शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [द्वितीय-सतीखण्ड] – अध्याय 36
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
छत्तीसवाँ अध्याय
युद्ध में शिवगणों से पराजित हो देवताओं का पलायन, इन्द्र आदि के पूछने पर बृहस्पति का रुद्रदेव की अजेयता बताना, वीरभद्र का देवताओं को युद्ध के लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्र की बातचीत

ब्रह्माजी बोले — उस समय [शिवतत्त्वरूपी] आत्मवाद में रत विष्णु पर हँसते हुए इन्द्र हाथ में गदा धारणकर देवताओं को साथ लेकर [वीरभद्र से] युद्ध करने के लिये तत्पर हो गये ॥ १ ॥ उस समय इन्द्र हाथी पर सवार हो गये, अग्नि भेंड़ पर सवार हो गये, यम भैंसे पर चढ़ गये और निर्ऋति प्रेत पर सवार हो गये ॥ २ ॥

शिवमहापुराण

वरुण मकर पर, वायु मृग पर और कुबेर पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो आलस्यरहित होकर [युद्ध के लिये] तैयार हो गये । इसी प्रकार प्रतापी अन्य देवसमूह, यक्ष, चारण तथा गुह्यक भी अपने-अपने वाहनों पर आरूढ़ होकर तैयार हो गये ॥ ३-४ ॥ उन देवताओं के उद्योग को देखकर रक्त से सने हुए मुखवाले वे दक्ष अपनी पत्नी के साथ उनके पास जाकर कहने लगे — ॥ ५ ॥

दक्ष बोले — [हे देवगणो!] मैंने आपलोगों के ही बल से इस यज्ञ को प्रारम्भ किया है; क्योंकि महातेजस्वी आपलोग ही सत्कर्म की सिद्धि के लिये प्रमाण हैं ॥ ६ ॥

ब्रह्माजी बोले — दक्ष के उस वचन को सुनकर इन्द्र आदि सभी देवगण युद्ध करने के लिये तैयार हो निकल पड़े । तदनन्तर समस्त देवगण तथा इन्द्र आदि लोकपाल शिवजी की माया से मोहित होकर अपनी-अपनी सेनाओं को साथ लेकर युद्ध करने लगे ॥ ७-८ ॥ उस समय देवताओं तथा शिवगणों में महान् युद्ध होने लगा । वे तीखे तोमर तथा बाणों से परस्पर युद्ध करने लगे । उस युद्धमहोत्सव में शंख तथा भेरियाँ बजने लगीं और बड़ी-बड़ी दुन्दुभियाँ, नगाड़े तथा डिण्डिम आदि बजने लगे ॥ ९-१० ॥ उस महान् शब्द से उत्साह में भरे हुए समस्त देवगण लोकपालों को साथ लेकर उन शिवगणों को मारने लगे । हे मुनिश्रेष्ठ ! इन्द्र आदि देवताओं एवं लोकपालों ने भृगु के मन्त्रबल के प्रभाव से शिवजी के गणों को पराङ्मुख कर दिया ॥ ११-१२ ॥

उस समय याज्ञिक भृगुजी ने दीक्षा ग्रहण किये हुए दक्ष के तथा देवताओं के सन्तोष हेतु और यज्ञ की निर्विघ्न समाप्ति के लिये उन शिवगणों का उच्चाटन कर दिया ॥ १३ ॥ इस प्रकार अपने गणों को पराजित देखकर वीरभद्र क्रोध में भर उठे और भूत, प्रेत तथा पिशाचों को पीछे करके वे महाबली वीरभद्र बैल पर सवार सभी शिवगणों को आगे करके स्वयं त्रिशूल लेकर देवताओं को गिराने लगे ॥ १४-१५ ॥

