शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [द्वितीय-सतीखण्ड] – अध्याय 16
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
सोलहवाँ अध्याय
ब्रह्मा और विष्णु द्वारा शिव से विवाह के लिये प्रार्थना करना तथा उनकी इसके लिये स्वीकति

ब्रह्माजी बोले — भगवान् विष्णु आदि देवताओं द्वारा की गयी स्तुति को सुनकर सबकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और जोर से हँसे ॥ १ ॥ सपत्नीक ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु को साथ आया हुआ देखकर महादेवजी ने हमलोगों से यथोचित वार्तालाप करके हमारे आगमन का कारण पूछा ॥ २ ॥

शिवमहापुराण

रुद्र बोले — हे हरे ! हे विधे ! हे देवताओ और महर्षियो ! आपलोग आज निर्भय होकर अपने आने का ठीक-ठीक कारण बताइये । आपलोगों की स्तुति से मैं [बहुत ही] प्रसन्न हूँ । आपलोग किसलिये यहाँ आये हैं, कौन-सा कार्य आ पड़ा है, वह सब मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ३-४ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! महादेवजी के इस प्रकार पूछने पर सभी लोकों का पितामह मैं ब्रह्मा भगवान् विष्णु की आज्ञा से कहने लगा ॥ ५ ॥ हे देवाधिदेव ! हे महादेव ! हे करुणासागर ! हे प्रभो ! हम दोनों इन देवताओं और मुनियों के साथ जिस उद्देश्य से यहाँ आये हैं, उसे सुनिये ॥ ६ ॥ हे वृषभध्वज ! विशेष रूप से आपके लिये ही हमलोग यहाँ आये हैं; क्योंकि हम तीनों सहायतार्थी हैं, [सृष्टिचक्र के संचालनरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिये| एक-दूसरे के सहायक हैं] सहार्थी को सदा परस्पर यथायोग्य सहयोग करना चाहिये, अन्यथा यह जगत् टिक नहीं सकता ॥ ७ ॥ हे महेश्वर ! कुछ ऐसे असुर उत्पन्न होंगे, जो मेरे द्वारा मारे जायँगे, कुछ भगवान् विष्णु के द्वारा और कुछ आपके द्वारा वध्य होंगे । हे महाप्रभो ! कुछ आपके वीर्य से उत्पन्न पुत्र द्वारा मारे जायँगे और कुछ असुर आपकी माया के द्वारा वध को प्राप्त होंगे ॥ ८-९ ॥

आप भगवान् शंकर की कृपा से ही देवताओं को सदा उत्तम सुख प्राप्त होगा । घोर असुरों का विनाश करके आप जगत् को सदा स्वास्थ्य एवं अभय प्रदान करेंगे ॥ १० ॥ आप राग-द्वेषरहित, योगयुक्त एवं सर्वथा दयालु हैं, इसलिये हो सकता है कि आप असुरों का वध न करें । हे ईश ! जब ये आराधना करके वर प्राप्त कर लेंगे, तब सृष्टि की स्थिति किस प्रकार रहेगी ? इसलिये हे वृषभध्वज ! उचित यही है कि आप [इस सृष्टि की स्थिति के लिये] सदैव असुरों का वध करते रहें ॥ ११-१२ ॥ यदि सृष्टि, पालन तथा संहारकर्म न करने हों, तब हमारा तथा माया का भिन्न-भिन्न शरीर धारण करना सार्थक नहीं रहेगा ॥ १३ ॥ वास्तव में हम तीनों एक ही स्वरूपवाले हैं, किंतु कार्य के भेद से भिन्न-भिन्न शरीर धारण करके स्थित हैं । यदि कार्यभेद न सिद्ध हो, तब तो हमारे रूपभेद का कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १४ ॥

परमात्मा महेश्वर एक होते हुए भी अपनी माया के कारण ही तीन रूपों में विभक्त हैं, वे प्रभु अपनी लीला से स्वतन्त्र हैं ॥ १५ ॥ श्रीहरि उनके वामांग से उत्पन्न हुए हैं, मैं ब्रह्मा उनके दाहिने अंग से उत्पन्न हुआ हूँ और आप उन सदाशिव के हृदय से उत्पन्न हैं, अतः आप ही शिवजी के पूर्ण रूप हैं ॥ १६ ॥ हे प्रभो ! इस प्रकार भिन्न स्वरूपवाले हम तीन रूपों में प्रकट हैं और जो [वस्तुतः] उन शिवा-शिव के पुत्र ही हैं । हे सनातन ! इस यथार्थ तत्त्व को आप हृदय से अनुभव कीजिये ॥ १७ ॥ हे प्रभो ! मैं और भगवान् विष्णु आपके आदेश से प्रसन्नतापूर्वक लोक की सृष्टि और पालन का कार्य कर रहे हैं तथा कार्यकारणवश सपत्नीक भी हो गये हैं ॥ १८ ॥

