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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 20
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
बीसवाँ अध्याय
दूत के द्वारा कैलास का वृत्तान्त जानकर जलन्धर का अपनी सेना को युद्ध का आदेश देना, भयभीत देवों का शिव की शरण में जाना, शिवगणों तथा जलन्धर की सेना का युद्ध, शिव द्वारा कृत्या को उत्पन्न करना, कृत्या द्वारा शुक्राचार्य को छिपा लेना

व्यासजी बोले — हे सनत्कुमार ! हे सर्वज्ञ ! आपने अद्भुत कथा सुनायी, जिसमें महाप्रभु शंकर की पवित्र लीला है । हे महामुने ! अब मेरे ऊपर कृपा करके प्रेमपूर्वक यह बताइये कि [श्रीशंकरजी के भ्रूमध्य से प्रकट] उस पुरुष के द्वारा मुक्त किया गया राहु कहाँ गया ? ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले — अमित बुद्धिवाले व्यासजी का वचन सुनकर ब्रह्मा के पुत्र महामुनि सनत्कुमार प्रसन्नचित्त होकर कहने लगे — ॥ ३ ॥

शिवमहापुराण

सनत्कुमार बोले — वह राहु उस पुरुष के द्वारा वर्वर स्थान पर मुक्त कर दिया गया, इसलिये वह वर्वर नाम से पृथ्वी पर विख्यात हुआ ॥ ४ ॥ तब [उस पुरुष के द्वारा इस प्रकार छुटकारा प्राप्त करनेपर] वह अपना नया जन्म मानता हुआ फिर गर्वरहित हो शनैः-शनैः जलन्धर के नगर में पहुँचा ॥ ५ ॥

हे व्यास ! उसने वहाँ जाकर दैत्येन्द्र जलन्धर से शंकर की सारी चेष्टा का वर्णन विस्तारपूर्वक किया ॥ ६ ॥ उसे सुनकर दैत्यराजों में श्रेष्ठ बलवान् सिन्धुपुत्र जलन्धर क्रोध से व्याकुल हो उठा ॥ ७ ॥ तब क्रोध के वशीभूत चित्तवाले उस दैत्येन्द्र ने समस्त दैत्यों को युद्ध के लिये उद्यत होने का आदेश दिया ॥ ८ ॥

जलन्धर बोला — कालनेमि आदि एवं शुम्भनिशुम्भ आदि सभी वीर दैत्य अपनी-अपनी सेनाओं से युक्त होकर [युद्ध के लिये] निकलें ॥ ९ ॥ वीरकुल में उत्पन्न एक करोड़ कम्बुवंशीय, दौर्हृद, कालक, कालकेय, मौर्य तथा धौम्रगण भी शीघ्र चलें ॥ १० ॥

महाप्रतापी सिन्धुपुत्र वह दैत्यपति इस प्रकार आज्ञा देकर करोड़ों दैत्यों को साथ लेकर शीघ्र ही चल पड़ा ॥ ११ ॥ शुक्र एवं कटे हुए सिरवाला राहु उसके आगे-आगे चलने लगे । उसी समय जलन्धर का मुकुट वेग से खिसककर पृथ्वी पर गिर पड़ा और समस्त आकाशमण्डल वर्षाकाल के समान मेघों से आच्छन्न हो गया तथा मृत्युसूचक बहुत-से भयानक अपशकुन होने लगे ॥ १२-१३ ॥
तब उसकी इस प्रकार की युद्ध की तैयारी देखकर इन्द्रसहित वे देवता छिपकर शिवजी के निवासस्थान कैलास पर्वत पर गये । वहाँ जाकर इन्द्रसहित सभी देवता शिवजी को देखकर उन्हें प्रणामकर कंधा झुकाये हुए हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे — ॥ १४-१५ ॥

देवता बोले — हे देवदेव ! महादेव ! हे करुणाकर ! हे शंकर ! आपको प्रणाम है । हे महेशान ! हम शरणागतों की रक्षा कीजिये । हे प्रभो ! इन्द्रसहित हमलोग जलन्धर द्वारा किये गये उपद्रव से अत्यन्त व्याकुल हो गये हैं और अपना-अपना स्थान छोड़कर पृथ्वी पर स्थित हैं ॥ १६-१७ ॥

हे प्रभो ! हे स्वामिन् ! आप देवताओं की इस विपत्ति को कैसे नहीं जानते ? अतः आप हमलोगों की रक्षा के लिये जलन्धर का वध कीजिये ॥ १८ ॥ हे नाथ ! आपने जो पूर्वसमय में हमलोगों की रक्षा के लिये विष्णुजी को नियुक्त किया था, इस समय वे भी रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं । अब वे भी उसके अधीन होकर लक्ष्मी के साथ उसके घर में रहते हैं और हम देवगण भी उसके वशवर्ती होकर वहीं रहते हैं ॥ १९-२० ॥

