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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [प्रथम-सृष्टिखण्ड] – अध्याय 04
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
चौथा अध्याय
नारदजी का भगवान् विष्णु को क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना, फिर माया के दूर हो जाने पर पश्चात्तापपूर्वक भगवान् के चरणों में गिरना और शुद्धि का उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णु का उन्हें समझा-बुझाकर शिव का माहात्म्य जानने के लिये ब्रह्माजी के पास जाने का आदेश और शिव के भजन का उपदेश देना

ऋषिगण बोले — हे महाप्राज्ञ ! हे सूत ! आपने बड़ी अद्भुत कथा का वर्णन किया है । भगवान् शंकर की माया धन्य है । यह चराचर जगत् उसी के अधीन है ॥ १ ॥ भगवान् शंकर के वे दोनों गण जब अपनी इच्छा से [कहीं अन्यत्र] चले गये, तब कामविह्वल और [अपमान से] क्रुद्ध मुनि नारद ने क्या किया ? ॥ २ ॥

शिवमहापुराण

सूतजी बोले — शिव की इच्छा से विमोहित [उस राजकुमारी के प्रति विशेष आसक्ति होने के कारण अन्य अर्थ-अनर्थ के ज्ञान से रहित] मुनि ने उन दोनों को यथोचित शाप देकर जल में अपना मुख और स्वरूप देखा ॥ ३ ॥ शिव-इच्छा के कारण उन्हें ज्ञान नहीं हुआ और विष्णु के द्वारा किये गये छल का स्मरण करके दुःसह क्रोध में आकर वे उसी समय विष्णुलोक में जा पहुँचे । शिव की इच्छा से ज्ञान-शून्य तथा समिधायुक्त जल रही अग्नि के समान क्रुद्ध वे [नारद] विष्णु से अत्यन्त अप्रिय व्यंग्य वचन कहने लगे — ॥ ४-५ ॥

नारदजी बोले — हे हरे ! तुम बड़े दुष्ट हो, कपटी हो और समस्त विश्व को मोह में डाले रहते हो । दूसरों का उत्साह तुमसे सहा नहीं जाता । तुम मायावी हो और तुम्हारा अन्तःकरण मलिन है ॥ ६ ॥ पूर्वकाल में तुमने मोहिनीरूप धारण करके कपट किया, असुरों को वारुणी मदिरा पिलायी और उन्हें अमृत नहीं पीने दिया ॥ ७ ॥

छल-कपट में ही रत रहनेवाले हे हरे ! यदि महेश्वर रुद्र दया करके विष न पी लेते, तो तुम्हारी सारी माया उसी दिन समाप्त हो जाती ॥ ८ ॥ हे विष्णो ! कपटपूर्ण चाल तुम्हें अधिक प्रिय है । तुम्हारा स्वभाव अच्छा नहीं है, भगवान् शंकर ने तुम्हें स्वतन्त्र बना दिया है ॥ ९ ॥ परमात्मा शंकर के द्वारा ऐसा करके अच्छा नहीं किया गया और तुम उनके प्रभावबल को जानकर स्वतन्त्र होकर कार्य करते रहते हो । तुम्हारी इस चाल-ढाल को समझकर अब वे (भगवान् शिव) भी पश्चात्ताप करते होंगे ॥ १०१/२ ॥ अपनी वाणीरूप वेद की प्रामाणिकता स्थापित करनेवाले महादेवजी ने ब्राह्मण को सर्वोपरि बताया है । हे हरे ! इस बात को जानकर आज मैं बलपूर्वक तुम्हें ऐसी सीख दूंगा, जिससे तुम फिर कभी कहीं भी ऐसा कर्म नहीं कर सकोगे ॥ ११-१२ ॥ अबतक किसी तेजस्वी पुरुष से तुम्हारा पाला नहीं पड़ा था, इसलिये आजतक तुम निडर बने हुए हो, परंतु हे विष्णो ! अब तुम्हें अपने द्वारा किये गये कर्म का फल मिलेगा ॥ १३ ॥

