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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [द्वितीय-सतीखण्ड] – अध्याय 03
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
तीसरा अध्याय
कामदेव को विविध नामों एवं वरों की प्राप्ति, काम के प्रभाव से ब्रह्मा तथा ऋषिगणों का मुग्ध होना, धर्म द्वारा स्तुति करने पर भगवान् शिव का प्राकट्य और ब्रह्मा तथा ऋषियों को समझाना, ब्रह्मा तथा ऋषियों से अग्निष्वात्त आदि पितृगणों की उत्पत्ति, ब्रह्मा द्वारा काम को शाप की प्राप्ति तथा निवारण का उपाय

ब्रह्माजी बोले — तब मेरे अभिप्राय को जाननेवाले मेरे पुत्र मरीचि आदि मुनियों ने उसके उचित नाम रखे ॥ १ ॥ उन सृष्टिकर्ता दक्ष आदि ने उसका मुख देखते ही तथा [उसकी अन्य चेष्टाओं से] उसके समस्त चरित्र को जानकर उसे रहने का स्थान दिया तथा पत्नी भी दे दी ॥ २ ॥ मेरे पुत्र मरीचि आदि ऋषियों ने एकत्रित होकर नामों का निश्चय करके उस पुरुष को नाम भी बता दिये ॥ ३ ॥

शिवमहापुराण

ऋषिगण बोले — तुमने ब्रह्माजी से उत्पन्न होते ही हमलोगों के मन को मथ डाला है, इसलिये तुम लोक में ‘मन्मथ’ नाम से प्रसिद्ध होओगे ॥ ४ ॥ सभी लोकों में तुम सुन्दर रूपवाले हो, तुम्हारे समान कोई भी सुन्दर नहीं है, इसलिये हे मनोभव ! ‘काम’ नाम से भी तुम विख्यात होओगे ॥ ५ ॥ तुम सभी को मदोन्मत्त करने के कारण ‘मदन’ कहे जाओगे । अहंकारयुक्त होकर दर्प से उत्पन्न हुए हो, इसलिये तुम ‘कन्दर्प’ नाम से भी संसार में प्रसिद्ध होओगे ॥ ६ ॥ तुम्हारे समान किसी भी देवता का पराक्रम नहीं होगा, अतः तुम्हारे लिये सभी स्थान होंगे और तुम सर्वव्यापी होओगे ॥ ७ ॥ ये जो आदिप्रजापति पुरुषोत्तम दक्ष हैं, वे स्वयं ही तुमको योग्य पत्नी के रूप में सुन्दर स्त्री प्रदान करेंगे ॥ ८ ॥

ब्रह्मा के मन से उत्पन्न हुई यह सुन्दर रूपवाली कन्या सन्ध्या नाम से सभी लोकों में विख्यात होगी ॥ ९ ॥ अच्छी प्रकार से ध्यान करते हुए ब्रह्माजी के हृदय से उत्पन्न होने के कारण तेज आभावाली तथा मल्लिकापुष्प के सदृश यह कन्या सन्ध्या — इस नाम से विख्यात होगी ॥ १० ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कामदेव अपने पाँच पुष्प-आयुधों को लेकर वहीं पर गुप्त रूप से स्थित होकर विचार करने लगा — ॥ ११ ॥

