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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [द्वितीय-सतीखण्ड] – अध्याय 23
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
तेईसवाँ अध्याय
सती के पूछने पर शिव द्वारा भक्ति की महिमा तथा नवधा भक्ति का निरूपण

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! इस प्रकार शंकरजी के साथ विहार करके वे सती काम से सन्तुष्ट हो गयीं और उनके मन में वैराग्य उत्पन्न होने लगा ॥ १ ॥ एक दिन की बात है, देवी सती एकान्त में भगवान् शंकर से मिलीं और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणामकर दोनों हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं । भगवान् शंकर को प्रसन्नचित्त जानकर विनयभाव से दक्षकुमारी सती कहने लगीं — ॥ २-३ ॥

शिवमहापुराण

सती बोलीं — हे देवदेव ! हे महादेव ! हे करुणासागर ! हे प्रभो ! हे दीनोद्धारपरायण ! हे महायोगिन् ! मुझपर कृपा कीजिये ॥ ४ ॥ आप परमपुरुष हैं, इस जगत् के स्वामी हैं, रजोगुण, तमोगुण एवं सत्त्वगुण से परे हैं, निर्गुण हैं, सगुण भी हैं, सबके साक्षी हैं, निर्विकार हैं और महाप्रभु हैं ॥ ५ ॥ मैं धन्य हूँ, जो आपकी कामिनी और आपके साथ सुन्दर विहार करनेवाली आपकी प्रिया हुई । हे स्वामिन् ! हे हर ! आप अपनी भक्तवत्सलता के कारण ही मेरे स्वामी हुए ॥ ६ ॥ हे नाथ ! मैंने आपके साथ बहुत दिनों तक विहार किया । हे महेशान ! इससे मैं सन्तुष्ट हो गयी हूँ । अब मेरा मन उधर से हट गया है ॥ ७ ॥ हे देवेश ! अब मैं परमतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो सुख प्रदान करनेवाला है तथा हे हर ! जिसको जान लेने पर समस्त जीव संसारदुःख से अनायास ही उद्धार प्राप्त कर लेते हैं ॥ ८ ॥ हे नाथ ! जिस कर्म का अनुष्ठान करके विषयी जीव भी परमपद को प्राप्त कर लेता है तथा पुनः संसारबन्धन में नहीं पड़ता है, उस परमतत्त्व को आप बताइये, मुझपर कृपा कीजिये ॥ ९ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! इस प्रकार आदिशक्ति महेश्वरी सती ने केवल जीवों के उद्धार के लिये उत्तम भक्तिभाव से भगवान् शंकर से इस प्रकार पूछा ॥ १० ॥ तब इसे सुनकर स्वेच्छा से शरीर धारण करनेवाले तथा योग के द्वारा भोग से विरक्त चित्तवाले स्वामी शिवजी अत्यन्त प्रसन्न होकर सती से कहने लगे — ॥ ११ ॥

शिवजी बोले — हे देवि ! हे दक्षनन्दिनि ! हे महेश्वरि ! सुनो, मैं उस परमतत्त्व का वर्णन करता हूँ, जिससे वासनाबद्ध जीव तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ हे सती ! तुम विज्ञान को परमतत्त्व जानो । विज्ञान वह है, जिसके उदय होने पर ‘मैं ब्रह्म हूँ’, ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है । ब्रह्म के सिवा दूसरी किसी वस्तु का स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुष की बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती है ॥ १३ ॥ हे प्रिये ! वह विज्ञान दुर्लभ है, त्रिलोकी में उसका ज्ञाता कोई विरला ही होता है । वह जो और जैसा भी है, सदा मेरा स्वरूप ही है । साक्षात् परात्पर ब्रह्म है ॥ १४ ॥

इस प्रकार के विज्ञान की माता केवल मेरी भक्ति है, जो भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करती है । वह मेरी कृपा से सुलभ होती है । वह भक्ति नौ प्रकार की कही गयी है । हे सति ! भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है । भक्त और ज्ञानी दोनों को ही सदा सुख प्राप्त होता है । भक्ति के विरोधी को विज्ञान की प्राप्ति नहीं होती ॥ १५-१६ ॥

हे देवि ! मैं सदा भक्त के अधीन रहता हूँ और भक्ति के प्रभाव से जातिहीन नीच मनुष्यों के घरों में भी चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ १७ ॥ हे देवि ! वह भक्ति दो प्रकार की कही गयी है, सगुण और निर्गुण । जो वैधी अर्थात् शास्त्रविधि से प्रेरित और स्वाभाविकी भक्ति होती है, वह श्रेष्ठ है और इससे भिन्न जो कामनामूलक भक्ति है, वह निम्नकोटि की कही गयी है । सगुण और निर्गुण भक्ति — ये दोनों प्रकार की भक्तियाँ नैष्ठिकी और अनैष्ठिकी के भेद से दो प्रकार की हो जाती हैं । नैष्ठिकी भक्ति छः प्रकारवाली जाननी चाहिये और अनैष्ठिकी एक ही प्रकार की कही गयी है ॥ १८-१९ ॥