सभी शिवगणों ने भी त्रिशूल के प्रहारों से शीघ्रतापूर्वक देवताओं, यक्षों, साध्यगणों, गुह्यकों तथा चारणों को मार डाला । गणों ने तलवारों से कुछ देवताओं के दो टुकड़े कर दिये, कुछ को मुद्गरों से पीट डाला और कुछ को घायल कर दिया ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार सभी देवता पराजित होकर भाग चले और एक-दूसरे को रणभूमि में छोड़कर देवलोक को चले गये । उस अत्यन्त भयानक युद्ध में महाबली इन्द्र आदि लोकपाल ही धैर्य धारण करके उत्साहित होकर खड़े रहे ॥ १८-१९ ॥ उस समय इन्द्र आदि समस्त देवता एकत्र होकर विनयभाव से युक्त हो उस युद्धस्थल में बृहस्पतिजी से पूछने लगे — ॥ २० ॥

लोकपाल बोले — हे गुरो ! हे बृहस्पते ! हे तात ! हे महाप्राज्ञ ! हे दयानिधे ! शीघ्र बताइये, हमलोग यह पूछते हैं कि हमारी विजय किस प्रकार होगी ? ॥ २१ ॥

ब्रह्माजी बोले — उनकी यह बात सुनकर उपायों को जाननेवाले बृहस्पति शम्भु का स्मरण करके ज्ञानदुर्बल महेन्द्र से कहने लगे — ॥ २२ ॥

बृहस्पति बोले — हे इन्द्र ! भगवान् विष्णु ने पहले जो कहा था, वह सब आज घटित हो गया, मैं उसी बात को कह रहा हूँ, सावधानीपूर्वक सुनिये ॥ २३ ॥ समस्त कर्मों का फल देनेवाले जो कोई ईश्वर हैं, वे भी अपने कर्ता शिव का भजन करते हैं । वे अपने कर्ता के प्रभु नहीं हैं ॥ २४ ॥ न मन्त्र, न औषधियाँ, न समस्त आभिचारिक कर्म, न लौकिक पुरुष, न कर्म, न वेद, न पूर्वमीमांसा, न उत्तरमीमांसा तथा न अनेक वेदों से युक्त अन्यान्य शास्त्र ही ईश्वर को जानने में समर्थ होते हैं, ऐसा प्राचीन विद्वान् कहते हैं ॥ २५-२६ ॥ अनन्यशरण भक्तों को छोड़कर दूसरे लोग सम्पूर्ण वेदों का दस हजार बार स्वाध्याय करके भी महेश्वर को भली-भाँति नहीं जान सकते — यह महाश्रुति है । भगवान् सदाशिव के अनुग्रह से ही सर्वथा शान्त, निर्विकार एवं उत्तम दृष्टि से उनको जाना जा सकता है ॥ २७-२८ ॥

तब भी हे सुरेश्वर ! उचित-अनुचित कार्य के निर्णय में सबके कल्याण के लिये सिद्धि के उत्तम अंश का प्रतिपादन करूँगा, आप उसे सुनिये । हे इन्द्र ! आप लोकपालों के साथ नादान बनकर इस समय दक्षयज्ञ में आ गये, किंतु आप कौन-सा पराक्रम करेंगे ? ॥ २९-३० ॥ भगवान् रुद्र के सहायक ये गण अत्यन्त कुपित होकर यज्ञ में विघ्न डालने के लिये आये हैं, ये अवश्य ही उसे करेंगे ॥ ३१ ॥ मैं यह सत्य-सत्य कह रहा हूँ कि इस यज्ञ में विघ्ननिवारण के लिये वस्तुतः किसी के भी पास सर्वथा कोई उपाय नहीं है ॥ ३२ ॥

ब्रह्माजी बोले — बृहस्पति की इस बात को सुनकर स्वर्ग में रहनेवाले इन्द्रसहित वे समस्त लोकपाल चिन्ता में पड़ गये । तब महावीर गणों से घिरे हुए वीरभद्र मन-ही-मन भगवान् शंकर का स्मरण करके उन इन्द्र आदि लोकपालों से कहने लगे — ॥ ३३-३४ ॥