भगवान् विष्णु से ऐसा कहकर मायामोहित नारद मुनि अपने ब्रह्मतेज का प्रदर्शन करते हुए क्रोध से खिन्न हो उठे और शाप देते हुए बोले — ॥ १४ ॥

हे विष्णो ! तुमने स्त्री के लिये मुझे व्याकुल किया है । तुम इसी तरह सबको मोह में डालते रहते हो । यह कपटपूर्ण कार्य करते हुए तुमने जिस स्वरूप से मुझे संयुक्त किया था, उसी स्वरूप से हे हरे ! तुम मनुष्य हो जाओ और स्त्री के लिये दूसरों को दुःख देनेवाले तुम भी स्त्री के वियोग का दुःख भोगो । तुमने जिन वानरों के समान मेरा मुँह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक हों । तुम दूसरों को [स्त्री-विरह का] दुःख देनेवाले हो, अतः स्वयं भी तुम्हें स्त्री के वियोग का दुःख प्राप्त हो और अज्ञान से मोहित मनुष्यों के समान तुम्हारी स्थिति हो ॥ १५-१७ ॥

अज्ञान से मोहित हुए नारदजी ने मोहवश श्रीहरि को जब इस तरह शाप दिया, तब उन विष्णु ने शम्भु की माया की प्रशंसा करते हुए उस शाप को स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥ तदनन्तर महालीला करनेवाले शम्भु ने अपनी उस विश्वमोहिनी माया को, जिसके कारण ज्ञानी नारदमुनि भी मोहित हो गये थे, खींच लिया ॥ १९ ॥

उस माया के तिरोहित होते ही नारदजी पूर्ववत् शुद्ध बुद्धि से युक्त हो गये । उन्हें पूर्ववत् ज्ञान प्राप्त हो गया और उनकी सारी व्याकुलता जाती रही । इससे उनके मन में बड़ा विस्मय हुआ ॥ २० ॥ वे पश्चात्ताप करके बार-बार अपनी निन्दा करने लगे । उस समय उन्होंने ज्ञानी को भी मोह में डालनेवाली भगवान् शम्भु की माया की सराहना की ॥ २१ ॥ तदनन्तर यह जानकर कि माया के कारण ही मैं भ्रम में पड़ गया था, वैष्णवशिरोमणि नारदजी भगवान् विष्णु के चरणों में गिर पड़े ॥ २२ ॥ भगवान् श्रीहरि ने उन्हें उठाकर खड़ा कर दिया । उस समय अपनी दुर्बुद्धि नष्ट हो जाने के कारण वे बोले — माया से मोहित होने के कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी, इसलिये मैंने आपके प्रति बहुत दुर्वचन कहे हैं । हे नाथ ! मैंने आपको शाप तक दे डाला है । हे प्रभो ! उस शाप को आप मिथ्या कर दीजिये । हाय ! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है, अब मैं निश्चय ही नरक में पडुँगा । हे हरे ! मैं आपका दास हूँ । अतः बताइये, मैं क्या उपाय-कौन-सा प्रायश्चित्त करूं, जिससे मेरा पाप-समूह नष्ट हो जाय और मुझे नरक में न गिरना पड़े ॥ २३-२५ ॥

ऐसा कहकर शुद्ध बुद्धिवाले मुनिशिरोमणि नारदजी पुनः भक्तिभाव से भगवान् विष्णु के चरणों में गिर पड़े । उस समय उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था । तब श्रीविष्णु उन्हें उठाकर मधुर वाणी में कहने लगे — ॥ २६१/२ ॥

विष्णु बोले — हे तात ! खेद मत कीजिये । आप मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं, इसमें संशय नहीं है । मैं आपको एक बात बताता हूँ, सुनिये । उससे निश्चय ही आपका परम हित होगा, आपको नरक में नहीं जाना पड़ेगा । भगवान् शिव आपका कल्याण करेंगे ॥ २७-२८ ॥