अतः आप भी विश्वहित के लिये तथा देवताओं के सुख के लिये एक परम सुन्दरी स्त्री को पत्नी के रूप में ग्रहण करें ॥ १९ ॥ हे महेश्वर ! एक और बात सुनिये । मुझे पहले के वृत्तान्त का स्मरण हो आया है, जिसे पूर्वकाल में आपने ही शिवस्वरूप से हमारे सामने कहा था ॥ २० ॥

हे ब्रह्मन् ! मेरा ऐसा उत्तम रूप आपके अंग से प्रकट होगा, जो लोक में रुद्र नाम से प्रसिद्ध होगा ॥ २१ ॥ आप ब्रह्मा सृष्टिकर्ता होंगे, श्रीहरि जगत् का पालन करनेवाले होंगे तथा मैं सगुण रुद्ररूप होकर संहार करनेवाला होऊँगा ॥ २२ ॥ मैं एक स्त्री के साथ विवाह करके लोक का उत्तम कार्य करूंगा, [हे स्वामिन् !] आप अपने द्वारा कहे गये वचन को याद करके अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण कीजिये ॥ २३ ॥ हे स्वामिन् ! आपका आदेश है कि मैं सृष्टि करूँ, श्रीहरि पालन करें और आप स्वयं संहार के हेतु बनकर प्रकट हों, सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ता के रूप में प्रकट हुए हैं । आपके बिना हम दोनों अपना-अपना कार्य करने में समर्थ नहीं हैं । अतः आप लोकहित के कार्य में तत्पर एक कामिनी को स्वीकार करें ॥ २४-२५ ॥ हे शम्भो ! जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णु की और सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इस समय अपनी सहचरी कान्ता को ग्रहण करें ॥ २६ ॥

ब्रह्माजी बोले — मेरी यह बात सुनकर मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाले वे लोकेश हर श्रीहरि के सामने मुझसे कहने लगे — ॥ २७ ॥

ईश्वर बोले — हे ब्रह्मन् ! हे विष्णो ! आप दोनों मुझे सदा ही अत्यन्त प्रिय हैं, आप दोनों को देखकर मुझे बड़ा आनन्द मिलता है ॥ २८ ॥ आपलोग समस्त देवताओं में श्रेष्ठ और त्रिलोकी के स्वामी हैं । लोकहित के कार्य में मन लगाये रहनेवाले आपदोनों का वचन अत्यन्त गौरवपूर्ण है ॥ २९ ॥ किंतु हे सुरश्रेष्ठगण ! सदा तपस्या में संलग्न रहकर संसार से विरत रहनेवाले और योगी के रूप में प्रसिद्ध मेरे लिये विवाह करना उचित नहीं है; जो निवृत्ति के सुन्दर मार्गपर स्थित, अपनी आत्मा में ही रमण करनेवाला, निरंजन, अवधूत देहवाला, ज्ञानी, आत्मदर्शी, कामना से शून्य, विकाररहित, अभोगी, सदा अपवित्र और अमंगल वेशधारी है, उसे संसार में कामिनी से क्या प्रयोजन है, यह इस समय मुझे बताइये ॥ ३०-३२ ॥

मुझे तो सदा केवल योगमें लगे रहनेपर ही आनन्द आता है, ज्ञानहीन पुरुष ही भोग को अधिक महत्त्व देता है । संसार में विवाह करना बहुत बड़ा बन्धन समझना चाहिये । इसलिये मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि उसमें मेरी अभिरुचि नहीं है । आत्मा ही अपना उत्तम अर्थ या स्वार्थ है, उसका भली-भाँति चिन्तन करने के कारण [लौकिक] स्वार्थ में मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है, तथापि आपने जगत् के हित के लिये हितकर जो कुछ कहा है, उसे मैं करूंगा । आपके वचन को गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बात को पूर्ण करने के लिये मैं विवाह अवश्य करूंगा; क्योंकि मैं सदा अपने भक्तों के अधीन हूँ ॥ ३३-३६ ॥

हे हरे ! हे ब्रह्मन् ! परंतु मैं जैसी नारी को प्रिय पत्नी के रूप में ग्रहण करूँगा और जिस शर्त के साथ करूँगा, उसे सुनें । मेरा वचन सर्वथा उचित है । जो नारी मेरे तेज को विभागपूर्वक ग्रहण करने में समर्थ हो, उस योगिनी तथा कामरूपिणी स्त्री को मेरी पत्नी बनाने के लिये बतायें । जब मैं योग में तत्पर रहूँ, तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा और जब मैं कामासक्त होऊँ, तब उसे भी कामिनी के रूप में रहना होगा ॥ ३७-३९ ॥ वेदवेत्ता विद्वान् जिन्हें अविनाशी बतलाते हैं, उन ज्योतिःस्वरूप सनातन शिवतत्त्व का मैं सदा चिन्तन करता हूँ । हे ब्रह्मन् ! उन सदाशिव के चिन्तन में जब मैं न लगा होऊँ तब उस कामिनी के साथ मैं समागम कर सकता हूँ । जो मेरे शिव-चिन्तन में विघ्न डालेगी, वह दुर्भगा स्त्री मेरी भार्या न बने ॥ ४०-४१ ॥ आप ब्रह्मा, विष्णु और मैं तीनों ही महाभाग्यशाली ब्रह्मस्वरूप शिवजी के अंशभूत हैं, अतः हमारे लिये उनका नित्य चिन्तन करना उचित है ॥ ४२ ॥