हे शम्भो ! हमलोग छिपकर आपकी शरण में आये हैं, इस समय वह बलवान् जलन्धर आपसे युद्ध करने के लिये आ रहा है । अतः हे स्वामिन् ! हे सर्वज्ञ ! आप शीघ्र ही युद्ध में उस जलन्धर का वध कीजिये और हम शरणागतों की रक्षा कीजिये ॥ २१-२२ ॥

सनत्कुमार बोले — [हे व्यास!] ऐसा कहकर वे सभी देवता प्रभु को प्रणामकर उन महेश्वर के चरण देखते हुए विनम्र हो वहीं स्थित हो गये ॥ २३ ॥ तब देवगणों का यह वचन सुनकर शिवजी हँसकर विष्णु को शीघ्रता से बुलाकर यह वचन कहने लगे — ॥ २४ ॥

ईश्वर बोले — हे हृषीकेश ! हे महाविष्णो ! जलन्धर से सन्त्रस्त हुए ये देवगण अत्यन्त व्याकुल होकर यहाँ मेरी शरण में आये हुए हैं । हे विष्णो ! आपने युद्ध में जलन्धर का वध क्यों नहीं किया और आप स्वयं भी अपना वैकुण्ठ छोड़कर उसके घर चले गये हैं । स्वयं स्वतन्त्र होकर विहार करनेवाले मैंने दुष्टों के निग्रह के लिये तथा सज्जनों की रक्षा के लिये आपको नियुक्त किया था ॥ २५–२७ ॥

सनत्कुमार बोले — शंकर का यह वचन सुनकर गरुडध्वज विष्णु विनम्र हो सिर झुकाये हुए हाथ जोड़कर कहने लगे — ॥ २८ ॥

विष्णुजी बोले — हे प्रभो ! आपके अंश से प्रकट होने तथा लक्ष्मीजी का भाई होने के कारण मैंने युद्ध में उसका वध नहीं किया, अब आप ही इस दानव का वध कीजिये ॥ २९ ॥ हे देवेश ! वह महाबली तथा महावीर दानव सभी देवताओं तथा अन्य लोगों के लिये भी अजेय है, मैं यह सत्य कह रहा हूँ । देवताओंसहित मैंने बहुत समय तक उसके साथ युद्ध किया, परंतु मेरा कोई भी उपाय उस दानवश्रेष्ठ पर नहीं चला । उसके पराक्रम से सन्तुष्ट होकर मैंने उससे कहा — वर माँगो; तब उसने मेरा वचन सुनकर यह उत्तम वरदान माँगा — हे महाविष्णो ! आप देवताओं एवं मेरी भगिनी लक्ष्मी के साथ मेरे घर में निवास करें और मेरे अधीन रहें, अतः मैं उसके घर चला गया ॥ ३०-३३ ॥

सनत्कुमार बोले — विष्णुजी का यह वचन सुनकर दयालु तथा भक्तवत्सल वे महेश्वर शंकर अतिप्रसन्न होकर हँसकर कहने लगे — ॥ ३४ ॥

महेश्वर बोले — हे विष्णो ! हे सुरश्रेष्ठ ! आप मेरी बात को आदरपूर्वक सुनिये । मैं महादैत्य जलन्धर का वध करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है । उस असुरपति को मारा गया समझकर आप भयरहित हो अपने स्थान को जाइये और सभी देवता भी भयमुक्त तथा सन्देहरहित होकर अपने स्थान को जायँ ॥ ३५-३६ ॥

सनत्कुमार बोले — महेश्वर का यह वचन सुनकर रमापति विष्णु सन्देहरहित हो देवगणों के साथ अपने स्थान को चले गये । हे व्यास ! इसी बीच वह अति पराक्रमी तथा बलवान् दैत्यपति युद्ध के लिये तत्पर असुरों के साथ कैलास के समीप पहुँचा और कैलास को घेरकर तीव्र सिंहनाद करता हुआ काल के समान वह महती सेना के साथ वहीं रुक गया ॥ ३७–३९ ॥ उसके बाद दैत्यों के सिंहनाद से उत्पन्न महाकोलाहल सुनकर दुष्टों का संहार करनेवाले तथा महालीला करनेवाले महेश्वर अत्यन्त क्रोधित हो उठे ॥ ४० ॥