आपने मद से मोहित होकर जो भगवान् शिव की बात नहीं मानी थी — उसकी अवहेलना कर दी थी, उसी अपराध का ऐसा फल भगवान् शिव ने आपको दिया है, क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता हैं ॥ २९ ॥ आप अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लीजिये कि भगवान् शिव की इच्छा से ही यह सब कुछ हुआ है । सबके स्वामी परमेश्वर शंकर ही गर्व को दूर करनेवाले हैं ॥ ३० ॥ वे ही परब्रह्म हैं, परमात्मा हैं, उन्हीं का सच्चिदानन्दरूप से बोध होता है, वे निर्गुण हैं, निर्विकार हैं और सत्त्व, रज तथा तम — इन तीनों गुणों से परे हैं ॥ ३१ ॥ वे ही अपनी माया को लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश — इन तीन रूपों में प्रकट होते हैं । निर्गुण और सगुण भी वे ही हैं ॥ ३२ ॥

निर्गुण अवस्था में उन्हीं का नाम शिव है । वे ही परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनन्त और महादेव आदि नामों से कहे जाते हैं ॥ ३३ ॥ उन्हीं की सेवा से ब्रह्माजी जगत् के स्रष्टा हुए हैं, मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ और वे स्वयं ही रुद्ररूप से सदा सबका संहार करते हैं ॥ ३४ ॥ वे शिवस्वरूप से सबके साक्षी हैं, माया से भिन्न और निर्गुण हैं । स्वतन्त्र होने के कारण वे अपनी इच्छा के अनुसार चलते हैं । उनका विहार-आचार, व्यवहार उत्तम है और वे भक्तों पर दया करनेवाले हैं ॥ ३५ ॥ हे नारद मुने ! मैं आपको एक सुन्दर उपाय बताता हूँ, जो सुखद, समस्त पापों का नाश करनेवाला और सदा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है, आप उसे सुनिये ॥ ३६ ॥ अपने समस्त संशयों को त्यागकर आप भगवान् शंकर के सुयश का गान कीजिये और सदा अनन्यभाव से शिव के शतनामस्तोत्र का पाठ कीजिये । जिसका पाठ करने से आपके समस्त पाप शीघ्र ही नष्ट हो जायँगे ॥ ३७१/२ ॥

इस प्रकार नारद से कहकर दयालु भगवान् विष्णु ने उनसे पुनः कहा — हे मुने ! आप शोक न करें । आपने तो कुछ किया ही नहीं है । यह सब तो भगवान् शंकर ने अपनी इच्छा से किया है । इसमें शंका नहीं है ॥ ३८-३९ ॥ उन्होंने ही आपकी दिव्य बुद्धि का हरण कर लिया था । उन्होंने ही आपको काम का कष्ट भी दिया और उन्हीं भगवान् शंकर ने आपके मुख से मुझे यह शाप भी दिलाया है ॥ ४० ॥ इस प्रकार उन्होंने संसार में अपने चरित्र को स्वयं प्रकट किया है [इसमें अन्य किसीका दोष नहीं है] । वे मृत्यु को जीतनेवाले, काल के भी काल और भक्तों का उद्धार करने में तत्पर रहनेवाले हैं ॥ ४१ ॥

