शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 59
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
उनसठवाँ अध्याय
काशी के कन्दुकेश्वर शिवलिंग के प्रादुर्भाव में पार्वती द्वारा विदल एवं उत्पल दैत्यों के वध की कथा, रुद्रसंहिता का उपसंहार तथा इसका माहात्म्य

सनत्कुमार बोले — हे व्यासजी ! अब आप प्रेमपूर्वक शिवजी के उस चरित्र को सुनिये, जिस प्रकार उन्होंने संकेत द्वारा दैत्य को बताकर अपनी प्रिया से उस दैत्य का वध कराया था । पूर्व समय में विदल तथा उत्पल नामक दो महाबली दैत्य थे । वे दोनों ही ब्रह्माजी के वर से मनुष्यों से वध न होने का वर पाकर बड़े पराक्रमी तथा अभिमानी हो गये थे । हे ब्रह्मन् ! उन दैत्यों ने अपनी भुजाओं के बल से तीनों लोकों को तृणवत् कर दिया तथा संग्राम में सम्पूर्ण देवताओं को जीत लिया ॥ १-३ ॥

उन दैत्यों से पराजित हुए सब देवता ब्रह्माजी की शरण में गये और आदर से उनको विधिपूर्वक प्रणामकर उन्होंने [दैत्यों के उपद्रव को] कहा ॥ ४ ॥

तब ब्रह्माजी ने उनसे यह कहा कि ये दोनों दैत्य निश्चय ही पार्वतीजी द्वारा मारे जायँगे ।आप सब पार्वती सहित शिवजी का भली-भाँति स्मरण करके धैर्य धारण कीजिये ॥ ५ ॥ देवीसहित भक्तवत्सल तथा कल्याण करनेवाले वे परमेश्वर बहुत शीघ्र ही आपलोगों का कल्याण करेंगे ॥ ६ ॥

सनत्कुमार बोले — तब देवताओं से ऐसा कहकर वे ब्रह्माजी शिव का स्मरण करके मौन हो गये और वे देवता भी प्रसन्न होकर अपने-अपने लोक को चले गये ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् शिवजी की प्रेरणा से देवर्षि नारदजी ने उनके घर जाकर पार्वती की सुन्दरता का वर्णन किया ॥ ८ ॥ तब नारदजी का वचन सुनकर माया से मोहित, विषयों से पीड़ित तथा पार्वती का हरण करने की इच्छावाले उन दोनों दैत्यों ने मन में विचार किया कि प्रारब्ध के उदय होने के कारण हम दोनों को वह पार्वती कब और कहाँ मिलेगी ॥ ९-१० ॥

किसी समय शिवजी अपनी लीला से विहार कर रहे थे, उसी समय पार्वती भी कौतुक से अपनी सखियों के साथ प्रीतिपूर्वक शिवजी के समीप कन्दुकक्रीडा करने लगीं ॥ ११-१२ ॥ ऊपर को गेंद फेंकती हुई, अपने अंगों की लघुता का विस्तार करती हुई, श्वास की सुगन्ध से प्रसन्न हुए भौंरों से घिरने के कारण चंचल नेत्रवाली, केशपाश से माला टूट जाने के कारण अपने रूप को प्रकट करनेवाली, पसीना आने से उसके कणों से कपोलों की पत्ररचना से शोभित, प्रकाशमान चोलांशुक (कुर्ती)-के मार्ग से निकलती हुई अंग की कान्ति से व्याप्त, शोभायमान गेंद को ताड़न करने से लाल हुए करकमलोंवाली और गेंद के पीछे दृष्टि देने से कम्पायमान भौंहरूपी लता के अंचलवाली जगत् की माता पार्वती खेलती हुई दिखायी दीं ॥ १३-१६ ॥

आकाश में विचरते हुए उन दोनों दैत्यों ने कटाक्षों से देखा, मानो उपस्थित मृत्यु ने ही दोनों को गोद में ले लिया हो । ब्रह्माजी के वरदान से गर्वित विदल और उत्पल नामक दोनों दैत्य अपनी भुजाओं के बल से तीनों लोकों को तृण के समान समझते थे ॥ १७-१८ ॥ कामदेव के बाणों से पीड़ित हुए दोनों दैत्य उन देवी पार्वती के हरण की इच्छा से शीघ्र ही शाम्बरी माया करके आकाश से उतरे । अति दुराचारी तथा अति चंचल मनवाले वे दोनों दैत्य माया से गणों का रूप धारणकर पार्वती के समीप आये ॥ १९-२० ॥

