॥
महादैत्यमहारण्यनाशिने दाववह्नये ।
दैत्यद्रुमकुठाराय नमस्ते शूलपाणये ॥ १७ ॥
महादनुजनाशाय नमस्ते परमेश्वर ।
अम्बिकापतये तुभ्यं नमस्सर्वास्त्रधारक ॥ १८ ॥
नमस्ते पार्वतीनाथ परमात्मन्महेश्वर ।
नीलकंठाय रुद्राय नमस्ते रुद्ररूपिणे ॥ १९ ॥
नमो वेदान्तवेद्याय मार्गातीताय ते नमः ।
नमोगुणस्वरूपाय गुणिने गुणवर्जिते ॥ २० ॥
महादेव नमस्तुभ्यं त्रिलोकीनन्दनाय च ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय वासुदेवाय ते नमः ॥ २१ ॥
संकर्षणाय देवाय नमस्ते कंसनाशिने ।
चाणूरमर्दिने तुभ्यं दामोदर विषादिने ॥ २२ ॥
हृषीकेशाच्युत विभो मृड शंकर ते नमः ।
अधोक्षज गजाराते कामारे विषभक्षणः ॥ २३ ॥
नारायणाय देवाय नारायणपराय च ।
नारायणस्वरूपाय नाराणयतनूद्भव ॥ २४ ॥
नमस्ते सर्वरूपाय महानरकहारिणे ।
पापापहारिणे तुभ्यं नमो वृषभवाहन ॥ २५ ॥
क्षणादिकालरूपाय स्वभक्तबलदायिने ।
नानारूपाय रूपाय दैत्यचक्रविमर्दिने ॥ २६ ॥
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
सहस्रमूर्त्तये तुभ्यं सहस्रावयवाय च ॥ २७ ॥
धर्मरूपाय सत्त्वाय नमस्सत्त्वात्मने हर ।
वेदवेद्यस्वरूपाय नमो वेदप्रियाय च ॥ २८ ॥
नमो वेदस्वरूपाय वेदवक्त्रे नमो नमः ।
सदाचाराध्वगम्याय सदाचाराध्वगामिने ॥ २९ ॥
विष्टरश्रवसे तुभ्यं नमस्सत्यमयाय च ।
सत्यप्रियाय सत्याय सत्यगम्याय ते नमः ॥ ३० ॥
नमस्ते मायिने तुभ्यं मायाधीशाय वै नमः ।
ब्रह्मगाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे ब्रह्मजाय च ॥ ३१ ॥
तपसे ते नमस्त्वीश तपसा फलदायिने ।
स्तुत्याय स्तुतये नित्यं स्तुतिसंप्रीतचेतसे ॥ ३२ ॥
श्रुत्याचारप्रसन्नाय स्तुत्याचारप्रियाय च ।
चतुर्विधस्वरूपाय जलस्थलजरूपिणे ॥ ३३ ॥
सर्वे देवादयो नाथ श्रेष्ठत्वेन विभूतयः ।
देवानामिन्द्ररूपोऽसि ग्रहाणां त्वं रविर्मतः ॥ ३४ ॥
सत्यलोकोऽसि लोकानां सरितां द्युसरिद्भवान् ।
श्वेतवर्णोऽसि वर्णानां सरसां मानसं सरः ॥ ३५ ॥
शैलानां गिरिजातातः कामधुक्त्वं च गोषु ह ।
क्षीरोदधिस्तु सिन्धूनां धातूनां हाटको भवान् ॥ ३६ ॥
वर्णानां ब्राह्मणोऽसि त्वं नृणां राजासि शंकर ।
मुक्तिक्षेत्रेषु काशी त्वं तीर्थानां तीर्थराड् भवान् ॥ ३७ ॥
उपलेषु समस्तेषु स्फटिकस्त्वं महेश्वर ।
कमलस्त्वं प्रसूनेषु शैलेषु हिमवांस्तथा ॥ ३८ ॥
भवान्वाग्व्यवहारेषु भार्गवस्त्वं कविष्वपि ।
पक्षिष्वेवासि शरभः सिंहो हिंस्रेषु संमतः ॥ ३९ ॥
शालग्रामशिला च त्वं शिलासु वृषभध्वज ।
पूज्य रूपेषु सर्वेषु नर्मदालिंगमेव हि ॥ ४० ॥
नन्दीश्वरोऽसि पशुषु वृषभः परमेश्वर ।
वेदेषूपनिषद्रूपी यज्वनां शीतभानुमान् ॥ ४१ ॥
प्रतापिनां पावकस्त्वं शैवानामच्युतो भवान् ।
भारतं त्वं पुराणानां मकारोऽस्यक्षरेषु च ॥ ४२ ॥
प्रणवो बीजमंत्राणां दारुणानां विषं भवान् ।
व्योमव्यप्तिमतां त्वं वै परमात्मासि चात्मनाम् ॥ ४३ ॥
इन्द्रियाणां मनश्च त्वं दानानामभयं भवान् ।
पावनानां जलं चासि जीवनानां तथामृतम् ॥ ४४ ॥
लाभानां पुत्रलाभोऽसि वायुर्वेगवतामसि ।
नित्यकर्मसु सर्वेषु संध्योपास्तिर्भवान्मता ॥ ४५ ॥
क्रतूनामश्वमेधोऽसि युगानां प्रथमो युगः ।
पुष्यस्त्वं सर्वधिण्यानाममावास्या तिथिष्वसि ॥ ४६ ॥
सर्वर्तुषु वसंतस्त्वं सर्वपर्वसु संक्रमः ।
कुशोऽसि तृणजातीनां स्थूलवृक्षेषु वै वटः ॥ ४७ ॥
योगेषु च व्यतीपातस्सोमवल्ली लतासु च ।
बुद्धीनां धर्मबुद्धिस्त्वं कलत्रं सुहृदां भवान् ॥ ४८ ॥
साधकानां शुचीनां त्वं प्राणायामो महेश्वर ।
ज्योतिर्लिंगेषु सर्वेषु भवान् विश्वे श्वरो मतः ॥ ४९ ॥
धर्मस्त्वं सर्वबंधूनामाश्रमाणां परो भवान् ।
मोक्षस्त्वं सर्ववर्णेषु रुद्राणां नीललोहितः ॥ ५० ॥
आदित्यानां वासुदेवो हनूमान्वानरेषु च ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽसि रामः शस्त्रभृतां भवान् ॥ ५१ ॥
गंधर्वाणां चित्ररथो वसूनां पावको ध्रुवम् ।
मासानामधिमासस्त्वं व्रतानां त्वं चतुर्दशी ॥ ५२ ॥
ऐरावतो गजेन्द्राणां सिद्धानां कपिलो मतः ।
अनंतस्त्वं हि नागानां पितॄणामर्यमा भवान् ॥ ५३ ॥
कालः कलयतां च त्वं दैत्यानां बलिरेव च ।
किं बहूक्तेन देवेश सर्वं विष्टभ्य वै जगत् ॥ ५४ ॥
एकांशेन स्थितस्त्वं हि बहिःस्थोऽन्वित एव च ॥ ५५ ॥