तब महालीला करनेवाले कौतुकी महादेव ने महाबलवान् नन्दी आदि अपने गणों को युद्ध के लिये आज्ञा दी ॥ ४१ ॥ तब शिवजी की आज्ञा से नन्दी, गजमुख आदि प्रमुख सेनापति तथा सभी गण बड़ी शीघ्रता से युद्ध के लिये तत्पर हो गये । वे सभी महावीर गण युद्ध के लिये क्रोध से दुर्मद हो नाना प्रकार के युद्धसम्बन्धी शब्द करते हुए कैलास पर्वत से उतरे ॥ ४२-४३ ॥ उसके बाद कैलास की उपत्यकाओं में प्रमथगणों और दैत्यों में अस्त्र-शस्त्रों से घोर युद्ध होने लगा ॥ ४४ ॥

उस समय वीरों में हर्ष उत्पन्न करनेवाली भेरी, मृदंग तथा शंखों की ध्वनियों और हाथी, घोड़े तथा रथों के शब्दों से नादित हुई पृथ्वी कम्पित हो उठी ॥ ४५ ॥ शक्ति, तोमर, बाण, मूसल, प्राश एवं पट्टिशों से आकाशमण्डल मोतियों से भरा हुआ जैसा लगने लगा ॥ ४६ ॥ मरे हुए हाथी, घोड़े एवं पैदल सेनाओं के द्वारा पृथ्वी इस प्रकार पट गयी, जैसे पूर्व समय में [इन्द्र के] वज्र से आहत हुए पर्वतराजों से पटी हुई थी ॥ ४७ ॥

उस समय प्रमथों के द्वारा मारे गये दैत्यों एवं दैत्यों के द्वारा मारे गये प्रमथों के मज्जा, रक्त एवं मांस के कीचड़ से पृथ्वी व्याप्त हो गयी, जिससे उसपर चलना असम्भव हो गया । तब शुक्राचार्य प्रमथगणों के द्वारा युद्ध में मारे गये दैत्यों को मृतसंजीवनी विद्या के प्रभाव से बारंबार जिलाने लगे । उन्हें इस प्रकार जीवित होते देखकर व्याकुल तथा भयभीत सभी गणों ने देवदेव शिवजी से शुक्राचार्य की सारी घटना निवेदित की ॥ ४८-५० ॥

यह सुनकर भगवान् रुद्र ने अत्यधिक क्रोध किया और दिशाओं को प्रज्वलित करते हुए वे भयंकर तथा अत्यधिक रौद्ररूपवाले हो गये । उस समय रुद्र के मुख से महाभयंकर कृत्या प्रकट हो गयी । ताड़ वृक्ष के समान उसकी जाँघे थीं । गुफा के समान उसका मुख था और उसके स्तन से बड़े-बड़े वृक्ष टूट जाते थे ॥ ५१-५२ ॥

हे मुनिसत्तम ! महाभयंकर वह कृत्या बड़े वेग से युद्धभूमि में आ गयी और महान् असुरों का भक्षण करती हुई विचरण करने लगी । इसके बाद वह निर्भय होकर शीघ्र ही वहाँ जा पहुँची, जहाँ महान् दैत्यों से घिरे हुए शुक्राचार्य थे । हे मुने ! वह अपने तेज से आकाश एवं पृथ्वी को व्याप्तकर शुक्र को अपने गुह्यदेश में छिपाकर आकाश में अन्तर्धान हो गयी ॥ ५३–५५ ॥

तब युद्धदुर्मद दैत्यसेना के वीर शुक्राचार्य को तिरोहित देखकर मलिनमुख होकर रणभूमि से भागने लगे ॥ ५६ ॥ शिवगणों से भयभीत हुई असुरों की सेना वायु के वेग से बिखरे हुए तृणसमूह की भाँति भागने लगी ॥ ५७ ॥ इस प्रकार गणों के भय से दैत्यों की सेना को छिन्न-भिन्न होते देखकर सेनापति निशुम्भ, शुम्भ एवं कालनेमि को महान् क्रोध हुआ । उन महाबली तीनों सेनापतियों ने वर्षाकालीन मेघ के समान बाणों की वृष्टि करते हुए गणों की सेना को भगाना प्रारम्भ किया । उन असुरों के बाण शलभसमूहों की भाँति आकाश तथा सभी दिशाओं को व्याप्तकर गणों की सेना को कँपाने लगे ॥ ५८-६० ॥

सैकड़ों बाणों से बिंधे हुए तथा रुधिर की धारा बहाते हुए शिवगण वसन्त ऋतु में किंशुक के पुष्प की भाँति सुशोभित हो रहे थे और उन्हें कुछ भी ज्ञात न हो पा रहा था । इस प्रकार अपनी सेना को छिन्न-भिन्न होते देखकर कुपित हुए गणेश, कार्तिकेय एवं नन्दी आदि महाक्रोधकर बड़ी शीघ्रता से उन महादैत्यों को रोकने लगे ॥ ६१-६२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में जलन्धरवधोपाख्यान में सामान्यगण असुरयुद्धवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥

 

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