शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [प्रथम-सृष्टिखण्ड] – अध्याय 02
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
दूसरा अध्याय
नारद मुनि की तपस्या, इन्द्र द्वारा तपस्या में विघ्न उपस्थित करना, नारद का काम पर विजय पाना और अहंकार से युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र से अपने तप का कथन

सूतजी बोले — [हे मुनियो!] एक समय की बात है, ब्रह्माजी के पुत्र, मुनिशिरोमणि, विनीतचित्त नारदजी ने तपस्या के लिये मन में विचार किया ॥ १ ॥ हिमालय पर्वत में कोई एक परम शोभा-सम्पन्न गुफा थी, जिसके निकट देवनदी गंगा निरन्तर वेगपूर्वक बहती थीं ॥ २ ॥ वहाँ एक महान् दिव्य आश्रम था, जो नाना प्रकार की शोभा से सुशोभित था । वे दिव्यदर्शी नारदजी तपस्या करने के लिये वहाँ गये ॥ ३ ॥

शिवमहापुराण

उस गुफा को देखकर मुनिवर नारदजी बड़े प्रसन्न हुए और सुदीर्घकाल तक वहाँ तपस्या करते रहे । उनका अन्तःकरण शुद्ध था । वे दृढ़तापूर्वक आसन बाँधकर मौन हो प्राणायामपूर्वक समाधि में स्थित हो गये ॥ ४ ॥

हे ब्राह्मणो ! उन्होंने वह समाधि लगायी, जिसमें ब्रह्म का साक्षात्कार करानेवाला ‘अहं ब्रह्मास्मि’ [मैं ब्रह्म हूँ]-यह विज्ञान प्रकट होता है ॥ ५ ॥ मुनिवर नारदजी जब इस प्रकार तपस्या करने लगे, तब देवराज इन्द्र काँप उठे और मानसिक सन्ताप से व्याकुल हो गये ॥ ६ ॥

 

‘वे नारद मुनि मेरा राज्य लेना चाहते हैं’ — मन-ही-मन ऐसा सोचकर इन्द्र ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिये प्रयत्न करने की इच्छा की । उस समय देवनायक इन्द्र ने मन से कामदेव का स्मरण किया । [स्मरण करते ही ] समान बुद्धिवाले कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ आ गये ॥ ७-८ ॥ आये हुए कामदेव को देखकर कपटबुद्धि देवराज इन्द्र शीघ्र ही स्वार्थ के लिये उनको सम्बोधित करते हुए कहने लगे — ॥ ९ ॥

इन्द्र बोले — मित्रों में श्रेष्ठ ! हे महावीर ! हे सर्वदा हितकारक ! तुम प्रेमपूर्वक मेरे वचनों को सुनो और मेरी सहायता करो ॥ १० ॥ हे मित्र ! तुम्हारे बल से मैंने बहुत लोगों की तपस्या का गर्व नष्ट किया है । तुम्हारी कृपा से ही मेरा यह राज्य स्थिर है ॥ ११ ॥ पूर्णरूप से संयमित होकर दृढ़निश्चयी देवर्षि नारद मन से विश्वेश्वर भगवान् शंकर की प्राप्ति का लक्ष्य बनाकर हिमालय की गुफा में तपस्या कर रहे हैं ॥ १२ ॥ मुझे यह शंका है कि [तपस्या से प्रसन्न] ब्रह्मा से वे मेरा राज्य ही न माँग लें । आज ही तुम वहाँ चले जाओ और उनकी तपस्या में विघ्न डालो ॥ १३ ॥

इन्द्र से ऐसी आज्ञा पाकर वे कामदेव वसन्त को साथ लेकर बड़े गर्व से उस स्थान पर गये और अपना उपाय करने लगे ॥ १४ ॥ उन्होंने वहाँ शीघ्र ही अपनी सारी कलाएँ रच डालीं । वसन्त ने भी मदमत्त होकर अनेक प्रकार से अपना प्रभाव प्रकट किया ॥ १५ ॥ हे मुनिवरो ! [कामदेव और वसन्त के अथक प्रयत्न करने पर भी] नारदमुनि के चित्त में विकार नहीं उत्पन्न हुआ । महादेवजी के अनुग्रह से उन दोनों का गर्व चूर्ण हो गया ॥ १६ ॥ हे शौनक आदि महर्षियो ! ऐसा होने में जो कारण था, उसे आदरपूर्वक सुनिये । महादेवजी की कृपा से ही [नारदमुनि पर] कामदेव का कोई प्रभाव नहीं पड़ा ॥ १७ ॥ पहले उसी आश्रम में कामशत्रु भगवान् शिव ने उत्तम तपस्या की थी और वहीं पर उन्होंने मुनियों की तपस्या का नाश करनेवाले कामदेव को शीघ्र ही भस्म कर डाला था ॥ १८ ॥