देवगण बोले — सम्पूर्ण सृष्टि का विधान करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्मास्वरूप आप शिव को नमस्कार है । पालन करनेवाले विष्णुस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १३ ॥ सम्पूर्ण प्राणियों का संहार करनेवाले हरस्वरूप आपको नमस्कार है । निर्गुण तथा अमिततेजस्वी आप शिव को नमस्कार है । अवस्थाओं से रहित, निर्विकार, तेजस्वरूप, महाभूतों में आत्मस्वरूप से वर्तमान, निर्लिप्त एवं महान् आत्मावाले आप महात्मा को नमस्कार है ॥ १४-१५ ॥

सम्पूर्ण प्राणियों के अधिपति, शेषरूप से पृथ्वी का भार उठानेवाले, तृष्णा को नष्ट करनेवाले, शान्त प्रकृतिवाले तथा अमित तेजस्वी आप शिव को नमस्कार है ॥ १६ ॥ महादैत्यरूपी महावन को विनष्ट करने के लिये दावाग्नि के स्वरूप एवं दैत्यरूपी वृक्षों के लिये कुठारस्वरूप आप शूलपाणि को नमस्कार है ॥ १७ ॥ महादैत्यों का नाश करनेवाले हे परमेश्वर ! आपको नमस्कार है । हे सभी अस्त्रों के धारणकर्ता ! आप अम्बिकापति को नमस्कार है । हे पार्वतीनाथ ! हे परमात्मन् ! हे महेश्वर ! आपको नमस्कार है । आप नीलकण्ठ, रुद्र तथा रुद्रस्वरूप को नमस्कार है ॥ १८-१९ ॥