विद्वान् पुरुष विहिता और अविहिता आदि भेद से उसे अनेक प्रकार की मानते हैं । इन द्विविध भक्तियों के बहुत से भेद-प्रभेद होने के कारण इनके तत्त्व का अन्यत्र वर्णन किया गया है । हे प्रिये ! मुनियों ने सगुण और निर्गुण दोनों भक्तियों के नौ अंग बताये हैं । हे दक्षनन्दिनि ! मैं उन नौ अंगों का वर्णन करता हूँ, तुम प्रेम से सुनो ॥ २०-२१ ॥

हे देवि ! श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, सदा मेरा वन्दन, सख्य और आत्मसमर्पण विद्वानों ने भक्ति के ये नौ अंग माने हैं । हे शिवे ! इसके अतिरिक्त उस भक्ति के बहुत-से उपांग भी कहे गये हैं ॥ २२-२३ ॥ हे देवि ! अब तुम मन लगाकर मेरी भक्ति के नौ अंगों के पृथक्-पृथक् लक्षण सुनो, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं । जो स्थिर आसन पर बैठकर तन-मन आदि से मेरे कथा-कीर्तन आदि का नित्य सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक [अपने श्रवणपुटों से] उसका पान किया जाता है, उसे श्रवण कहते हैं ॥ २४-२५ ॥

जो हृदयाकाश के द्वारा मेरे दिव्य जन्म एवं कर्मों का चिन्तन करता हुआ प्रेम से वाणी द्वारा उनका उच्च स्वर से उच्चारण करता है, उसके इस भजन साधन को कीर्तन कहा जाता है । हे देवि ! मुझ नित्य महेश्वर को सदा और सर्वत्र व्यापक जानकर संसार में निरन्तर निर्भय रहने को स्मरण कहा गया है [यह निर्गुण स्मरण भक्ति है।] ॥ २६-२७ ॥ अरुणोदयकाल से प्रारम्भकर शयनपर्यन्त तत्परचित्त से निर्भय होकर भगवद्विग्रह की सेवा करने को स्मरण कहा जाता है [यह सगुण स्मरण भक्ति है।] ॥ २८ ॥

हर समय सेव्य की अनुकूलता का ध्यान रखते हुए हृदय और इन्द्रियों से जो निरन्तर सेवा की जाती है, वही सेवन नामक भक्ति है । अपने को प्रभु का किंकर समझकर हृदयामृत के भोग से स्वामी का सदा प्रिय-सम्पादन करना दास्य कहा गया है ॥ २९ ॥ अपने को सदा सेवक समझकर शास्त्रीय विधि से मुझ परमात्मा को सदा पाद्य आदि सोलह उपचारों का जो समर्पण करना है, उसे अर्चन कहा जाता है ॥ ३० ॥ वाणी से मन्त्र का उच्चारण करते हुए तथा मन से ध्यान करते हुए आठों अंगों से भूमि का स्पर्श करते हुए जो इष्टदेव को अष्टांग प्रणाम [उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते ॥ अर्थात् हृदय, मस्तक, नेत्र, मन, वाणी , चरण, हस्त और घुटने से शरणागत होने को अष्टांग प्रणाम ( वंदन ) कहते हैं ।] किया जाता है, उसे वन्दन कहा जाता है ॥ ३१ ॥

ईश्वर मंगल-अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगल के लिये है — ऐसा दृढ़ विश्वास रखना सख्य भक्ति का लक्षण है ॥ ३२ ॥ देह आदि जो कुछ भी अपनी कही जानेवाली वस्तु है, वह सब भगवान् की प्रसन्नता के लिये उन्हीं को समर्पित करके अपने निर्वाह के लिये कुछ भी बचाकर न रखना अथवा निर्वाह की चिन्ता से भी रहित हो जाना, आत्मसमर्पण कहा जाता है ॥ ३३ ॥ मेरी भक्ति के ये नौ अंग हैं, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं । इनसे ज्ञान प्रकट हो जाता है तथा ये साधन मुझे अत्यन्त प्रिय हैं । मेरी भक्ति के अनेक उपांग भी कहे गये हैं । जैसे बिल्व आदि का सेवन, इनको विचार से समझ लेना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥

हे प्रिये ! इस प्रकार मेरी सांगोपांग भक्ति सबसे उत्तम है । यह ज्ञान-वैराग्य की जननी है और मुक्ति इसकी दासी है । हे देवि ! भक्ति सर्वदा सभी कर्मों के फलों को देनेवाली है, यह भक्ति मुझे सदा तुम्हारे समान ही प्रिय है । जिसके चित्त में नित्य-निरन्तर यह भक्ति निवास करती है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ ३६-३७ ॥ हे देवेशि ! तीनों लोकों और चारों युगों में भक्ति के समान दूसरा कोई सुखदायक मार्ग नहीं है । कलियुग में तो यह विशेष सुखद एवं सुविधाजनक है; क्योंकि कलियुग में प्रायः ज्ञान और वैराग्य दोनों ही ग्राहक के अभाव के कारण वृद्ध, उत्साहशून्य और जर्जर हो जाते हैं ॥ ३८-३९ ॥ परंतु भक्ति कलियुग में तथा अन्य सभी युगों में भी प्रत्यक्ष फल देनेवाली है । भक्ति के प्रभाव से मैं सदा भक्त के वश में रहता हूँ, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४० ॥

संसार में जो भक्तिमान् पुरुष है, उसकी मैं सदा सहायता करता हूँ और उसके कष्टों को दूर करता हूँ । उस भक्त का जो शत्रु होता है, वह मेरे लिये दण्डनीय है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४१ ॥ हे देवि ! मैं अपने भक्तों का रक्षक हूँ, भक्त की रक्षा के लिये ही मैंने कुपित होकर अपने नेत्रजनित अग्नि से काल को भी भस्म कर डाला था ॥ ४२ ॥ हे देवि ! भक्त की रक्षा के लिये मैं पूर्वकाल में सूर्य पर भी अत्यन्त क्रोधित हो उठा था और मैंने त्रिशूल लेकर सूर्य को भी जीत लिया था ॥ ४३ ॥ हे देवि ! मैंने भक्त के लिये सैन्यसहित रावण को भी क्रोधपूर्वक त्याग दिया और उसके प्रति कोई पक्षपात नहीं किया । हे देवि ! भक्तों के लिये ही मैंने कुमति से ग्रस्त व्यास को नन्दी द्वारा दण्ड दिलाकर उन्हें काशी के बाहर निकाल दिया ॥ ४४-४५ ॥ हे देवेशि ! बहुत कहने से क्या लाभ, मैं सदा ही भक्त के अधीन रहता हूँ और भक्ति करनेवाले पुरुष के अत्यन्त वश में हो जाता हूँ, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४६ ॥

ब्रह्माजी बोले — [नारद!] इस प्रकार भक्ति का महत्त्व सुनकर दक्षकन्या सती को बड़ा हर्ष हुआ और उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिव को मन-ही-मन प्रणाम किया ॥ ४७ ॥ हे मुने ! देवी सती ने पुनः भक्तिविषयक शास्त्र के विषय में बड़े आदरपूर्वक पूछा, जो लोक में सुखदायक तथा जीवों के उद्धार का साधन है ॥ ४८ ॥ हे मुने ! उन्होंने यन्त्र, मन्त्रशास्त्र, उनके माहात्म्य तथा अन्य जीवोद्धारक धर्ममय साधनों के विषय में विशेष रूप से जानने की इच्छा प्रकट की ॥ ४९ ॥ सती के इस प्रश्न को सुनकर शंकरजी के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने जीवों के उद्धार के लिये सब शास्त्रों का प्रेमपूर्वक वर्णन किया ॥ ५० ॥

महेश्वर ने पाँचों अंगसहित तन्त्रशास्त्र, यन्त्रशास्त्र तथा भिन्न-भिन्न देवेश्वरों की महिमा का वर्णन किया ॥ ५१ ॥ हे मुनीश्वर ! महेश्वर ने कृपा करके इतिहास-कथा सहित उन देवताओं के भक्तों की महिमा, वर्णाश्रम-धर्म, राजधर्म, पुत्र और स्त्री के धर्म की महिमा, कभी नष्ट न होनेवाले वर्णाश्रम, जीवों को सुख देनेवाले वैद्यकशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र, उत्तम सामुद्रिकशास्त्र तथा अन्य भी बहुत से शास्त्रों का तत्त्वतः वर्णन किया ॥ ५२-५४ ॥ इस प्रकार लोकोपकार करने के लिये सद्गुणसम्पन्न शरीर धारण करनेवाले, तीनों लोकों को सुख देनेवाले सर्वज्ञ परब्रह्मस्वरूप शिव और सती ने हिमालयपर्वत के कैलासशिखर पर तथा अन्यान्य स्थानों में अनेक प्रकार की लीलाएँ कीं ॥ ५५-५६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के द्वितीय सतीखण्ड में भक्ति के प्रभाव का वर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥

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