हर्षण, रोचन, मोहन, शोषण तथा मारण नामक ये [मेरे] पाँच अस्त्र मुनियों को भी मोहित करनेवाले कहे गये हैं ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी ने मुझे जिस सनातन कर्म को करने के लिये आदेश दिया है, उसे मैं यहाँ मुनियों और ब्रह्माजी के सन्निकट ही करूँगा ॥ १३ ॥ यहाँ बहुत-से मुनिगण तथा स्वयं प्रजापति ब्रह्माजी भी उपस्थित हैं । ये लोग साक्षीरूप से विद्यमान हैं, इसलिये मेरे कर्म की सत्यता का आरम्भ भी हो जायगा ॥ १४ ॥ यह ब्रह्माजी के द्वारा सन्ध्या नाम से कही गयी यह कन्या भी मेरे वचन का समर्थन करेगी । मैं इसी स्थान पर अपने कर्म की परीक्षा करके ही प्रयोग द्वारा सबको मोहित करूँगा ॥ १५ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार विचार करने के अनन्तर मन में निश्चय करके वह अपने पुष्प के धनुष पर पुष्प के बाणों को चढ़ाने लगा । श्रेष्ठ धनुर्धारी कामदेव ने धनुष खींचने की मुद्रा में स्थित होकर यत्नपूर्वक धनुष चढ़ाकर उसे मण्डलाकार किया ॥ १६-१७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! जब इस प्रकार के धनुष पर कामदेव ने अपना बाण चढ़ाया, तो उसी समय [मनको] आह्लादित करनेवाली सुगन्धित वायु बहने लगी ॥ १८ ॥ उस समय कामदेव ने तीक्ष्ण पुष्पबाणों से मुझ ब्रह्मा को तथा सभी मानसपुत्रों को मोहित कर लिया ॥ १९ ॥ हे मुने ! तत्पश्चात् सभी मुनिगण और मैं भी मोहित हो गया, सभी के मन में कामविकार उत्पन्न हो गया ॥ २० ॥

विकार से युक्त होने के कारण सभी लोग सन्ध्या की ओर बार-बार देखने लगे । सभी के मन में काम का उद्रेक हो गया; क्योंकि स्त्री काम को बढ़ानेवाली होती है ॥ २१ ॥ उस कामदेव ने सभी को बार-बार मोहित करके जिस किसी भी तरह से वे कामविकार को प्राप्त हों, वैसा उन सबको कर दिया ॥ २२ ॥ उस स्त्री को देखकर जब मैं ब्रह्मा उन्मत्त इन्द्रियोंवाला हो गया, उस समय मेरे शरीर से उनचास भाव उत्पन्न हो गये ॥ २३ ॥

कामबाण के प्रहार से उन सभी के द्वारा देखी जाती हुई वह सन्ध्या भी अपने कटाक्षों के आवरण से अनेक प्रकार के भाव प्रकट करने लगी ॥ २४ ॥ स्वभाव से सुन्दरी वह सन्ध्या मन से उत्पन्न उन भावों को प्रकट करती हुई छोटी-छोटी लहरों से युक्त गंगा की तरह शोभित होने लगी ॥ २५ ॥ हे मुने ! इस प्रकार के भावों से युक्त सन्ध्या को देखकर काम से परिपूर्ण शरीरवाला मैं ब्रह्मा उसकी अभिलाषा करने लगा ॥ २६ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! तब मरीचि, अत्रि आदि सभी मुनि तथा दक्ष प्रजापति आदि विकृत इन्द्रियोंवाले हो गये । दक्ष-मरीचि आदि ऋषियों तथा मुझे और सन्ध्या को भी कामविकार से युक्त देखकर कामदेव को अपने कार्य पर विश्वास हो गया ॥ २७-२८ ॥

अब कामदेव के मन में यह विश्वास हो गया कि ब्रह्मा ने मुझे जिस कार्य के लिये आदेश दिया है, मैं वह कार्य करने में पूर्ण रूप से सक्षम हूँ ॥ २९ ॥ [ब्रह्माजी के पुत्र] धर्म ने अपने पिता तथा भाइयों की ऐसी दशा देखकर धर्म की रक्षा करनेवाले भगवान् सदाशिव का स्मरण किया ॥ ३० ॥ धर्म ने धर्मपालक शिवजी का मन से स्मरणकर दीनभावना से युक्त होकर अनेक प्रकार के वाक्यों से उनकी इस प्रकार स्तुति की — ॥ ३१ ॥

