शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 56
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
छप्पनवाँ अध्याय
बाणासुर का ताण्डव नृत्य द्वारा भगवान् शिव को प्रसन्न करना, शिव द्वारा उसे अनेक मनोऽभिलषित वरदानों की प्राप्ति, बाणासुरकृत शिवस्तुति

नारदजी बोले — हे महामुने ! भार्यासहित अनिरुद्ध तथा श्रीकृष्णजी के द्वारकापुरी में चले जाने पर बाणासुर ने क्या किया, इसको आप कहिये ॥ १ ॥

सनत्कुमार बोले — भार्यासहित अनिरुद्ध तथा श्रीकृष्ण के द्वारका चले जाने पर बाणासुर मन-ही-मन अपने अज्ञान का स्मरण करता हुआ अत्यन्त दुखी हुआ ॥ २ ॥ तब शिवजी के गण नन्दी ने रक्त से संलिप्त शरीरवाले, पश्चात्तापयुक्त तथा दुखी दैत्य बाणासुर से कहा — ॥ ३ ॥

नन्दीश्वर बोले — हे शिव के भक्त बाणासुर ! तुम दुखी न होओ, भगवान् शिवजी भक्तों पर कृपा करनेवाले भक्तवत्सल नामधारी हैं । हे भक्तों में श्रेष्ठ ! जो कुछ हुआ, उनकी इच्छा से हुआ है, इस प्रकार चित्त में मानकर बारंबार शिवजी का स्मरण करो ॥ ४-५ ॥ उन आदिदेव शिवजी में मन लगाकर नित्य भक्तों पर दया करनेवाले महादेव का बारंबार उत्सव करो ॥ ६ ॥ उसके बाद नन्दी के कहने से द्वेषरहित होकर वह दैत्य बाणासुर हर्षित हो धैर्य धारणकर शीघ्र शिवजी के स्थानको चला गया ॥ ७ ॥

वहाँ जाकर प्रभु को नमस्कारकर गर्वरहित होकर प्रेम से पूर्ण मनवाला बाणासुर विह्वल होकर रोने लगा और अनेक स्तोत्रों तथा स्तुतियों से नमस्कार करता हुआ, यथोचित चरणन्यास कर हाथों को चलाता हुआ, अनेक प्रकार के आलीढ आदि स्थान कों तथा प्रत्यालीढ आदि मुद्राओं से शोभित ताण्डव नृत्य करने लगा ॥ ८-१० ॥ वह सहस्रों मुख के बाजों को बजाने, भौंह चलाने, सिर को कँपाने तथा सहस्रों प्रकार से अंग चलाने लगा । धीरे-धीरे अनेक प्रकार के नृत्यों को दिखाकर तथा रुधिर की धाराओं से भूमि को सींचकर अपनी गति तथा अहंकार को विस्मृत किये हुए उस महाभक्त बाणासुर ने चन्द्रशेखर शिव को प्रसन्न किया ॥ ११-१३ ॥

तब नृत्यगीतप्रिय भक्तवत्सल भगवान् शिवजी ने प्रसन्न होकर सुन्दर नृत्य करनेवाले बाणासुर से कहा — ॥ १४ ॥

रुद्र बोले — हे बाणासुर ! हे बलिपुत्र ! हे तात ! मैं तुम्हारे इस नृत्य से प्रसन्न हूँ । हे दैत्येन्द्र ! तुम्हारे मन में जो हो, वह वरदान माँगो ॥ १५ ॥

सनत्कुमार बोले — हे मुने ! तब शिवजी का यह वचन सुनकर उस दैत्येन्द्र बाणासुर ने अपना घाव भरने के लिये वर माँगा, इसके साथ ही बाहुयुद्ध के लिये क्षमा, अक्षय गाणपत्य का भाव तथा उस शोणितपुर नामक नगर में ऊषापुत्र का राज्य हो, देवताओं से तथा विशेषकर विष्णु से निर्वैरता और रजोगुण तथा तमोगुण से युक्त दुष्ट दैत्यभाव का विनाश हो, विशेषकर शिवजी की निर्विकार भक्ति, शिव के भक्तों के प्रति स्नेह तथा सब प्राणियों के प्रति दयाभाव हो । हे मुने ! उस बाण दैत्य ने शिवजी से इन वरों को माँगकर नेत्रों से आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक शिवजी की स्तुति की — ॥ १६-२० ॥

बाणासुर बोला — हे देव ! हे महादेव ! हे शरणागतवत्सल ! हे महेश्वर ! हे दीनबन्धो ! हे दयानिधे ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे कृपासागर ! हे शंकर ! हे प्रभो ! आपने मुझपर बड़ी कृपा की, आपने प्रसन्न होकर मेरा गर्व दूर कर दिया । आप ब्रह्म, परमात्मा, सर्वव्यापी, अखिलेश्वर, ब्रह्माण्डरूपी शरीरवाले, उग्र, ईश, विराट्, सबमें व्याप्त तथा सबसे परे हैं ॥ २१–२३ ॥
हे प्रभो ! आकाश आपकी नाभि, मुख अग्नि, जल वीर्य है, दिशाएँ कान, धुलोक मस्तक, पृथ्वी चरण तथा चन्द्रमा मन है, सूर्य नेत्र, ऋद्धि उदर, इन्द्र भुजाएँ, ब्रह्मा बुद्धि, प्रजापति विसर्ग तथा धर्म आपका हृदय है । हे नाथ ! औषधियाँ आपके रोम हैं, मेघ आपके केश हैं, तीनों गुण आपके तीनों नेत्र हैं, आप सर्वात्मा पुरुष हैं । आपका मुख ब्राह्मण है, भुजाएँ क्षत्रिय, जंघा वैश्य और चरण शूद्र कहे गये हैं ॥ २४–२७ ॥

हे महेश्वर ! आप ही नित्य सब जीवों के उपासना करनेयोग्य हैं, आपका भजन करनेवाला मनुष्य निश्चय ही परम मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥ जो मनुष्य आत्मा के प्रिय ईश्वर आपको त्याग देता है, वह मानो अमृत का त्याग करता हुआ इन्द्रियों के लिये अकल्याणकारी विष का ही भक्षण करता है ॥ २९ ॥ विष्णु, ब्रह्मा, सभी देवता, निर्मलभाववाले मुनि आप प्रिय ईश्वर के सब प्रकार से शरणागत हैं ॥ ३० ॥

सनत्कुमार बोले — इस प्रकार कहकर उस दैत्य बाणासुर ने प्रेम से विह्वल अंगवाला हो शिवजी को प्रणामकर मौन धारण कर लिया । अपने भक्त बाणासुर का यह वचन सुनकर भगवान् सदाशिव ‘तुम सब कुछ प्राप्त करोगे’ — इस प्रकार कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३१-३२ ॥ तब शिवजी के अनुग्रह से महाकालत्व को प्राप्त हुआ वह शिवजी का अनुचर बाणासुर बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ३३ ॥

[हे व्यासजी!] सभी गुरुजनों के परम गुरु तथा समस्त पृथ्वी के मध्य में क्रीड़ा करनेवाले शूलपाणि शंकर तथा बाणासुर के सुन्दर वृत्तान्त का कानों को प्रिय लगनेवाले वचनों में आपसे यह वर्णन किया ॥ ३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में बाणासुरगाणपत्यपदप्राप्तिवर्णन नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥

 

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