उस समय रति ने कामदेव को पुनः जीवित करने के लिये देवताओं से प्रार्थना की । तब देवताओं ने समस्त लोकों का कल्याण करनेवाले भगवान शंकर से याचना की । इस पर वे बोले — हे देवताओ ! कुछ समय व्यतीत होने के बाद कामदेव जीवित तो हो जायँगे, परंतु यहाँ उनका कोई उपाय नहीं चल सकेगा ॥ १९-२० ॥ हे अमरगण ! यहाँ खड़े होकर लोग चारों ओर जितनी दूर तक की भूमि को नेत्रों से देख पाते हैं, वहाँ तक कामदेव के बाणों का प्रभाव नहीं चल सकेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

भगवान् शंकर की इस उक्ति के अनुसार उस समय वहाँ नारदजी के प्रति कामदेव का अपना प्रभाव मिथ्या सिद्ध हुआ । वे शीघ्र ही स्वर्गलोक में इन्द्र के पास लौट गये ॥ २२ ॥ वहाँ कामदेव ने अपना सारा वृत्तान्त और मुनि का प्रभाव कह दिया । तत्पश्चात् इन्द्र की आज्ञा से वे वसन्त के साथ अपने स्थान को लौट गये ॥ २३ ॥ उस समय देवराज इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने नारदजी की भूरि-भूरि प्रशंसा की । परंतु शिव की माया से मोहित होने के कारण वे उस पूर्ववृत्तान्त का स्मरण न कर सके ॥ २४ ॥

वास्तव में इस संसार में सभी प्राणियों के लिये शम्भु की माया को जानना अत्यन्त कठिन है । जिसने अपने-आपको शिव को समर्पित कर दिया है, उस भक्त को छोड़कर शेष सम्पूर्ण जगत् उनकी माया से मोहित हो जाता है ॥ २५ ॥ नारदजी भी भगवान् शंकर की कृपा से वहाँ चिरकाल तक तपस्या में लगे रहे । अन्त में अपनी तपस्या को पूर्ण हुआ जानकर वे मुनि उससे विरत हो गये ॥ २६ ॥ कामदेव पर अपनी विजय मानकर उन मुनीश्वर को व्यर्थ ही गर्व हो गया । भगवान् शिव की माया से मोहित होने के कारण उन्हें यथार्थ बात का ज्ञान नहीं रहा ॥ २७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! भगवान् शम्भु की महामाया धन्य है, धन्य है । ब्रह्मा, विष्णु आदि देव भी उसकी गति को नहीं देख पाते हैं ॥ २८ ॥

उस माया से अत्यन्त मोहित मुनिशिरोमणि नारद गर्वयुक्त होकर अपना [कामविजय-सम्बन्धी] वृत्तान्त बताने के लिये तुरंत ही कैलास पर्वत पर गये ॥ २९ ॥ वहाँ रुद्रदेव को नमस्कार करके गर्व से भरे हुए मुनि ने अपने आपको महात्मा, प्रभु तथा कामजेता मानकर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा ॥ ३० ॥ यह सुनकर भक्तवत्सल शंकरजी अपनी माया से मोहित, वास्तविक कारण से अनभिज्ञ तथा भ्रष्ट्रचित्त नारद से कहने लगे — ॥ ३१ ॥

रुद्र बोले — हे तात ! हे नारद ! हे प्राज्ञ ! तुम धन्य हो । मेरी बात सुनो, अबसे फिर कभी ऐसी बात कहीं भी न कहना और विशेषतः भगवान् विष्णु के सामने तो इसकी चर्चा कदापि न करना ॥ ३२ ॥ तुमने मुझसे अपना जो वृत्तान्त बताया है, उसे पूछने पर भी दूसरों के सामने न कहना । यह [सिद्धि सम्बन्धी] वृत्तान्त सर्वथा गुप्त रखनेयोग्य है, इसे कभी किसी से प्रकट नहीं करना चाहिये ॥ ३३ ॥ तुम मुझे विशेष प्रिय हो, इसीलिये [अधिक जोर देकर] मैं तुम्हें यह शिक्षा देता हूँ; क्योंकि तुम भगवान् विष्णु के भक्त हो और उनके भक्त होते हुए मेरे अत्यन्त अनुगामी हो ॥ ३४ ॥

इस प्रकार बहुत कुछ कहकर संसार की सृष्टि करनेवाले भगवान् रुद्र ने नारदजी को शिक्षा दी, परंतु शिव की माया से मोहित होने के कारण नारदजी ने उनकी दी हुई शिक्षा को अपने लिये हितकर नहीं माना । भावी कर्मगति अत्यन्त बलवान् होती है, उसे बुद्धिमान् लोग ही जान सकते हैं । भगवान् शिव की इच्छा को कोई भी मनुष्य नहीं टाल सकता ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर मुनिशिरोमणि नारद ब्रह्मलोक में गये । वहाँ ब्रह्माजी को नमस्कार करके उन्होंने अपने तपोबल से कामदेव को जीत लेने की बात कही ॥ ३७ ॥ उनकी वह बात सुनकर ब्रह्माजी ने भगवान् शिव के चरणारविन्दों का स्मरण करके और समस्त कारण जानकर अपने पुत्र को यह सब कहने से मना किया ॥ ३८ ॥