तभी दुष्टों का नाश करनेवाले शिवजी ने क्षणमात्र में चंचल नेत्रों से उन दोनों को जान लिया । सर्वस्वरूपी महादेव ने संकट को दूर करनेवाली पार्वती की ओर देखा, उन्होंने समझ लिया कि ये दोनों दैत्य हैं, गण नहीं हैं ॥ २१-२२ ॥ उस समय पार्वतीजी महाकौतुकी तथा कल्याणकारी परमेश्वर अपने पति शिव के नेत्रसंकेत को समझ गयीं ॥ २३ ॥ उस नेत्रसंकेत को जानकर शिवजी की अर्धांगिनी पार्वती ने सहसा उसी गेंद से उन दोनों पर एक साथ प्रहार कर दिया । तब महादेवी पार्वती के गेंद से प्रताड़ित हुए महाबलवान् वे दोनों दुष्ट घूम-घूमकर उसी प्रकार गिर पड़े, जिस प्रकार वायु के वेग से ताड़ के वृक्ष के गुच्छे से पके हुए फल तथा वज्र के प्रहार से सुमेरु पर्वत के शिखर गिर जाते हैं ॥ २४–२६ ॥

कुत्सित कर्म में प्रवृत्त हुए उन दैत्यों को मारकर वह गेंद लिंगस्वरूप को प्राप्त हुआ ॥ २७ ॥ उसी समय से वह लिंग कन्दुकेश्वर नाम से प्रसिद्ध हो गया । सभी दोषों का निवारण करनेवाला वह लिंग ज्येष्ठेश्वर के समीप है ॥ २८ ॥ इसी समय शिव को प्रकट हुआ जानकर विष्णु, ब्रह्मा आदि सब देवता तथा ऋषिगण वहाँ आये ॥ २९ ॥

इसके बाद सम्पूर्ण देवता तथा काशीनिवासी शिवजी से वरों को पाकर उनकी आज्ञा से अपने स्थान को चले गये । पार्वतीसहित महादेव को देखकर उन्होंने अंजलि बाँधकर प्रणामकर भक्ति और आदरपूर्वक मनोहर वाणी से उनकी स्तुति की ॥ ३०-३१ ॥ हे व्यासजी ! उत्तम विहार को जाननेवाले भक्तवत्सल शिवजी पार्वती के साथ क्रीड़ा करके प्रसन्न होकर गणोंसहित अपने लोक को चले गये ॥ ३२ ॥

काशीपुरी में कन्दुकेश्वर नामक लिंग दुष्टों को नष्ट करनेवाला, भोग और मोक्ष को देनेवाला तथा निरन्तर सत्पुरुषों की कामना को पूर्ण करनेवाला है ॥ ३३ ॥ जो मनुष्य इस अद्भुत चरित्र को प्रसन्न होकर सुनता या सुनाता है, पढ़ता या पढ़ाता है, उसको दुःख और भय नहीं होता है । वह इस लोक में सब प्रकार के उत्तम सुखों को भोगकर परलोक में देवगणों के लिये भी दुर्लभ दिव्य गति को प्राप्त करता है ॥ ३४-३५ ॥

हे तात ! भक्तों पर कृपालुता का सूचक, सज्जनों का कल्याण करनेवाला तथा परम अद्भुत शिव-पार्वती का यह चरित्र मैंने आपसे कहा ॥ ३६ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] इस प्रकार शिवजी के चरित्र का वर्णनकर, उन व्यासजी से अनुज्ञा लेकर और उनसे वन्दित होकर मेरे श्रेष्ठ पुत्र सनत्कुमार आकाशमार्ग से शीघ्र ही काशी को चले गये ॥ ३७ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! रुद्रसंहिता के अन्तर्गत सब कामनाओं और सिद्धियों को पूर्ण करनेवाले इस युद्धखण्ड का वर्णन मैंने आपसे किया । शिव को अत्यन्त सन्तुष्ट करनेवाली तथा भुक्ति-मुक्ति को देनेवाली इस सम्पूर्ण रुद्रसंहिता का वर्णन मैंने आपसे किया ॥ ३८-३९ ॥

जो मनुष्य शत्रुबाधा का निवारण करनेवाली इस रुद्रसंहिता को नित्य पढ़ता है, वह सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करता है और उसके बाद मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ॥ ४० ॥

सूतजी बोले — इस प्रकार ब्रह्मा के पुत्र नारदजी अपने पिता से शिवजी के परम यश तथा शिव के शतनामों को सुनकर कृतार्थ एवं शिवानुगामी हो गये ॥ ४१ ॥ मैंने यह ब्रह्मा और नारदजी का सम्पूर्ण संवाद आपसे कहा । शिवजी सम्पूर्ण देवताओं में प्रधान हैं, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ॥ ४२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में विदल और उत्पलदैत्यवधवर्णन नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥
॥ द्वितीय रुद्रसंहिता का पंचम युद्धखण्ड पूर्ण हुआ ॥

 

 

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