वेदान्त से जाननेयोग्य आपको नमस्कार है । सभी मार्गों से अगम्य आपको नमस्कार है । गुणस्वरूप, गुणों को धारण करनेवाले एवं गणों से सर्वथा रहित आपको नमस्कार है । त्रिलोकी को आनन्द देनेवाले हे महादेव ! आपको नमस्कार है । प्रद्युम्न, अनिरुद्ध एवं वासुदेवस्वरूप आपको नमस्कार है । संकर्षणदेव एवं कंसनाशक आपको नमस्कार है । चाणूर का मर्दन करनेवाले एवं विरक्त रहनेवाले हे दामोदर ! आपको नमस्कार है ॥ २०-२२ ॥

हे हृषीकेश ! हे अच्युत ! हे विभो ! हे मृड ! हे शंकर ! हे अधोक्षज ! हे गजासुर के शत्रु ! हे कामशत्रु ! हे विषभक्षक ! आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥ नारायणदेव, नारायणपरायण, नारायणस्वरूप तथा सर्वरूप हे नारायणतनूद्भव ! आपको नमस्कार है । महानरक से बचानेवाले तथा पापों को दूर करनेवाले हे वृषभवाहन ! आपको नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥

क्षण आदि कालरूपवाले, अपने भक्तों को बल प्रदान करनेवाले, अनेक रूपोंवाले तथा दैत्यों के समूह का नाश करनेवाले, ब्रह्मण्यदेवस्वरूप, गौ तथा ब्राह्मणों का हित करनेवाले, सहस्रमूर्ति तथा सहस्र अवयवोंवाले आपको नमस्कार है ॥ २६-२७ ॥ धर्मरूप, सत्त्वस्वरूप तथा सत्त्वात्मरूप हे हर ! आपको नमस्कार है । वेदों के द्वारा जाननेयोग्य स्वरूपवाले तथा वेदप्रिय आपको नमस्कार है । वेदस्वरूप एवं वेद के वक्ता आपको नमस्कार है । सदाचार के मार्ग से जाननेयोग्य एवं सदाचार के मार्ग पर चलनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥

विष्टरश्रवा (विष्णु) तथा सत्यमय आपको नमस्कार है । सत्यप्रिय, सत्यस्वरूप तथा सत्य से प्राप्त होनेवाले आपको नमस्कार है । माया को अपने अधीन रखनेवाले आपको नमस्कार है । माया के अधिपति आपको नमस्कार है । सामवेदस्वरूप, ब्रह्मस्वरूप तथा ब्रह्मा से उत्पन्न होनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३०-३१ ॥ हे ईश ! आप तपःस्वरूप, तपस्या का फल देनेवाले, स्तुति के योग्य, स्तुतिरूप, स्तुति से प्रसन्नचित्त, श्रुति के आचार से प्रसन्न रहनेवाले, स्तुतिप्रिय, जरायुज-अण्डज आदि चार स्वरूपोंवाले एवं जल-थल में प्रकट स्वरूपवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ३२-३३ ॥

हे नाथ ! सभी देवता आदि श्रेष्ठ होने से आपकी विभूति हैं । आप सभी देवताओं में इन्द्रस्वरूप हैं और ग्रहों में आप सूर्य माने गये हैं ॥ ३४ ॥ आप लोकों में सत्यलोक, सरिताओं में गंगा, वर्गों में श्वेत वर्ण और सरोवरों में मानसरोवर हैं ॥ ३५ ॥ आप पर्वतों में हिमालय, गायों में कामधेनु, समुद्रों में क्षीरसागर एवं धातुओं में सुवर्ण हैं ॥ ३६ ॥ हे शंकर ! आप वर्गों में ब्राह्मण, मनुष्यों में राजा, मुक्तिक्षेत्रों में काशी तथा तीर्थों में प्रयाग हैं । हे महेश्वर ! आप समस्त पाषाणों में स्फटिक मणि, पुष्पों में कमल तथा पर्वतों में हिमालय हैं ॥ ३७-३८ ॥

आप व्यवहारों में वाणी हैं, कवियों में भार्गव, पक्षियों में शरभ और हिंसक प्राणियों में सिंह कहे गये हैं ॥ ३९ ॥ हे वृषभध्वज ! आप शिलाओं में शालग्रामशिला और सभी पूज्यों में नर्मदा-लिंग हैं । हे परमेश्वर ! आप पशुओं में नन्दीश्वर नामक वृषभ (बैल), वेदों में उपनिषद्प और यज्ञ करनेवालों में चन्द्रमा हैं ॥ ४०-४१ ॥ आप तेजस्वियों में अग्नि, शैवों में विष्णु, पुराणों में महाभारत तथा अक्षरों में मकार हैं । बीजमन्त्रों में प्रणव (ओंकार), दारुण पदार्थों में विष, व्यापक वस्तुओं में आकाश तथा आत्माओं में परमात्मा हैं ॥ ४२-४३ ॥