॥ धर्म उवाच ॥
देवदेव महादेव धर्मपाल नमोस्तु ते ।
सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता शंभो त्वमेव हि ॥ ३२ ॥
सृष्टौ ब्रह्मा स्थितौ विष्णुः प्रलये हररूपधृक् ।
रजस्सत्त्वतमोभिश्च त्रिगुणैरगुणः प्रभो ॥ ३३ ॥
निस्त्रैगुण्यः शिवः साक्षात्तुर्यश्च प्रकृतेः परः ।
निर्गुणो निर्विकारी त्वं नानालीलाविशारदः ॥ ३४ ॥
रक्षरक्ष महादेव पापान्मां दुस्तरादितः ।

धर्म बोला — हे देवाधिदेव ! हे महादेव ! हे धर्मपाल ! आपको नमस्कार है । हे शम्भो ! सृष्टि, पालन तथा विनाश करनेवाले आप ही हैं ॥ ३२ ॥ हे प्रभो ! आपने निर्गुण होकर भी रज, सत्त्व तथा तमोगुण से सृष्टिकार्य के लिये ब्रह्मा, पालन के लिये विष्णु तथा प्रलय के लिये रुद्रस्वरूप धारण किया है ॥ ३३ ॥ [हे प्रभो !] आप शिव तीनों गुणों से रहित, प्रकृति से परे, तुरीयावस्था में स्थित, निर्गुण, निर्विकार तथा अनेक प्रकार की लीलाओं में प्रवीण हैं ॥ ३४ ॥ हे महादेव ! इस भयंकर पाप से मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये, इस समय मेरे पिता तथा मेरे भाई पापबुद्धिवाले हो गये हैं ॥ ३५ ॥

ब्रह्माजी बोले — धर्म के द्वारा परमात्मा प्रभु की जब इस प्रकार स्तुति की गयी, तब वे आत्मभू शिव धर्म की रक्षा करने के लिये वहीं प्रकट हो गये ॥ ३६ ॥ वे शम्भु आकाश में स्थित होकर मुझ ब्रह्मा तथा दक्ष आदि को इस प्रकार से मोहित देखकर मन-ही-मन हँसने लगे । हे मुनिश्रेष्ठ ! उन सबको साधुवाद देकर और बार-बार हँसकर मुझे लज्जित करते हुए वे वृषभध्वज यह कहने लगे — ॥ ३७-३८ ॥

शिवजी बोले — हे ब्रह्मन् ! अपनी कन्या को देखकर आपको कामभाव कैसे उत्पन्न हो गया ? वेदों का अनुसरण करनेवालों के लिये यह उचित नहीं है ॥ ३९ ॥ बुद्धिमान् को चाहिये कि माता, भगिनी, भ्रातृपत्नी तथा कन्या को समान भाव से देखे । इन्हें कदापि कुदृष्टि से न देखे ॥ ४० ॥ वेदमार्ग का यह सिद्धान्त तो आपके मुख में स्थित है । हे विधे ! आपने काम के उत्पन्न होते ही उसे कैसे विस्मृत कर दिया ! ॥ ४१ ॥ हे चतुरानन ! आपके मन में धैर्य जागरूक रहना चाहिये । आश्चर्य है कि आपने इस काम के वशीभूत हो कन्या से रमण करने के लिये इस प्रकार अपने धैर्य को नष्ट कर दिया ॥ ४२ ॥ एकान्त-योगी तथा सर्वदा सूर्य का दर्शन करनेवाले दक्ष, मरीचि आदि भी स्त्री में आसक्त चित्तवाले हो गये ॥ ४३ ॥ देश-काल का ज्ञान न रखनेवाले, मन्दात्मा तथा अल्प बुद्धिवाले कामदेव ने भी अपनी प्रबलता से कामबाणों द्वारा आपलोगों को विकारयुक्त कैसे बना दिया ? ॥ ४४ ॥

