शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [प्रथम-सृष्टिखण्ड] – अध्याय 07
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
सातवाँ अध्याय
भगवान् विष्णु की नाभि से कमल का प्रादुर्भाव, शिवेच्छा से ब्रह्माजी का उससे प्रकट होना, कमलनाल के उद्गम का पता लगाने में असमर्थ ब्रह्मा का तप करना, श्रीहरि का उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णु के बीच में अग्निस्तम्भ का प्रकट होना तथा उसके ओर-छोर का पता न पाकर उन दोनों का उसे प्रणाम करना

ब्रह्माजी बोले — हे देवर्षे ! जब नारायणदेव जल में शयन करने लगे, उस समय उनकी नाभि से भगवान् शंकर की इच्छा से सहसा एक विशाल तथा उत्तम कमल प्रकट हुआ ॥ १ ॥ उसमें असंख्य नालदण्ड थे, उसकी कान्ति कनेर के फूल के समान पीले रंग की थी तथा उसकी लम्बाई और ऊँचाई भी अनन्त योजन थी । वह कमल करोडों सूर्यों के समान प्रकाशित, सुन्दर, सम्पूर्ण तत्त्वों से युक्त, अत्यन्त अद्भुत, परम रमणीय, दर्शन के योग्य तथा सबसे उत्तम था ॥ २-३ ॥

शिवमहापुराण

तत्पश्चात् कल्याणकारी परमेश्वर साम्बसदाशिव ने पूर्ववत् प्रयत्न करके मुझे अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया ॥ ४ ॥ हे मुने ! उन महेश्वर ने मुझे तुरंत ही अपनी माया से मोहित करके नारायणदेव के नाभिकमल में डाल दिया और लीलापूर्वक मुझे वहाँ से प्रकट किया ॥ ५ ॥ इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्यगर्भ का जन्म हुआ । मेरे चार मुख हुए और शरीर की कान्ति लाल हुई । मेरे मस्तक त्रिपुण्ड्र की रेखा से अंकित थे ॥ ६ ॥ हे तात ! भगवान् शिव की माया से मोहित होने के कारण मेरी ज्ञानशक्ति इतनी दुर्बल हो रही थी कि मैंने उस कमल के अतिरिक्त दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं जाना ॥ ७ ॥

मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरा कार्य क्या है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूँ और किसने इस समय मेरा निर्माण किया है — इस प्रकार संशय में पड़े हुए मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ — मैं किसलिये मोह में पड़ा हुआ हूँ ? जिसने मुझे उत्पन्न किया है, उसका पता लगाना तो बहुत सरल है ॥ ८-९ ॥ इस कमलपुष्प का जो पत्रयुक्त नाल है, उसका उद्गमस्थान इस जल के भीतर नीचे की ओर है । जिसने मुझे उत्पन्न किया है, वह पुरुष भी वहीं होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥

ऐसा निश्चय करके मैंने अपने को कमल से नीचे उतारा । हे मुने ! उस कमल की एक-एक नाल में गया और सैकड़ों वर्षों तक वहाँ भ्रमण करता रहा ॥ ११ ॥ कहीं भी उस कमल के उद्गम का उत्तम स्थान मुझे नहीं मिला । तब पुनः संशय में पड़कर मैं उस कमलपुष्प पर जाने के लिये उत्सुक हुआ और हे मुने ! नाल के मार्ग से उस कमल पर चढ़ने लगा । इस तरह बहुत ऊपर जाने पर भी मैं उस कमल के कोश को न पा सका । उस दशा में मैं और भी मोहित हो उठा ॥ १२-१३ ॥ मुझे नालमार्ग से भ्रमण करते हुए पुनः सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो गये, [किंतु उसका कोई पता न चल सका] तब मैं मोहित (किंकर्तव्यविमूढ़) होकर एक क्षण वहीं रुक गया ॥ १४ ॥