आप सम्पूर्ण इन्द्रियों में मन, सभी प्रकार के दानों में अभयदान, पवित्र करनेवालों में जल तथा जीवित करनेवाले पदार्थों में अमृत हैं ॥ ४४ ॥ आप लाभों में पुत्रलाभ तथा वेगवानों में वायु हैं । आप सभी प्रकार के नित्यकर्मो में सन्ध्योपासन कहे गये हैं ॥ ४५ ॥ आप सम्पूर्ण यज्ञों में अश्वमेधयज्ञ, युगों में सत्ययुग, नक्षत्रों में पुष्य तथा तिथियों में अमावास्या हैं ॥ ४६ ॥ आप सभी ऋतुओं में वसन्त, पर्वों में संक्रान्ति, तृणों में कुश और स्थूल वृक्षों में वटवृक्ष हैं ॥ ४७ ॥

आप योगों में व्यतीपात, लताओं में सोमलता, बुद्धियों में धर्मबुद्धि तथा सुहृदों में कलत्र हैं । हे महेश्वर ! आप सम्पूर्ण पवित्र साधनों में प्राणायाम हैं तथा सभी ज्योतिर्लिंगों में विश्वेश्वर कहे गये हैं ॥ ४८-४९ ॥ आप सभी बन्धुओं में धर्म, आश्रमों में संन्यासाश्रम, सभी वर्गों में मोक्ष तथा रुद्रों में नीललोहित हैं ॥ ५० ॥ आप आदित्यों में वासुदेव, वानरों में हनुमान्, यज्ञों में जपयज्ञ तथा शस्त्रधारियों में राम हैं ॥ ५१ ॥ आप गन्धों में चित्ररथ, वसुओं में पावक, मासों में अधिमास और व्रतों में चतुर्दशीव्रत हैं ॥ ५२ ॥

आप गजेन्द्रों में ऐरावत, सिद्धों में कपिल, नागों में अनन्त और पितरों में अर्यमा माने गये हैं । आप कलना करनेवालों में काल तथा दैत्यों में बलि हैं । हे देवेश ! अधिक कहने से क्या लाभ, आप सारे जगत् को आक्रान्तकर बाहर तथा भीतर सर्वत्र एकांशरूप से स्थित हैं ॥ ५३-५५ ॥

सनत्कुमार बोले — हे मुने ! इस प्रकार सिर झुकाकर हाथ जोड़कर अनेक प्रकार के दिव्य स्तोत्रों से त्रिशूलधारी परमेश्वर, वृषभध्वज महादेव की स्तुतिकर स्वार्थसाधन में कुशल इन्द्र आदि सभी देवता अत्यन्त दीन हो प्रस्तुत स्वार्थ की बात कहने लगे — ॥ ५६-५७ ॥

देवता बोले — हे महादेव ! हे भगवन् ! इन्द्रसहित सभी देवताओं को तारकासुर के तीनों पुत्रों ने पराजित कर दिया । उन्होंने समस्त त्रैलोक्य को अपने वश में कर लिया है । उन लोगों ने सभी मुनिवरों तथा सिद्धों का विध्वंस कर दिया है और सारे जगत् को तहस-नहस कर दिया है । वह भयंकर दैत्य समस्त यज्ञभागों को स्वयं ग्रहण करता है । उन तारकपुत्रों ने वेदविरुद्ध अधर्म को बढ़ावा दे रखा है ॥ ५८-६० ॥

हे शंकर ! वे तारकपुत्र सभी प्राणियों से निश्चित रूप से अवध्य हैं, सभी लोग उन्हीं की इच्छा से कार्य करते हैं ॥ ६१ ॥ जबतक त्रिपुरवासी दैत्यों के द्वारा जगत् का विध्वंस नहीं हो जाता है, तबतक आप ऐसी नीति का निर्धारण करें, जिससे जगत् की रक्षा हो सके ॥ ६२ ॥

सनत्कुमार बोले — वार्तालाप करते हुए उन इन्द्रादि देवताओं का यह वचन सुनकर शिवजी ने कहा — ॥ ६३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में देवस्तुतिवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

 

 

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