उस पुरुष को तथा उसके वेद, शास्त्र आदि के ज्ञान को धिक्कार है, जिसके मन को स्त्री हर लेती है और धैर्य से विचलित करके मन को लोलुपता में डुबा देती है ॥ ४५ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार सदाशिव के वचन को सुनकर मैं दुगुनी लज्जा में पड़ गया, उस समय मेरा शरीर पसीने से पानी-पानी हो उठा ॥ ४६ ॥ हे मुने ! तत्पश्चात् कामरूपिणी सन्ध्या को ग्रहण करने की इच्छा करते हुए भी मैंने शिवजी के भय से इन्द्रियों को वश में करके कामविकार को दूर कर दिया ॥ ४७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उस समय मेरे शरीर से [लज्जा के कारण] जो पसीना गिरा, उसी से अग्निष्वात्त तथा बर्हिषद् नामक पितृगणों की उत्पत्ति हुई । अंजन के समान कृष्णवर्णवाले और विकसित कमल के समान नेत्रवाले वे पितर महायोगी, पुण्यशील तथा संसार से विमुख रहनेवाले हैं ॥ ४८-४९ ॥ हे मुने ! चौंसठ हजार अग्निष्वात्त पितर और छियासी हजार बर्हिषद् पितर कहे गये हैं ॥ ५० ॥

उसी समय दक्ष के शरीर से भी स्वेद निकलकर पृथ्वी पर गिरा, उससे समस्त गुणसम्पन्न परम मनोहर एक स्त्री की उत्पत्ति हुई ॥ ५१ ॥ उसका शरीर सूक्ष्म था, कटिप्रदेश सम था, शरीर की रोमावली अत्यन्त सूक्ष्म थी, उसके अंग कोमल तथा दाँत परम सुन्दर थे और वह तपे हुए सोने के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रही थी ॥ ५२ ॥ वह अपने शरीर के समस्त अवयवों से बड़ी मनोहर प्रतीत हो रही थी तथा उसका मुखकमल पूर्ण चन्द्रमा के समान था । उसका नाम रति था, जो मुनियों के भी मन को मोहित करनेवाली थी ॥ ५३ ॥

क्रतु, वसिष्ठ, पुलस्त्य तथा अंगिरा को छोड़कर मरीचि आदि छः ऋषियों ने अपनी इन्द्रियों का निग्रह कर लिया । हे मुनिश्रेष्ठ ! इन क्रतु आदि चार ऋषियों का वीर्य पृथ्वी पर गिरा, उन्हीं से दूसरे पितृगणों की उत्पत्ति हुई ॥ ५४-५५ ॥ इन पितरों में सोमपा, आज्यपा, सुकालिन् तथा हविष्मान् मुख्य हैं । ये सभी पुत्र कव्य को धारण करनेवाले कहे गये हैं ॥ ५६ ॥ क्रतु के पुत्र सोमपा नामक पितर, वसिष्ठ के पुत्र सुकालिन् नामक पितर, पुलस्त्य के पुत्र आज्यपा तथा अंगिरा के पुत्र हविष्मान् नामक पितर के रूप में उत्पन्न हुए ॥ ५७ ॥ हे विप्रेन्द्र ! इस प्रकार अग्निष्वात्त आदि पितरों के उत्पन्न हो जाने पर पितरों के मध्य वे सभी कव्य का वहन करनेवाले कव्यवाट् हुए ॥ ५८ ॥ इस प्रकार सन्ध्या पितरों को उत्पन्न करनेवाली बनकर उनकी उद्देश्यसिद्धि में लगी रहती थी । यह शिव के द्वारा देख लिये जाने के कारण दोषों से रहित तथा धर्म-कर्म में परायण रहती थी ॥ ५९ ॥

इसी बीच सदाशिव समस्त महर्षियों पर अनुग्रह करके तथा विधिपूर्वक धर्म की रक्षाकर शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये ॥ ६० ॥

उसके बाद शम्भु सदाशिव के वाक्यों से मैं पितामह लज्जित हुआ । मैंने अपनी भुकुटि चढ़ा ली और कामदेव पर बड़ा क्रुद्ध हुआ ॥ ६१ ॥ हे मुने ! मेरे मुख को देखकर और मेरा अभिप्राय समझकर रुद्र से भयभीत उस कामदेव ने अपने बाणों को लौटा लिया ॥ ६२ ॥ हे मुने ! तब मैं पद्मयोनि ब्रह्मा कोपयुक्त होकर इस प्रकार जलने लगा, जिस प्रकार भस्म करने की इच्छावाली अति बलवान् अग्नि प्रज्वलित हो उठती है ॥ ६३ ॥