मुझे शिव के समान अन्य कोई प्रिय नहीं है । वे ही मेरे स्वामी हैं, सुख और शक्ति देनेवाले हैं । वे महेश्वर ही मेरे सब कुछ हैं ॥ ४२ ॥ हे मुने ! आप उन्हीं की उपासना करें, सदैव उन्हीं का भजन करें, उन्हीं के यश का श्रवण और गान करें तथा नित्य उन्हीं की अर्चना करें ॥ ४३ ॥ हे मुने ! जो शरीर, मन तथा वाणी से शंकर को प्राप्त कर लेता है, वही पण्डित है — ऐसा जानना चाहिये और वही जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ ४४ ॥ शिव-नामरूपी इस दावाग्नि से महापातकरूपी पर्वत अनायास ही जलकर भस्म हो जाते हैं, यह पूर्णतया सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४५ ॥ संसार में पापों के मूलभूत जितने भी प्रकार के दुःख हैं, वे सर्वथा मात्र शिवपूजन से ही नष्ट हो जाते हैं । अन्य उपायों से [उनका] नाश सम्भव नहीं है ॥ ४६ ॥ हे मुने ! वही वैदिक है, वही पुण्यात्मा है, वही धन्य है और वही बुद्धिमान् है, जो सदा शरीर, वाणी और मन से भगवान् शंकर की शरण में चला जाता है ॥ ४७ ॥

जिनके विविध प्रकार के धर्मकृत्य तत्काल फलोन्मुख (फल देनेवाले) होते हैं, उनका पूर्ण विश्वास त्रिपुर के विनाशक शिव में होता है ॥ ४८ ॥ महामुने ! शिव की पूजा से जितने पाप नष्ट हो जाते हैं, उतने पाप तो पृथ्वी में हैं ही नहीं ॥ ४९ ॥ हे मुने ! ब्रह्महत्यादि पापों की अपरिमित राशियाँ भी शिव का स्मरण करने से नष्ट हो जाती हैं, यह मैं पूर्ण सत्य कह रहा हूँ ॥ ५० ॥ शिव-नाम का कीर्तन करनेवाले लोग ही शिवनाम की नौका से संसाररूपी सागर को पार कर जाते हैं । संसार का मूल पाप-समूह है, उसका नाश नामकीर्तन से निश्चित ही हो जाता है ॥ ५१ ॥ हे महामुने ! शिवनामरूपी कुठार से संसार के मूलभूत पापों का नाश अवश्य हो जाता है ॥ ५२ ॥

पापरूपी दावानल से दग्ध हुए लोगों को शिवनामरूपी अमृत पीना चाहिये, पाप की दावाग्नि से तपे हुए लोगों को उसके बिना शान्ति देने का कोई अन्य उपाय नहीं मिल सकता ॥ ५३ ॥
शिव-इस नाम की अमृतमयी वर्षा की धारा से नहाये हुए लोग संसार के पापों की दावाग्नि के मध्य रहते हुए भी शोक नहीं करते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ५४ ॥ राग-द्वेष में निरन्तर लगे रहनेवाले लोगों की शिव के प्रति भक्ति नहीं होती है, किंतु इसके विपरीत अर्थात् पापों से विरत रहनेवाले लोगों की मुक्ति तो निश्चित ही होती है ॥ ५५ ॥ जिसने अनन्त जन्मों में अपनी तपस्या से शरीर को जलाया होगा, उसीकी भक्ति भवानीप्राणवल्लभ शिव के लिये सम्भव है ॥ ५६ ॥ भगवान् शिव के प्रति अनन्यतापूर्वक की गयी ‘शिव-नाम-भक्ति’ के अतिरिक्त अन्य साधारण भक्ति व्यर्थ ही हो जाती है ॥ ५७ ॥ भगवान् शिव के प्रति जिसकी भक्ति एकनिष्ठ तथा असाधारण होती है, उसको ही मोक्ष प्राप्त होता है । अन्य के लिये वह सुलभ नहीं है — ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५८ ॥


अनन्त पाप करने के पश्चात् भी यदि प्राणी भगवान् शंकर में भक्ति करने लगता है, तो वह सभी पापों से निर्मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५९ ॥ जिस प्रकार वन में दावाग्नि से वृक्ष [जलकर] भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार शिव-भक्तों के पाप भी [शिवभक्ति के प्रभाव से] नष्ट हो जाते हैं ॥ ६० ॥ जो मनुष्य नित्य अपने शरीर को भस्म से पवित्रकर शिव की पूजा में लगा रहता है, वह महान् कष्ट देनेवाले संसाररूपी अपार सागर को निश्चित ही पार कर जाता है ॥ ६१ ॥ ब्राह्मणों का धन हरण करके और बहुत से ब्राह्मणों की हत्या करके भी जो मनुष्य विरूपाक्ष भगवान् शंकर की सेवामें लग जाता है, उसे उन पापों से लिप्त नहीं होना पड़ता ॥ ६२ ॥

