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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 09
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
नौवाँ अध्याय
ब्रह्माजी को सारथी बनाकर भगवान् शंकर का दिव्य रथ में आरूढ़ होकर अपने गणों तथा देवसेना के साथ त्रिपुर-वध के लिये प्रस्थान, शिव का पशुपति नाम पड़ने का कारण

सनत्कुमार बोले — इस प्रकार के महादिव्य तथा अनेक आश्चर्यों से युक्त रथ में वेदरूपी घोड़े जोतकर ब्रह्माजी ने उसे शिवजी को समर्पित किया । इसे शिवजी को अर्पण करके उन्होंने विष्णु आदि देवगणों के सम्माननीय देवेश शिवजी से बहुत प्रार्थना करके उन्हें रथ पर बैठाया । तब समस्त रथ-सामग्रियों से सम्पन्न उस दिव्य रथ पर सर्वदेवमय महाप्रभु शम्भु आरूढ़ हुए ॥ १-३ ॥ उस समय ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, ब्रह्मा, विष्णु तथा समस्त लोकपाल उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥

शिवमहापुराण

गान में प्रवीण अप्सराओं से घिरे हुए वरदायक शिवजी उस सारथी (ब्रह्मा)-की ओर देखते हुए शोभित होने लगे । सर्वलोकमय उस निर्मित रथ पर सदाशिव के चढ़ते ही वेदरूपी घोड़े सिर के बल पृथ्वी पर गिर पड़े, जिससे पृथ्वी तथा सभी पर्वत चलायमान हो गये और शेषनाग भी उस भार को सहने में असमर्थ होने के कारण कम्पित हो उठे । तब पृथ्वी को धारण करनेवाले भगवान् शेष वृषेन्द्र का रूप धारणकर क्षणमात्र के लिये उस रथ को उठाकर स्थापित करने लगे, किंतु रथ पर आरूढ़ शिवजी के परम तेज को सहन करने में असमर्थ वृषेन्द्र भी घुटनों के बल पृथ्वी पर गिर पड़े ॥ ५-९ ॥

तब हाथ में लगाम पकड़े हुए ब्रह्माजी ने शंकरजी की आज्ञा से घोडों को उठाकर रथ को व्यवस्थित किया ॥ १० ॥ उसके बाद ब्रह्माजी स्वयं उस श्रेष्ठ रथ पर सवार हो शिव की आज्ञा से मन तथा पवन के समान वेगवाले रथ में जुते हुए उन वेदरूपी घोड़ों को तेजी से हाँकने लगे । शिवजी के बैठ जाने पर वह रथ उन बलवान् दानवों के आकाशस्थित तीनों पुरों को उद्देश्य करके चलने लगा ॥ ११-१२ ॥

उस समय देवगणों की ओर देखकर कल्याण करनेवाले भगवान् रुद्र ने कहा — हे श्रेष्ठ देवताओ ! यदि आपलोग मुझे पशुओं का अधिपति बना दें, तो मैं असुरों का वध करूँ । देवताओं तथा अन्य लोगों के पृथक्-पृथक् पशुत्व की कल्पना करने पर ही वे दैत्यश्रेष्ठ वध के योग्य हो सकते हैं, अन्यथा नहीं ॥ १३-१४ ॥

सनत्कुमार बोले — उन बुद्धिमान् देवाधिदेव के इस वचन को सुनकर सभी देवता पशुत्व के प्रति शंकित होकर दुःखित हो गये । तब देवाधिदेव अम्बिकापति शंकर देवताओं का भाव जानकर हँसते हुए उन देवताओं से कहने लगे — ॥ १५-१६ ॥

शम्भु बोले — हे देवगणो ! पशुभाव को प्राप्त होने पर भी आपलोगों का पात नहीं होगा, मेरी बात सुनिये और उस पशुभाव से अपने को मुक्त कीजिये । जो इस दिव्य पाशुपत व्रत का आचरण करेगा, वह पशुत्व से मुक्त हो जायगा, मैंने आपलोगों से सत्य प्रतिज्ञा की है ॥ १७-१८ ॥ हे श्रेष्ठ देवताओ ! जो अन्य लोग भी मेरे पाशुपतव्रत का आचरण करेंगे, वे पशुत्व से मुक्त हो जायेंगे, इसमें संशय नहीं है । जो निष्ठापूर्वक बारह वर्ष, छ: वर्ष अथवा तीन वर्ष तक मेरी उपासना करेगा, वह पशुभाव से छूट जायगा । इसलिये हे श्रेष्ठ देवताओ ! यदि आप लोग इस श्रेष्ठ एवं दिव्य व्रत का आचरण करेंगे, तो पशुत्व से मुक्त हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १९-२१ ॥