हे मुने ! उस समय भगवान् शिव की इच्छा से परम मंगलमयी तथा उत्तम आकाशवाणी प्रकट हुई, जो मेरे मोह का विध्वंस करनेवाली थी, उस वाणी ने कहा ‘तप’ तपस्या करो ॥ १५ ॥ उस आकाशवाणी को सुनकर मैंने अपने जन्मदाता पिता का दर्शन करने के लिये उस समय पुनः प्रयत्नपूर्वक बारह वर्षों तक घोर तपस्या की ॥ १६ ॥ तब मुझपर अनुग्रह करने के लिये ही चार भुजाओं और सुन्दर नेत्रों से सुशोभित भगवान् विष्णु वहाँ सहसा प्रकट हो गये । उन परम पुरुष ने अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे । उनके सारे अंग सजल जलधर के समान श्यामकान्ति से सुशोभित थे । उन परम प्रभु ने सुन्दर पीताम्बर पहन रखा था । उनके मस्तक आदि अंगों में मुकुट आदि महामूल्यवान् आभूषण शोभा पा रहे थे । उनका मुखारविन्द प्रसन्नता से खिला हुआ था । मैं उनकी छवि पर मोहित हो रहा था । वे मुझे करोड़ों कामदेवों के समान मनोहर दिखायी दिये ॥ १७-१९ ॥

उन चतुर्भुज भगवान् विष्णु का वह अत्यन्त सुन्दर रूप देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । वे साँवली और सुनहरी आभा से उद्भासित हो रहे थे ॥ २० ॥ उस समय उन सदसत्स्वरूप, सर्वात्मा, महाबाहु नारायणदेव को वहाँ उस रूप में अपने साथ देखकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ ॥ २१ ॥ मैं उस समय प्रभु शम्भु की लीला से मोहित हो रहा था, इसलिये मैं अपने उत्पन्न करनेवाले को न जानकर अति हर्षित होकर उनसे कहने लगा — ॥ २२ ॥

ब्रह्माजी बोले — मैंने उन सनातन पुरुष को हाथ से उठाकर कहा कि आप कौन हैं, उस समय हाथ के तीव्र तथा सुदृढ़ प्रहार से क्षणमात्र में ही वे जितेन्द्रिय जाग करके शय्या से उठकर बैठ गये । तदनन्तर अविकल रूप से निद्रारहित होकर उन राजीवलोचन भगवान् विष्णु ने मुझको वहाँपर अवस्थित देखा और हँसते हुए बार-बार मधुर वाणी में [वे] कहने लगे — ॥ २३-२५ ॥

विष्णुजी बोले — हे वत्स ! आपका स्वागत है । हे महाद्युतिमान् पितामह ! आपका स्वागत है । निर्भय होकर रहिये । मैं आपकी सभी कामनाओं को पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २६ ॥
[हे देवर्षे !] उनके मन्दहासयुक्त उस वचन को सुनकर रजोगुण के कारण शत्रुता मान बैठा देवश्रेष्ठ मैं उन जनार्दन भगवान् विष्णु से कहने लगा — ॥ २७ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे निष्पाप ! समस्त संहार के कारणभूत मुझे आप हँसते हुए जो हे वत्स ! हे वत्स ! कह रहे हैं, वह तो वैसे ही लग रहा है, जैसे कोई गुरु अपने शिष्य को हे वत्स ! हे वत्स ! कह रहा हो ॥ २८ ॥ मैं ही संसार का साक्षात् कर्ता, प्रकृति का प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा, विष्णु, ब्रह्मा, विष्णु को उत्पन्न करनेवाला विश्वात्मा, विधाता, धाता और पुण्डरीकाक्ष हूँ । आप अज्ञानवश मुझे हे वत्स ! हे वत्स ! ऐसा क्यों कह रहे हैं ? इसका कारण शीघ्र बताइये ॥ २९-३० ॥ नियमतः वेद भी मुझे स्वयम्भू, अज, विभु, पितामह, स्वराज, सर्वोत्तम और परमेष्ठी कहते हैं ॥ ३१ ॥

मेरे इस वचन को सुनकर लक्ष्मीपति भगवान् हरि क्रुद्ध हो उठे और कहने लगे कि मैं जानता हूँ-संसार आपको जगत् का कर्ता मानता है ॥ ३२ ॥