हे कमलासन ! उनके चिन्तन के लिये मैं बिना विवाह के भी रह लूँगा, किंतु उनका चिन्तन छोड़कर विवाह नहीं करूँगा । अतः आपलोग मुझे इस प्रकार की पत्नी बताइये, जो सदा मेरे कर्म के अनुकूल चल सके ॥ ४३ ॥ हे ब्रह्मन् ! उसमें भी मेरी एक शर्त है, उसे आप सुनें । यदि उस स्त्री का मुझपर और मेरे वचनों पर अविश्वास होगा, तो मैं उसे त्याग दूँगा ॥ ४४ ॥

ब्रह्माजी बोले — उन रुद्र की बात सुनकर मैंने और श्रीविष्णु ने मन्द मुसकान के साथ मन-ही-मन प्रसन्नता का अनुभव किया, फिर मैंने विनम्र होकर यह कहा — ॥ ४५ ॥

हे नाथ ! हे महेश्वर ! हे प्रभो ! आपने जिस प्रकार की स्त्री को निर्देश किया है, वैसी ही स्त्री के विषय में मैं आपको प्रसन्नतापूर्वक बता रहा हूँ ॥ ४६ ॥ वे उमा जगत् की कार्यसिद्धि के लिये भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट हुई हैं । हे प्रभो ! सरस्वती और लक्ष्मी ये दो रूप धारण करके वे पहले ही प्रकट हो चुकी हैं ॥ ४७ ॥

महालक्ष्मी तो विष्णु की कान्ता तथा सरस्वती मेरी कान्ता हुई हैं । लोकहित का कार्य करने की इच्छावाली वे अब हमारे लिये तीसरा रूप धारण करके प्रकट हुई हैं ॥ ४८ ॥ हे प्रभो ! वे शिवा ‘सती’ नाम से दक्षपुत्री के रूप में अवतीर्ण हुई हैं । वे ही आपकी ऐसी भार्या हो सकती हैं, जो सदा आपके लिये हितकारिणी होंगी ॥ ४९ ॥

हे देवेश ! वे दृढव्रत में स्थित होकर आपके लिये तप कर रही हैं । वे महातेजस्विनी सती आपको पतिरूप में प्राप्त करने की इच्छुक हैं ॥ ५० ॥ हे महेश्वर ! [उन सती के ऊपर] कृपा कीजिये, उन्हें वर प्रदान करने के लिये जाइये और वैसा वर देकर उनके साथ विवाह कीजिये ॥ ५१ ॥ हे शंकर ! भगवान् विष्णु की, मेरी तथा सभी देवताओं की यही इच्छा है । आप अपनी शुभ दृष्टि से हमारी इच्छा को पूर्ण कीजिये, जिससे हम इस उत्सव को आदरपूर्वक देख सकें ॥ ५२ ॥ ऐसा होने से तीनों लोकों में सुख देनेवाला परम मंगल होगा और सबकी समस्त चिन्ताएँ मिट जायँगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥

मेरी बात पूरी होने पर अच्युत मधुसूदन लीला से रूप धारण करनेवाले भक्तवत्सल ईशान से कहने लगे — ॥ ५४ ॥

विष्णुजी बोले — हे देवाधिदेव ! हे महादेव ! हे करुणाकर ! हे शम्भो ! ब्रह्माजी ने जो कुछ भी कहा है, उसे मेरे द्वारा कहा गया ही समझिये, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥ ५५ ॥ हे महेश्वर ! मेरे ऊपर कृपा करके उसे कीजिये, उन सती से विवाहकर इस त्रिलोकी को अपनी कृपादृष्टि से सनाथ कीजिये ॥ ५६ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! यह कहकर उत्तम बुद्धिवाले भगवान् विष्णु चुप हो गये, तब भक्तवत्सल भगवान् शिवजी ने हँसकर ‘तथास्तु’ कहा ॥ ५७ ॥ तत्पश्चात् उनसे आज्ञा प्राप्तकर पत्नियोंसहित हम दोनों मुनियों तथा देवताओं के साथ अपने-अपने अभीष्ट स्थान को अत्यन्त प्रसन्नता के साथ चले आये ॥ ५८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के द्वितीय सतीखण्ड में विष्णु और ब्रह्माद्वारा शिव की प्रार्थना का वर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

 

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