सनत्कुमार बोले — उन परमात्मा महेश्वर का यह वचन सुनकर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवगणों ने कहा — ऐसा ही होगा । इसलिये [हे वेदव्यास!] देवता एवं असुर सभी उन प्रभु के पशु हैं और पशुओं को पाश से मुक्त करनेवाले रुद्र भगवान् शंकर पशुपति हैं ॥ २२-२३ ॥ तभी से उन महेश्वर का यह कल्याणप्रद पशुपति नाम भी सभी लोकों में प्रसिद्ध हुआ ॥ २४ ॥

उसके बाद सभी देवता तथा ऋषि प्रसन्नतापूर्वक जय-जयकार करने लगे । स्वयं देवेश, ब्रह्मा, विष्णु एवं अन्य लोग भी बहुत प्रसन्न हुए । उस समय उन परमात्मा का जैसा अद्भुत रूप था, उसका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार के स्वरूपवाले, सबके लिये सुखदायक अखिलेश्वर महेश तथा महेशानी त्रिपुर को मारने के लिये चल पड़े । जिस समय देवाधिदेव उस त्रिपुर का वध करने के लिये चले, उस समय सूर्य के समान तेजस्वी इन्द्र आदि सभी देवता उत्तम हाथी, घोड़े, सिंह, रथ तथा बैल पर सवार हो उनके पीछे-पीछे चले । हाथों में हल, शाल, मूसल, विशाल पर्वत के समान भुशुण्ड तथा विविध आयुध धारण किये हुए पर्वतसदृश वे इन्द्रादि देवता प्रसन्न होकर [त्रिपुर का वध करने के लिये] चले ॥ २७–२९ ॥

उस समय अनेक प्रकार के आयुधों से युक्त तथा परम प्रकाशमान इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता महोत्सव मनाते हुए तथा शिवजी की जय-जयकार करते हुए उन महेश्वर के आगे-आगे चल रहे थे ॥ ३० ॥ उस समय हाथ में दण्ड लिये हुए तथा जटा धारण किये हुए सभी मुनि हर्षित हुए और आकाश में विचरण करनेवाले सिद्ध तथा चारण पुष्पवृष्टि करने लगे ॥ ३१ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! जो सभी गणेश्वर तीनों पुरों को जा रहे थे, उनकी संख्या बताने में कौन समर्थ है, तथापि मैं कुछको कह रहा हूँ ॥ ३२ ॥

गणेश्वरों और देवगणों के साथ सभी गणों से श्रेष्ठ भृंगी विमान में चढ़कर महेन्द्र के समान त्रिपुर का वध करने के लिये चला । केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली, सवर्ण, सोमप, सनक, सोमधृक्, सूर्यवर्चा, सूर्यप्रेषण, सूर्याक्ष, सूरि, सुर, सुन्दर, प्रस्कन्द, कुन्दर, चण्ड, कम्पन, अतिकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजव, हिमकर, यन्ता, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, सतीजुह, शतास्य, रंक, कर्पूरपूतन, द्विशिख, त्रिशिख, अहंकारकारक, अजवक्त्र, अष्टवक्त्र, हयवक्त्र तथा अर्धवक्त्र इत्यादि बहुत-से असंख्य वीरगण, जो लक्ष्य-लक्षण से रहित थे, वे शिवजी को घेरकर चले ॥ ३३-३९ ॥

जो गण महादेव शिव को घेरकर उनके साथ चल रहे थे, वे मन से ही चराचर जगत् को भस्म करने में समर्थ थे । किंतु यहाँ तो पिनाकधारी भगवान् शंकर स्वयं ही त्रिपुर को जलाने में समर्थ थे । उन शम्भु को रथ, बाण, गणों तथा देवताओं की क्या आवश्यकता थी, किंतु हे व्यास ! हाथ में पिनाक धारण किये वे अपने गणों तथा देवताओं के साथ दैत्यों के उन तीनों पुरों को जलाने के लिये जा रहे थे । यह उनकी अद्भुत लीला है ॥ ४०-४२ ॥

हे ऋषिश्रेष्ठ ! उसमें जो कारण है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ । दूसरों के पापों का नाश करनेवाले उन्होंने अपने यश का त्रिलोकी में विस्तार करने के निमित्त ऐसा किया और दूसरा यह भी कारण है कि दुष्टों के मन में यह विश्वास हो जाय कि सभी देवगणों में शिवजी से बढकर अन्य कोई नहीं है ॥ ४३-४४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में शिवयात्रावर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

 

 

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