शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 54
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
चौवनवाँ अध्याय
नारदजी द्वारा अनिरुद्ध के बन्धन का समाचार पाकर श्रीकृष्ण की शोणितपुर पर चढ़ाई, शिव के साथ उनका घोर युद्ध, शिव की आज्ञा से श्रीकृष्ण का उन्हें जृम्भणास्त्र से मोहित करके बाणासुर की सेना का संहार करना

व्यासजी बोले — हे मुनिश्रेष्ठ ! कुम्भाण्ड की पुत्री चित्रलेखा द्वारा अपने पौत्र अनिरुद्ध का हरण कर लिये जाने पर श्रीकृष्ण ने क्या किया, उसे कहिये ॥ १ ॥

सनत्कुमार बोले — हे मुनिसत्तम ! अनिरुद्ध के चले जाने पर उन स्त्रियों के रोने के शब्द को सुनकर श्रीकृष्ण को बहुत दुःख हुआ ॥ २ ॥ अनिरुद्ध को बिना देखे उनके बन्धुओं तथा श्रीकृष्ण को शोक करते हुए वर्षाकाल के चार मास बीत गये ॥ ३ ॥

तब नारदजी से उनकी वार्ता तथा उनके बंधन का समाचार सुनकर सब यादवगण तथा श्रीकृष्णजी अति दुखी हुए । उस सम्पूर्ण वृत्तान्त को सुनकर श्रीकृष्ण उसी समय आदरपूर्वक गरुड को बुलाकर युद्ध के लिये शोणितपुर को गये । उस समय प्रद्युम्न, युयुधान, साम्ब, सारण, नन्द, उपनन्द, भद्र, बलराम तथा कृष्ण के अनुवर्ती सब लोग चले ॥ ४-६ ॥

बारह अक्षौहिणी सेना के साथ श्रेष्ठ यादवों ने चारों ओर से बाणासुर के नगर को घेर लिया ॥ ७ ॥ नगर, उद्यान, प्राकार, अटारी, गोपुर आदि को विध्वस्त होता हुआ देखकर क्रोध से व्याप्त वह बाणासुर भी उतनी ही सेना के साथ निकल पड़ा ॥ ८ ॥ बाणासुर की रक्षा करने के लिये भगवान् सदाशिव नन्दी वृषभ पर सवार होकर अपने पुत्र तथा प्रमथगणों के साथ युद्ध करने के लिये गये । वहाँ बाणासुर के रक्षक रुद्र आदि से श्रीकृष्ण आदि का अद्भुत, रोमांचकारी तथा भयंकर युद्ध हुआ । कृष्ण के साथ शिवजी का, प्रद्युम्न के साथ कार्तिकेय का एवं कूष्माण्ड और कूपकर्ण के साथ बलराम का परस्पर द्वन्द्वयुद्ध होने लगा ॥ ९-११ ॥

साम्ब का बाणासुर के पुत्र के साथ. सात्यकि का बाणासुर के साथ, गरुड का नन्दी के साथ और अन्य लोगों का अन्य लोगों के साथ युद्ध होने लगा ॥ १२ ॥ उस समय ब्रह्मा आदि देवता, मुनि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा अप्सराएँ अपने वाहनों तथा विमानों से युद्ध देखने के लिये आये ॥ १३ ॥ हे विप्रेन्द्र ! विविध आकारवाले रेवती आदि प्रमथों के साथ उन यदुवंशियों का बड़ा भयानक युद्ध हुआ ॥ १४ ॥ भाई बलराम तथा बुद्धिमान् प्रद्युम्न के सहित श्रीकृष्णजी ने प्रमथगणों के साथ घोर भयानक युद्ध किया । वहाँ अग्नि, यम, वरुण आदि देवताओं के साथ विमुख, त्रिपाद, ज्वर और गुह का युद्ध हुआ । विविध आकारवाले प्रमथों के साथ उन यादवों का विकट, भयंकर तथा रोमहर्षण युद्ध होने लगा ॥ १५-१७ ॥

बहुत-सी विभीषिकाओं से, कोटरियों से तथा निर्लज्ज प्रबल स्त्रियों से पास-पास से युद्ध होने लगा ॥ १८ ॥ तब श्रीकृष्णजी ने शिवजी के भूत, प्रमथ तथा गुह्यक आदि अनुचरों को अपने शार्ङ्ग धनुष से छोड़े हुए तीक्ष्ण अग्रभागवाले बाणों से पीड़ित किया । इस प्रकार युद्ध के उत्साही प्रद्युम्न आदि वीर भी शत्रु की सेना का नाश करते हुए महाभयंकर युद्ध करने लगे । तब अपनी सेना को नष्ट होते हुए देखकर शिवजी ने उसे सहन न करते हुए महान् क्रोध किया और भयंकर गर्जन किया ॥ १९–२१ ॥