वीरभद्र बोले — आपलोग मुर्खता के कारण ही [इस यज्ञ में] अपना-अपना भाग लेने के लिये आये हैं । अतः मेरे समीप आइये, मैं आपलोगों को यज्ञ का फल देता हूँ ॥ ३५ ॥ हे शक्र ! हे अग्ने ! हे सूर्य ! हे चन्द्र ! हे कुबेर ! हे यम ! हे वरुण ! हे वायो ! हे निर्ऋते ! हे शेष ! हे बुद्धिमान् देव तथा राक्षसगण ! आपलोग इधर आइये, मैं आपलोगों को तृप्त करने के लिये इसका फल प्रदान करूँगा ॥ ३६-३७ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कहकर गणों में श्रेष्ठ वीरभद्र ने क्रोध में भरकर तीक्ष्ण बाणों से उन सभी देवताओं को शीघ्र ही घायल कर दिया । उन बाणों से घायल होकर इन्द्र आदि वे समस्त सुरेश्वर भागकर दसों दिशाओं में चले गये । लोकपालों के चले जाने पर और देवताओं के भाग जाने पर वीरभद्र गणों के साथ यज्ञशाला के समीप पहुँचे ॥ ३८-३९ ॥ उस समय वहाँ उपस्थित समस्त ऋषि अत्यन्त भयभीत होकर रमापति श्रीहरि से [रक्षाकी] प्रार्थना करने के लिये सहसा विनम्र हो शीघ्र कहने लगे — ॥ ४० ॥

ऋषिगण बोले — हे देवदेव ! हे रमानाथ ! हे सर्वेश्वर ! हे महाप्रभो ! दक्ष के यज्ञ की रक्षा कीजिये, आप यज्ञस्वरूप हैं, इसमें संशय नहीं है । आप ही यज्ञ करनेवाले, यज्ञरूप, यज्ञ के अंग और यज्ञ के रक्षक हैं, अतः यज्ञ की रक्षा कीजिये-रक्षा कीजिये, आपके अतिरिक्त कोई दूसरा रक्षक नहीं है ॥ ४१-४२ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] उन ऋषियों के इस वचन को सुनकर भगवान् विष्णु वीरभद्र के साथ युद्ध करने के लिये उद्यत हो गये ॥ ४३ ॥ महाबली चतुर्भुज भगवान् विष्णु हाथों में चक्र आदि आयुध धारणकर सम्यक् सावधान होकर देवताओं के साथ यज्ञमण्डप से बाहर निकले । अनेक गणों से समन्वित तथा हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए वीरभद्र ने महाप्रभु विष्णु को युद्ध के लिये तैयार देखा ॥ ४४-४५ ॥ उन्हें देखते ही वीरभद्र टेढ़ी भौंहों से युक्त मुखमण्डलवाले हो गये, जैसे पापी को देखकर यमराज और हाथी को देखकर सिंह हो जाता है ॥ ४६ ॥ उस प्रकार श्रीहरि को [युद्ध के लिये उद्यत] देखकर वीरगणों से घिरे हुए शत्रुनाशक वीरभद्र कुपित होकर शीघ्रता से कहने लगे — ॥ ४७ ॥

वीरभद्र बोले — हे हरे ! आपने आज शिवजी के शपथ की अवहेलना क्यों की ? और आपके मन में घमण्ड क्यों हो गया है ? क्या आप में शिवजी के शपथ का उल्लंघन करने की शक्ति है ? आप कौन हैं ? तीनों लोकों में आपका रक्षक कौन है ? ॥ ४८-४९ ॥ यहाँ किसलिये आये हैं, इसे हम नहीं जान पा रहे हैं । आप दक्ष के यज्ञरक्षक क्यों बन गये हैं, इसे बताइये । [इस यज्ञ में] सती ने जो किया, उसे क्या आपने नहीं देखा और दधीचि ने जो कहा, उसे क्या आपने नहीं सुना ? ॥ ५०-५१ ॥ आप दक्ष के इस यज्ञ में अवदान (यज्ञभाग) प्राप्त करने के लिये आये हुए हैं । हे महाबाहो ! मैं [शीघ्र ही] आपको अवदान देता हूँ । हे हरे ! मैं त्रिशूल से आपका वक्षःस्थल विदीर्ण करूँगा । आपका कौन रक्षक है, वह मेरे समक्ष आये ॥ ५२-५३ ॥ मैं आपको पृथिवी पर धराशायी करूँगा, अग्नि से जला दूंगा और पुनः दग्ध हुए आपको पीस डालूँगा ॥ ५४ ॥ हे हरे ! हे दुराचारी ! हे महेशविमुख ! हे अधम ! क्या आप शिवजी के पावन माहात्म्य को नहीं जानते ? ॥ ५५ ॥ फिर भी हे महाबाहो ! आप युद्ध की कामना से आगे स्थित हैं । यदि आप [इस युद्धभूमि में] खड़े रह गये तो मैं आपको उस स्थान पर भेज दूंगा, जहाँ से पुनः लौटना सम्भव नहीं है ॥ ५६ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] उन वीरभद्र की इस बात को सुनकर बुद्धिमान् सुरेश्वर विष्णु प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहने लगे — ॥ ५७ ॥