सम्पूर्ण वेदों का अवलोकन करके पूर्ववर्ती विद्वानों ने यही निश्चय किया है कि भगवान् शिव की पूजा ही संसार-बन्धन के नाश का उपाय है ॥ ६३ ॥ [हे मुने!] आज से यत्नपूर्वक सावधान रहकर विधि-विधान के साथ भक्तिभाव से नित्य जगदम्बा पार्वतीसहित महेश्वर सदाशिव का भजन कीजिये ॥ ६४ ॥ पैर से लेकर सिर तक भस्म का लेपन करके सम्यक् रूप से आदरपूर्वक सभी श्रुतियों से सुने गये षडक्षर शैवमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)-का जप कीजिये ॥ ६५ ॥ प्रयत्नपूर्वक [बताये गये नियमानुसार] भगवान् । शिव के प्रिय रुद्राक्ष को धारण करके अत्यन्त सद्भक्ति से ही सविधि मन्त्र का जप करना चाहिये ॥ ६६ ॥ नित्य शिव की ही कथा सुनिये और कहिये । अत्यन्त यत्न करके बारम्बार शिव-भक्तों का पूजन किया कीजिये ॥ ६७ ॥

प्रमाद से रहित होकर सदा एकमात्र शिव की शरण में रहिये, क्योंकि शिव के पूजन से ही निरन्तर आनन्द प्राप्त होता रहता है ॥ ६८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! अपने हृदय में भगवान् शिव के उज्ज्वल चरणारविन्दों की स्थापना करके पहले शिव के तीर्थों में विचरण कीजिये ॥ ६९ ॥ हे मुने ! इस प्रकार परमात्मा शंकर के अनुपम माहात्म्य का दर्शन करते हुए अन्त में आनन्दवन (काशी) जाइये, वह स्थान भगवान् शिव को बहुत ही प्रिय है ॥ ७० ॥ वहाँ विश्वनाथजी का दर्शन करके भक्तिपूर्वक उनकी पूजा कीजिये । विशेषतः उनकी स्तुति-वन्दना करके आप निर्विकल्प (संशयरहित) हो जायँगे ॥ ७१ ॥ हे मुने ! इसके बाद आपको मेरी आज्ञा से भक्तिपूर्वक अपने मनोरथ की सिद्धि के लिये निश्चय ही ब्रह्मलोक में जाना चाहिये ॥ ७२ ॥

हे मुने ! वहाँ अपने पिता ब्रह्माजी की विशेषरूप से स्तुति-वन्दना करके आपको प्रसन्नतापूर्ण हृदय से बारम्बार शिव-महिमा के विषय में प्रश्न करना चाहिये ॥ ७३ ॥ ब्रह्माजी शिव-भक्तों में श्रेष्ठ हैं, वे आपको अत्यन्त प्रसन्नता के साथ भगवान् शंकर का माहात्म्य और शतनामस्तोत्र सुनायेंगे ॥ ७४ ॥ हे मुने ! आज से आप शिवाराधन में तत्पर रहनेवाले शिवभक्त हो जाइये और विशेषरूप से मोक्ष के भागी बनिये । भगवान् शिव आपका कल्याण करेंगे’ ॥ ७५ ॥

इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए भगवान् विष्णु नारदमुनि को प्रेमपूर्वक उपदेश देकर शिवजी का स्मरण, वन्दन और स्तवन करके वहाँ से अन्तर्धान हो गये ॥ ७६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के प्रथम खण्ड में नारद-विष्णु-उपदेश-वर्णन नामक चतुर्थ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

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