यह सुनकर शिवजी के गण गरजने लगे तथा शिवजी के तेज से तेजस्वी हुए वे शत्रुयोद्धाओं को नष्ट करते हुए युद्ध करने लगे । श्रीकृष्ण ने शार्ङ्गधनुष पर नाना प्रकार के अस्त्रों को रखकर शिवजी के ऊपर प्रहार किया, तब विस्मित न होते हुए महादेवजी ने प्रत्यक्ष रूप से अस्त्रों को शान्त कर दिया । शिवजी ने ब्रह्मास्त्र को ब्रह्मास्त्र से, वायव्यास्त्र को पर्वतास्त्र से तथा नारायण के आग्नेय अस्त्र को अपने पर्जन्यास्त्र से शान्त कर दिया ॥ २२–२४ ॥

प्रत्येक योद्धा से जीती हुई श्रीकृष्णजी की सेना भागने लगी, हे व्यासजी ! वह सेना शिव के सम्पूर्ण तेज के कारण युद्ध में न रुक सकी । हे मुने ! अपनी सेना के पलायन करने पर परम तपस्वी श्रीकृष्ण ने वरुण देवता सम्बन्धी अपने शीतल नामक ज्वर को छोड़ा ॥ २५-२६ ॥ हे मुने ! श्रीकृष्ण की सेना के भाग जाने पर श्रीकृष्ण का शीतलज्वर दसों दिशाओं को भस्म करता हुआ उन शिवजी के समीप गया । उसको आता हुआ देखकर महादेव ने अपना ज्वर छोड़ा । उस समय शिवज्वर तथा विष्णुज्वर आपस में युद्ध करने लगे । तब विष्णु का ज्वर शिवजी के ज्वर से पीड़ित होकर क्रन्दन करने लगा और कहीं अपनी रक्षा न देखकर शिवजी की स्तुति करने लगा ॥ २७–२९ ॥

तब विष्णु के ज्वर द्वारा वन्दित शरणागतवत्सल सदाशिव ने प्रसन्न होकर विष्णु के शीतज्वर से कहा — ॥ ३० ॥

महेश्वर बोले — हे शीतज्वर ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुमको मेरे ज्वर से भय नहीं होगा, जो कोई हम दोनों के संवाद का स्मरण करेगा, उसको ज्वर से भय नहीं होगा ॥ ३१ ॥

सनत्कुमार बोले — इस प्रकार कहे जाने पर वह वैष्णवज्वर शिवजी को नमस्कार करके चला गया । उस चरित्र को देखकर श्रीकृष्ण भयभीत तथा विस्मित हो गये । प्रद्युम्न के बाणसमूह से पीड़ित होकर कुपित हुए दैत्य-संघाती स्कन्द ने अपनी शक्ति से प्रद्युम्न को आहत कर दिया । तब स्वामी कार्तिकेय की शक्ति से आहत बलवान् प्रद्युम्न अपने शरीर से रुधिर बहाते हुए संग्रामभूमि से हट गये । कुम्भाण्ड और कूपकर्ण के द्वारा अनेक अस्त्रों से आहत किये गये बली बलभद्र भी युद्ध में स्थिर न रह सके और भाग गये ॥ ३२-३५ ॥

गरुड़ ने हजारों रूप धारणकर महासागर से जल का पानकर और मेघों के समान जल छोड़कर बहुत-से लोगों का नाश किया । तब शिवजी के वाहन बलवान् वृषभ ने कुपित होकर उन गरुडजी को बड़े वेग से शीघ्रतापूर्वक सींगों द्वारा विदीर्ण कर दिया । तब सींगों के आघात से विदीर्ण शरीरवाले गरुड़जी अत्यन्त विस्मित हो शीघ्र ही भगवान् को छोड़कर युद्धस्थल से भाग गये ॥ ३६-३८ ॥
ऐसा चरित्र होने पर देवकीपुत्र भगवान् श्रीकृष्ण शिवजी के तेज से विस्मित हो शीघ्र ही अपने सारथी से कहने लगे — ॥ ३९ ॥

श्रीकृष्ण बोले — हे सूत ! तुम मेरे वचन को सुनो, मेरे रथ को शीघ्र ले चलो, जिससे मैं शिव के समीप स्थित होकर उनसे कुछ कह सकूँ ॥ ४० ॥

सनत्कुमार बोले — भगवान् के इस प्रकार कहने पर अपने गुणों के कारण मुख्य दारुक नामक सारथि शीघ्र ही उस रथ को शिवजी के समीप ले गया ॥ ४१ ॥ तब शरणागत हुए श्रीकृष्ण ने झुककर हाथ जोड़कर भक्तवत्सल शिवजी से भक्तिपूर्वक प्रार्थना की ॥ ४२ ॥