विष्णुजी बोले — आप संसार की सृष्टि करने और पालन करने के लिये मुझ अव्यय के अंग से अवतीर्ण हुए हैं, फिर भी आप मुझ जगन्नाथ, नारायण, पुरुष, परमात्मा, निर्विकार, पुरुहूत, पुरुष्टुत्, विष्णु, अच्युत, ईशान, संसार के उत्पत्ति-स्थानरूप, नारायण, महाबाहु और सर्वव्यापक को भूल गये हैं । मेरे ही नाभिकमल से आप उत्पन्न हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३३-३५ ॥ इस विषय में आपका अपराध भी नहीं है, आपके ऊपर तो मेरी माया है । हे चतुर्मुख ! सुनिये, यह सत्य है कि मैं ही सभी देवों का ईश्वर हूँ ॥ ३६ ॥ मैं ही कर्ता, हर्ता और भर्ता हूँ । मेरे समान अन्य शक्तिशाली कोई देव नहीं है । हे पितामह ! मैं ही परब्रह्म तथा परम तत्त्व हूँ ॥ ३७ ॥ मैं ही परमज्योति और वह परमात्मा विभु हूँ, इस जगत् में आज जो यह सब चराचर दिखायी दे रहा है । और सुनायी पड़ रहा है, हे चतुर्मुख ! यह जो कुछ भी है, वह मुझमें व्याप्त है — ऐसा आप जान लें । मैंने ही सृष्टि के पहले जगत् के चौबीस अव्यक्त तत्त्वों की रचना की है ॥ ३८-३९ ॥

उन्हीं तत्त्वों से प्राणियों के शरीरधारक अणुओं का निर्माण होता है और क्रोध, भय आदि षड्गुणों की सृष्टि हुई है । मेरे प्रभाव और मेरी लीला से ही आपके अनेक अंग हैं ॥ ४० ॥ मैंने ही बुद्धितत्त्व की सृष्टि की है और उसमें तीन प्रकार के अहंकार उत्पन्न किये हैं । तदनन्तर उससे रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श — इन पंचतन्मात्राओं, मन एवं चक्षु, जिह्वा, घ्राण, श्रोत्र तथा त्वचा — इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों और वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ — इन पाँच कर्मेन्द्रियों, क्षिति, जल, पावक, गगन और वायु — इन पंच महाभूतों तथा अन्य सभी भौतिक पदार्थों की रचना लीला से ही की है । हे प्रजापते ! हे ब्रह्मन् ! ऐसा जानकर आप मेरी शरण में आ जाइये, मैं सभी दुःखों से आपकी रक्षा करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ४१-४२१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले — विष्णु का यह वचन सुनकर मुझ ब्रह्मा को क्रोध आ गया और माया के वशीभूत हुआ मैं उनको डाँटते हुए पूछने लगा कि आप कौन हैं और किसलिये इतना अधिक निरर्थक बोल रहे हैं ? आप न ईश्वर हैं, न परब्रह्म हैं । आपका कोई कर्ता अवश्य है ॥ ४३-४४ ॥

महाप्रभु शंकर की माया से विमोहित मैं उन भगवान् विष्णु के साथ भयंकर युद्ध करने लगा ॥ ४५ ॥ उस प्रलयकालीन महासमुद्र के मध्य रजोगुण के कारण परस्पर बढ़ी शत्रुता से हमारा और विष्णु का रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ ४६ ॥ इसी बीच हम दोनों के छिड़े विवाद को शान्त करने के लिये और ज्ञान प्रदान करने के लिये हम दोनों के सामने ही एक लिंग प्रकट हुआ ॥ ४७ ॥ वह लिंग अग्नि की प्रचण्ड हजार ज्वालाओं से भी अधिक ज्वालासमूहोंवाला, सैकड़ों कालाग्नियों के समान कान्तिमान्, क्षय एवं वृद्धि से रहित, आदि-मध्य और अन्त से विहीन था ॥ ४८ ॥ वह उपमारहित, अनिर्देश्य, बिना किसी के द्वारा उपस्थापित, अव्यक्त और विश्वसर्जक था । उस लिंग की सहस्र ज्वालाओं के समूह को देखनेमात्र से ही भगवान् विष्णु मोहित हो उठे ॥ ४९ ॥

शिव की माया से मोहित मुझसे वे कहने लगे कि इस समय मुझसे तुम इतनी स्पर्धा क्यों कर रहे हो ? हम दोनों के मध्य तो एक तीसरा भी आ गया है, इसलिये युद्ध रोक दिया जाय ॥ ५० ॥ हम दोनों इस अग्नि से उत्पन्न लिंग की परीक्षा करें कि यह कहाँ से प्रकट हुआ है । मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भ के नीचे जाऊँगा और हे प्रजानाथ ! आप इसकी परीक्षा करने के लिये वायुवेग से प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ऊपर की ओर जायँ ॥ ५१-५२ ॥