नारदजी शिव की माया से मोहित थे. अतएव उनके चित्त में मद का अंकुर जम गया था । इसलिये ज्ञानियों में श्रेष्ठ नारदजी ने ब्रह्माजी की बात को अपने लिये हितकर नहीं समझा ॥ ३९ ॥ इस लोक में शिव की जैसी इच्छा होती है, वैसा ही होता है । समस्त विश्व उन्हीं की इच्छा के अधीन है और उन्हीं की वाणीरूपी तन्त्री से बँधा हुआ है ॥ ४० ॥ तब नष्ट बुद्धिवाले नारदजी अपना सारा वृत्तान्त गर्वपूर्वक भगवान् विष्णु के सामने कहने के लिये वहाँ से शीघ्र ही विष्णुलोक में गये ॥ ४१ ॥

नारद मुनि को आते देखकर भगवान् विष्णु बड़े आदर से उठकर शीघ्र ही आगे बढ़े और उन्होंने मुनि को हृदय से लगा लिया । उन्हें मुनि के आगमन के हेतु का ज्ञान पहले से ही था । नारदजी को अपने आसन पर बैठाकर भगवान् शिव के चरणारविन्दों का स्मरण करके श्रीहरि उनसे यथार्थ तथा गर्वनाशक वचन कहने लगे — ॥ ४२-४३ ॥

विष्णु बोले — हे तात ! आप कहाँ से आ रहे हैं ? यहाँ किसलिये आपका आगमन हुआ है ? हे मुनिश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं । आपके शुभागमन से मैं पवित्र हो गया ॥ ४४ ॥

भगवान् विष्णु का यह वचन सुनकर गर्व से भरे हुए नारद मुनि ने मद से मोहित होकर अपना सारा वृत्तान्त बड़े अभिमान के साथ बताया ॥ ४५ ॥ नारद मुनि का वह अहंकारयुक्त वचन सुनकर मन-ही-मन शिव के चरणारविन्दों का स्मरणकर भगवान् विष्णु ने उनके कामविजय के समस्त यथार्थ कारण को पूर्णरूप से जान लिया ॥ ४६ ॥ उसके पश्चात् शिव के आत्मस्वरूप, परम शैव, सुबुद्ध भगवान् विष्णु भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाकर हाथ जोड़कर परमेश्वर कैलासपति शंकर की स्तुति करने लगे ॥ ४७ ॥

विष्णु बोले — हे देवेश्वर ! हे महादेव ! हे परमेश्वर ! आप प्रसन्न हों । हे शिव ! आप धन्य हैं और सबको विमोहित करनेवाली आपकी माया भी धन्य है ॥ ४८ ॥

इस प्रकार परमात्मा शिव की स्तुति करके हरि अपने नेत्रों को बन्दकर उनके चरणकमलों में ध्यानस्थित होकर चुप हो गये ॥ ४९ ॥ विश्वपालक हरि शिव के द्वारा जो होना था, उसे हृदय से जानकर शिव के आज्ञानुसार मुनिश्रेष्ठ नारदजी से कहने लगे — ॥ ५० ॥

विष्णु बोले — हे मुनिश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं, आप तपस्या के भण्डार हैं और आपका हृदय भी बड़ा उदार है । हे मुने ! जिसके भीतर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नहीं होते, उसीके मन में समस्त दुःखों को देनेवाले काम, मोह आदि विकार शीघ्र उत्पन्न होते हैं । आप तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं और सदा ज्ञान-वैराग्य से युक्त रहते हैं, फिर आपमें कामविकार कैसे आ सकता है । आप तो जन्म से निर्विकार तथा शुद्ध बुद्धिवाले हैं ॥ ५१-५२ ॥

श्रीहरि की कही हुई बहुत-सी बातें सुनकर मुनिशिरोमणि नारदजी जोर-जोर से हँसने लगे और मन-ही-मन भगवान् को प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे — ॥ ५३ ॥

नारदजी बोले — हे स्वामिन् ! यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तब कामदेव का मेरे ऊपर क्या प्रभाव हो सकता है । ऐसा कहकर भगवान् के चरणों में मस्तक झुकाकर इच्छानुसार विचरनेवाले नारदमुनि वहाँ से चले गये ॥ ५४-५५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के सृष्टिखण्ड में नारदतपोवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

 

 

 

 

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