श्रीकृष्ण बोले — हे देवों के देव ! हे महादेव ! हे शरणागतवत्सल ! आप अनन्त शक्तिवाले, सबके आत्मरूप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ । आप संसार की उत्पत्ति-स्थिति एवं नाश के कारण, सज्ज्ञप्तिमात्र, ब्रह्मलिंग, परमशान्त, केवल, परमेश्वर, काल, दैव, कर्म, जीव, स्वभाव, द्रव्य, क्षेत्र, प्राण, आत्मा, विकार तथा अनेक समुदायवाले हैं, हे संसार के स्वामिन् ! बीजरोह तथा प्रवाहरूपी यह आपकी माया है, इस कारण मैं आप बन्धनहीन परमेश्वर की शरण में आया हूँ ॥ ४३–४६ ॥

आप लोकेश्वर अपने द्वारा किये गये विविध भावों से लीलापूर्वक देवता आदि का पोषण करते हैं तथा बुरे मार्ग में जानेवालों को स्वभाव से विनष्ट करते हैं ॥ ४७ ॥ आप ही ब्रह्म, परम ज्योतिःस्वरूप तथा शब्दब्रह्मरूप हैं, आप निर्मल आत्मा को योगी केवल आकाश के समान देखते हैं । आप ही आदिपुरुष, अद्वितीय, तुर्य, आत्मद्रष्टा, ईश, हेतु, अहेतु तथा विकारी प्रतीयमान होते हैं । हे प्रभो ! हे भगवन् ! हे महेश्वर ! आप अपनी माया से सम्पूर्ण गुणों की प्रसिद्धि के निमित्त सभी से युक्त तथा सभी से भिन्न भी हैं ॥ ४८-५० ॥

हे प्रभो ! जिस प्रकार सूर्य छायारूपों का तिरस्कार करके अपनी कान्ति से प्रकाश करता है, उसी प्रकार दिव्य नेत्रवाले आप सर्वत्र प्रकाश कर रहे हैं ॥ ५१ ॥ हे विभो ! हे भूमन् ! हे गिरिश ! आप गुणों से बिना ढके हुए भी अपने गुणों से समस्त गुणों को दीपक के समान प्रकाशित करते हैं । हे शंकर ! आपकी माया से मोहित बुद्धिवाले पुत्र, स्त्री, गृह आदि में आसक्त होकर पापसमुद्र में डूबते-उतराते रहते हैं ॥ ५२-५३ ॥

जो अजितेन्द्रिय पुरुष प्रारब्धवश इस मनुष्य जन्म को प्राप्तकर आपके चरणों में प्रेम नहीं करता, वह शोक करने योग्य तथा आत्मवंचक है ॥ ५४ ॥ हे भगवन् ! मैं आपकी आज्ञा से बाणासुर की भुजाओं को काटने के लिये आया हूँ, अभिमान के नाश करनेवाले आपने ही इस गर्वित बाणासुर को शाप दिया है ॥ ५५ ॥ हे देव ! आप संग्रामभूमि से लौट जाइये, जिससे आपका शाप व्यर्थ न हो । हे प्रभो ! आप मुझे बाणासुर के हाथ काटने की आज्ञा दीजिये ॥ ५६ ॥

सनत्कुमार बोले — हे मुनीश्वर ! श्रीकृष्ण के इस वचन को सुनकर महेश्वर शिवजी ने श्रीकृष्ण की स्तुति से प्रसन्नचित्त होकर कहा — ॥ ५७ ॥

महेश्वर बोले — हे तात ! आपने सत्य कहा, मैंने दैत्यराज को शाप दिया है । आप मेरी आज्ञा से बाणासुर की भुजाओं को काटने के लिये आये हैं । हे रमानाथ ! हे हरे ! मैं क्या करूँ, मैं सदा भक्तों के अधीन हूँ । हे वीर ! मेरे देखते हुए बाणासुर की भुजाओं का छेदन किस प्रकार हो सकता है । अतः आप मेरी आज्ञा से जृम्भणास्त्र से मेरा जृम्भण (जम्भाई आना) कीजिये, इसके बाद अपना यथेष्ट कार्य कीजिये और सुखी हो जाइये ॥ ५८-६० ॥

सनत्कुमार बोले — हे मुनीश्वर ! शिवजी के इस प्रकार कहने पर वे श्रीकृष्णजी अति विस्मित हुए और अपने युद्धस्थल में आकर प्रसन्न हुए ॥ ६१ ॥ हे व्यासजी ! इसके बाद अनेक अस्त्रों के संचालन में कुशल भगवान् श्रीकृष्णजी ने शीघ्र ही जृम्भणास्त्र का धनुष पर सन्धानकर उसे शिवजी के ऊपर छोड़ा ॥ ६२ ॥

उस जृम्भणास्त्र से जृम्भित हुए शिव को मोहित करके श्रीकृष्ण ने खड्ग, गदा तथा ऋष्टि से बाणासुर की सेनाओं को मार डाला ॥ ६३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में बाणासुररुद्रकृष्णादियुद्धवर्णन नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥

 

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