ब्रह्माजी बोले — तब ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णु ने वाराह का रूप धारण किया और हे मुने ! मैंने भी शीघ्र हंस का रूप बना लिया ॥ ५३ ॥ उसी समय से लोग मुझे हंस-हंस और विराट् ऐसा कहने लगे । जो ‘हंस-हंस’ यह कहकर मेरे नाम का जप करता है, वह हंसस्वरूप ही हो जाता है ॥ ५४ ॥

अत्यन्त श्वेत, अग्नि के समान, चारों ओर से पंखों से युक्त और मन तथा वायु के वेगवाला होकर मैं ऊपर के भी ऊपर लिंग का पता लगाते हुए चला गया ॥ ५५ ॥ उसी समय विश्वात्मा नारायण ने भी अत्यन्त श्वेत स्वरूप धारण किया । दस योजन चौड़े, सौ योजन लम्बे मेरुपर्वत के समान शरीरवाले, श्वेत तथा अत्यन्त तेज दाढ़ों से युक्त, प्रलयकालीन सूर्य के समान कान्तिमान्, दीर्घ नासिका से सुशोभित, भयंकर [घुर्र–घुर्र की] ध्वनि करनेवाले, छोटे-छोटे पैरों से युक्त, विचित्र अंगोंवाले, विजय प्राप्त करने की इच्छा से परिपूर्ण, दृढ़ तथा अनुपम वाराह का स्वरूप धारण करके वे भगवान् विष्णु भी अत्यन्त वेग से उसके नीचे की ओर गये ॥ ५६-५८ ॥ इस प्रकार रूप धारणकर भगवान् विष्णु एक हजार वर्ष तक नीचे की ओर ही चलते रहे । उसी समय से [पृथिवी आदि] लोकों में श्वेतवाराह नामक कल्प का प्रादुर्भाव हुआ । हे देवर्षे ! यह मनुष्यों की कालगणना की अवधि है ॥ ५९१/२ ॥

इधर [अत्यन्त तीव्र गतिसे] नीचे की ओर से जाते हुए महातेजस्वी विष्णु बहुत प्रकार से भ्रमण करते रहे, किंतु महावाराहरूपधारी विष्णु उस ज्योतिर्लिंग के मूल का अल्प भाग भी न देख सके ॥ ६०१/२ ॥

हे अरिसूदन ! तबतक मैं भी उस ज्योतिर्लिंग के अन्त का पता लगाने के लिये वेग से ऊपर की ओर जाता रहा । यत्नपूर्वक उस ज्योतिर्लिंग के अन्त को जानने का इच्छुक मैं अत्यन्त परिश्रम के कारण थक गया और उसका अन्त बिना देखे ही थोड़े समय में नीचे की ओर लौट पड़ा ॥ ६१-६२ ॥ उसी प्रकार सर्वदेवस्वरूप, महाकाय, कमललोचन, भगवान् विष्णु भी थकान के कारण ज्योतिर्लिंग का अन्त देखे बिना ही ऊपर निकल आये ॥ ६३ ॥ शिव की माया से विमोहित विष्णु आकर मेरे साथ ही भगवान् शिव को बार-बार प्रणाम करके व्याकुल चित्त से वहाँ खड़े रहे ॥ ६४ ॥ पृष्ठ प्रदेश की ओर से, पार्श्वों की ओर और आगे की ओर से परमेश्वर शिव को मेरे साथ ही प्रणाम करके विष्णु भी सोचने लगे कि यह क्या है ? ॥ ६५ ॥ वह रूप तो अनिर्देश्य, नाम तथा कर्म से रहित, अलिंग होते हुए भी लिंगता को प्राप्त और ध्यानमार्ग से अगम्य था । तदनन्तर अपने मन को शान्त करके मैं और विष्णु दोनों शिव को बार-बार प्रणामकर कहने लगे — हे महाप्रभो ! हम आपके स्वरूप को नहीं जानते । आप जो हैं, वही हैं, आपको हमारा नमस्कार है । हे महेशान ! आप शीघ्र ही हमें अपने स्वरूप का दर्शन करायें ॥ ६६-६८ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार अहंकार से आविष्ट हुए हम दोनों को वहाँ नमस्कार करते हुए सैकड़ों वर्ष बीत गये ॥ ६९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के प्रथम खण्ड में सृष्टि-उपाख्यान का विष्णु-ब्रह्मा-विवाद वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

 

 

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