[मैंने क्रोध में भरकर उसे यह शाप दे दिया] अहंकार से मोहित हुआ यह कन्दर्प शिवजी के प्रति दुष्कर कर्म करके उनकी नेत्राग्नि से भस्म हो जायगा ॥ ६४ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार मुझ ब्रह्मा ने पितृसमूहों के तथा जितेन्द्रिय मुनियों के सामने इस काम को यह अमित शाप दिया ॥ ६५ ॥ मेरे शाप को सुनकर भयभीत हुआ कामदेव उसी क्षण अपने बाणों को त्यागकर सबके सामने प्रकट हो गया ॥ ६६ ॥ हे मुने ! उसका सारा गर्व नष्ट हो गया । तब वह दक्ष आदि मेरे पुत्रों, [अग्निष्वात्तादि] पितरों, सन्ध्या एवं मुझ ब्रह्मा के सामने ही सबको सुनाते हुए यह कहने लगा — ॥ ६७ ॥

काम बोला — हे ब्रह्मन् ! आप तो न्यायमार्ग का अनुसरण करनेवाले हैं, हे लोकेश ! तब मुझ निरपराध को आपने इस प्रकार दारुण शाप क्यों दे दिया ? ॥ ६८ ॥ हे ब्रह्मन् ! आपने मेरे लिये जो कहा था, मैंने तो वही कार्य किया । आपको मुझे शाप देना ठीक नहीं है; क्योंकि मैंने [आपकी आज्ञा के विरुद्ध] कोई अन्य कार्य नहीं किया है ॥ ६९ ॥ [हे ब्रह्मन् !] मैं [ब्रह्मा], विष्णु तथा शिव — ये सब भी तुम्हारे बाणों के वशीभूत होकर रहेंगे — ऐसा जो आपने कहा था, उसी के अनुसार ही मैंने परीक्षा ली थी ॥ ७० ॥ अतः हे ब्रह्मन् ! इसमें मेरा अपराध नहीं है । हे देव ! हे जगत्पते ! यदि आपने मुझ निरपराध को यह दारुण शाप दे ही दिया, तो इसका कोई समय भी निश्चित कर दीजिये ॥ ७१ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] तब मैं जगत्पति ब्रह्मा उसकी यह बात सुनकर चित्त को वश में करनेवाले काम को बार-बार डाँटता हुआ इस प्रकार बोला — ॥ ७२ ॥

[हे काम !] यह सन्ध्या मेरी कन्या है, तुमने इसकी ओर सकाम करने के लिये मुझे [अपने कामका] लक्ष्य बनाया । इसलिये मैंने तुम्हें शाप दिया ॥ ७३ ॥ हे मनोभव ! अब मेरा क्रोध शान्त हो गया है, अतः मैं तुमसे कह रहा हूँ, उसे सुनो । तुम सन्देहरहित होकर सुखी हो जाओ और भय छोड़ो ॥ ७४ ॥ हे मदन ! तुम महादेवजी की नेत्राग्नि से भस्म होकर बाद में शीघ्र ही इसीके समान शरीर प्राप्त करोगे ॥ ७५ ॥ जब शंकरजी विवाह करेंगे, तब वे अनायास ही तुम्हें शरीर प्रदान करेंगे ॥ ७६ ॥

[हे नारद!] काम से इस प्रकार कहकर मैं लोकपितामह उन मानसपुत्र मुनिवरों के देखते-देखते ही अन्तर्धान हो गया ॥ ७७ ॥ इस प्रकार मेरे वचन को सुनकर कामदेव तथा मेरे वे सभी मानसपुत्र प्रसन्न हो गये और शीघ्रता से अपने-अपने घरों को चले गये ॥ ७८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के द्वितीय सतीखण्ड में कामशापानुग्रहवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

 

 

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