विष्णु बोले — हे वीरभद्र ! आज आपके सामने मैं जो कह रहा हूँ, उसको सुनिये । आप मुझ शंकर के सेवक को रुद्रविमुख मत कहिये ॥ ५८ ॥ कर्म में निष्ठा रखनेवाले अज्ञानी इन दक्ष ने मूर्खतावश पहले मुझसे यज्ञ के लिये बार-बार प्रार्थना की थी ॥ ५९ ॥ मैं भक्त के अधीन हूँ और वे भगवान् महेश्वर भी भक्त के अधीन हैं । हे तात ! दक्ष मेरे भक्त हैं, इसलिये मैं यज्ञ में आया हूँ ॥ ६० ॥ रुद्र के कोप से उत्पन्न होनेवाले हे वीर ! हे महान् प्रताप के आलय ! हे प्रभो ! आप रुद्रतेजस्वरूप हैं, आप मेरी प्रतिज्ञा सुनिये ॥ ६१ ॥

मैं [यज्ञकी रक्षाके लिये] आपसे युद्ध करूँगा और आप भी [इस यज्ञ के विध्वंस के लिये] मुझसे युद्ध कीजिये । जो होनहार होगा, वह होगा, मैं अवश्य ही पराक्रम प्रकट करूँगा ॥ ६२ ॥

ब्रह्माजी बोले — विष्णु के इस प्रकार कहने पर महाबाहु वीरभद्र ने हँसते हुए कहा — [हे विष्णो!] मैं आपको अपने प्रभु शिव का प्रिय जानकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ । तदनन्तर गणों में श्रेष्ठ वीरभद्र ने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बड़े विनय से भगवान् विष्णु से कहा — ॥ ६३-६४ ॥

वीरभद्र बोले — हे महाप्रभो ! मैंने आपके भाव की परीक्षा के लिये ही ऐसा वचन कहा था, अब मैं यथार्थ बात कह रहा हूँ, उसको आप सावधानीपूर्वक सुनिये ॥ ६५ ॥ हे हरे ! जैसे शिव हैं, वैसे आप हैं और जैसे आप हैं, वैसे शिव हैं । शिव के आदेश से वेद ऐसा ही कहते हैं ॥ ६६ ॥ हे रमानाथ ! भगवान् शिव की आज्ञा के अनुसार हम सब लोग उनके सेवक ही हैं, तथापि मैंने जो बात कही है, वह इस वाद-विवाद के अवसर के अनुकूल ही है । आप प्रत्येक बात को आदरपूर्वक ही समझें ॥ ६७ ॥

ब्रह्माजी बोले — उन वीरभद्र का यह वचन सुनकर भगवान् विष्णु हँसकर और उनके लिये हितकर यह वचन कहने लगे — ॥ ६८ ॥

विष्णु बोले — हे महावीर ! आप निःशंक होकर मेरे साथ युद्ध कीजिये, आपके अस्त्रों से शरीर के भर जाने पर ही मैं अपने आश्रम को जाऊँगा ॥ ६९ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर वे विष्णु चुप होकर युद्ध के लिये तैयार हो गये और महाबली वीरभद्र भी अपने गणों के साथ युद्ध के लिये उद्यत हो गये ॥ ७० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के द्वितीय सतीखण्ड में विष्णुवीरभद्रसंवाद-वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥

 

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